Current News (Concise) ]- Examrace" /> Current News (Concise) ]- Examrace" />

उच्च 6 समाचार भाग 2 (Top Six News Part 2 Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

()

प्रस्तावना: - यहां पेश हैं कानून से लेकर सीमा की सुरक्षा, राजनीति, चुनाव सुधार, पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़ी छह बड़ी खबरों पर जाने-माने विशेषज्ञों के नजरिए से विश्लेषण हैं। प्रस्तुत सब समाचारों के विशेषज्ञों द्वारा विशेषण करने से यह तो पता पड़ता है कि व्यक्ति के जीवन शैली में क्या आवश्यक तत्व हैं और क्या नहीं हैं। अत: हर तरह के समाचारों का विश्लेषण करने से बात स्पष्ट हो जाती है कि व्यक्ति को उस विषय में क्या ठोस कदम उठाना चाहिए।

1 भारत का नक्शा: - खंडित व अखंड भारत में अंतर है। औपचारिक नक्शें में खंडित भारत है। और अखंड भारत के नक्शे में बाग्लादेश, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बर्मा आदि देश समाहित है। अखंड भारत का नक्शा दिखाना गलत नहीं होगा।

  • कानून- यह बहुत ही अच्छा कानून होगा जिसमें भारत के नक्शे को गलत दिखाने वालें को सजा का प्रावधान किया जा रहा है। कुछ सोशल नेटवर्किंग साइट्‌स (सामाजिक जाल सपंर्क स्थान) पर जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान और अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा दिखाया गया। हालांकि भारत के विरोध के बाद नक्शे को सुधार लिया गया पर इससे अधिक हम कुछ नहीं कर सके।
  • जुर्माना: - कुछ लोगों को 100 करोड़ रुपए तक का जुर्माना और सात साल की जेल बहुत ही सख्त सजा लग सकती है लेकिन देश की सीमाओं को गलत दिखाने वाले बहुत से असामाजिक तत्व देश में रहते हैं। उन पर सख्ती किया जाना बहुत जरूरी है। यह कानून हर उस भारतीय पर लागू होगा जो देश में या फिर विदेश में रहते हुए भारत की भौगोलिक सीमा के साथ खिलवाड़ करने ही हिमाकत करेगी। यही नहीं विदेशी व्यक्तियों को भारत में रहते हुए, इस कानून की अनुपालना करनी होगी। कोई विदेशी कंपनी (जनसमूह) या स्थान भी ऐसा करेगी तो उसे कानूनन सजा भुगतनी होगी।
  • नक्शे- हमारे पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद का मुद्दा अलग विषय है, उससे देश निपटेगा। उसके मद्देनजर भी देशवासियों के लिए भारत को नया आधिकारिक नक्शा जारी करने की कोई जरूरत ही नहीं है। भारत की तरफ से पहले ही आधिकारिक नक्शा जारी किया हआ है। उस नक्शे का उल्लंघन होने पर ही कार्रवाई की जा सकेगी। विदेश में रहने वाले विदेशी क्या करते हैं, इस बात से हमें कोई मतलब नहीं होना चाहिए। हमारा कानून उन पर लागू नहीं होगा। यह उन पर तब ही लागू होगा जबकि वे भारत में रह रहे हों।

2 वादे: - जिस तरह के वादे राजनीतिक दल कर सकते हैं हमें यह तो समझना ही चाहिए कि सत्ता में आने पर इनको पूरा करने मेें होने वाले खर्च की वसुली भी जनता से ही होनी हैं।

हमारे देश में चुनाव चाहे लोकसभा के हों या फिर विधानसभा के और यहां तक कि सबसे निचली पंचायत का। मतदाताओं को प्रलोभन देने का दौर कोई नया नहीं है। लेकिन जब राजनीतिक दल बाकायदा घोषणा पत्र जारी कर ऐसे वादे तक करने लगे जिनको पूरा करना संभव ही नहीं हो उसे क्या कहा जाए। ये वादे मतदाताओं को प्रलोभन की श्रेणी में आते हैं। या यूं कहें कि घुस का रूप है। तमिलनाडु में इस बार भी जे. जयललिता और एम. करुणानिधि दोनों ही लुभावने वादों को लेकर चुनाव मैदान में हैं। दूसरे राज्यों में भी कमोबेश ऐसे ही हालात रहे हैं। आगामी वर्ष होने वाले चुनावों में भी ये सब दोहराए जाएंगे।

  • प्रलोभन- सुप्रीम कोर्ट (न्यायालय) ने भी चुनाव आयोग को कहा था कि उसे घोषणा-पत्रों के नियम के लिए दिशा- निर्देश बनाने चाहिए। मुफ्त बिजली, घर, कर्जा, माफी, लेपटॉप, मंगलसूत्र, स्कूटी व मिक्सर ग्राइंडर और यहां तक कि आटा-चावल जैसी वस्तुओं का वादा करते समय राजनीतिक दलों को यह तो स्पष्ट करना ही चाहिए। कि वे इनको कैसे पूरा करेंगे? लोकतंत्र में सबके वोट की कीमत भी एक ही है। प्रालोभनों के इन पिटारों से उन उम्मीदवारों को सीधे-साीधे नुकसान होता है जो ईमानदार और साधनविहीन है। मतदाताओं को भी इस तरह के प्रलोभनों के पीछे छिपी राजनीतिक दलों की मंशा समझनी होगी। चुनाव आयोग को भी ठोस निर्देश जारी करने होंगे।

3 पोस्टर (बड़ा छपा हुआ चित्र) युद्ध: - चुनाव का मौका हो या नहीं हो राजनीतिक दलों को यह ध्यान तो रखना ही होगा कि उनकी ओर से जारी पोस्टरों की भाषा संयमित हो।

हमारे देश में हर बार चुनावों में पोस्टर व होर्डिंग्स (बड़े छपे हुए चित्र व तख्ता) लगते आए हैं। और सही मायने में कहा जाएं तो बिना पोस्टर के किसी चुनाव का माहौल नहीं बन सकता। हर बार चुनावों में तरह-तरह के पोस्टर के माध्यम से मतदाताओं का ध्यान बंटाने की कोशिश की जाती रहीं है। पोस्टर (बड़ा छपा हुआ चित्र) व नारे गढ़ने के दौरान कई बार हालात चिंताजनक तक हो जाते हैं जब राजनीतिक दल एक-दूसरे पर व्यक्तिगत हमले करते नजर आते हैं। कई बार तो चरित्रहीन के प्रयास तक होते हैं। वैसे एक कार्यकता के रूप में कोई अपने नेता को देवी-देवता के रूप में पेश करता है या किसी अन्य नायक के रूप यह उसकी निष्ठा से जुड़ा हो सकता है लेकिन यह ध्यान तो रखना ही होगा कि ऐसे पोस्टर जनभावनाओं के खिलाफ नहीं हो। उत्तरप्रदेश में भी इन दिनों ऐसे ही पोस्टर सामने आए हैं। कहीं किसी को मां काली तो किसी को सिंहम के रूप में दिखाया जा रहा है। हम हमेशा देखते हैं कि न केवल पोस्टर बल्कि नेताओं की बयानबाजी को लेकर भी माहौल गरमा जाता है। आरोप प्रत्यारोप का दौर देश भर में बवाल का कारण बन जाता हे। जिम्मेदारी राजनीतिक दल और उनके कार्यकताओं की ही बनती है कि वे पोस्टर या नारे जारी करते समय सावधानी बरतें। चुनाव चाहें राज्यों के हों या फिर लोकसभा के सबको व्यक्तिगत परित्रहन के प्रयासों वाले पोस्टरों से तो बचना ही होगा। पिछले कुछ चुनावों से चुनाव आयोग व स्थानीय पुलिस प्रशासन की सक्रियता के कारण आपत्तिजनक पोस्टर (बड़ा छपा हुआ चित्र) अपेक्षाकृत अब कम होते जा रहे हैं।

4 कश्मीर: -पाकिस्तान ने भी जम्मू-कश्मीर सीमा के उस पार पूर्व सैनिक परिवारों को बसाकर उनको खेती के लिए जमीन और पशु दे रखें हैं। यहां तक कि बंकर व मशीनगनें भी।

जम्मू -कश्मीर में सैनिक बस्ती बसाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए जमीन राज्य सरकार से मांगी जा रही है जिसका फैसला होना शेष है। निश्चित ही ऐसा हुआ तो रणनीतिक तौर पर सधा हुआ कदम कहा जाएगा। केंद्र और राज्य सरकार को तत्परता दिखाने की आवश्यकता है। जम्मू-कश्मीर सीमा के उस पर पाकिस्तान ने अपने पूर्व सैनिक परिवारों को बसाकर उन्हें खेती के लिए जमीन और पशु दे रखे हैं। उनको न केवल बंकर बल्कि उन पर मशीनगनें भी तैनात कर दी जाती हैं। चीन भी सीमावर्ती इलाकों में सैन्य आबादी बसाकर गतिविधियां संचालित करता है। भारत के लिए भी जरूरी होगा कि न केवल जम्मू-कश्मीर में सैनिक बस्ती बसाए बल्कि उसे पजांब, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उ. पू. राज्य, प. बंगाल, असम में भी आधारभूत सुविधाओं के साथ ऐसा ही बस्तियां बसानी चाहिए। यदि सैन्य परिवारों को सीमावर्ती राज्यों में खेती के लिए जमीन और पशु उपलब्ध करा दि जाएं तो उनका आकर्षण इस भूमि के लिए बढ़ा हुआ होगा। पड़ोसी राज्य से कोई परेशानी होने पर हमें सीमा पर ही प्रशिक्षित लोग मिलेंगे। इसके अलावा उनके रहने से देशभक्ति का अलग ही माहौल बनेगा जो सीमावर्ती इलाकों में बेहद जरूरी है। सीमा की सुरक्षा का तारबंदी लेजर बीम की बजाय पूर्व सैनिकों के परिवारों की बसावट बहुत अच्छा और स्थायी उपाय हो सकता है।

5 तंबाकु: - सरकार ने तंबाकु उत्पाद के पैकेट के 85 फीसदी हिस्से पर सचित्र चेतावनी लागू की। तंबाकु निर्माताओं ने विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट (न्यायालय) ने इस सीमा को बाध्यकारी बताया।

सचित्र चेतावनी (पिक्टोरियल वॉर्निंग) एक तरीका है, जिससे तंबाकु उपभोग करने वालों को सजग किया जा सकता है। इससे स्वास्थ्य के प्रति जनता में जागरूकता बढ़ेगी और तंबाकु उपभोग रुकेगा। तंबाकु का उपभोग वयस्क आयु में शुरू करने वाले अधिकांश लोगों को तंबाकु के दुष्प्रभावों के बारे में मालूम नहीं होता। वे इसे प्रयोग और आनंद के तौर पर शुरू करते हैं। पर बाद में समझ आता है कि निकाटिन हेरोइन और कोकेन से भी ज्यादा आदी बना देती हैं। इसलिए तंबाकु उपभोग शुरू करने वाली व्यक्ति ’पिक्टोरियल वॉर्निंग’ (सचित्र चेतावनी) से रुक पाएगा। यह कुछ शोध में साबित हुआ है। जो लोग तंबाकु सेवन छोड़ना चाह रहे हैं, उनके व्यवहार में भी चेतावनी से तब्दीली लाई जा सकती है। यानी यह जनशिक्षा का जरिया है। पर यह वॉर्निंग अकेले काम नहीं करेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी यह मानता है कि तंबाकु का सेवन करने से रोकने के लिए कई रणनीति एक साथ जोड़नी होंगी। सार्वजनिक स्थलों पर धुम्रपान पर पाबंदी, विज्ञापन और फिल्मों में फिल्मांकन पर रोक इसमें शामिल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के तंबाकु नियंत्रण ऊष्णता में मांग और आपूर्ति को हतोत्साहित करने के उपाय हैं। बहरहाल तस्वीर के रूप में दी जाने वाली चेतावनी में तंबाकु से होने वाली करीब 40 बीमारियों को अलग-अलग तस्वीर के साथ बताना होगा। हर पैकट पर अलग-अलग चेतावनी रहे। एक ही तस्वीर को देखकर उपभोक्ता पर असर कम होता है।

6 तापमान वृद्धि: -पृथ्वी के तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर (हमनदी) पिघल रहे हैं। भारतीय उपमहाद्धीप में तो ज्यादातर ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। भारत में ही नहीं दुनियाभर में यही हो रहा है। तापमान बढ़ेगा तो जमीन में नमी कम होगी और जंगल सूखेंगे और वहां गर्मी बढ़ते ही आग लगती है। भारत में ही नहीं टोरंटो के जंगलों में अभी भयानक आग लगी हुई हैं। कैलिफोर्निया के जंगलों में तो हर साल आग लगती है। ऑस्ट्रेलिया में बड़ी आग लगती है। ग्लेशियर अगर नजदीक हैं तो जंगलों की आग का असर जाहिर तौर पर वहां जल्दी पहुंचता है। इसके साथ ही प्रदूषण बढ़ने का फर्क ग्लेशियर के आकार पर पड़ा है। उत्तराखंड में शहरीकरण और औद्योगिकीरण के कारण तापमान बढ़ा है, जिसके कारण ग्लेशियर दो तरह से घटता है। एक आकार में और दूसरा उसे शरीर मास का कम होना। इस पर आजकल बहुत रिसर्च (खोज) हो रही है। पता नहीं लग रहा है कि बॉडी मास से ग्लेशियर कितना कम हो रहा है। उसका आकार कितना घटा है। यह तो बताना आसान है। ग्लेशियर का महत्व गर्मियों के दिनों में होता है। जब नदियों में पानी वहां से आता है। ग्लेशियर का भारतीय उपमहाद्धीप में महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां सालभर में 8760 घंटों में से सिर्फ 100 घंटे बारिश होती है। जब गर्मी चरम पर होती है जब कहीं भी पानी नहीं होता है तब ग्लेशियर (हिमनदी) से नदियों में पानी आता है। अगर ये पिघलते रहें तो गंगा, ब्रह्यपुत्र जैसी नदियां सूख जाएंगी।

- Published on: June 29, 2016