सात उच्च समाचार (Top Seven News in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- पूर्व की भांति हम इस बार भी कुछ देश-विदेश से जुड़ी समाचार लाये है जो विश्वभर में घटित खबरों पर आधारित हैं। यह खबरें निम्नलिखित हैं। हमें अपनी विदेश नीति और विश्व भर में घटित घटनाओं को आकार देने की स्वतता की बेशकीमती विरासत की पूरी तरह रक्षा करनी चाहिए।

1 मध्य एशिया:-

  • चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए भारत और ईरान के बीच हाल ही में समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इससे व्यक्तिगत रूप से सही कदम उठाने का संतोष मिला है। यशवंत सिन्हा जी जब 2002 और 2004 के बीच विदेश मंत्री थे तब इस मामले को आगे बढ़ाने में छोटी सी भूमिका निभाई थी। असाधारण इतिहास बोध रखने वाले अटलबिहारी वाजपेयी के मन में यह बात स्पष्ट थी कि भारत को ईरान के साथ श्रेष्ठ तक संबंध विकसित करने चाहिए। वे 2001 में ईरान यात्रा पर गए, जिसने हमारे द्धिपक्षीय संबंधों को जबर्दस्त बढ़ावा दिया। उन्हीं की यात्रा के दौरान ईरान और भारत अपने संबंधों को रणनीतिक स्तर तक ऊंचा उठाने पर सहमत हुए और द्धिपक्षीय सहयोग के लिए कई केंद्रों की प्राथमिक क्षेत्रों के रूप में पहचान की गई।
  • भारत व ईरान:- ईरान के राष्ट्रपति खतामी 2003 की शुरुआत में भारत यात्रा पर आए। इसी यात्रा के दौरान दोनों देश औपचारिक रूप से चाबहार बंदरगाह को मिलकर विकसित करने पर सहमत हुए। 1990 के दशक में भारत ने ईरान के इस बंदरगाह का आंशिक विकास किया था और यशवंत जी मंत्री बने तो उन्होंने अपने तरीके से इसके पूर्ण विकास पर जोर दिया। तर्क बहुत सरल सा था।
  • पाकिस्तान व भारत-पाकिस्तान हमेशा से भारत को उसके भू-भाग से अफगानिस्तान में प्रवेश देने के प्रति उदासीन रहा है। हाल के वर्षो में तो उसने भारत का अफगानिस्तान से ऐसा संपर्क बिल्कुल ही बंद कर दिया है। इस तरह पाकिस्तान ने न सिर्फ भारत के अफगानिस्तान जाने पर पाबंदी लगा दी, बल्कि इसने मध्य एशिया में भारत के प्रवेश को भी रोक दिया। भारत को नुकसान पहुंचाने के लिए पाकिस्तान ने अपनी भौगोलिक स्थिति का पूरी तरह इस्तेमाल किया है। हमें पाकिस्तान द्वारा खड़ी की गई इस बाधा का तत्काल कोई समाधान खोजना था। भारत के सामने सिर्फ ईरान का विकल्प था और चाबहार बंदरगाह का विकास एकमात्र संभावना है।
  • चाबहार बंदरगाह- चाबहार बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से और ओमान की खाड़ी में स्थित है। यह ईरान का एकमात्र ऐसा बंदरगाह है, जिसकी समुद्र तक सीधी पहुंच है। ईरान की सीमा से अफगानिस्तान ही हाईवे (राजमार्ग/मुख्यमार्ग) व्यवस्था तक भारत द्वारा जरांज-देलाराम मुख्यमार्ग का निर्माण उल्लेखनीय उपलब्धि है, क्योंकि इसे बड़ी कीमत चुकाकर निर्मित किया गया है आर्थिक रूप से तो भारत ने कीमत चुकाई ही लेकिन आंतकी हमलों में भारतीय निर्माण दलों के लोगों की जाने भी गई। पाकिस्तान ने इस मुख्यमार्ग का निर्माण रोकने के लिए अपने सारे आतंकवादी गुटों का इस्तेमाल किया, लेकिन हम अविचलित रहकर निर्माण में लगे रहे।
  • त्रिपक्षीय समझौता- जब ईरान ने चाबहार से जाहेदान को जोड़ने वाली सड़क बनाई तो चाबहार और अफगानिस्तान और वहां से मध्य एशिया तक पूरी सड़क संपर्क अस्तित्व में आ गया। वर्ष 2003 में भारत ने ईरान और अफगानिसतान के साथ प्राथमिकता के आधार पर व्यापार के लिए त्रिपक्षीय समझौता किया। प्रधानमंत्री की मौजूदा यात्रा के दौरान भारत व ईरान और अफगानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर को उचित ही गेमचेंजर अर्थात खेल परिवर्तन की उपमा दी गई है।
  • फायदा:-मध्य एशिया के लिए अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे के विकास से भारतीय सामान को बिना दिक्कत न सिर्फ अफगानिस्तान पहुंचाना आसान होगा बल्कि माल मध्य एशिया और उससे आगे यूरोप तक पहुंचाया जा सकेगा।

तीनों ही देशों के लिए इस समझौते का अत्यधिक रणनीति महत्व है। कौन कहता है कि भूगोल बदला नहीं जा सकता है, यह गहरे खेद की बात है कि चाबहार पर अंतिम समझौते के लिए 13 साल का इंतजार करना पड़ा हैं।

  • कारण-इसका कारण अमेरिका से निपटने में यूपीए सरकार की भी रूढ़ता रही है। अमेरिका ने ईरान पर इस बहाने प्रतिबंध लगा दिया कि वह परमाणु हथियार बनाने की तकनीक विकसित कर रहा है। इसके समर्थन में जो सबूत दिए गए थे, वे उतने ही बनावटी थे, जितने इराक द्वारा व्यापक विनाश के हथियार निर्मित करने के मामले में था। अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा दिए गए सबूत, जिनका इस्तेमाल इराक पर हमला करने के लिए बहाने के लिए रूप किया गया।
  • परमाणु हथियार- 2003 दिसम्बर में यशवंत जी में ईरान यात्रा के दौरान राष्ट्रपति खतामी ने उनको बताया था कि वे परमाणु हथियारों को इस्लाम विरोधी मानते हैं और उन्होंने आश्वस्त किया था कि परमाणु हथियार बनाने के लिए तकनीक विकसित करने में ईरान की कोई रुचि नहीं है। इसके बावजूद अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए, जिसके तहत सभी देशों पर ईरान के साथ वाणिज्यिक सौदे करने पर रोक लगा दी गई। भारत ने न सिर्फ चुपचाप इसे स्वीकार कर लिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग की बैठक में ईरान के खिलाफ मत करने की हद तक चला गया। इस घटनाक्रम से यशवंत जी इतने विचलित हो गये थे कि उन्होंने यूपीए सरकार के इस फेसले की कटु आलोचना करते हुए बयान जारी किया और कहा कि ईरान के खिलाफ मत देकर हम सच्चे अर्थों में अमेरिका के पिछे लगे देश हो गये है। जैसा कि कई अन्य देशों ने किया था।
  • समझौता:-ईरान और पश्चिमी शक्तियों के बीच लंबी समझौता वार्ताओं के बाद आखिरकार दोनों के बीच समझौता हुआ और अमेरिका ईरान पर लगे प्रतिबंध उठाने के लिए राजी हो गया हैं। इससे भारत के लिए ईरान और इसके परे अपनी रणनीतिक योजनाओं को अमल में लाने का रास्ता खुल गया हैं। ईरानी नेतृत्व की परिपक्वता और महानता को श्रेय देना होगा कि इसने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा कार्यकता में उसके खिलाफ भारत के मतदान को इस ऐतिहासिक समझौते में बाधा नहीं बनने दिया। विदेश नीति का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा और उन्हें आगे बढ़ाना होता है। इस मूलभूत सिद्धांत का पालन दुनिया का हर देश करता है।
  • भारत:-इस मामले में भारत प्राय: गफलत करता रहा है संदिग्ध कारणों से अपने राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ाने का हमारा लंबा इतिहास रहा है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के साथ भारत एक बड़ा देश है और यहां लोकतंत्र की गौरवान्वित करने वाली लंबी परंपरा है। हमें अमेरिका सहित किसी भी देश के खेमे का पिछा देश बनने की जरूरत नहीं है। किसी के नेतृत्व में आने की बजाय हमें नेतृत्व देना चाहिए।
  • विदेश यात्रा:- यदि पिछले एक साल में मोदी की विदेश यात्राओं का रास्ता देखें तो पाएंगे कि ज्यादातर यात्राओं का रूट मध्य एशिया या आस-पास के किसी क्षेत्र के रूट को जरूर काटता था। वे जो कर रहे हैं वह भारत की रणनीतिक जरूरत के लिए बहुत आवश्यक है। वे उस क्षेत्र तक पहुंच की नींव रख रहे हैं, जहां के संपर्क से उसे पिछले 25 वर्षों से वंचित रखा गया है। जो इस क्षेत्र पर निगाह रखे हुए हैं, वे जानते हैं कि नया ‘ग्रेट गेम’ (बड़ा खेल) यहीं खेला जा रहा है। ऐसा खेल जो जर्मनी संपर्क, आधाभूत ढांचे, ऊर्जा और विचारधारा के आस-पास खेला जा रहा है। इस खेल में अपना प्रभाव बढ़ाने की तीव्र स्पर्द्धा शामिल है। भारत इस खेल का हिस्सा तो है, लेकिन क्षेत्र में पहुंच के अभाव में वह प्रभावी खिलाड़ी नहीं रहा है। अमेरिका को इस मानदंड की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह महाशक्ति है।
  • अमरीका:- विशेषज्ञ भी कई बार यह भूल जाते हैं कि अमेरिकी संतुलन और एशिया की धुरी मध्य एशिया में निहित है। इस झूलते दरवाजे की अग्रिम किनोर दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम एशिया से भारत-प्रशांत की ओर जाती है, लेकिन जहां तक अमेरिकी हितों की बात है मध्य एशिया में कोई फेरबदल नहीं होता दिखता और धुरी होने का कारण भी यही है। यूरोप से चीन को जाड़ने वाले इस भू-भाग में निहिम रणनीतिक महत्व से तुलना दुनिया के कुछ ही भू-भाग कर सकते हैं। शंघाई सहयोग परिषद की बात पर लौटने के पहले यह ध्यान दिलाना जरूरी होगा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में ईरान के लौटने के साथ क्षेत्र का रणनीतिक संतुलन बदल रहा है। ईरान पर मोदी का फोकस व्यावहारिकता और अवसरों की पहचान से ही निकला है। 23 मई 2016 को भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच-त्रिपक्षीय परिवहन व पारगमन कॉरिडोर (गलियारा/शासन का उच्च स्तर जहाँ निर्णय लिए जाते हैं।) समझौता अपने आप में खेल परिवर्तन है। इससे भारत के लिए दो ऐसे क्षेत्रों में अवसर खुले हैं, जिनसे उसे अब तक वंचित रखा गया था। एक मध्य एशिया तक पहुंचने की सुविधा और दूसरा आधारभूत ढांचे में आने की सुविधा दी हैं। अचानक भारत को मध्य एशिया के प्राकृतिक संसाधनों से वंचति रखने के लिए किए गए पाकिस्तानी इनकार को बेअसर कर दिया है।
  • ताशकंद यात्रा:-मोदी जी की ताशंकद यात्रा में भारत-पाक के बीच 50 साल पहले 10 जनवरी 1966 को हुए समझौते की पृष्ठीभूमि में कुछ सांकेतिक महत्व था। यह यात्रा सिर्फ एनएसजी और पुतिन व शी जिनपिंग से मुलाकात के अवसर से संबंधित नहीं था बल्कि मध्य एशिया के संबंध में थी।
  • मोदी की यात्रा चाहे एनएसजी का फैसला होने के पहले बातचीत करने के इरादे से की गई रणनीतिक यात्रा हो पर वृहद परिप्रेक्ष्य में यह मध्य एशिया में भारतीय हितों और न्यू ग्रेट गेम (नया बड़ा खेल) के आसपास ही केंद्रित होती है, क्योंकि मोदी की ईरान यात्रा के बाद इसमें नया आयाम जुड़ गया है। मध्य एशिया में प्रभाव बढ़ाकर भारत, चीन पर अकुंश भी लगाए रख सकता है, क्योंकि रूस भी संगठन में चीन के खिलाफ संतुलन लाने के पक्ष में हैं।

2 शंघाई सहयोग संगठन:-

  • वर्ष 2001 में बने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में मूलरूप से चीन, कजाकिस्तान, किर्गिजस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल थे और जाहिर तौर पर क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने का यह चीनी प्रयास था, क्योंकि उसे मुस्लिम कटटरपंथ की आंच महसूस होने लगी थी। समय के साथ भारत, मंगोलिया, ईरान और पाकिस्तान को भी 2005 तक पर्यवेक्षक के दर्जे के साथ शामिल कर लिया गया है। 2010 के बाद से भारत व पाकिस्तान को पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल करने के प्रयास शुरू हुए। जैसा कि सार्क में होता है भारत-पाकिस्तान को साथ में लेने के मुद्दे पर अन्य देशों को आशंका रहती है कि उनकी आपसी प्रतिद्धंद्धिता संगठन के कामकाज पर हावी न हो जाए। 2014 में दोनों को शामिल करने की कार्यविधि तय की गई। अपेक्षा थी कि अंतत: दोनों का स्वागत हो जाएगा, लेकिन ब्योरो की बारीकियों के कारण वह संभव नहीं हुआ हैं।
  • भारत और चीन- कई लोगों की कल्पना के विपरीत एससीओं में भारत के प्रवेश में चीन की भी रूचि होगी, क्योंकि इससे एक तो संगठन का दायरा बढ़ेगा और दुनिया की तीन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं रूस, चीन और भारत के आने से संगठन का महत्व कई गुना बढ़ जाएगा। ध्यान में रखने की बात है कि जहां चीन सारे सदस्य देशों से द्धिपक्षीय संबंध बढ़ाने में लगा है, बहुपक्षीय संगठन हमेशा ही विश्वसनीयता व अवसरों में काफी वृद्धि कर देते हैं। खासतौर पर तब जब चीन इनमें से कुछ विशिष्ट परिणाम चाहता है। एक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पहल ‘वन बेल्ट, वन रोड’ (एक पट्टा एक सड़क) को अधिक वजन देना चाहता है।
  • एससीओ - आखिर में, एससीओ एकमात्र ऐसा मंच हैं जिससे ऊर्जा, व्यापार, आधारभूत ढांचा, संपर्क सुविधाएं, विचारधारा या आतंकवाद सभी का संबंध है। इनमें से प्रत्येक विषय में राजनीति शामिल है। जोखिम कम करने, अवसर हासिल करने और क्षेत्र के देशों से रिश्ते सुनिश्चित करने का इससे बहेतर तरीका क्या हो सकता है कि भारत एससीओं का पूर्ण सदस्य बना जाए।

3 स्पेक्ट्रम (श्रंखला) नीलामी:-

  • कैबिनेट (मंत्रालय) ने अब तक की सबसे बड़ी स्पेक्ट्रम नीलामी को मंजूरी दी है। अलग-अलग उत्पाद के लिए जो कीमतें तय हुई हैं, उनके आधार पर सरकार को 5.66 लाख करोड़ रुपए मिलने का अनुमान है। इसमें चार लाख करोड़ सबसे महंगे है। 700 मेगाहट्‌र्ज स्पेक्ट्रम बैंड से आने की उम्मीद है। गौरतलब है कि 2014 - 15 में देश की टेलीकॉम जनसमूहों का कुल रेवेन्यू 2.54 लाख करोड़ रुपए था।
  • कैबिनेट की बैठक के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया कि करीब 2,300 मेगाहट्‌र्ज स्पेक्ट्रम नीलामी के लिए रखे जाएंगे। इससे 4जी सेवाओं का विस्तार होगा। इंडस्ट्री (उद्योग) के पास अभी कुल 2,772 मेगाहट्‌र्ज स्पेक्ट्रम है। स्पेक्ट्रम उपयोगकर्ता चार्ज पर कोई निर्णय नहीं हुआ है। इसे दोबारा विचार के लिए टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई को भेजा गया है। ट्राई ने 2500 मेगाहट्‌र्ज बैंड (उत्पाद) के लिए रेवेन्यू (राजस्व/राज्य या संघ की पूर्ण वार्षि आय) का एक फीसदी और बाकी के लिए तीन फीसदी स्पेक्ट्रम यूजज (उपयोगकर्ता) चार्ज (मूल्य या भुगतान के रूप में मांग) का प्रस्ताव दिया था।
  • सूत्रों के मुताबिक कैबिनेट ने ट्राई (संस्था) की बेस प्राइज (आधारा कीमत) की सिफारिश को मान लिया है। 700 मेगाहट्‌र्ज बैंड के लिए 11,485 करोड़ रुपए प्रति मेगाहट्‌र्ज की सिफारिश थी। जनसमूहों इसे बहुत ज्यादा बता रही हैं। देशभर में कम से कम पांच मेगाहट्‌र्ज बैंड के लिए किसी भी जनसमूह को कम से कम 57,425 करोड़ रुपए खर्च 3जी में इस्तेमाल होने वाले 2100 मेगाहट्‌र्ज बैंड का 70 प्रतिशत आएगा। जनसमूहों 700 मेगाहट्‌र्ज स्पेक्ट्रम की अभी नीलामी न करने का भी अनुरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि इस स्पेक्ट्रम के लिए तैयारी पूरी नहीं है।
  • भुगतान की शर्ते- जनसमूहों को 1800,2100, 2300 और 2500 मेगाहट्‌र्ज के लिए 50 प्रतिशत राशि का भुगतान तत्काल करना होगा। बाकी पैसे दो साल बाद दस सालाना किस्तों में दे सकते हैं। अभी तक 33 प्रतिशत रकम का तत्काल भगुतान करना पड़ता था। 700,800 और 900 मेगाहट्‌र्ज स्पेक्ट्रम के लिए 25 प्रतिशत रकम का दस सालाना किस्तों में देने होंगे। पहले भी यही शर्त थी। भुगतान की शर्ते पहले से कठोर हैं।
  • कीमत- सरकार द्वारा कीमत किसी जनसमूह के लिए अफोर्डेबल (वहन) नहीं हैं। ज्यादा डिमांड (मांग) 1800,2100 और 2300 मेगाहट्‌र्ज में रहेगी। वैसे पहली बार इतनी बड़ी मात्रा में नए स्पेक्ट्रम नीलामी के लिए रखे गए हैं। अभी तक ज्यादातर रिन्यूअल (नवीनी करण) होते थे।

राजन मैथ्यूज, महानिदेश, सीओएआई

इस साल नीलामी से मिलेंगे 1.6 लाख करोड़ रुपए। नीलामी बेस से कीमत पर सरकार को 5.66 लाख करोड़ मिलेंगे। इस साल 64,000 करोड़ आएंगे, कर-लेवी आदि से 98,995 करोड़ मिलने का अनुमान है। एक लाख करोड़ रुपए मार्च की नीलामी में मिले थे। मार्च में 470.75 मेगाहट्‌र्ज स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई थी। 19 दिन तक 115 राउंड की नीलामी में कुल 1,09, 874 करोड़ रुपए की बोली लगी थी।

Table Showing the Auction
नीलामी
स्पेक्ट्रम बैंड (श्रंखला उत्पाद)प्रति मेगाहट्‌र्ज बेस प्राइज
70011,485 करोड़ रु.
8005,819 करोड़ रु.
9003,341 करोड़ रु.
18002,873 करोड़ रु.
21003,746 करोड़ रु.
2300817 करोड़ रु.
2500817 करोड़ रु.

4 एनएसजी (परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह) :-

  • आने वाले वर्षो में अंतरराष्ट्रीय शांति सुरक्षा और समृद्धि को बनाए रखने में तकनीकी का महत्व बढ़ता जाएगा। इसका विस्तार सूचना, संचार, मेडिकल और जैव विज्ञानों में होगा। इस तरह आगामी वर्षो में विभन्न तकनीकी निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं की भूमिका और महत्व बढ़ता जाएगा। यह इसलिए भी होगा, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सामना तकनीकी के विस्तार सहित वैश्वीकरण किरदारों से उत्पन्न खतरे, दोनों से होगा। ये वास्तव में क्षेत्रीय व्यवस्थाएं हैं, जिन्हें समान विचारों वाले देशों ने बनाया है। दूसरे देशों को इसमें शामिल होना हो तो उसके लिए लिए नियम है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत के लिए इन निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं में सक्रिय रूप से सहभागी होना महत्वूपर्ण है ताकि इनमें होने वाला कोई भी घटनाक्रम इसके हितों पर विपरीत असर न डाल सके। ऐसा 1992 में हो चुका है, जब एनएसजी के सदस्यों ने परमाणु व्यापार के लिए पूर्ण परमाणु निगरानी की शर्ते लागू कर दी थी इस संदर्भ में बीते वर्षों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं।
  • भारत और अमेरिका-अभी मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संयुक्त समय में मिसाइल तकनीकी नियंत्रण व्यवस्था, ऑस्ट्रलिया समूह और वैसीनार व्यवस्था में भारत के प्रवेश पर जोर दिया था। इसमें अमेरिका एनएसजी देशों से भारत के आवेदन को समर्थन देने का आह्यन भी किया था। जहां तक एनएसजी का सवाल है, सिओल में एनएसजी का पूर्ण सम्मेलन भारत को सदस्यता देने के प्रश्न पर फैसला लेने में नाकाम रहा हैं, ऐसा मुख्यत: इसलिए हुआ क्योंकि ये सारी व्यवस्थाएं आम सहमति पर काम करती हैं।
  • सदस्य-भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) का सदस्य बनने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहा हैं। आज से नहीं, वर्ष 2008 से कर रहा है। उस समय से कर रहा है जब भारत और अमरीका के मध्य परमाणु संधि हुई। तब इसी एनएसजी ने भारत को कुछ छूट दी थी। इन्हीं रियायतों के आधार पर दोनों देशों के मध्य वह संधि-समझौता हुआ और उन्हीं रियायतों के आधार पर भारत दुनिया का पहला ऐसा परमाणु शक्तिसम्पन्न देश बना जिसे बिना एनएसजी का सदस्य बने, परमाणु क्षेत्र में कारोबार की छूट मिली। लेकिन बाद मे क्या हुआ? अमरीका ने जो संधि-समझौता किया वह आज तक पूरा लागू नहीं हुआ। दुनिया के दूसरे देशों से परमाणु व्यापार की बात तो दूर स्वयं अमरीका की एक भी जनसमूह इस क्षेत्र में व्यापार के लिए भारत के साथ नहीं आई, आज अमरीका बड़े जोर-शोर से इस समूह के लिए हमारी सदस्यता का समर्थन कर रही है।
  • बैठक- एनएसजी (परमाणु आपूर्तिकता समूह) की अहम बैठक से पहले भारत की निगाहें नरेन्द्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात पर हैं। दोनों नेता ताशकंद में मिले इस दौरान मोदी एनएसजी में भारत की सदस्यता के लिए जिनपिंग को मनाने की कोशिश करेंगे।
  • देश-चीन सहित उसके 48 सदस्य देशों में से एक-एक से बात कर सियोल में 24 जून को होने वाले इस समूह के पूर्ण अधिवेशन में हमारी सदस्यता की पैरवी कर रहा है यह बहुत अच्छी बात है लेकिन हमारे देश में कोई ऐसा राजनेता है, जो बराक ओबामा या उनके प्रशासन से पूछे कि वर्ष 2008 के समझौते की कितनी पालना हुई? अगर किसी ने पूछा भी होतो कम से कम देश को नहीं बताया। वैसे ही जैसे एनएसजी के मुद्दे पर भारतीय विदेश सचिव एस. जयशंकर चुपचाप दो दिन के लिए बीजिंग जा आए। हालांकि, चीन हो या अमरीका, दोनों ही भारत के लिए कभी भरोसे के दोस्त नहीं रहे। वैसे जैसे किसी जमाने में भारत और सोवियत संघ थे। सोवियत संघ यदि भारत से दूर हुआ तो उसमें भी उसकी अपनी परिस्थितियों के साथ हमारे अपने राजनीतिक नेतृत्व की भी कमजोरियां थीं लेकिन इस मुद्दे पर वह आज भी उतनी की मजबूती से हमारे साथ खड़ा हैं, जितनी मजबूती से अमरीका खड़ा दिख रहा हैं और चीन की तो बात कराना ही बेकार है। अभी तो वह खुलकर हमारी सदस्यता के विरोध में है तब भी हम ‘कूटनीतिक तरीके’ से उसे मनाने मे ंलगें हैं हमारी सरकार तो यह उम्मीद कर रही है कि अन्तत: वह सियोल में हमारे पक्ष में खड़ा होगा।
  • भारत और चीन- चीन अब तक एनएसजी में भारत को सदस्यता दिए जाने का विरोध कर रहा है। हालांकि उसने कभी सीधा विरोध नहीं किया है। उसका कहना है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ने एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि) में हस्ताक्षर नहीं किए हैं। ऐसे में दोनों के साथ समान बर्ताव होना चाहिए। अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता दी जाती है तो पाकिस्तान को भी दी जाए। जबकि कुछ अन्य सैद्धांतिक स्तर पर भारतीय सदस्यता को समर्थन देने के बावजूद प्रवेश देने की प्रक्रिया में अधिक स्पष्टता चाहते हैं। यह मामला अब एनएसजी के निवृत्तमान प्रमुख अर्जेटीना के दूत रफेल ग्रॉसी को सौंप दिया गया है और संकेत तो यही है कि वर्ष के अंत तक भारत को प्रवेश देने का तरीका खोज लिया जाएगा।
  • भगवान करें वह अच्छे दिन आए लेकिन हमें उन बुरे दिनों को भी नहीं भूलना चाहिए जब हिन्दी- चीनी भाई-भाई का नारा लगाते हुए उसने हम पर हमला किया। हमारा लंबा-चौड़ा भू-भाग दबा लिया। दगाबाजी उसकी फितरत में हैं और पाकिस्तान जैसा पीछे लगा उसके साथ है। हमें अमरीका को भी लंबे समय के लिए अपने साथ मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। वैसे भी हम रक्षा और उड्‌डयन जैसे व्यापक संभावनाओं वाले क्षेत्रों को 100 प्रतिशत हो जायें क्यों न हम अपनी विशाल मानव शक्ति, मस्तिष्क शक्ति और आर्थिक शक्ति के सहारे वैसे हालात पैदा करें कि, 48 देश खुद चलकर हमें सदस्यता देने आए। वैसे ही जैसे वर्ष 2008 में परमाणु समझौते के लिए अमरीका आया था।

यहां यह बता देना होगा कि किसी भी निर्यात नियंत्रण व्यवस्था में सदस्यता मिलने से इनके द्वारा नियंत्रित तकनीकी तक अपने आप पहुंच नहीं मिल जाती है। इस पर तो तकनीकी निर्यात करने वाले देश के सबंधित राष्ट्रीय कानून लागू होते हैं फिर इन तकनीकी निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओ में सदस्यता मिलने से भारत को कौन-सा फायदा मिल जाएगा? निम्न बातें हैं-

  • पहली बात तो यह कि सदस्यता से यह सुनिश्चित हो जाएगा कि इन व्यवस्थाओं के नियमों में भविष्य में कोई भी बदलाव भारत की सहमति के बिना नहीं हो पाएगा। इस प्रकार भारत उसके राष्ट्रीय हितों पर विपरीत प्रभाव डालने वाले परिवर्तनों से खुद सुरक्षित रख सकेगा। हालांकि, भारत के लिए यह दुखद होगा कि सदस्यों में एक भी ऐसा न हो जो भारत विरोधी बदलावों को रोक दे। ऐसा होने की आशंका बहुत ही कम है, लेकिन ऐसी आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता है। 1998 के भारत परमाणु परीक्षण के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा पारित प्रस्ताव हमें नहीं भूलना चाहिए। इसे नियंत्रण व्यवस्थाओं के सारे सदस्य देशों का समर्थन था। इन प्रतिबंधों का भारत की सुरक्षा का स्पष्ट नकारात्मक प्रभाव पड़ा हैं।
  • दूसरी बात अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत के बढ़ते आर्थिक व राजनीतिक प्रभाव के साथ उसे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को आकार देने वाली वैश्विक संस्थाओं में भी सक्रिय होना चाहिए। इस प्रकार ऐसी सदस्यता भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिकाओं के अनुरूप है।
  • तीसरी बात इनकी सदस्यता से भारत अन्य देशों के राष्ट्रीय कानूनों की अनिश्चिताओं से बच सकेगा। जैसे अमरीकी कानून के मुताबिक यदि एमटीसीआर द्वारा नियंत्रित चीजों को कोई गैर सदस्य देश किसी दूसरे गैर-सदस्य को नियार्त करता है तो उस पर अमेरिकी प्रतिबंध अपने आप लग जाएंगे। 1990 के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ की एजेंसी (कार्यस्थान) ग्लोवकॉस्मोस और भारत के इसरो पर ऐसे प्रतिबंधित लगाए गए थे, क्योंकि सोवियत कार्यस्थान ने इसरो को क्रोयोजेनिक इंजन की तकनीकी हस्तांरित की थी। मौजूदा परिदृश्य में यदि भारत, ची के वियतनाम, फिलीपीन्स जैसे पड़ोसियों को उसी तरह ब्रह्योस मिसाइल देता जैसा चीन पाकिस्तान को देता है तो उस पर प्रतिबंध लगाए जाते है, लेकिन एमटीसीआर की सदस्यता मिलने के बाद यह संभव नहीं हैं।

आखिर में, चूंकि चीन एनएसजी के अलावा किसी अन्य समूह का सदस्य नहीं है और वे सारे आम सहमति से चलते हैं तो जैसे को तैसा की तर्ज पर भारत यदि चाहे तो वह अन्य सारे समूहों में चीन के प्रवेश को रोक सकता है।

  • विकल्प- यह सही है कि एनएसजी के भारत प्रवेश का विरोध करने वाला देश अब भी आम सहमति के नियम के तहत भारत की सदस्यता रोक सकता है। हालांकि, जिस निवृत्तमान प्रमुख को भारत को सदस्य देने का कोई अन्य जरिया खोजने का दायित्व सौंपा गया है उन्होंने बहुत रोचक टिप्पणी की है, ‘अब बात सारे विकल्पों की पड़ताल करने पर आ गई है। एनएसजी में सदस्यता के लिए (भारत को) कई विकल्प उपलब्ध है। मानदंडो के साथ, मानदंडों के बिना, किसी फेसले या मतसंग्रह के जरिये सदस्यता हो सकती है।’ ऐसे में इस बात की संभावना ज्यादा है कि वर्ष के अंत तक भारत एनएसजी का सदस्य बन जाए। जहां तक अन्य दो निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं का सवाल है, भारत उनकी सदस्यता की पूरी योग्यता रखता है। मजे की बात है कि जो देश एनएसजी में भारत का विरोध्ध कर रहा है, वह अन्य किसी भी तकनीकी नियंत्रण व्यवस्था का सदस्य नहीं है और इसलिए अन्य दो समूहों में भारत के प्रवेश के लिए वह कोई खतरा पैदा नहीं कर सकता हैं।
  • सदस्यता- भारत एनएसजी का सदस्यता हासिल करने के लिए भारत के प्रयासों की उपयोगिता व महत्व पर सवाल उठाएं गए हैं। दो चीजें शुरू में ही स्पष्ट हो जानी चाहिए। एक, जहां तक बिजली उत्पादन पर जोर देने वाले भारत के नागरिक परमाणु कार्यक्रम का सवाल है, दूसरा भारत को भारत एनएसजी का सदस्य मिलने से कोई नई सुविधा नहीं मिल जाएगी।
  • अहम बैठक-
  • में भारत को एससीओं की पूर्ण सदस्यता दिए जाने की घोषिणा हो सकती हैं। इस बारे में पिछले साल 2015 जुलाई में सहमति बनी थी। एससीओ के ज्यादातर सदस्यों के पास पेट्रोलियम पदार्थ का भंडार है। भारत की कोशिश इन देशों से सस्ता तेल खरीदने की होगी।
  • एनएसजी की अहम बैठक सियोल में हैं दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल मेें एनएसजी की अहम बैठक होगी। यहां भारत की सदस्यता पर चर्चा संभव है। इस मसले पर चीनी विरोध कम करने और दूसरे देशों का समर्थन हासिल करने के लिए भारतीय विदेश सचिव जयशंकर यहां पहुंच गए हैं।
  • बैठक में चीन समेत 10 देशों का विरोध ‘चीन की दीवार’ की तरह आड़े आ गया है। लिहाजा, फैसला अगली बैठक तक टाल दिया गया है। सूत्रों अनुसार चीन, के साथ न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रलिया, तुर्की आयरलैंड, ब्राजील, स्विट्‌जरलैंड, बेल्जियम ने भी भारत की सदस्यता का विरोध किया है।
  • बैठक के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा कि ′ एक देश (चीन) के विरोध के कारण भारत को एनएसजी में जगह नहीं मिल पाई। ′ उधर, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चुनयिंग ने कहा, ′ हम किसी देश का विरोध नहीं कर रहे है। गैर-एनपीटी देशों को एनएसजी में प्रवेश देने से एनपीटी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
  • नियम- यह तो नहीं कहा जा सकता कि न्यूक्लियर सप्लायर्स (मांगी गई वस्तु की पूर्ति करना) ग्रुप (समूह) (एनएसजी) में प्रवेश पाने का मोदी का सारा प्रयास विफल हो गया, लेकिन यह जरूर है कि अभी चीन ने नियम का हवाला देकर भारत का दाखिला रोक दिया है। यह दिक्कत भारत के सिद्धांत और व्यवहार में अंतर रहने के कारण उपस्थिति हुई हैं। अहिंसा में आस्था रखने और एटमी हथियार न बनाने का संकल्प लेने वाले भारत ने जब पहली बार परमाणु विस्फोट किया तो उसकी नाकेबंदी करने के लिए 1974 में एनएसजी का गठन हुआ और आज अगर भारत उसी संगठन का सदस्य बनना चाह रहा है तो यह अपने आप में अंतरराष्ट्रीय नाभिकीय सिद्धांत और व्यवहार में मौलिक परिवर्तन करने जैसा है किन्तु खुशी की बात यह है भारत वैसा करने के करीब पहुंच रहा है। 84 सदस्यीय एनएसजी में 38 देश स्पष्ट तौर पर भारत के पक्ष में हैं, जबकि चीन के साथ अन्य 9 देशों के विरोध और ना के चलते भारत के इस अभियान को झटका लगा हैं। ताशकंद में मोदी की चीनी राष्ट्रपति के साथ मुलाकात का भी फायदा नहीं हुआ। क्योंकि चीन अपने रवैए को नियम सम्मत बता रहा है। उसका कहना है। कि अगर भारत को नियमों का अपवाद बनाया गया तो दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा। अटल बिहारी के कार्यकाल में 1996 में दूसरा परमाणु विस्फोट करके भारत ने जब कई प्रकार की पाबंदियों का सामना किया और तोड़ने में अमेरिकी नागरिक परमाणु संधि के साथ कामयाबी मिली, तब भी चीन संधि के विरद्ध था। उसने यही सवाल उठाया था कि अगर अमेरिका भारत के साथ ऐसी संधि कर साकता है तो पाकिस्तान के साथ क्यों नहीं, लेकिन बाद में चीन मोर्चे पर परास्त हुआ।
  • परिणाम:-भारत ने पाकिस्तान की तुलना में अपने को एक जिम्मेदार एटमी शक्ति के रूप में प्रमाणित किया और इसी का परिणाम है कि अमेरिका और उसके समर्थक देश भारत को इस की तुलना में अपने को एक जिम्मेदार एटमी में शामिल करने के पक्ष में खड़े हैं। बस यहां एनपीटी के हस्ताक्षरी होने के नियम आड़े आ रहा है। भारत तेजी से उभरती हुई आर्थिक शक्ति है इसलिए उसकी लंबी उपेक्षा तो संभव नहीं है, लेकिन सवाल समय रहते उद्देश्य पूरा होने का है। अब भारत के पास यही उपाय है कि वह चीन को विश्वास में लेने की कोशिश जारी रखते हुए ब्राजील, ऑस्टि्रया, नयूजीलैंड और तुर्की जैसे देशों का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करें, क्योंकि इस समूह का सदस्य बने बिना भारत का एटमी ऊर्जा का सपना अधूरा रह जाएगा।
  • दल:- एनएसजी में भारत की सदस्यता पर कोई फैसला नहीं होने से प्रधानमंत्री मोदी विपक्षियों के निशाने पर हैं। कांग्रेस और आम आदमी दल (आप) समेंत दूसरे दलों के कई बड़े नेताओं ने मोदी की विदेश नीति पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, गलत रणनीति की वजह से नाकामी मिली है। वहीं कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने कहा ′ पूरी दुनिया में पीएम मोदी ने भारत का तमाशा बना दिया। मोदी की गलत नीतियों के कारण से आज पूरे देश को बेवजह शर्मिंदा होने पड़ रहा है। ′ राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने भी मोदी की कूटनीति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा हैं कि ′ देश के लिए विश्व के मंच पर गहराई और ईमानदारी से कुटनीति जरूरी है। मोदी जी समझते हैं कि नाटक और दिखावा करने से सब कुछ मिल जाएगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मोदी की विदेश नीति पूरी तरह से फ्लॉप (गिर) हो गई है। मोदी को इस नाकामी पर सफाई देनी चाहिए।
  • वॉशिंगटन- अमरीका के मेसाचुसेट्‌स से जुनियर डेमोक्रेटिक सीनेटर एड्‌वर्ड मार्के ने कहा, ‘एनएसजी ने भारत को प्रवेश देने से रोककर परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) के प्रति अपने दृढ़ समर्थन को दोहराया है। यदि भारत को एनएसजी में शामिल किया जाता तो एनपीटी के प्रति एनएसजी की प्रतिबद्धता कमजोर होती है।’
  • मोदी जी ने कहा है कि एनएसजी सदस्यता के लिए भी पूरा प्रयास किया है। एनएसजी को लेकर आलोचना इसलिए नहीं हो रही कि हम वहां विफल हो गए। आलोचना इसलिए हो रही है कि ज्यादा सफल हो गए है।

5 मिसाइल तकनीकी नियंत्रण रिजीम (एमटीसीआर) :-

  • न्यूल्यिर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) का सदस्य न बन पाने से भारत की जो राजनयिक किरकरी हुई थी उसकी एक हद तक क्षतिपूर्ति मिसाइल तकनीकी नियंत्रण रिजीम (एमटीसीआर) का 35वां पूर्ण सदस्या बनने से हो गई है। भारत अब न सिर्फ ऐसी उच्च स्तरीय मिसाइल प्रौद्योगिकी पा सकेगा, जो उसके लिए वैसे आसान नहीं थी बल्कि उनका व्यापार भी कर सकेगा। ऐसे में रूस के साथ हो रहा बह्योस मिसाइल का उत्पादन व्यावसायिक रूप से लाभकारी होगा।
  • भारत की कामयाबी-भारत की यह कामयाबी भले एनएसजी जैसी नहीं है, लेकिन चीन जैसे देशों के लिए संदेश जरूर है कि वे भारत का रास्ता लंबे समय तक नहीं रोक सकते है। भारत सामरिक रूप से उनसे भले पीछे है, लेकिन ज्यादा दिन वह स्थिति भी नही रहने वाली है। भारत को यह सफलता इसलिए भी मिली क्योंकि एमटीसीआर की हेग आचार सहिंता को मानने की घोषणा करने के बावजूद चीन इसका सदस्य नहीं है। इस अभियान में अमेरिकी सहयोग से यह भी साबिता होता है नाभिकीय प्रौद्योगिकी से संबंधित विभिन्न समूहों मेें भारत को शामिल कराने के लिए अमेरिका प्रतिबंद्ध है और ऑस्ट्रेलिया समूह व वाइजनर प्रणाली में भी जल्दी ही भारत को भागीदार बनाया जाएगा। हालांकि, एमटीसीआर 500 किलोग्राम पेलोड ले जानी वाली उन मिसाइलों को नियंत्रित करने का दावा करता है, जिनकी रेंज (शामिल करना) 300 किलोग्राम है और साथ ही यह ड्रोन जैसे यूएवी के प्रसार को रोकने का संकल्प जताता है लेकिन इस संगठन के प्रयासों का दुनिया पर मिला-जुला असर पड़ा है। अगर अर्जेटीना, मिस्र, इराक, दक्षिण अफ्रीका और ताइवान के मिसाइल कार्यक्रम इससे प्रभावित हुए हैं तो चीन, ईरान, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान इस संगठन से बाहर रहकर इसकी हिदायतों का उल्लंघन करते रहे हैं।
  • पाबंदी:-भारत का विवरण इस मामले में बेहतर है कि उसने बाहर रहते हुए भी मिसाइल प्रौद्योगिकी का प्रसार नहीं किया और अब सदस्य बन जाने के बाद भारत की जिम्मेदारी ओर बढ़ गई हैं। संगठन के सदस्य देश मिसाइल प्रौद्योगिकी के लेन-देन में कुछ स्वतंत्र व्यवहार भी करते हैं और नियमों का उल्लंघन करने वाले देशों पर आवश्यक तौर पर पाबंदी नहीं लगती हैं। किन्तु अमेरिका इस मामले में सख्त है और वह ऐसे देशों पर पाबंदी लगाता है। इस मायने में एमटीसीआर का सदस्य बनना भारत के हित में है, क्योंकि इससे भारत और अमेरिका कारण रणनीतिक सहयोग और सघन होगा। भारत इन्ही स्थितियों का लाभ उठाते हुए एक दिन एनएसजी में भी अपनी जगह बनाएगा इसमें किसी प्रकार का संदेह दिखाई नहीं पड़ता हैं।

6 एस्सार:-

  • एस्सार ग्रुप (समूह) पर देश की कई वीवीआईपी हस्तियों की अवैध फोन टेपिंग (गुप्त रूप से सुनने के लिए लगाया गया उपकरण) का आरोप लगा है। इस संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय को शिकायत की गई है। इसमें कहा गया है कि एस्सार ग्रुप ने कई कैबिनेट (मंत्रिमंडल) मंत्रियों के साथ ही कई कारोबारी दिग्गजों के फोन टेप किए।
  • अधिकारी- रेडिया टेप की तरह अब एस्सार टेप ने हमारी व्यवस्था के तहखाने के राज उजागर किए हैं। इनसे पता चलता हैं कि किस तरह सरकारी और निजी क्षेत्र एक-दूसरे से मिलकर पक्षपात करते हैं और कानून व नैतिकता की धज्जियां उड़ाते हुए व्यवस्था को चलाते हैं। सत्ता और संपत्ति के इस मायाजाल में लोकतंत्र के चौथे खंभे के लोग भी शामिल है और उन्हें पटाने में न तो व्यवस्था पीछे है और न ही उन्हें पटने में किसी प्रकार की नैतिक हिचक हैं। हालांकि एस्सार के अधिकारी उस टेप की सच्चाई से इनकार कर रहे हैं, लेकिन इस बारे में 29 पेज की शिकायत पीएमओ में पहुंच गई है और पहुंचाने वाले वकील ने इस मामले की फाइलें (कागजात रखने की फाइल) एक अखबार को सौंप दी हैं। अगर यह जानकारी यही है तो 2001 से 2006 के बीच टेलीकॉम (संचार) जनसमूह एस्सार की तरफ से जिन लोगों के फोन टेप किए गए हैं वे मामूली लोग नहीं है।
  • जानकारी के अनुसार अल बासित खान पूर्व में ड्रग (दवा/औषधि) एन्फोर्समेंट से जुड़े थे। उसके बावजूद प्रशांत रूईया ने उन्हें जनसमूह का सुरक्षा हेड (मुखिया) बना दिया। वर्ष 2001 से लेकर 2011 तक खान एस्सार ग्रुप (समूह) से जुड़े रहे हैं। बाद में उन्हें निकाला गया।
  • नाम:- टेप में निम्नलिखित नाम हैं-

उनमें रेल मंत्री सुरेश प्रभु, पूर्व मंत्री प्रफुल्ल पटेल, राम नाइक, मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, उनकी पत्नी टीना उनकी कई जसमूहों की अधिकारी, सासंद सपा नेता अमर सिंह, गृह मंत्री राजनीव महर्षि, केवी कामथ (आईडीबीआई बैंक के ही पूर्व सीईओ और एमडी) और पूर्व ज्वाइंन मैनेजिंग व्यवस्थापक निदेशक ललिता गुप्ते, प्रमोद महाज, अमर सिंह, ब्रजेश मिश्र, एनके सिंह, सुब्रत राय, अमिताभ बच्चन, मोतीलाल वोरा, श्रीप्रकाश जायसवाल, वरुण गांधी और यशवंत सिन्हा, किरीट सोमैया, जसवंत सिहं, पीयूष गोयल, सुधांशु मित्तल जैसे दिग्गजों के साथ कई बैंकरों के नाम हैं एवं हस्तियों के फोन टेपिंग टेलीकॉम लाइसेसिंग (दूरसंचार अनुमति प्रमाण पत्र) के सिलसिले में टेप किए गए।

  • मामला-इनमें दर्ज बातचीत में नितिन गडकरी के परिवार को फ्रैंच क्रूज नामक स्थान पर सैर कराए जाने की भी चर्चाएं हैं। वैसे तो इस तरह के टेप जारी होने से हमारी जनता ने चौंकना बंद कर दिया है, लेकिन अभी भी समाज के कुछ संवदेनशील हिस्से और व्यवस्था के कुछ अंग जोरदार हरकत में आते हैं। विशेषकर तब यह मसला ज्यादा तुल पकड़ता है जब इससे किसी प्रतिद्धंद्धदी दल या पूंजीपति से बदला लेने की गुंजाइश हो। यानी सरकारी और निजी क्षेत्र के अंतविरोधी के चलते ही इस तरह की टेपिंग होती है, उसी ये यह बाहर आते हैं और उसी के चलते इन पर कार्रवाई होती है। एस्सार के रहस्य खुलने से कांग्रेस दल चौंक गई हैं, क्योंकि जिस दौरान फोन टेपिंग की गई हैं उसमें से अगर एक साल एनडीए के कार्यकाल का है तो चार साल यूपीए कार्यकाल के हैं इसलिए कांग्रेस ने ये टेप सार्वजनिक किए जाने की मांग की है। कांग्रेस को लगता है कि केंद्र की मोदी सरकार को उसे बदनाम करने का एक और हथियार मिल गया है और अगले साल होने वाले पांच राज्यों के चुनावों तक वह इस मामले को घसीटेगी। यह मामला सुप्रीम न्यायालय और पीएमओ दोनों के संज्ञान में है। अब देखना है कि इस पर राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई होती है या फिर इससे सबक लेते हुए व्यवस्था की सफाई का कोई इंतजाम होता हैं। एक नए खुलासा ने राजनीति से लेकर बड़े घरानों तक के गलियारों को हिला दिया है। प्रस्तुत सालों के दौरान एनडीए और यूपीए की सरकारें सत्ता में थीं।
  • सुप्रीम न्यायालय:- में इस समय तक जनहित याचिका पर सुनावई चल रही है, इसमें एस्सार ग्रुप पर अपने फायदे के लिए कुछ नेताओ, अधिकारियों एवं पत्रकारों की फोन टेपिंग का आरोप है। यह पीआईएल केंद्र की तरफ से दायर की गई है। एक अग्रेजी अखबार ने अपने विवरण में दावा किया है कि सुप्रीम न्यायालय के वकील सुरेश उप्पल ने एक जुन को इस बोर मेंं 29 पेज की एक शिकयत वीएमओ को भेजी है।
  • जनसमूह:- ने कहा कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया है। सभी तथ्यों और आरोपों की जांच की जानी चाहिए। उधर, जिस कर्मचारी अलबासीतखान पर फोन टेपिंग का आरोप है, उसके वकील सुरेश उप्पल तक का कहना है कि खान एस्सार समूह में सुरक्षा हेड थे। उनहोंने ये फोन टेपिंग अपने छॉप मैनेजमैंट (छाप व्यवस्था) के कहने पर की थी।

7 विश्वभर की कठपुतली:-

  • भले ही मनोंरजंन के लिए आजकल दुनिया भर के बिजली उपकरण खेल, मूवी एवं अन्य साधन उपलब्ध हो गए हों लेकिन कठपुतली का तमाशा और उनके हाव- भाव देखने का मजा ही कुछ अलग हैं। कठपुतली कई तरह की होती हैं और उन्हें लकड़ी के अलावा कपड़े, मिटटी, चमड़ा किसी भी समान से बनाया जा सकता है। आमतौर पर धारणा है कि कठपुतली का खेल सिर्फ भारत में ही दिखाया जाता है। लेकिन सच तो यह है कि इसके दोस्त दुनियाभर में है, जानते हैं दुनियां की कुछ मशहूर कठपुतलीयों के बारे में जो निम्नलिखित विदेशों में हैं-
  • वियतनाम की कठपुतली- इस देश में खेल 10वीं सदी से भी पुराना माना जाता है। यहां इस कला को मुआ रोई नॉक कहते हैं, जिसका मतलब है पानी पर नृत्य करने वाली कठपुतली। कठपुतलीयों को नचाने वाले कलाकर कमर तक पानी भरे तालाब में खड़े होकर लकड़ी से बनी इन कठपुतलीयों का तमाशा दिखाते हैं। यहां इन कठपुतलीयों के भव्य शो आयोजित किए जाते हैं, जो पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।
  • चीन की शैडो (परछाई) कठपुतली- चीन में बच्चों को संस्कृति और इतिहास पढ़ाने के लिए कठपुतली शो का आयोजन किया जाता है। यहां धागे से खींचे जाने वाले खिलौनों और शैडो कठपुतली का तमाशा दिखाया जाता है। शैडो कठपुतली वैसी आकृतियां होती हैं जिन पर विशेष एंगल (तरीके) से रोशनी डालने पर पीछे लगे पर्दे पर उनकी सजीव तस्वीर उभर आती है। कार्यक्रम दिखाते समय कलाकार बीच-बीच में बांस की सीटी भी बजाते रहते हैं, जिससे दर्शकों में उत्साह आ जाता है।
  • अमरीका के सुपरहिट कठपुतली शो (कार्यक्रम) - यूरोपीय देशों और अमरीका में कोमल और गुदगुदे कपड़ों से कठपुतली बनाई जाती हैं। इन देशों में कठपुतली के कई सुपरहिट टीवी शो (अतिप्रसिद्ध दूरदर्शन कार्यक्रम) प्रदर्शित किए जा चुके हैं। यहां बच्चों के लिए प्रेरक, शिक्षाप्रद और मनोरंजन कार्यक्रम बनाने के लिए कठपुतलीयों का खूब प्रयोग किया जाता है। अमरीकी धारावाहिक सीसेम स्ट्रीट का नाम तो आपने जरूर सुना होगा, जो हमारे यहा ‘गली-गली सिम मिस’ के नाम से दिखाया जाता रहा है।
  • इंडोनेशिया में रामकथा- कठपुतली का इस्तेमाल रामकथा के प्रदर्शन के लिए किया जाता है। जिसे यहां के धर्मप्रेमी लोग बड़े चाव से देखते हैं। इसके अलावा जावा और सुमात्रा जैसे देशों में भी कठपुतली के माध्यम से भगवान राम की जीवनी का प्रदर्शन किया जाता है। इन देशों में शैडो कठपुतली का इस्तेमाल किया जाता है। मनोरंजन की यह विधा यहां काफी लोकप्रिय है।

उपसंहार:-

  • हमें अपनी विदेश नीति और विश्व भर में घटित घटनाओं को आकार देने की स्वतता की बेशकीमती विरासत की पूरी तरह रक्षा करनी चाहिए। इसके लिए मौजूदा सरकार द्वारा कुछ विशेष कदम उठाए जाने चाहिए।

- Published/Last Modified on: July 6, 2016

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