प्रंदह उच्च समाचार (Top High Fifteen News) (Download PDF)

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अमेरिका व चीन: - अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग वॉशिगटन में आमने-सामने मिल रहे हैं तो दोनों देश दुनिया में अपनी जगह का फिर आकलन करने में लगे हैं। दोनों विपरीत दिशा में देख रहे हैं: अमेरिका वैश्विक जिम्मेदारियों से दूर जा रहा है, तो चीन इसकी ओर बढ़ रहा है। ट्रंप प्रशासन खरगोश की तरह दौड़ रहा है, जिसमें कई बार वह खुद विरोधाभास में होता है। इसमें उसे कोई प्रतिदव्ंदव्ी दिखता है, तो वह उससे भी टकराने का इच्छुक है। चीन कछुए की तरह धीमे कदम उठा रहा है। कछुए-खरगोश की दौड़ की कहानी लिखने वाली ईश्वर ही जाने कि इस स्पद्वार् का अंत कैसा होगा।

चीन की विदेशी नीति के सिद्धांत में डेंग शियाओपिंग की यह हिदयात थी कि देश लो (नीचा) प्रोफाइल (पार्श दृश्य) रहे, नेतृत्व न करे, पहल न करे और फर्क पैदा करके दिखाए। 2010 में तब थोड़ा फर्क आया, जब अधिकारी कहने लगे कि चीन को ’सक्रियता’ दिखाकर फर्क पैदा करना चाहिए। इस साल जनवरी में दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक में शी ने कहा-चीन को आर्थिक वैश्वीकरण को दिशा देनी चाहिए। कहते हैं कि शी का मूल भाषण घरेलू अर्थव्यवस्था पर था लेकिन, शी ने उसे खारिज कर विदेशी विशेषज्ञों से चीन की विश्व दृष्टि पर भाषण तैयार करवाया। उनका भाषण लहजे व विषय की दृष्टि से उल्लेखनीय रूप से अंतरराष्ट्रीय था। एक दिन बाद ही शी ने साफ कर दिया कि उनकी निगाह किस पर है। संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने ’अपनी इच्छा दूसरों पर थोपने वाले दादा’ की बात करते हुए अमेरिका को ’थूसिडाइड्‌स ट्रंप’ की चेतावनी दी-प्रचीन ग्रीस का वह विनाश जो तब हुआ, जब प्रभावी शक्ति ’स्पार्टा’ ने उभरती शक्ति एथेंस को स्वीकार नहीं किया। क्या चीन अमेरिका को वैश्विक नेतृत्व के लिए चुनौती दे रहा है? इस सवाल का उत्तर देने के लिए चीन की राजनीतिक कार्यप्रणाली देखनी होगी। राष्ट्रपति के भाषण में नीतियां पूर्णरूप से नहीं उभरतीं। अधिकारी आने वाले बदलाव के सूक्ष्म संकेत भेजने को तरजीह देते हैं ताकि नाकामी हो तो सरकार के लिए पीछे हटने की गुंजाइश रहे। फिर सिस्टम (प्रबंध) में नीचे इन संकेतों को और मजबूती से भेजा जाता है, जिसे बाद में सरकारी मीडिया (साधन) में उस पर बहस होती है। विदेश नीति के क्षेत्र में फिलहाल यही सब हो रहा है। चीन प्रधानमंत्री ली केकियांग ने सालाना ’वर्क रिपोर्ट’ (कार्य विवरण) में कुआनकिउ (वैश्विक) और कुआनकिहुआ (वैश्वीकरण) का 13 बार उल्लेख किया।

कथित ’चाइना सॉल्यूशन’ (विलय) का उल्लेख पिछली जुलाई में पहली बार चीनी कम्युनिस्ट (साम्यवाद) पार्टी (राजनीतिक दल) की 95वीं वर्षगांठ पर किया गया था। वहां शी ने कहा था-चीन के लोगों को पूरा आत्मविश्वास है कि वे बेहतर सामाजिक संस्थानों की दुनिया की तलाश का बेहतर ’चीनी समाधान’ दे सकते हैं। कोई नहीं बता रहा कि यह ’चीनी समाधान’ है क्या। इसका जो भी अर्थ हो, हर चीज के लिए एक समाधान है। मध्य ऐशिया में अरबो डॉलर (अमरीका आदि देशों की प्रचलित मुद्रा) का निवेश वहां की गरीबी व अस्थिरता का चीनी समाधान है। ’चाइना पॉलिसी’ (राजनीति) कंसल्टेंसी (परामर्शदाता) के डेविड केली के मुताबिक चीनी समाधान पश्चिमी देशों सहित हर किसी के लिए है। इससे न सिर्फ बड़ा खेल खेलने का चीनी नेतृत्व का संकल्प दिखता है, बल्कि बढ़ता आत्मविश्वास भी नजर आता है कि चीन यह कर सकता है। पिछले साल अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर के अधिकांश हिस्से पर चीनी प्रभुत्व को ठुकरा दिया था। लेकिन, चीन ने मामला उठाने वाले फिलिपींस को यह कानूनी जीत त्याग देने, अमेरिका से निकट संबंध खत्म करने और बहुत बड़े चीनी निवेश को स्वीकार करने के लिए जल्दी मना लिया। अमेरिका का दूसरा निकटवर्ती मलेशिया, जिसकी समुद्री सीमा का भी चीन से विवाद है, उसने भी इसी तरह का समझौता कर लिया।

निश्चित ही यह शी के ’बेल्ट (पेटी) एंड (और) रोड (सड़क) इनिशिएटिव’ (प्रारंभिक/उपक्रम) के लिए भी उल्लेखनीय रहा। इसमें चीन व यूरोप के बीच आधारभूत ढांचे में निवेश किया जाता है। इसके तहत अनुंबध पिछले साल 1 खरब डॉलर के निकट पहुंच गए। बेल्ड एंड रोड के 60 से ज्यादा देशों में चीन का निर्यात अमेरिका व यूरोपीय संघ से ज्यादा हो गया है। मई में शी इसका जश्न मनाने वाले हैं। लेकिन, वैश्वीकरण और चीनी पीठ दिखा रहा है अथवा अमेरिकी नेतृत्व को चुनौती दे रहा है। वह समीक्षावादी महाशक्ति है, जो मौजूदा ढांचे के तहत प्रभाव बढ़ाना चाहती है। चीन संयुक्त राष्ट्र में योगदान देने वाला तीसरा बड़ा देश है। पिछले साल उसने 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता की। उसने दो वित्तीय संस्थान-एशियन (ऐशिया सं संबंधित) इन्फ्रांस्ट्रक्चर (बुनियादी संरचना) इनवेस्टमेंट (निवेश) बैंक (अधिकोष) और न्यू (नया) डेवलपमेंट (विस्तार) बैंक (अधिकोष) स्थापित किए हैं। ये विश्व बैंक की तर्ज पर ही बनाए गए हैं। शी के लिए व्यापार व वित्त संबंधी, वैश्विक नियमों का बहुत महत्व है।

अब जब ट्रंप अपने पूर्ववर्ती कीे जलवायु परिवर्तन संबंधी नीतियों को ध्वस्त कर रहे हैं तो ग्रीन पीस के ली शीड कहते हैं कि इसलिए चीन अब अकेले ही आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है। चीनी विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी जांग जुन ने कहा-’चीन नेतृत्व के लिए नहीं दौड़ रहा है, अग्रणी देश पीछे हठकर चीन के लिए रास्ता छोड़ रहे है।’ उन्होंने कहा यदि चीन दुनिया नेतृत्व संभालता है तो वह जिम्मेदारियां भी स्वीकार करेगा।

चाइना मॉडल (आदर्श) की बात करने वाले उसके राष्ट्रपति शी अब ’चाइना सॉल्यूशन’ की बात कर रहे हैं पर बता नहीं रहे कि वह है क्या। निश्चित तौर पर वे वैश्विक रणनीति पर काम कर रहे हैं।

ब्रिटिश: -

  • उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर उथल-पुथल जारी है। इससे ब्रिटेन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। नीतिगत बदलावों से ब्रिटिश विश्वविद्यालय के सामने वैश्विक प्रासंगिकता, मंदी से उबरने व अंतरराष्ट्रीय छात्रों के प्रति पहले की तरह आकर्षण पैदा करने की समस्या उठ खड़ी हुई है। वहां के शिक्षाशास्त्री भी मानते हैं कि इससे पार पाने के लिए ब्रिटिश विश्वविद्यालय के समक्ष ’बॉर्डरलेस (अनवधि) एजुकेशन’ (शिक्षा) अंतिम विकल्प है। इस पर तेजी से अमल करने के बाद ही ब्रिटेन अपनी बादशाहत पहले की तरह बरकरार रख पाएगा।
  • हिस्सा-ब्रिटिश विश्वद्यालयों के शिक्षाविदों और प्रशासकों का कहना है कि बदली परिस्थितियों में ट्रांस (पार) -नेशनल (राष्ट्रीय) एजुकेशन (शिक्षा) (टीएनई) की नीतियों पर फिर से पुनर्विचार करने की जरूरत है। दुनियाभर में सिरमौर बने रहना है तो टीएनई को अपने शैक्षिक पाठयक्रमों का अहम अंग बनाए रखना होगा। इस योजना के तहत तकनीक शिक्षा को विभिन्न पाठयक्रमों के केन्द्र में रखना जरूरी है। साथ ही उन भ्रांतियों से भी शैक्षिक संस्थानों को बचाने पर जोर देना होगा जो अंतरराष्ट्रीय छात्रों के बीच हमारी शिक्षा व्यवस्था की नकारात्मक छवि पेश करने लगी हैं। 2012 - 2013 और 2013 - 2014 के बीच वहां टीएनई पर जोर देने की वजह से 13.4 फीसदी अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई थी।

विश्व स्तर-

  • विश्व स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में लगातार कमजोर होती स्थिति के मद्देनजर ब्रिटेन में शिक्षां व्यवस्था को लेकर बहस छिड़ गई है। ब्रिटिश उच्च शिक्षा के रणनीतिकार पॉल फेल्डमैन का कहना है कि इस स्थिति से बाहर आने के लिए सभी विश्वविद्यालय के लिए उच्च शिक्षा की रणनीतियों पर पुनर्विचार करना जरूरी हो गया है।
  • ग्लोबल (विश्वव्यापी) वर्ल्ड (विश्व) में एकला चलो की नीति पर आगे बढ़ना ब्रिटेन के लिए लाभकारी नहीं होगा। दुनियाभर में जारी विकास व भविष्यगत मूल्यों को पाठ्‌यक्रमों में शामिल करना होगा, ताकि ब्रिटिश शिक्षा पद्धति दुनियाभर के युवाओं के लिए प्रासंगिक साबित हो सके। तभी जाकर ब्रिटिश शिक्षा पद्धति पहले की तरह दुनियाभर के युवाओं के लिए आगे भी आकर्षण का केंद्र बना रह सकता है और अंतरराष्ट्रीय छात्र यहां पर शिक्षा लेना पसंद करेंगे।
  • असर-ब्रिटिश पीएम थेरेसा में सरकार की नई शिक्षा नीति से गुणवत्ता का स्तर प्रभावित हुआ है। आशंका यह भी जताई जा रही है कि इससे शोध कार्यो में भी कमी आएगी।

प्रतिभा-

  • विश्वविद्यालय कैंपस (परिसर) में प्रतिभाओं के आने से नए विचार, तकनीक, मानवीय मूल्य सामने आते हैं, जिसका सीधा लाभ अभी तक मिलता रहा है।
  • यूरोपीय यूनियन से अलग होने के बाद ब्रिटिश विश्वविद्यालयी शिक्षा को झटका लगा है। शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आई है। बदले माहौल में छात्र खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। इससे पार पाने के लिए ब्रिटिश विश्वविद्यालय फ्रांस के इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) कैंपस (परिसर) मॉडल (आदर्श) का अनुसरण करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। फ्रास के पेरिस व अन्य विश्वविद्यालय ऐसा कर विदेशी छात्रों को आकर्षित करने में काफी सफल रहे है। उन्होंने ब्रिटिश विश्वविद्यालयों को इसमें भागीदार बनने का आमंत्रण दिया है।
  • जरूरत-इस मामलें में ब्रिटेन को अमरीका, कनाडा और आस्ट्रेलिया से भी सीख लेने की जरूरत है। आस्ट्रेलियाई सरकार ने विदेशी छात्रों को आकर्षित करने के लिए विशेष नीतियों पर अमल किया है। इससे विदेशी छात्रों के लिए बेहतर माहौल बना है। वहां के शिक्षा मंत्री को सीधे तौर पर इसकी जिम्मेदारी दी गई है।
  • चिंताजनक- सख्त वीजा नीति अपने छात्रों को प्राथमिकता देने, जाने-अनजाने में ट्रांसनेशनल (अनुवाद) एजुकेशन (शिक्षा) की उपेक्षा करने की वजह से ब्रिटिश शिक्षा संस्थानों की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। हेपी (खुश) रिपोर्ट (विवरण) में भविष्यवाणी की गई है कि वीजा प्रतिबंधों की वजह से 20, 000 विदेशी छात्र ब्रिटेन में तत्काल अपनी पढ़ाई बंद कर सकते है।

नुकसान-

  • नई नीति पर जोर देने से ब्रिटिश विश्वविद्यालयों को सालाना दो बिलियन (दस अरब संख्या) पाउंड (कुछ देशों का सिक्का) का नुकसान हो सकता है। अनुसंधान की दृष्टि से यह आगे और ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है।
  • वर्तमान सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों को 2020 तक 30 अरब पाउंड (कुछ देशों का सिक्का) आर्थिक सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई है। 2012 में सरकार ने 18 अरब पाउंड की सहायता राशि दी थी। यानी आगामी चार वर्षो में 12 अरब पाउंड सहायता राशि शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ाने का आश्वासन दिया गया है।
  • ब्रिटिश विश्वविद्यालय में विदेशी छात्रों के पढ़ाई करने से देश को काफी आर्थिक लाभ भी हुआ था। इस स्थित को बना रखने के लिए ओवरसीज (समुद्र पार) कैंपस (परिसर) माकूल साबित होगा।

श्रीनगर: -

  • श्रीनगर संसदीय सीट (स्थान) के लिए बीते 9 अप्रेल को उपचुनाव हुआ। हमें भी कम मतदान की तो आशंका थी पर यह इतना नीचा रहेगा, इसका अनुमान हमने नहीं किया था। केवल 6.5 फीसदी ही मतदान। इसका अर्थ हुआ कि पिछले साल जम्मू -कश्मीर में हुई हिंसा को लेकर लोगों के बीच नारजगी काफी गहरी है। उपचुनाव के दौरान भी श्रीनगर, बड़गाम और गांदेरबल जिलों के करीब 100 मतदान केंद्रो पर हिंसा हुई, जिसमें अनेक लोग घायल हुए और करीब 10 लोगों की मौत की खबर सुनने को मिल रही है। हमारा अनुमान था कि शहर के आसपास के इलाकों में ही लोगों की नाराजगी है लेकिन समझ में आ रहा है कि ग्रामीण इलाकों में ही लोगों की नाराजगी कम नहीं हुई है। उल्लेखनीय है कि श्रीनगर संसदीय क्षेत्र पर उपचुनाव इसलिए कराना पड़ा क्योंकि इस क्षेत्र के सांसद तारिक अहमद कर्रा ने पिछले साल हुई हिंसा से नाराज होकर इस्तीफा दे दिया था। वे पीडीपी के टिकट पर जीते थे लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस से हाथ मिला लिया था। वैस बीते साल की हिंसा के विरोध के प्रति पीडीपी और नेशनल (राष्ट्रीय) कॉन्फ्रेंस (सम्मेलन) के नेताओं का रुख नरम ही रहा है लेकिन यह सारी बातें मतदाताओं को समझ में आती हैं। कई बाद ऐसा कहा जाता है कि फारुख अब्दुल्ला या किसी अन्य नेता के बयानों के बाद माहौल बिगड़ा है तो मेरा मानना है कि फारुख अब्दुल्ला जैसे नेताओ के बयानों की अब उतनी अहमियत नहीं है। लोगों को समझ में आता है कि वे अपने आप को चर्चा में बनाए रखने के लिए और स्थानीय लोगों की हमदर्दी बटोरने के लिए बयान देते रहे हैं।
  • श्रीनगर संसदीय सीट पर वे भी एक उम्मीदवार हैं और यह सीट नेशनल कॉन्फ्रेंस (राष्ट्रीय, सम्मेलन) का परंपरागत गढ़ भी रहा है। ऐसा लगता भी है कि बहुत ही कम मतगणना का लाभ नेशनल कॉन्फ्रेंस (राष्ट्रीय, सम्मेलन) को ही मिलने वाला है। इस बात को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि चुनाव के दौरान होने वाली हिंसा और कम मतदान में केवल पार्टी से लंबे समय से जुड़ाव रखने वाले कट्‌टर मतदाता ही मतदान के लिए निकलते हैं। हालांकि यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि श्रीनगर संसदीय चुनाव के दौरान सर्वाधिक मतदान 1984 में हुआ था, तब 73 फीसदी मतदान हुआ था 1990 के बाद श्रीनगर पार्टी के मतदाताओं का रुझान सैयद शाह गिलानी, मीरवाइज, यासीन मलिक जैसे अलगाववादी नेताओं की ओर हो गया। तब से ही वहां मतदान प्रतिशत में गिरावट आने लगी। 1999 के लोकसभा चुनाव में तो इस संसदीय क्षेत्र पर 12 फीसदी मतदान ही हो सका था लेकिन इस बार तो हद ही हो गई। समझ में नहीं आता कि इतने कम मतदान को चुनाव माना भी जाना चाहिए कि नहीं? मेरी राय में तो श्रीनगर संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में कम मतदान का सीधा अर्थ मतदाताओं की ओर से ’अविश्वास’ व्यक्त करना ही माना जाना चाहिए’। वास्तव में यह सभी के लिए चौंकाने वाला है और पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार के लिए चुनौती भरा है। शायद, इतने कम मतदान से उनका आत्मविश्वास ही हिल गया होगा। यह उनके लिए आत्मंथन करने की ओर संकेत कर रहा है।
  • दरअसल, परेशानी ही यह है कि सरकार संकेतों को नहीं पढ़ पा रही है। पहला संकेत तो तभी मिल गया था जब मुफ्ती मोहम्मद सईद जैसे लोकप्रिय नेता के जनाजे में बहुत ही कम लोग पहुंच थे। इसके बाद भी पीडीपी ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। जैसे-तैसे सरकार बन भी गई लेकिन काम के लिहाज से कुछ नहीं हुआ। विकास की बात वहीं की वहीं है। किसी विद्युत परियोजना पर कोई फैसला हो रहा हो, ऐसा भी नहीं लगता। लोगों की आधारभूत समस्याएं जस की तस हैं। पीडीपी-भाजपा घाटी में लोकप्रिय गठबंधन नहीं बल्कि मजबूरी का गठबंधन अधिक दिखाई दे रहा है। यह सब भी ठीक रहता लेकिन आमतौर पर जैसा होता आया है कि घाटी में जब भी हिंसक कार्रवाई होती है, केंद्र सरकार या राज्य सरकार की ओर से हमदर्दी की बात होती रही है। लोगों को सहायता दिए जाने के प्रयास होते हैं पर इस बार ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। लोगों की अपेक्षाओं पर सरकार खरी नहीं उतर रही। इसे लेकर भी बहुत गहरे तक लोगों की नारजगी रही है लगता है कि आम जनता को सुध लेने वाली सरकार वहां है ही नहीं। देश के अन्य भागों में कभी गाय तो कभी मुस्लिमों को लेकर जिस तरह की राजनीति होती रही है। उसे लेकर स्थानीय लोग बातें करते हैं कि जम्मु-कश्मीर ने भारत के साथ रहना इसलिए पसंद किया था क्योंकि वह सांप्रदायिक राजनीति और ऐसे वातावरण से दूर रहना चाहता था। लेकिन, अब लगता है कि कहीं वह फैसला गलत तो नहीं हो गया। पिछले दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के नेतृत्व में एक दल कश्मीर आया था, उसकी रिपोर्ट (विवरण) में भी कहा गया है कि घाटी के हालात सुधारने के लिए युवाओं के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू किया जाए लेकन इसकी शुरुआत भी नहीं हो सकी है।
  • अब भी समय है संकेतों को समझा जाए। जो लोग पत्थर फेंकते है वो गोलियों के शिकार हानेे से नहीं हिचकिचाते। यह भी समझना होगा कि अनंतनाग का चुनाव क्यों टालना पड़ा। इसे ध्यान रखना होगा कि चुनाव की तारीख 25 मई 2017 रखी गई है लेकिन इस दिन से रमजान शुरू हो रहा है और अमरनाथ यात्रा की तैयारियां भी हो रही होगी। समझना तो होगा कि क्या ये तारीखें सही हैं? अन्यथा फिर से कम मतदान को झेलेंगे
  • श्रीनगर संसदीय सीट के लिए हुए उपचुनाव में मात्र 6.5 फीसदी मतदान हुआ। सवाल यह है कि आखिर क्यों हुआ ऐसा? क्या यह पिछले साल कश्मीर घाटी में हुई हिंसा को लेकर नारजगी का असर था? क्या इसे पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार के प्रति गुस्सा भी कहा जा सकता है? यदि अनंतनाग में चुनाव होते तो क्या इसी तरह मतदान होता?

प्रो. नूर अहमद बाबा, कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रमुख। तीस से अधिक वर्षों का अध्यापन अनुभव।

ब्राजील: -

  • ब्राजील के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति मिशेल टेमर की कैबिनेट (मंत्रिमंडल) के आठ मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार मामलों की जांच के आदेश दिए हैं। इनमें राष्ट्रपति कार्यालय के प्रमुख एलिसु पडिल्डा भी शामिल हैं। ब्राजील में भ्रष्टाचार के आरोप में डिल्मा रूसेफ को राष्ट्रपति पद से महाभियोग लगाकर बर्खास्त किया गया था। उसके बाद उपराष्ट्रपति मिशेल टेमर को राष्ट्रपति बनाया गया था। जस्टिस एडसन फचिन ने 74 मामलों में 108 लोगों के खिलाफ जाचं के आदेश दिए हैं। इनमें संसद के दोनों सदनों के अध्यक्ष भी शामिल हैं। टेमर सरकार के एक तिहाई मंत्री जाच के घेरे में हैं। इनमें विदेश, कृषि और व्यापार मंत्री भी हैं।

मॉस्को: -

  • अमेरिका के विदेश मंत्री रैक्स टिलरसन ने पहली बार मॉस्को में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात की। टिलरसन ने कहा कि रूस अब राष्ट्रपति असद का साथ छोड़ दे। वहीं, लावरोव बोले कि वे सीरिया मसले पर अमेरिका की असल नीयत जानने की कोशिश कर रहे हैं। सीरिया को लेकर अमेरिका और रूस में तनाव के बीच दोनों देशों के नेताओं की यह पहली मुलाकात है।
  • मॉस्को के नूकोवो हवाई अड्‌डे पर टिलरसन का स्वागत अमेरिका में रूसी राजदूत जेम्स टैफ्ट ने किया। टिलरसन नाटो की बैठक को छोड़कर मॉस्को पहुंचे हैं। इससे पता चलता है कि अमेरिका के लिए रूस से बातचीत कितनी जरूरी है। टिलरसन ने कहा, हम दोनों देशों के मतभेदों की गंभीरता को समझते हैं। हम इन्हें दूर करने की कोशिश करेंगे। वहीं, लावरोव ने कहा कि रूस को सीरिया में अमेरिकी हमले पसंद नहीं हैं, ये बुनियादी रूप से गलत हैं, गैर कानूनी हैं। उन्होंने कहा कि टिलरसन का दौरा बहुत ही सही समय पर हुआ है। इससे हमें अमेरिका की असल नीयत समझने का मौका मिलेगा।

अमृतसर: -

  • वैशाखी है शहादत, शौर्य, श्रम और समृद्धि का पर्व है। देशभर में 13 अप्रेल को मनाए जाने वाले इस पर्व के साथ इतिहास की कई घटनाएं जुड़ी है। इसी दिन सन्‌ 1699 में सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। इसी दिन 1919 को ब्रिटिश राज में अमृतसर के जलियांवाला बाग में सभा कर रहे निहत्थो लोगों पर अंधांंधुंध गोलीबारी की जिसमें बड़ी संख्या में लोग शहीद हो गए थे। वैशाखी जहां शहादत की याद दिलाती है, वहीं खेतों में लहलहाती फसलों के गीत भी गाती है। पहले पंजाब वैशाखी पर नई फसल आने की खुशी में झुमता था।
  • दुनिया भर के नृशंस हत्याकांडों में से एक अमृतसर का जलियावाला बाग हत्याकांड 13 अप्रेल 1919 को हुआ था। रोलेट एक्ट (काम) के विरोध में आयोजित सभा पर जनरल डायर ने बिना चेतावनी गोलियां चलवा दी थी। करीब एक हजार लोग मारे गए और दो हजार लोग जख्मी हुए। बाग की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान हैं। यहां स्मारक बनाया गया हैं।

शहादत-

  • भले ही जालियावाला बाग हत्याकांड को 98 साल हो गए हों। पर 13 अप्रेल का नाम आते ही अब भी युवाओं के जहन में भारतीय इतिहास का यह काला दिन तरोताजा हो जाता है। गुरुनानकपुरा के कुछ युवाओं से बात करने पर मालूम पड़ा कि हर साल 13 अप्रेल को वैशाखी तो मनाई जाती है, लेकिन इस दिन लोगों के दिन में गम भी होता है। क्योंकि इसी दिन अमृतसर स्थित जालियांवाला बाग में देश की आजादी के लिए रक्षा कर रहे सैकड़ों बेगुनाहों को मौत के घाट उतार दिया गया था। कुछ युवाओं ने तो इसके जवाब दिए। कई युवाओं को इसकी कम जानकारी थी। वहीं कुछ युवाओं ने पूरा घटनाक्रम बताया। परवीन्द्र सिंह ने बताया कि 13 अप्रेल 1919 को वैशाखी के दिन जालियावाला बाग में अंग्रेजों की गोली से सैंकड़ों लोग मारे गए और घायल हुए। 388 शहीदों की सूची है जलियावाला बाग में शहीदों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते हैं। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने यह आंकड़ा कम बताया। लेकिन माना जाता है कि करीब 1000 लोग शहीद हुए करीब 2000 लोग घायल हुए थे।

विरोध-

  • युवाओं को सभा होने का कारण भी मालूम है। शरबजीत सिंह ने बताया कि लोग अंग्रेजों के बनाए रोलेट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्ण तरह से सभा कर रहे थे। बाग से निकलने के लिए एक ही पतली गली थी। डायर ने सिपाहियों को गली के मुख्य द्वार पर तैनात कर गोलियां चलवा दी। जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए।

पंजाब: -

  • पंजाब में नहरी खेती का इतिहास शताब्दियों पुराना है। अरब देश से इब्नबतूता नामक यात्री 14वीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आया था तो उसने कुछ दिन पंजाब में भी बिताए थे। श्रीगंगानगर से 45 किलोमीटर दूर पंजाब के अबोहर की यात्रा का जिक्र इब्नबतूता ने अपनी पुस्तक में किया है। उस वर्णन से पता चलता है कि अबोहर और उसके आसपास नहरें थी और किसान उनसे खेतों में सिंचाई करते थे। अबोहर के बारे में बतूता ने लिखा है कि यह शहर रमणीक है और मकान भी सुन्दर बने हुए हैं। नहरों और वृक्षों की इलाके में बहुतायत हैं।

श्रीगंगानगर-

  • श्रीगंगानगर जिले में सिख किसानों ने अपनी मेहनत से धोरों से अटी धरती को समतल कर सिंचाई से खेती शुरू की तो यह इलाका सरसब्ज होने लगा। सिखों के अनुभव को स्थानीय किसानों ने अपनाया तो यहां कपास गेहूं, सरसों और गन्ना जैसी फसलें होने लगी। गेहूं में सर्वाधिक उत्पादन करने पर सरदार बलवंत सिंह को भारत सरकार ने कृषि पंडित की उपाधि दी, वहीं इस इलाके में बागवानी को बढ़ावा देने पर सरदार करतारसिंह नरूला को भारत सरकार ने उद्यान पंडित की उपाधि से नवाजा। कृषि क्षेत्र में सिख किसान आज भी नवाचार कर रहे हैं।

योजना गंगनहर-

  • गंगनहर के निर्माण के साथ-साथ महाराजा गंगासिंह के दिमाग में एक और विचार बार-बार आ रहा था कि रियासत के स्थानीय बाशिंदे नहरी खेती के तौर-तरीकों से अंजान हैं। ऐसे में नहर का पानी कही व्यर्थ नहीं चला जाए। गंगनहर के निर्माण के समय पंजाब आते-तो महाराजा गंगासिंह ने वहां के किसानों को नहरी पानी से खेती करते देखा था। विचार विमर्श के बाद योजना बनी पंजाब के सिखों को बीकानेर रियासत में लाकर बसने की। महाराजा ने इस बारे में महाराजा पटियाला और महाराजा फरीदकोट से बात की तो उन्होंने इसके लिए इजाजत दे दी। सिखों के लिए तब न्यूनतम दर और किस्तों पर भूमि देने की योजना बनी। लेकिन सिख इतने पर बीकानेर रियासत के रेतीले और उजड़ इलाके में आकर बसने को तैयार नहीं हुए। सिखों को एक डर यह भी था कि पराई जगह जाकर कहीं दोयम दर्जे के नागरिक बनकर नहीं रह जाएं। यह बात महाराजा गंगासिंह तक पहुंची तो उन्होंने सिखों के प्रमुख लोगों से बातचीत की। इस वार्ता में सिखों की ओर से कई शर्ते रखी गई। उन शर्तो में सिखों को बीकानेर रियासत के नागरिक का दर्जा देना, जमीन का मालिकाना हक देना आदि शर्ते मुख्य थी। महाराजा ने इन पर सहमति दे दी।
  • अत: 1899 के अकाल से द्रवति होकर पंजाब से नदियों का पानी लाने की योजना बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने बनाई थी। यह नदी 1927 को बनकर बीकानेर कैनाल में तैयार हुई थी। बाद में इसे ही महाराजा गंगासिंह के नाम पर गंगनहर कहा जाने लगा।

अमरीका: -

  • अमेरिका ने 2003 में एमओबी, यानी मदर ऑफ ऑल बम बनाया था। तब इराक की लड़ाई चल रही थी। अमेरिकी विशेषज्ञों ने इसे महज 9 हफ्तो में तैयार किया था। उस समय ऐसे सिर्फ 15 बम बनाए गए थे। पहला टेस्टर (परीक्षा करने वाली) फायर (अग्नि) 11 मार्च 2003 को फ्लोरिडा में किया गया था। उसके बाद इसका कभी भी इस्तेमाल नहीं किया गया। पहली बार अमेरिका ने इसका प्रयोग किया है। हालांकि अमेरिका इससे पहले ईरान पर एमओएबी से हमले की तैयारी कर चुका था।

बम के विषय में-

  • एक बम की कीमत 103 करोड़ रुपए हैं। वजन 10 हजार किलो, लंबाई 9 मीटर, चौड़ाई 1 मीटर, विस्फोटक 11 टन एच-6 टीएनटी और एल्युमीनियम (एक प्रकार की हल्की धातु) । रेंज (श्रेणी) गिराने वाली जगह पर 1.5 मील तक सब तबाह।

रूस-

  • अमेरिका को जवाब देने के लिए रूस ने एमओएबी से 4 गुना ताकतवर बम बनाया था। इसे फॉदर ऑफ ऑल बम कहा गया। इसका प्रयोग नहीं हुआ है। फादर ऑफ ऑल बम नामक इस श्रेणी का परीक्षण रूस ने किया था। दावा था कि हमारा बम जीबीयू से तीन गुना ताकतवर है।

अमरीका व अफगानिस्तान-

  • अमरीका ने अब तक का सबसे बड़ा नॉन न्यूक्लियर (गैर-परमाणु) हमला अफागनिस्तान पर किया। बम को मदर ऑफ ऑल बॉम्ब (मोआब) नाम दिया। यह जीबीयू 43 कैटेगरी (कोटि) का बम है। यह किसी भी युद्ध में गिराया गया सबसे बड़ा गैर-परमाणु बम था। नांगरहार प्रांत में आईएसआईएस की सुरंगो को निशाना बनाया गया। इसको एम सी 130 कार्गो विमान से गिराया। हमला अफगान के समयानुसार 13 अप्रेल को शाम 7 बजे किया।

जवाब-

  • माना जा रहा है हमले के पीछे अमरीका की मंशा उत्तर कोरिया के लिए चेतावनी भी है, जो 16 अप्रेल तक अगला परमाणु परीक्षण करने पर उतारू है। जब व्हाहट हाउस के प्रवक्ता शॉन स्पाइसर से पूछा गया कि क्या अब सीरिया और उ. कोरिया पर भी ऐसे हमले किए जाएंगे तो वे पहले तो जवाब टाले गए, बाद में उन्होंने कहा कि इस संबंध में आप रक्षा मंत्रालय से संपर्क करे।
  • हमें गर्व कि अफगान पर हमने मदर ऑफ ऑल बॉब गिराया है।

डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति, अमरीका

जीबीयू 43/बी, एमओएबी मैसिव ऑर्डनेंस एयर (हवा) ब्लास्ट (धमाका) बम -नॉन न्यूक्लियर कैटेगरी, यूनाइटेड (संयुक्त) स्टेट्‌स (राज्य) मिलिट्री (सैन्य) द्वारा विकसित, 11 टन तक विस्फोटक क्षमता, एयर (हवा) फोर्स (शक्ति) लेबोरेट्री (प्रयोगशाला) के अल्बर्ट एल. वेमाट्‌र्स जू. ने बनाया। इस बम में एक ग्रिड होता है जो फोल्ड हो जाता है। ताकि इसका साइज छोटा हो जाए और इसे विमान में रख सके। यह एक पैलेट के जरिए काम करता है, पैलेट को पैराशूट (अवतरण छत्र) के जरिए नीचे खींचा जाता है जिससे बम विमान से बाहर आता है। फिर पैलेट बम से अलग होता है ताकि बम टारगेट पर गिरे। यह जमीन से 1.8 मीटर ऊपर ब्लास्ट होता है हवा में ब्लास्ट (विस्फोट) करते हें ताकि तबाही ज्यादा हो। अफगानिस्तान में बम ब्लास्ट के बाद इसका धुआँ 30 से 35 किलामीटर दूर तक देखांं गया।

अमेरिका-

  • अमेरिका ने अफगानिस्तान में आईएस के ठीकाने पर अपना सबसे बड़ा गैर-एटमी एमओएगी बम गिराकर आतंकियों को तो धमकाया ही है, दुनियां को अपना नया तेवर भी दिखाया है। यह तेवर उसकी नई अफगानिस्तान-पाक नीति की झलक है, जिसमें नए सिरे से इस इलाके में अक्रामक उपस्थिति बनाने की पहल देखी जा सकती है। सीरिया पर मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) हमले के हफ्तेभर के भीतर हुआ यह हमला जहां अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की चुनावी आक्रामकता को हकीकत में बदलते हुए दिखाता है, वहीं इसके उद्देश्य और उपलब्धि को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। अफगानिस्तान में गिराए गए इस बम से 36 आतंकियों के मारे जाने का दावा किया गया है और व्हाइट हाउस के प्रवक्ता सान स्पाइसर ने यह भी कहा है कि इस हमले में आम आदमी को क्षति नहीं हुई है। दूसरी तरफ अपुष्ट सूत्रों से खबरें आ रही है कि इसमें कुछ नागरिक मारे गए है। मारे जाने वालों में महिलाओं और बच्चों के होने का भी दावा किया जा रहा हैं। हालांकि, इस हमले की वजह और उसके लिए दिए गए आदेश को लेकर आरंभ में परस्पर विरोधी दावे भी किए गए थे। एक दावा यह है कि अमेरिकी कमांडर मार्क डी एलनकार के मारे जाने के बाद ऐसा घातक आक्रमण किया गया है। दूसरा दावा यह है कि इस बारे में ट्रंप को बाद में जानकारी दी गई है। राष्ट्रपति ने अपनी जानकारी होने की बात मान ली है लेकिन, यह सवाल अभी भी उठ रहे हैं कि क्या गैर-एटमी हथियार के इस्तेमाल में राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक है? पर अफगास्तािन के राष्ट्रपति ने हमले को आतंकवाद नहीं अफगानियों के विरुद्ध कार्रवाई बताया है। इस हमले से आतंकवाद को कुछ नुकसान जरूर होगा लेकिन, इससे न तो उसका सामरिक समाधान निकलेगा और न ही राजनीतिक। इसलिए अमेरिका परमाणु विस्फोट को आतुर उ. कोरिया को तो धमकाना चाहता है, साथ में रूस के लिए भी कुछ सबक देना चाहता है। पहले रूस के लिए नरम और नाटो के लिए गरम दिखने वाले ट्रंंप ने दो दिनों में रणनीति बदली है और अब वे नाटो और चीन के करीब जाना चाहते हैं। भारत के लिए विशेष सतर्कता जरूरी है, क्योंकि अफगानिस्तान में भारतीय हित काफी गहरें हैं। आतंकियों पर कार्रवाई तो भारत के हित में है लेकिन, अफगानी और भारतीय नागरिकों की हानि उल्टा असर डालेगी।
  • अमेरिका ने अफगानिस्तान में आईएस के ठीकाने पर सबसे बड़ा बम गिराने के बाद अमेरिका के इरादों पर बहस छिड़ गई है। रूस, ईरान समेत कई देश इसे उकसाने वाली कार्रवाई बता रहे हैं। पर अमेरिकी सांसद केविन ने कहा कि इस हमले से आतंकियों के छिपने की सुरंगे तबाह हो गई। ट्रंप ने आईएस को जो संदेश दिया है वह रूस, उ. कोरिया, ईरान और पूरी दुनिया को सुनाई देगा। सबको पता होना चाहिए कि अमेरिका अपने सैनिकों पर हमले बर्दाश्त नहीं करेगा। जो हमले करते हैं, वे कड़ी प्रतिक्रिया की अपेक्षा कर सकते हैं।
  • अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, ’हमारा अभियान सफल रहा। हमने सेना को पूरी आजादी दी, जिसका नतीजा ऐसे सफल अभियानों के रूप में सामने आ रहा है।’ ट्रंप ने पिछले हफ्ते सीरिया पर हवाई हमले के आदेश और इस अभियान का हवाला देकर ओबामा के शासन पर भी निशाना साधा। ट्रंप ने कहा कि पिछले 8 हफ्तों में जो कुछ हुआ अगर उसकी तुलना पिछले 8 सालों से की जाए तो आपको जबरदस्त अंतर दिखाई पड़ेगा।
  • अमेरिकी ताकत- अमेरिकी न्यूज (समाचार) चैनल (मार्ग) सीएनएन ने कहा कि ट्रंप ने अपने हथियारों के बेड़े से एक बड़ा हथियार छोड़ा। ट्रंप ने अपनी ताकत दिखाने के लिए ऐसा किया। उन्हें लगता है इससे चीन, उ. कोरिया, रूस जैसी अमेरिका विरोधी ताकतें उसके दबदबे को फिर मानने लगेंगी। ट्रंप ने इस हमले से अपना एक वादा भी पूरा कर दिया है। ट्रंप विरोधी डेमोक्रेट (लोकतंत्रवादी) नेता भी इस मुद्दे पर बोलने से बच रहे हैं क्योंकि अमेरिका इसे आतंक विरोधी हमला बता रहा है। बीबीसी की रिपोर्ट (विवरण) में भी कहा गया है यह हमला अमेरिकी ताकत दिखाने के लिए किया गया। ट्रंप यह हमला कर साबित करना चाहते हैं कि वे बड़े फैसले लेने में सक्षम हैं।

अफगानिस्तान-

  • के नंगरहार इलाके में अमेरिका ने जो करीब 10 टन का महाबम गिराया है, खास बात ये है कि इसमें कम से कम एक भारतीय के मारे जाने की ख़बर भी आ रही है जो आईएस का हिस्सा था। एनआईए के मुताबिक केरल के कासरगोड़ का 26 साल का मुर्शीद मोहम्मद मारा गया है। पेंटागन के अनुसार हमला नांगरहार प्रांत के अचिन जिले में हमला हुआ। यह प्रांत अफगान और पाक की सीमा पर स्थित है। पेशवर से इसकी दूरी करीब ढाई घंटे की है। अर्थात 100 किमी दूरी पर है।
  • अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने कहा, ”मैं अमेरिकी सेना की ओर से घातक गैर परमाणु बम किराए जाने की कड़े शब्दों में निंदा करता हूं। यह कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ नहीं, बल्कि अफगानिस्तानियों के खिलाफ और अमानवीय है। अफगानिस्तान का इस्तेमाल हथियारों के परीक्षण के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
  • अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की कार्यवाई को 16 साल पूरे हो रहे हैं। और अब वे देश से निकल रहे हैं। जहां ये बम गिराया गया उस नंगरहार प्रांत में प्श्तून रहते हैं। आबादी करीब 1 लाख है। अफीम की सबसे ज्यादा पैदावार होती है। 1980 में रूस-अफगान युद्ध के समय अमेरिका समर्थित मुजाहिदीनों का गढ़ था।
  • जरूरी- अफागनिस्तान में पैठ बना चुके आईएसआईएस के आतंकी आईईडी, बंकर और सुरंगों के जरिए अपनी सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसलिए इस हमले की जरूरत आ गई थी। इससे आंतकियों को कमजोर करने और वहां हमारी सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

जनरल जॉन निकलसन, अफगानिस्तान में यूएस फोर्स (बल) के कमांडर (सेनापति)

अमेरिका ने करीब 9, 8000 किलो वजनी गैर परमाणु बम को अफगानिस्तान पर गिराया है, हालिया महीनों में अफगानिस्तान में यह सबसे बड़ी अमेरिकी कार्रवाई है, ऐसा तो अमेरिका ने तब भी नहीं किया था जब अफगानिस्तान में तालिबान के साथ उसकी लड़ाई चरम पर थी।

कनाडा: -

  • कनाडा के प्रांत ब्रिटिश कोलंबिया में दूरदराज के एक आईलैंड पर खुदाई में हजारों साल पुराना एक गांव खोजा गया है। उत्तरी अमेरिका में यह अब तक की सबसे पुरानी मानव सभ्यता के निशान माने जा रहे हैं।
  • अनुमान के मुताबिक यह गांव 14, 000 साल पुराना है। कनाडा के विक्टोरिया शहर से 500 किलामीटर उत्तर-पश्चिम में ट्रिकेट आईलैंड पर यह गांव मिला। माना जा रहा है कि गांव मिश्र के पिरामिडों से पुराना है।
  • इंडिपेंडंट (स्वतंत्र) में छपी रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिको का कहना है कि खुदाई में मिली शिल्पकृतियों में आग जलाने और मछली पकड़ने के औजार हैं साथ ही यहां से भाले भी मिले हैं। ये औजार हिमयुग के हैं जिनसे यह पता चलता है कि उत्तरी अमरीका में सभ्यता कैसे विकसित हुई।
  • खुदाई के काम में शामिल हकाई इंस्ट्‌िटयूट (संस्था) की रिसर्चर (अनुसंधान) अलीशा बताती हैं ये शिल्पकृतियां देखकर हम हैरान रह गए, ये बहुत पुरानी थीं। यह खोज नॉर्थ (उत्तरी) अमेरिका में सभ्यता की शुरूआत को लेकर हमारे अवधारणा बदल देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटिश कोलंबिया के समुद्रतट पर बड़े स्तर पर ह्यूमन (मानवीय) माइग्रेशन (प्रवास) हुआ होगा।
  • हालांकि यहां समुद्रतटों पर बसे प्राचीन गांवों की लोककथाएं मशहूर हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही हैं। ऐसे में समुद्रतट पर बसे इस गांव की खोज से इन लोककथाओं को और बल मिलेगा।

सौर ऊर्जा: -

  • भारत अक्षय ऊर्जा पर बहुत जोर दे रहा है और दुनियाभर की सोलर (सूर्य संबंधी) कंपनियां (संघ) उसे गौर से देख रही है। पिछले साल नवंबर में देश में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर (सूर्य संबंधी) प्लांट (औद्योगिक संयंत्र) स्थापित किया गया, जिससे डेढ़ लाख घरों में सप्लाई (पूर्ति करना) लायक बिजली पैदा होगी। इसमें इजाफा करते हुए भारत ने पिछले वित्तीय वर्ष में सौर ऊर्जा से बिजली बनाने की क्षमता में 5, 525 मेगावॉट और जोड़े है। इस तरह ऊर्जा के स्वच्छ स्त्रोतों से हमारा कुल उत्पादन 12, 288 मेगावॉट हो गया है।
  • ब्लूमबर्ग के मुताबिक देश के सोलर (सूर्य संबंधी) पैनल (तालिका) उत्पादन उद्योग पर मोदी जी 210 अरब रुपए खर्च करना चाहते हैं ताकि देश की फोटो (प्रकाश से संबंधित) वोल्टिक (बिजली की शक्ति की नाप की इकाई) क्षमता को बढ़ाकार इसे निर्यात उद्योग बनाया जा सके। इसे ’प्रयास इनिशिएटिव’ (उपक्रम/प्रारंभिक) का नाम दिया गया है। इसे अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। हमारे देश में बिजली के अभाव में अब भी 30 करोड़ लोग रात के अंधेर में रहने को मजबूर हें। ऐसे में सौर ऊर्जा बिजली पैदा करने का किफायती माध्यम साबित हो सकता है। इसी योजना पर काम करते हुए सरकार की अपेक्षा है कि कुल बिजली उत्पादन का 40 फीसदी अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पैदा किया जाए, जिसमें मुख्यत: सौर ऊर्जा का योगदान हो। हाल ही में सौर ऊर्जा का शुल्क दर का रिकॉर्ड (लेख प्रमाण) न्यूनतम रहना इसी की पुष्टि है। सोलर (सूर्य-संबंधी) पैनल (तालिका) की गिरती कीमतों के साथ सौर ऊर्जा की दरें भी नीचे आ रही है। डेवलपर (विकासक) का जोखिम कम करने वाले बेहतर प्रोजेक्ट (परियोजना) संरचना और विदेशी मुद्रा के बेहतर सौदों से अब फाइनेंस (आर्थिक प्रबंध) किफायती लागत पर उपलब्ध है।
  • मौजूदा एनडीए सरकार के सक्रिय प्रयासों का नतीजा है कि सन (सूर्य) पॉवर (शक्ति) सीईओ टॉम वर्नर ने कहा है कि भारत जल्द ही सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा बाजार बन जाएगा। टेस्ला की भी निगाह है और वह इसी गर्मी में भारतीय बाजार में आ जाएगी। सीईओ एलॉन मस्क ने ट्‌वीट करके यह बताया है। सही है कि सौर ऊर्जा उत्पादन के मामले में हम कई विकसित देशों से पीछे हैं लेकिन, यदि हम हर घर में बिजली पहुंचाने के साथ अतिरिक्त बिजली पैदा करना चाहते हैं तो यही आगे का रास्ता होना चाहिए।

सिद्धार्थ सचदेव, आईआईएम, रायपुर

अमरीका व न्यूजीलैंड: -

  • सिलिकॉन वैली शब्द की उत्पत्ति वर्ष 1970 में एक अमेरिकी अखबार की हैडलाइन (समाचार का शीर्षक) से हुई थी। उसके बाद वहां आईटी कंपनियों (संघों) की संख्या तेजी से बढ़ी और आज सैन फ्रांसिस्को का बड़ा क्षेत्र उसी नाम से जाना जाता है। दुनिया के कई शहरों ने ’सिलिकॉन वैली’ स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन कई कारणों से यह संभव नहीं हुआ। विश्व के बदलते परिदृश्य और राजनीतिक वातावरण के कारण अब न्यूजीलैंड में राजधानी वेलिंगटन और ऑकल्डैं में सिलिकॉन वैली बनाने की तैयारी है और उसमें सफलता मिलनी शुरू हो गई है। कुछ ऐसी कंपनियां शुरू हो चुकी हैं, जो पहले अमेरिका में थी। वहां के वातावरण, वीजा नियमों में सख्ती के कारण आईटी के जानकारों के विचार भी बदल रहे हैं। ऐसे कई लोग हैं, जो सिलिकॉन वैली से ऑकलैंड आकर बस गए और उन्होंने अपनी अलग कंपनी शुरू कर ली है।
  • न्यूजीलैंड में कुछ दशक पहले तक सॉफ्टवेयर (परिकलक के कार्यक्रम की आधार सामग्री) उद्योग की ज्यादा जरूरत नहीं थी, अब वही न्यूजीलैंड आईटी विशेषज्ञों की नई पनाहगार बन रहा है। अमेरिका तो ठीक, यूरोप में ब्रेग्जिट के कारण लंदन के प्रति मोह कम हो रहा है। इससे कहीं न कहीं अनिश्चितता का अहसास जरूर होता है। अगले महीने न्यूजीलैंड में 100 डेवलपरों (विकासक) को लाने का कार्यक्रम है, जिसके लिए ’वाइन (अंगुर की बेल) देम (उन्हें) -डाइन (भोजन करना) -देम (उन्हें) -एंड (और) ऑफर (प्रस्ताव) देम जॉब (नौकरी) ’ का कैम्पेन (अभियान) जारी है। अनुमान था कि कम से कम 2, 500 आवेदन आएंगे। लेकिन, ’लुक-सी वेलिन्गटन’ प्रोग्राम (कार्यक्रम) के तहत 48, 000 आवेदन आए। उनमें ज्यादातर लों गूगल, एमेजॉन, फेसबुक, एमआईटी और नासा से जुड़े हैं।
  • न्यूजीलैंड ने खुद को इस तरह विकसित कर लिया है कि प्रतिभा खुद वहां आ रही हैं। बड़ा कारण रहने का खर्च भी है। सैन फ्रांसिस्कों में रहने के लिए बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है, जो वेलिन्गटन और आकॅकलैंड जैसे शहरों में काफी कम है। वेलिन्गटन रीजनल (क्षेत्रीय) इकोनॉमिक (अर्थशास्त्रीय) डेवलपमेंट (विस्तार) एजेंसी (प्रतिनिधि) के जीएम डेविड जोन्स कहते हैं-अब सभी सितारे एकसाथ आ रहे हैं। नए लोगों से न्यूजीलैंड को नई पहचान मिल रही है। वे इस देश के वातावरण को ज्यादा अनुकूल बना रहे हैं।
  • सैन फ्रांसिस्को छोड़कर दो कंपनियां शुरू करने न्यूजीलैंड पहुंची एलना इरविंग कहती है कि अमेरिका में खुद को बहुत अलग-थलग महसूस करती थी। वहां हमारे आसपास कई चीजें होती थीं, लेकिन पता नहीं मैं उनसे सहमत थी या नहीं।
  • न्यूजीलैंड का दूसरा प्रयास है, उसने अपने यहां अपनी सिलिकॉन वैली स्थापित करने सपना देखा है। पहली बार के प्रयास में कई बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन उन्हें पूरा नहीं किया गया था। वह एक अलग तरह का दौर था, लेकिन अब सभी को यह लगता है कि इस बार कुछ नया है। कहानी की शुरूआत एक दशक पहले हुई थी, जब एक खरबपति आंत्रप्रेन्योर यहां सैर करने आए थे। यहां की खूबसूरती व लोगों के व्यवहार और वातावरण ने उन्हें आकर्षित किया था। इन्हीं कारणों से पीटर जैक्सन ने ’लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ फिल्म (चलचित्र) की शूटिंग के लिए न्यूजीलैंड को चुना था।
  • न्यूजीलैंड की नागरिकता चाहने वालों के लिए पांच वर्ष का 70 फीसदी समय यहां गुजारना जरूरी है। उन्हें साबित करना होता है कि वे आने वाले समय में यही रहेंगे। पे-पाल और फेसबुक में निवेश से पैसा कमाने वाले अमेरिकी व्यवसायी पीटर थियल ने कुछ वर्ष पहले न्यूजीलैंड में व्यवसाय शुरू कि या था। वे स्थानीय अर्थव्यवस्था में शामिल होना चाहते थे। वहां स्थानीय मार्केट (बाजार) का सबसे बड़ा निर्यात भेड़-बकरियों के दूध व उनसे जुड़े उत्पाद हैं। इन्वेस्टमेंट (निवेश) फर्म ’वलार वेन्चर्स’ (अदृष्ट) शुरू करने के बाद उस फर्म ने 3 मिलियन (दस लाख) डॉलर (अमेरिका आदि देशो की प्रचलित मुद्रा) वहीं की ऑनलाइन (परिकलित्र से जुड़ा हुआ) अकाउन्टिंग (गणना) सॉफ्टवेयर (परिकलक के कार्यक्रम की आधार सामग्री) फर्म ’जीरो’ (शून्यता) में निवेश किए। 1400 कर्मचारियों वाली जीरों के 180 देशों में क्लांइट (ग्राहक) हैं और वह न्यूजीलैंड की बड़ी कंपनियों (संघों) में शामिल है। उसके सीईओ रॉड ड्रूरी को वहां बिल गेट्‌स और मार्क जकरबर्ग की तरह माना जाता है।
  • फरवरी 2011 में क्राइस्टचर्च शहर में भूकंप के बाद थियल ने 5 करोड़ 27 लाख रुपए राहत में दिए थे। बाद में जब थियल को नागरिकता मिली, तो उन्होंने कहा कि मेरे लिए गौरव का क्षण इससे बड़ा नहीं हो सकता। थियल को न्यूजीलैंड में निवेश का लाभ मिला है, लेकिन उनके व्यवसायिक संपर्क कई देशों से हैं
  • ’लुक-सी वेलिन्गटन’ प्रोगाम (कार्यक्रम) खासतौर से अमेरिकी सॉफ्टवेयर (परिकलक के कार्यक्रम की आधार सामग्री) इंजीनियरों (यंत्रकार/अभियंता) को आकर्षित करने के लिए था, लेकिन इन शब्दों ने अपना दायरा बढ़ाया और आवेदनों की संख्या में भारतीयों ने अमेरिकियों को पीछे छोड़ दिया है। वैसे भी न्यूजीलैंड बाहरी लोगों का उसी तरह स्वागत कर रहा है, जैसे कभी अमेरिका ने किया था। आज वहां की बड़ी पूंजी वाली 50 फीसदी कंपनियां बाहरी लोगों के द्वारा स्थापित हैं।
  • अमेरिका मेें राजनीतिक वातावरण, वीजा (अन्य देश में जाने की अनुमति), आव्रजन, मैक्सिको सीमा पर दीवार और आईएसआईएस की चर्चाओं से सिलिकॉन वैली के आईटी विशेषज्ञ असहज महसूस कर रहे हैं। बेहतर वातावरण की उनकी तलाश ब्रेग्जिट के कारण लंदन तक ही सीमित रहीं। ऐसे में न्यूजीलैंड उस रूप मेें उभर रहा है, जहां दो शहरों में नई सिलिकॉन वैली स्थापित की जा सकती है। वहां इसके प्रोग्राम (कार्यक्रम) चलाए जा रहे हैं, जिसमें अनुमान से ज्यादा सफलता मिल रही है।
  • न्यूजीलैंड ने अमेरिकी प्रोगामरो (कार्यक्रमों) को आकर्षित करने की योजना बनाई, लेकिन भारतीय प्रोगामरों (कार्यक्रमों) ने उन्हें पीछे छोड़ दिया है। भारतीय आईटी विशेषज्ञ भी न्यूजीलैंड पसंद कर रहे हैं।

जैकलीन विलियम्स (सिडनी) और डेविड स्ट्रेेटफेल्ड (सिलकॉन वैली रिपोर्टर (संवाददाता) -पुलित्जर पुरस्कार विजेता)

शिकागो: -

  • अमेरिका में शिकागो के ओहारे एयरपोर्ट (हवाईअड्‌डे) पर यूनाइटेड (संयुक्त) के स्टाफ (कर्मचारी) ने एक चिकित्सक यात्री को इसलिए विमान से उतार दिया, क्योंकि एयरलाइन स्टाफ को यात्रा करनी थी। जब चिकित्सक ने इसका विरोध किया, तो एयरलाइन स्टाफ ने बल प्रयोग किया, चिकित्सक के साथ हिंसा की। उनके मुंह से खून बहते समय किसी ने वीडियो (चित्रमुद्रण या ध्वनि मुद्रण) बनाया और इंटरनेट पर अपलोड (छोटे परिकलक से बड़े में प्रतिलिपि करने कार्य या प्रक्रिया) कर दिया। कुछ ही घंटे में पूरे अमेरिका में उस घटना की घोर निंदा हुई और अंतत: यूनाइटेड के सीईओ को माफी मांगनी पड़ी। सवाल उठते हैं कि क्या एयरलाइन ऐसा व्यवहार कर सकती हैं?
  • एक वह दौर था, जब हवाई जहाज की यात्रा इधर से उधर जाना ही नहीं, बल्कि किसी एडवेंचर (असाधारण घटना) से कम नहीं थी। लेकिन, उस दौर के कई साल बीत चुके हैं और आज के परिदृश्य में हवाई यात्रा नए भय से कम नहीं है। खासतौर से विदेश यात्रा करनी हो तब, वह भी अमेरिका की या अमेरिका में ही, तो विमानतल पर भय दिखाती लाइनों (रेखा) से गुजरना मजबूरी हो गई है। कोई भी पीछे से प्रहार कर सकता है। उसके बाद एक्स-रे, पूछताछ, अपमान और अंतत: यात्रा से पहले यात्रियों के वर्ग देखकर उन्हें अलग किया जाना। संभव है कि यात्रा में उससे भी बुरे अनुभव मिलें। अमेरिकी एयरलाइन हो तो, ऐसा हो सकता है। यूनाइटेड एयरलाइन की घटना में प्रतीत होता है कि उनके लिए यात्रियों से ज्यादा अपना स्टाफ महत्वपूर्ण है। घटना का खुला प्रचार होने के बाद एयरलाइन के सीईओ ऑस्कर मुनोज सामने आते हैं। उन्होंने उस चिकित्सा यात्री की चोट के बारे में कुछ नहीं कहा, जबकि वीडियो में उनके मुंह से खून बहता साफ दिख रहा है।
  • यूनाइटेड एयरलाइन के सीईओ मुनोज ने अन्य लोगों का गुस्सा तब और भड़का दिया, जब उन्होंने चिकित्सक यात्री को ही गलत ठहराया, उन्हें नुकसान पहुंचाने वाला और झगड़ालु बताया। क्या यह इसलिए क्योंकि उन्होंने विमान से उतरने से मना कर दिया था। दो दिन बाद जब यूनाइटेड एयरलाइन के शेयर गिर गए, तब सीईओ मुनोज को अपनी गलती का अहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार अनुचित है। यह उस इंडस्ट्री (उद्योग) का केस (प्रकरण) है, जिसमें खरबों डॉलर (अमेरिका आदि देशों की प्रचलित मुद्रा) के मुनाफे के कारण वह खुद को सर्वोपरि समझने लगी है। इसके लिए तेल की गिरती कीमतों और विमान यात्रा की बढ़ती मांग जिम्मेदार है। हाल के वर्षो में बड़ी एयरलाइनों ने अपनी सीटों की चौड़ाई एवं उनके बीच की जगह घटाने का भी काम किया। इससे यात्री सटकर बैठने पर मजबूर हैं। कई बार उनके घुटनों में परेशानी होने लगती है। उसके अतिरिक्त बैग (झोला/थैला) की फीस (शूल्क), समय से पहले बोर्डिंग (समिति), अधिक लेगरूम (पैर, कमरा) के लिए यात्रियों से अधिक राशि ली जाती है। संभव है कि अन्य एयरलाइन इस घटना से सबक लेंगी। अगर ऐसा नही ंतो यात्रियों को ही बेहतर चयन करना होगा।

विमान यात्रा- अमेरिका जैसे देश में चार बड़ी एयरलाइन का 69 फीसदी घरेलू हवाई कारोबार पर नियंत्रण है। यह वर्ष 2016 की बात है, जबकि वर्ष 2012 में यह आंकड़ा 60 फीसदी ही था। अन्य प्रमुख देशों की एयरलाइनों के साथ भी ऐसा ही है। यात्री घटना के कारण निम्न हैं-

  • प्रतिस्पर्धा के अभाव में ऐसा होता है और एयरलाइन खुद को यात्रियों की जिम्मेदार से ऊपर समझने लगती हैं।
  • ऐसा इसलिए भी क्योंकि नियमित हवाई यात्रा करने वाले लोग एक या दो एयरलाइन को ही विकल्प के रूप में चुनते हैं।
  • आश्चर्य की बात नहीं कि यूनाइटेड सहित अमेरिका की चार बड़ी एयरलाइन अच्छी सेवाओं के लिए नहीं जानी जाती।
  • मशहूर ट्रैवल (यात्रा) एजेंसी (प्रतिनिधित्व) ने हाल ही में अच्छी सेवाएं देने वाली विश्व की टॉप (शिखर) -10 एयरलाइन की सूची जारी की है, जिसमें उपरोक्त चारों नहीं है। बल्कि, उनकी जगह अमेरिका की जेट ब्लू (4) और अलास्का एयरलाइन (9) ने टॉप (शिखर) -10 में जगह बनाई है।
  • बड़ी एयरलाइनें प्रतिस्पर्धा नहीं होने और सरकार की निगरानी नहीं होने का फायदा उठा रही हैं। इस कारण वे यात्रियों के साथ मनमाना व्यवहार करती हैं।

द न्यूयॉर्क टाइम्स एडिटोरियल बोर्ड (मंडल)

तुर्की: - तुर्की में संसदीय शासन प्रणाली हो या राष्ट्रपति, इसे अपनाने को लेकर जनमत संग्रह हुआ। जनमत में राष्ट्रपति प्रणाली यानी हां वाले आगे रहे। रात 11 बजे तक 97 फीसदी बैलेट की गणना में राष्ट्रपति प्रणाली को 51.4 फीसदी व संसदीय प्रणाली को 48.6 फीसदी मत मिले। जीत से राष्ट्रपति रोसेप तैय्यप एर्दोगन की सत्ता पर पकड़ मजबूत होगी। एर्दोगन अब 2029 तक राष्ट्रपति बने रह सकते हैं। यह 1923 में तुर्की के गठन के बाद सबसे बड़ा संविधान संशोधन होगा।

तकर्-पक्ष में समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रपति शासन प्रणाली देश में कारगर साबित होगी और इससे देश का आधुनिकीकरण होगा।

विपक्ष- में वहीं विरोधी मानते हैं कि इससे देश में निरंकुशता को बढ़ावा मिल सकता हैं।

Table shows the First parliamentary system

First parliamentary system

पहले संसदीय प्रणाली

बाद में राष्ट्रपति प्रणाली

राष्ट्रपति के पास प्रतीकात्मक शक्तियां। पीएम और सरकार के पास कार्यकारी शक्तियां।

राष्ट्रपति के पास होगी सभी कार्यकारी शक्तियां।

राष्ट्रपति किसी पार्टी (राजनीतिक दल) भी पार्टी से न जुड़े हो सकते हैं न ही पार्टी के नेता हो सकते हैं।

स्शााेंधन के बाद राष्ट्रपति किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य हो सकता है।

22 में से 4 सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) सदस्यों को राष्ट्रपति और अन्य का चुनाव जज और अभियोजक करते हैं।

13 में से सुप्रीम कार्ट (सर्वोच्च न्यायालय) सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे। अन्य की नियुक्ति संसद करेगी।

कैबिनेट (मंत्रिमंडल) के पास फैसले प्रकाशित करने का अधिकार

राष्ट्रपति के पास फैसले प्रकाशित करने का अधिकार होगा।

एक दशक तक तुर्की के प्रधानमंत्री रहने के बाद एर्दोगन 2014 में राष्ट्रपति बने थे। तुर्की में राष्ट्रपति को कार्यकारी शक्तियां हासिल नहीं हैं। एर्दोन ने कहा कि नई व्यवस्था से कुर्दिश विद्रोहियों पर काबू किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से इस्लामिक आतंकियों, शरणार्थी समस्या और सीरिया में जारी संघर्ष से भी राहत मिलेगी।

नई दिल्ली: -

  • प्रधानमंत्री मोदी ने मई 2014 में पदभार संभालने के बाद से 56 विदेश यात्राएं की। विदेश राज्य मंत्री वी. के. सिंह ने लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में कहा कि जून 2014 में अपने पहले भूटान दौरे के बाद मोदी चार बार अमेरिका और नेपाल, जापान, रूस, अफगानिस्तान और चीन के दौरे पर दो-दो बार गए। सितंबर 2014 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरे के साथ ही वाशिंगटन की अपनी दव्पक्षीय यात्रा की। वहीं, प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं हमेशा विपक्ष के निशाने पर रहीं। विपक्षी दलों ने कई बार ’कुछ दिन तो गुजारों देश’ में जैसे स्लोगन (नारा) से चुटकी ली।
  • सितंबर 2015 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के लिए न्यूयॉर्क का दौरा किया। इस दौरान वह फिर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिले। इसके बाद सेन जोस, कैलिफोर्निया चले गए, जहां वह फार्चून के शीर्ष 500 सीईओ से मिले। मोदी ने 2016 के वसंत में परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए अमेरिका का तीसरा दौरा किया। इस दौरान उन्होंने भारत की परमाणु सुरक्षा में वैश्विक साझेदारी के प्रति भारत की भूमिका और प्रतिबद्धता को उजागर किया। मोदी फिर से ओबामा के निमंत्रण पर जून 2016 में अमेरिका गए। इस दौरान उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित किया।
  • मोदी जी अगस्त 2014 में नेपाल के आधिकारिक दव्पक्षीय दौर पर रहे। यह 17 सालों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा था। इसके बाद नवंबर 2014 में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए उन्होंने नेपाल का दौरा किया। उन्होंने 2014 शरद ऋतु में जापान का दौरा किया, और फिर 2016 में वह वहां गए, दोनों बार वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए गए।
  • मोदी जी जुलाई में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उफा में भाग लेने के लिए रूस के दौरे पर गए। इसके बाद फिर दिसंबर 2015 में वार्षिक दव्पक्षीय शिखर सम्मेलन में भाग लेने रूस गए। मोदी दिसंबर 2015 में अफगानिस्तान की यात्रा पर गए। इसके बाद फिर जून 2016 में गए।
  • मोदी जी ने मई 2015 में चीन की दव्पक्षीय यात्रा की। इसके बाद वह सितंबर 2016 में हांगझोऊ में जी 20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने चीन गए।
  • मई 2015 में भारत-मंगोलिया के 60वीं कूटनीतिक वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री मंगोलिया गए। वह मंगोलिया की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री मार्च 2015 में सेशल्स की यात्रा पर गए। इसके बाद अगस्त 2015 में संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा पर गए। इसके अलावा दूसरे प्रमुख देशों में मोदी ने अप्रैल 2015 में कनाडा और नवंबर 2015 में ब्रिटेन का दव्पक्षीय दौरा किया। प्रधानमंत्री नवंबर 2014 में ऑस्ट्रलिया के ब्रिस्बेन में जी 20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने गए और फिर दव्पक्षीय दौरे के लिए रूक गए।
  • रूस: - रूस में राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के शासन के अंदर की खबरें लोगों तक नहीं पहुंच पाती हैं। शासन ही नहीं, सरकार विरोधी खबरों को काफी हद तक रोका जाता है और इसमें सरकार समर्थक मीडिया संस्थानों की भूमिका अहम होती है। पिछले एक साल में वहां सरकार के इस तंत्र को रोकने का काम कुछ ब्लॉगर कर रहे हैं, जो न केवल शासन के अंदर की खबरें प्रसारित कर रहे हैं, बल्कि वह खुलासे कर रहे हैं, जिन्हें आम लोगों से छिपाया जाता है।
  • रूस में सोशल मीडिया पर कोई रोक नहीं है और न ही स्मार्टफोन की गतिविधियों पर। इस बीच, वॉट्‌सएप् जैसे मैसेजिंग एप टेलीग्राम ने वहां नई क्रांति शुरू करने जैसा काम किया है। उस पर कई तरह के चैनल्स होते हैं, जिनमें अलग-अलग जानकारियां यूज़र को मिलती है। रीडर उस चैनल की फीड को सब्स्क्राइब कर सकते हैं, लेकिन उन्हें दूसरी ओर से कोई जवाब नहीं मिलता है। उसमें ब्लॉगरों के चैनल पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं, सरकार की गतिविधियां और रशियन एलीट की गोपनीय जानकारियों का प्रसार होता है। उसमें भी सबसे ज्यादा पॉपुलर चैनल नेज़ीगर है, जो स्वतंत्र न्यूज चैनल दोज़द के पूर्व एडिटर इन चीफ से संबंधित है। कुछ लों मानते हैं कनेज़ीगर पुतिन के ही प्रोजेक्ट का हिस्सा है। स्मार्टफोन यूज़र उस एप् की सूचनाओं का प्रसार दोस्तों या परिचितों तक ही कर सकते हैं।
  • रूसी लेखक ओलेग कशिन कहते हैं, लोगों को एप् के चैनल पर मिलने वाली खबरों की पुष्टि के लिए किसी स्त्रोत की जरूरत नहीं हैं। चैनल की फीड से पुतिन के शासन के बारे में या रशियन एलीट के बारें में जो जानकारियां आती हैं, लों उसे ही सही मानते हैं। हालांकि, अगर रूस में बेहतर राजनीतिक विश्लेषक होते, राजनीतिक का कवरेज करने वाला जर्नलिज्म़ और मजबूत व स्वतंत्र मीडिया होता, तो नेज़गीर की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन, जब नल से गंदा बदबूदार पानी आने लगता है, तो आप नदी का पानी पीने की कोशिश करते हैं। फिर यह जानने की कोशिश नहीं की जाती कि उस नदी में सीवेज का पानी मिल रहा है या नहीं।

- Published/Last Modified on: May 22, 2017

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