उच्च दस समाचार भाग-1 (Top Ten News Part - 1 in Hindi) (Download PDF)

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अफ्रीका:- भारत में दाल का संकट अब शायद जल्द ही खत्म हो जाएगा। भारत ने अफ्रीकी देश मोजांबिक से लंबे समय तक दाल खरीदने का समझौता किया है। मोदी की पहली मोजांबिक यात्रा के दौरान तीन समझौते किए गए है। उनमें से एक यह है।

  • यात्रा-मोदी जी ने मोजांबिक के राष्ट्रपति फिलिप न्यूसी से कई मुद्दों पर बातचीत की। दोनों नेताओं ने आतंकवाद को दुनिया का सबसे बड़ा खतरा बताया है। मोदी जी ने अफ्रीकी के चार देशों की यात्रा की। पांच दिन यात्रा में मोदी जी सबसे पहले मोजांबिक की राजधानी मापूतों पहुंचे। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका जोहानिसबर्ग में गए फिर तंजानिया और अंत मेें केन्या गए।
  • सुरक्षा एवं सहयोग-मोदी जी ने कहा ”अफ्रीका में भारतीय निवेश के लिए मोजांबिक अफ्रीका में निवेश का प्रवेश दव्ार है। राष्ट्रपति न्यूसी और मोदी जी मानते है कि पूरी दनिया आंतकवाद से जूझ रही है। भारत और मोजांबिक हिन्द महासागर के दव्ारा एक दूसरे जुड़े है। इसलिए दोनों के बीच सुरक्षा संबंध मजबूत होने चाहिए। मोदी जी ने कहा कि मोजांबिक को सुरक्षा, विकास और समृद्धि के लिए भारत हर तरह का सहयोग उपलब्ध कराएगा।

तीन समझौते निम्नलिखिति हैं-

  • भारत ने मोजांबिक से किया दाल खरीदने के लिए दीर्घकालीन समझौता किया।
  • युवा और खेल मामलों में सहयोग
  • मादक पदार्थों की तस्करी रोकने में सहयोग।

भारत ये मदद देगा-

  • मोजांबिक के सुरक्षा बलों को मजबूत बनाने में
  • एड्‌स व अन्य बीमारियों की दवाओं का दान में देगा।
  • उद्देश्य:-यात्रा का फोकस हाइड्रोकार्बन, व्यापार एवं निवेश, कृषि तथा खाद्य क्षेत्रों में अफ्रीकी देशों से सहयोग मजबूत करने पर। भारत अफ्रीकी देशों से रिश्ता मजबूत करने पर जोर दे रहा है। भारत का मानना है कि अफ्रीकी देशों से सहयोग की काफी संभावना है।
  • भरोसा-कुछ भयावह रूप से गलत हो रहा है। जब भारत में किसान उत्तरोत्तर खुदखुशी के लिए मजबूर किए जा रहे हैं, ऐसे समय में मोजांबिक से दालें आयात करने के लिए सरकारों के बीच अनुबंध त्रुटिपूर्ण अर्थनीति का सबूत हैं, जो अंतत: भारतीय किसानों का जड़ से उखाड़ डालेगी। कुछ दशकों पूर्व जब बलराम जाखड़ कृषि मंत्री थे तो उन्होंने भी कुछ अफ्रीकी देशों में दलहनों की खेती कराने और फिर उन्हें आयात करने का प्रस्ताव रखा था। यूपीए सरकार में तब के कृषि मंत्री शरद पवार भी चाहते थे कि भारत म्यांमार और उरुग्वे में दलहन की खेती कराए और बाद में दालों का आयात किया जा सकता है। किन्तु इन सारे वर्षों में कृषि मंत्रालय के किसी अज्ञानी नौकरशाह का यह काल्पनिक विचार केवल संचार माध्यम में बयानबाजी तक सीमित रहा। इस बार प्रधानमंत्री कार्यालय के नौकरशाह अपनी बात मनवाने में कामयाब रहे हैं। खबरों के अनुसार भारत स्थानीय कार्यकर्ताओं के माध्यम से मोजांबिक में किसानों के संपर्क का पता लगाएगा और उन्हें बीज व उपकरणों सहित उचित तकनीकी मुहैया कराएगा। खेती शुरू करने के पहले इन किसानों को आश्वस्त किया जाएगा कि उनकी उपज को भारत सरकार खरीदेगी और खरीदी मूल्य भारत सरकार दव्ारा दिए जा रहे न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम नहीं होगा।
  • घरेलु उत्पादन- यदि भारत नियमित रूप से दालों के उत्पादन के लिए मोजांबिक में किसानों का संपर्क तैयार कर सकता है तो इसमें आश्चर्य की बात यह है कि किसानों का ऐसा संपर्क भारत में ही क्यों नहीं खड़ा किया जा सकता है। सरकार ऊंची कीमत देने और निश्चित खरीदी का ऐसा ही, आश्वासन क्यों नहीं देती, जिससे आसानी से घरेलू उत्पादन बढ़ सकता था और दालों की उपलब्धता बढ़ जाती है।
  • दालों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कुंजी निश्चित खरीदी में है। सरकार ने चाहे कुछ महत्वपूर्ण खरीफ दलहनों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है। जैसे अरहर के लिए प्रति क्विंटल 425 रुपए का बोनस देकर मूल्य 5,050 रुपए प्रति क्विंटल किया गया है, लेकिन दीर्घविधि में केवल कीमत के बल पर उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता हैं। यदि सरकार मोजांबिक के किसानों को आश्वासन दे सकती है कि वे जो भी पैदा करेंगे, उसे वह खरीदेगी तो यही आश्वासन देश के भीतर नहीं देने का कोई कारण नजर नहीं आता। भारत को उम्मीद है कि वह मोजांबिक से 1 लाख टन दालें आयात कर सकेगा, जो कुछ ही वर्षों में बढ़कर 2 लाख टन तक पहुंच जाएगा। इसके अलावा तंजानिया, कैन्या और मलावी सहित कुछ अन्य अफ्रीकी देशों में भी दलहनों की खेती कराने की संभावनाएं तलाशी जाएंगी। दालों की लगातार बढ़ती घरेलू मांग की पूर्ति अफ्रीकी उत्पादन पर बढ़ती निर्भरता भारतीय कृषि के मोर्चे पर विनाश का सिलसिला छोड़ जाएगी, जिसके बारे में शायद ठीक से सोचा नहीं गया हैं।
  • खाद्य सुरक्षा -किसी भी सरकार की प्राथमिक जवाबदारी है, लेकिन सिंगापुर जैसे देशों की तरह भारत में यह सुरक्षा आयात से सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए। जब भारत के पास 60 करोड़ किसानों की विशाल फौज हो जो पिछले कुछ दशकों से खेती में संकट का सामना कर रही है तो ऐसी दशा में भारत को चाहिए कि वह व्यापक जन-समूह से उत्पादन करवाएं। 1966 में हरित क्रांति के समय यही किया गया था।
  • तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बृद्धिमता की दाद देनी चाहिए कि उन्होंने परिश्रमपूर्वक सरकारी खरीद का तंत्र खड़ा करके देश को भूखमरी के लंबे दुश्चक्र से बाहर निकाला।
  • खाद्य आत्म-निर्भरता -किसी भी देश के लिए इससे बढ़कर विनाशक कोई बात नहीं हो सकती कि खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्य आत्म-निर्भरता की पूर्व शर्त को त्याग दिया जा। खाद्य आत्म-निर्भरता सुनिश्चित करना राष्ट्रीय सम्प्रभुता की कसौटी मानी गई हैं। हमें यह नही भूलना चाहिए भारत 2007 व 8 के दंगों से बच गया जब दुनिया अपूर्व खाद्य संकट का सामना कर रही थी। उस समय कम से कम 37 देशों में ऐसे दंगे हुए थे और वे सारे देश खाद्य के लिए आयात पर निर्भर देश थे। हमारे पास तब प्रचुर खाद्य भंडार था। यह भंडार बनाए रखने की सतत नीति का परिणाम था।
  • दलहन-दलहनों में जिस पर आयात शुल्क शुन्य है। अब जब भारत यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया सहित अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने वाला है तो यह आशंका बढ़ रही है कि दूध व दूध के उत्पाद, फल-सब्जियाँ, और यहां तक कि गेहूं भी निशाने पर आ रहा हैं। खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्य आयात पर निर्भरता के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिणामों को सोचकर शर्मा जी कांप जाते हैं।

                                                                        देविंदर शर्मा, र्प्यावरणविद व कृषि विशेषज्ञ

                                                                                         (यह लेखक के अपने विचार हैं)

दिल्ली:-एनआईए राष्ट्रीय जांच कार्यकर्ता (एलआईए) ने देश में आईएसआईएस की बढ़ते आधार और गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए चल रही जांच में 6 देशों से सहयोग मांगा है। जिन देशों से मदद मांगी गई हैं उनमें अमरीका, यूएई, कनाड़ा, आयरलैंउ, न्यूजीलैंड, और सूडान शामिल है। देश में आईएस के लिए काम कर रहे संदिग्धों की तलाश और उनकी आतंकी मंसूबों पर रोक लगाने के लिए एनआईए जाचं कर रही है। एनआईए ने इस बात का खुलासा 16 आईएस संदिग्धों के खिलाफ दायर सूची में किया है। इसमें कहा गया है कि संदिग्धों के खिलाफ प्रमाण जुटाने के लिए साझा कानूनी सहयोग संधि (एमएलएटी) के अंतर्गत एनआईए ने अमरीका को दो, कनाडा को एक, यूएई को दो आवेदन भेजे हैं।

वहीं आयरलैंड व न्यूजीलैंड और सूडान को एक-एक पत्र रोगेटरी भेजे है। फिलहाल इन देशों से कोई सूचना अभी तक नहीं मिली है। हिरासत में लिए संदिग्ध भारत में आईएसआईएस को बढ़ावा देने के लिए और भारत में खिलाफत की स्थापना के लिए लगातार काम कर रहे थे।

कोलकत्ता:- भारतीय मछुआरा समुदाय ने देश में घुसपैठ व अवैध तस्करी रोकने के लिए नायाब कदम उठाया है। इस समुदाय ने तस्करी और अवैध तस्कर देश की समुद्री सीमा के रास्ते घुसने की फिराक में रहते हैं। देश में मछुआरा समुदाय शीर्ष संस्था नेशनल फिशवर्कर फोरम (राष्ट्रीय मछली कर्मचारी विशेष संगठन) भारतीय तटरक्षक बल के अधिकारियों के समक्ष ज्ञापन सौंपेगी। इस संस्था के नेशनल कंवेनर (राष्ट्रीय समिति का संयोजक) देबाशीष श्यामल ने बताया कि ज्ञापन हल्दिया पश्चिम बंगाल स्थित तटरक्षक बल कार्यालय में सौप दिया जाएगा। पहली सूचना 1999 कारगिल हमले में एक गड़ेरिया ने दी थी। समुद्री सीमा की भौगोलिक स्थित निम्न हैं-

  • समुद्री सीमा 8000 किमी है।
  • पूरी सीमा 4095 किमी लंबी है।
  • समुद्री सीमा 180 किमी लंबा हैं।

भारतीय तटरक्षक बल के प्रववक्ता आईजे सिंह ने बताया कि यह एक बेहतरीन कदम है अगर उनकी तरफ से ऐसा कोई प्रस्ताव आएगा तो हम उसका स्वागत करेंगे। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर सही कदम है।

चीन:-चीन के साइंस (विज्ञान) फिक्शन राइटर (लेखक) हाओं जिंगफेंग की कहानी है ’फोल्डिंग बीजिंग।’ कहानी के अनुसार चीनी राजधानी में विषमता इतनी है कि विभिन्न सामजिक वर्गों को एक साथ एक सार्वजनिक जगह का इस्तेमाल नहीं करने दिया जाता है। वे बीजिंग के छठे रिंग रोड (घेरा सड़क) को अदल-बदल कर इस्तेमाल कर सकते हैंं। यह रिंग रोड हर 24 घंटे में बदल जाता है। एक तरफ साफ नीला आकाश, सुकुनभरी हरियाली से ढंकी सड़के और सुपर बाजार है। यहा पहले जगह के 50 लाख लोग पूरे 24 घंटे आनंद लेते हें जबकि दव्तीय और तृतीय जगह के साढ़े सात करोड़ लोगों को सिर्फ 12-12 घंटे मिलते हैं। अंतिम समूह को एक ऐसी जगह ठूंस दिया जाता है, जहा कामगार पसीना बहाते है। यदि कोई अपने स्तर से ऊपर के जोन में चला जाए तो उसकी जमकर पिटाई होती है, उसे जेल में डाल दिया जाता है।

  • आय- आज का बीजिंग हाओं की कल्पना से भिन्न नहीं है। यह धरती पर सबसे विषम समाजों में से एक है। 1990 से 2014 के बीच प्रतिव्यक्ति आय 13 गुना बढ़ी, जबकि वैश्विक स्तर पर आंकड़ा तिगुने का है।
  • शिक्षा- गांवों में सिर्फ 10 फीसदी युवा, उच्च विद्यालय में जाते हैं, जबकि शहरों में यह प्रतिशत 70 है। गांवों में ज्यादातर बच्चे 15 साल की उम्र में विद्यालय छोड़ देते हैं तो शहरों में एक-तिहाई उपाधि लेते हैं।
  • संपत्ति-मध्यवर्ग के पास अपनी अचल संपित्त है और नौकरी भी है, लेकिन वे चिंतित है कि उन्हें ऊपर और नीचे दोनो ओर से निचोड़ा जा रहा है। 1980 के दशक में चीन दुनिया के सबसे समानता आधारित समाजों में था। जिनी को इफिशियंट पर (विषमता के इस पैमाने पर 0 यानी पूर्ण समानता और 1 यानी पूर्ण विषमता है) यह 0.3 पर था। अब यह 0.46 पर है, जो विकसित देशों में सर्वाधिक है। मध्यवर्ग की शिकायत है कि सुपर-रिच (असाधारण अमीर) बहुत तेजी से आगे बढ़े हैं और वहां पहुंचकर उन्होंने सीढ़ी भी हटा ली है।
  • शंघाई लग्जरी लोगों के जनसमूह हुरुन के अनुसार देश के 568 अरबपतियों ककी कुला संपत्ति ऑस्ट्रलिया के जीडीपी के बराबर है। शीर्ष 1 फीसदी परिवारों के पास चीन की एक-तिहाई संपत्ति है। नेशनल इकोनॉमिक रिसर्च इंस्ट्रीट्‌यूट (राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था खोज संस्थान) के वांग शिओलू के अनुसार अघोषित संपत्ति जोड़ लें तो शीर्ष 10 फीसदी, सबसे नीचे के 10 फीसदी तबके से 21 गुना ज्यादा कमाते हैं। मध्यवर्ग के कई लोगों को लगता है कि वे कड़ी मेहनत से ऊपर उठे हैं, लेकिन उन्हें उनके प्रयासों का उतना लाभ नहीं दिया गया है। कई लोगों को लगता है कि सुपर-रीच (शक्तिशाली अमीर) ओर अन्यों में अंतर इसलिए बढ़ रहा है, क्योंकि खेल में बेईमानी हो रही है। समाज दो वर्गों में बंट गया है। एक वह जिनके सत्ता में संपर्क हैं और एक वे जिनके संपर्क नहीं। बीजिंग में स्टार्टअप चलाने वाले 25 साल कांग मिआओं कहते हैं कि रिश्वतखोरी न भी हो तो जिन लोगों के संपर्क हैं उन्हें सरकारी नीतियों का पहले पता चल जाता है। मध्यवर्ग को लगता है कि उनकी संपत्ति खतरे में है। पेंशन व बीमा का प्रबंध बहुत कमजोर है। सूपर रीच (शक्तिशाली अमीर) तो अपना धन विदेश ले जाते हैं, लेकिन साधारण धनी वर्ग ऐसा करने में असमर्थ हैं।
  • ब्याज- चीनी बैंक प्राय: महंगाई की दर से कम ब्याज देते हैं, इसलिए लोग शेयर बाजार या अन्य योजनाओं में पैसा लगाते हैं। 2014 में स्क्रू और टीन ओपनर बनाकर खूब पैसा कमाने वाले डिंग निंग ने एजुबाओं नामक जनसमूह खोली और इसने 10 लाख निवेशकों से 50 अरब युआन जुटा लिए। उन्होंने बैंको से कई गुना 9 से 15 फीसदी ब्याज देने का दावा किया था। उसे सरकार ने ’नमूना आतंरप्रेन्योर’ करार दे दिया। किन्तु पिछले साल जनसमूह की संपत्ति जब्त करके इसे धोखाधड़ी करार दे दिया गया। ऐसी 4000 योजनाएं नाकाम हुई हैं। केवल पिछले एक साल में निवेशकों को 20 अरब डॉलर की चपत लगी है। 1949 में निजी अचल संपत्ति पर पाबंदी लगाने के बाद भूखंड 70 साल की गिरवी पर दिए जाते हैं कुछ जगहों पर ये 20 साल के लिए ही दिए गए और नवीनकरण के लिए लोगों से बाजार भाव के एक-तिहाई के बराबर रकम मांगी गई। इसे लेकर बहुत रोष है।

इजरायल:- हाल ही में एक विदेशी आईटी दिग्गज जनसमूह ने स्थानीय टेक फर्म खरीदने की घोषणा कर दी। वर्ष 2015 इजरायल की स्टार्टअप इंडस्ट्री ने प्रमाण 300 अरब रुपए की पूंजी बनाई थी, जो पिछले साल की तुलना में 30 फीसदी अधिक है। जो देश कभी ’स्टार्टअप नेशन’ (काम करना/शुरू करना राष्ट्र/क्रौम) कहलाता था, अब पहचान खो रहा है। वर्ष 1998 से 2012 तक यहां की टेक इंडस्ट्री (उद्योग) हर साल 9 फीसदी की दर से बढ़ी, जो जीडीपी की दुगुनी दर है। इसके बावजूद पिछले एक साल में ही आईटी सेक्टर में गिरावट शुरू हो गई है, इसका असर अर्थव्यवस्था पर नजर आने लगा है।

  • कारण-इजरायल के वित्तमंत्रालय ने हाल ही में विवरण में बताया कि इस गिरावट का प्रमुख कारण आईटी सेक्टर में प्रशिक्षित एवं प्रतिभाशाली कर्मचारियों की कमी हैं। इससे देश की ख्याति पर गलत असर पड़ रहा है, क्योंकि पहले समझा जाता था कि यहां तकनीकी जानकारों की भरमार है। इसका एक कारण इजरायल डिफेंस फोर्सेस (आक्रमण सेना) (आईडीएफ) भी है, जो तकनीकी क्षमताओं और हजारों प्रतिभाशाली कर्मचारियों के लिए जानी जाती है।
  • उद्योग- केवल 80 लाख की आबादी वाले इस देश में आईटी इंडस्ट्री (उद्योग) को दो अलग क्षेत्रों की उद्योग से मदद मिल रही थी। इसमें शैक्षणिक और सरकारी जनसमूह शामिल थीं। अब उनके कर्मचारी निजी क्षेत्र की जनसमूहों का रुख कर रहे हैं। इजरायल के विश्वविद्यालयों से निकलने वाले इंजीनियरों की संख्या में भी गिरावट आई है। वर्ष 1998 में जहां विज्ञान की उपाधि वाले स्नातक 12 फीसदी थे, वे 2014 तक 9 फीसदी ही रह गए हैं। यह ऐसे दौर की बात है जब आईडीएफ अपने प्रशिक्षित इंजीनियरों को बनाए रखना चाहता है, ताकि सायबर-वॉर क्षमताएं बढ़ा सके। निजी संस्थाओं दव्ारा सैनिकों को ज्यादा वेतन के प्रलोभन दिए जाते हैं, करीब दुगने। हालांकि सेना में ऐसा संभव नहीं हैं। कर्मचारियों की कमी के कारण उद्यमियों की रुचि भी घटने लगी है। ये अपनी स्टार्टअप फर्म विदेशी जनसमूहों को बेचने लगे हैं।
  • विचार-शिक्षा मंत्री एवं पूर्व उच्च टेक उद्यमी रहे नफाली बैनेट कहते हैं ’अब ज्यादा से ज्यादा छात्रों को गणित की शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाएगा।
  • आईडीएफ की लोटेम दल के पूर्व कमांडर डेनी बरन कहते हैं’ इसमें जनसंख्या संबंधित कारण भी हैं। एक अन्य क्षमतावान स्त्रोत 40 लाख फिलिस्तीनी युवाओं का हो सकता है, जो वेस्ट बैंक और गाजा पटटी में रहता है। एशिया से इंजीनियरों की खेप आयात करने पहले उसे अपने पड़ोसी में मौजूद प्रतिभाओं के बारे में विचार करना चाहिए।

ब्रिटेन:- को 26 साल में थेरेसा में के तौर पर दूसरी महिला प्रधानमंत्री मिल गई हैं। 59 साल की थेरेसा ने डेविड कैमरन की जगह सत्ता संभाल ली है। वे देश की 76 वीं पीएम हैं। इसी के साथ कैमरन युग का अंत हो गया है। ब्रेग्जिट में मिली करारी हार के बाद कैमरन ने पीएम पद छोड़ने का ऐलान कर दिया था।

  • सुझाव-कैमरन ने नई प्रधानमंत्री थेरेसा को सुझाव देते हुए का कि उन्हें उम्मीद है कि जितना संभव हो सकेगा वे ब्रिटेन को यूरोपीय संघ के नजदीक रखेगी। इसके बाद उन्होंने रानी एलिजाबेथ को इस्तीफा सौंप दिया। कैमरन 2010 में पीएम बने थे। सत्तारूढ़ सभा दल की ऊर्जा मंत्री एंड्रिया लीडसम के पीएम पद की दौड़ से नाम वापस लेने के बाद गृहमंत्री थेरेसा के नाम पर मुहर लग गई।
  • थेरेसा- की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री माग्रेट थैचर से हो रही है। उन्हें लौह महिला बताया जा रहा है। थेरेसा अपने पादरी पिता की इकलौती संतान हैं। यूरोपीय संघ को शक की नजर से देखती रही हैं। प्रवासी श्रमिकों के प्रति कठोरतापूर्ण रुख के अलावा वे कीमती कपड़ों और रंगबिरंगे जूतों व सैंडलों के लिए जानी जाती है।

तुलना निम्न हैं-

  • मार्ग्रेट थैचर-1979-1990 तक पीएम रही। 53 साल की उम्र में सत्ता मिली। जन्म ग्रैंथम में 1925 में हुआ।
  • शिक्षा- ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से केमिस्ट्रीि (रसायन) का अध्ययन किया।
  • अनुभव-20 साल सांसद होने का अनुभव हैं। तीन साल जू. पेंशन मंत्री रही, 4साल शिक्षा सचिव रहीं।
  • चुनाव क्षेत्र- फिंचले में (1959 से 92)
  • थेरेसा 13/07/2016 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का पद लिया। 59 साल सत्ता मिली। जन्म इस्टबोर्न 1 अक्टुबर (1956) को हुआ।
  • अनुभव-19 साल का सांसद होने का अनुभव। पिछले 50 साल से गृह मंत्रालय संभाल रही हैं। गृहमंत्री के पद पर रहने वाली सांसद हैं।
  • चुनाव क्षैत्र- मैडनहैड (1997 से)
  • शिक्षा- ऑक्सफोर्ड से जियोग्राफी (भूगोल) में अध्ययन।

पद की जिम्मेदारी संभालनें के कुछ घंटे भीतर ही थेरेसा ने मंत्रालय में फेरबदल किया। अंबर रूड और जस्टीन ग्रीनिंग को शीर्ष गृह मंत्रालय में जगह दी। जार्ज ऑस्बॉर्न की जगह फिलिप हेमंड को वित्त मंत्रालय दिया।

  • ब्रिटेन के विदेश मंत्री- ब्रिटेन की नई प्रधानमंत्री थेरेसा ने अलेक्जेंडर बोरिस जॉनसन को विदेश मंत्री बनाया है। इससे पूरी दुनिया स्तब्ध है। क्योंकि ब्रेग्जिट की मुहिम चलाने वाले जॉनसन आपत्तिजनक टिप्पणियां करने के लिए जाने जाते हैं। वे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्विलंटन समेत दुनियाभर के शीर्ष नेताओं के खिलाफ विवादित समेत दुनियाभर के शीर्ष नेताओं के खिलाफ विवादित बयान दे चुके हैं। जॉनसन विदेशियों को ’हबशी का बच्चा’ और ’नरभक्षी’ तक कह चुके हैं। इसकी जिम्मेदारी ब्रेग्जिट के पक्ष में मुहिम चलाने वाले डेविड डेविस को दी हैं।
  •  बयान-
  • जॉनसन हिलेरी क्लिंटन को मेटल (धातु) चिकित्सालय की सडिस्टिक नर्स (पीड़ा पहुंचाने में आनंद का अनुभव करने वाली) कह चुके हैं।
  • ओबामा को लेकर कहा था कि वे केन्याई मुल के हैं और ब्रिटेन से ’खानदानी’ नफरत रखते हैं।
  • 2002 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के कांगो दौरे पर लिखा था, ’आदिवासी लड़के मुसकराते हुए एक श्वेत मुखिया को ब्रिटिश कर पेयर्स के पैसे से बड़े योजना से उतरते देखेंगे।’
  • 2006 में अपने कॉलम में पापुआ नया गिनी के नागरिकों को नरभक्षी और हत्यारा कहा था।
  • उन्होंने रूसी राष्ट्रपति क्लादिमीर पुतिन की तुलना हैरी पोटर के डॉबी द हाउल इल्फ से की थी। उन्हें क्रूर तानाशाह तक कहा था।

52 साल के जॉनसन पत्रकार रह चुके हें। उन्होंने ’द टाइम्स’ और ’द डेली टेलीग्राफ’ में काम किया है।

  • पहचान-विवादित बयान देने वाले नेता के रूप में उनकी पहचान रही है। यही कारण कि उनके विदेशी मंत्री बनाए जाने की खबर से पूरा यूरोप स्तब्ध हैं। जनमतसंग्रह के बाद से ही जॉनसन का नाम ब्रिटेन के प्रधानमंत्री तौर पर लिया जा रहा था, लेकिन बाद में उन्होंने खुद को इस दौड़ से अलग कर लिया था। उनका कहना था कि वह इस काबिल नहीं हैं। वह पिछले साल उक्सब्रिज और साउथ रूरिलप से सांसद निर्वाचित हुए थे।
  • संसार का चित्र- विदेश मंत्री बनने के कुछ ही ही पल के बाद जॉनसन के घर के बाहर कुछ लोगों ने ’सारी वर्ल्ड’ (शब्द) लिखा हुआ एक विज्ञापन चिपका दिया।
  • ब्रेग्जिट- थेरेसा ने ब्रेग्जिट मामले पर कार्यवाई के लिए एक नया विभाग बनाया है। इस विभाग के मंत्री के रूप में डेविड डेविस को नियुक्त किया गया है, जो थेरेसा के सामने ब्रिटेन को ईयू से अलग करने की प्रक्रिया पूरी करने की चुनौती है। प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रवक्ता ने कहा-पीएम के पास आए सभी फोन कॉल में उन्होंने ईयू से ब्रिटेन के अलग होने की लोगों की मंशा को पूरा करने को प्राथमिकता देन की बात कही हैं। उन्होंने कहा है इसके लिए ईयू के दूसरे देशों के नेताओं से बातचीत शुरू करने के लिए हमें थोड़ा समय चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इस काम को रचनात्मक तरीके से पूरा किया जाएगा।
  • थेरेसा ने कहा कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ में वापस नहीं लौटेगा। उन्होंने कहा कि ब्रेग्जिट का मतलब बेग्जिट है। हम इसे सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगे। मैं बेहतर ब्रिटेन बनाने की दिशा में काम करूंगी।

                                                                                                             थेरेसा, प्रधानमंत्री ब्रिटेन

  • ट्‌िवटर सवाल- अपनी नियुक्ति के कुछ घ्टों भीतर ही बोरिस जानॅसन ट्‌िवटर पर बहस करने लगे। लोग बोरिस को विदेश मंत्री बनाए जाने के फेसले पर हैरानी जता रहे हैं। साथ प्रधानमंत्री थेरेसा की विदेश नीति और डिप्लोमेसी (अंतरराष्ट्रीय कूटनीति/व्यवहार कौशल) पर सवाल उठा रहे हैं।
  • विचार जॉनसन के बारे में निम्न हैं-

जॉनसन झूठे इंसान हैं। राजनीतिक तंगी को छिपाने के लिए उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया है।

                                                                                  ज्यां मार्क एरोल्ट, विदेश मंत्री, फ्रांस

जॉनसन की नियुक्ति पूरे यूरोप पर भारी पड़ेगी। इससे साफ है कि यूरोपियन संघ को लेकर थेरेसा की नियत में खोट हैं।

                                                                          मार्टिनशुलज, यूरोपियन संसद के प्रमुख

जॉनसन ने पहले ब्रिटेन को ब्रेग्जिट में घसीटा। परिणाम के बाद वे क्रिकेट खेलते दिखे। फिर पीएम की दौड़ से भाग खड़े हुए। इतने गैरजिम्मेदार शख्स को विदेश मंत्री बनाया गया है।

                                                                                      फ्रैंक वाल्टर, विदेश मंत्री जर्मनी

यूके की प्रधानमंत्री बनने पर थेरेसा में को बधाईयां। भारत-यूके संबंधों को मजबूत बनाने के लिए उनके साथ मिलकर काम करेंगे। मैं डेविड कैमरन की सराहना करता हूं। उन्होंने दोनों देशों के संबंधों की मजबूती के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

                                                                                      नरेन्द्रमोदी, भारत के प्रधानमंत्री

केन्या:- प्रधानमंत्री मोदी जी केन्या के दौरे के समय भारत और केन्या के बीच सात समझौते हुए जो इस प्रकार हैं-

  • रक्षा सहयोग करना
  • आवास नीति।
  • दोहरे कराधान के क्षेत्र।
  • भारत केन्या लघु और मध्यम उद्योगों के विकास में मदद देगा।
  • एक कैंसर अस्पताल बनवाएगा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद करेगा।
  • रिफ्ट वैली (दरार/संगठनों के बीच गंभीर मतभेद घाटी) कपड़े के कारखाने के आधुनिकीकरण के लिए भारत 2.49 करोड़ डॉलर का ऋण भी देगा।
  • केन्या के लघु उद्योगों के विकास के लिए 4.49 करोड़ डॉलर (करीब 302.83 करोड़ रुपए) तक का कर्ज देने का फैसला किया है।

भारत और दक्षिण अफ्रीका:- चार अफ्रीकी देशों की यात्रा के तहत प्रिटोरिया के संघ भवन में मोदी जी का भव्य स्वागत हुआ। यहा दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा के साथ उन्होंने कई मुद्दों पर चर्चा की। वहीं, सीईओं फोरम में दक्षिण अफ्रीका व भारत की जनसमूहों के बीच 8 समझौतों पर दस्तखत किए गए। इनमें प्रमुख समझौते इस प्रकार हैं-

मिनरल्स (खनिज पदार्थ/बोतलबंद पीने का ऐसा पानी जो खनिज लवणों से युक्त हो), खनन, केमिकल्स एंड (और) फार्मास्युटिकल्स, (रसायन) विनिर्माण और इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी (सूचना तकनीकी) आदि के क्षेत्र में समझौते हुए।

वियतनाम, ऐशिया और अमरीका:- 1955 से शुरू होकर 19 साल तक चले अमेरिका-वियतनाम युद्ध को खत्म हुए चार दशक बीत चुके हें, लेकिन सच मानिये कि आज भी वहां अमेरिकियों को मित्र के तौर नहीं समझा जाता है। यह अलग बात है कि अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तीन दिन की वियतनाम यात्रा की और वे हयां राजधानी हनोई की सड़कों पर आम नागरिक के तौर पर घूमे।

  • वियतनाम-9.4 करोड़ की आबदी वाले इस देश के एक तिहाई लोग फेसबुक से जुड़े है। चीन का भी यहां प्रभाव दिखता हैं, स्थानीय युवा चीन को समृद्धि के तौर पर देखते हैं। वियतनाम में एक अमेरिकी कई सालों से रहा रहा है। वह कहता हैं, ’आज भी मैं स्थानीय लोगों की सामन्य निगाहें नहीं देख पता हूं। वे मुझे अलग नजरों से देखते हैं। इसके विपरीत अमेरिका की नजरों में वियतनाम की गुणवत्ता अच्छी है इसलिए तो ओबामा यहां आए थे।
  • देश-अमेरिका ने भी एशिया में अपनी भूमिका बढ़ाने के लिए यहां ट्रांस-पेसिफिक साझेदारी (टीपीपी) के तहत 11 पेसिफिक रिम देशों के साथ (चीन को छोड़कर) ट्रेड (व्यापार) समझौता किया हैं। अगर अमेरिकी कांग्रेस इसे नहीं पहचानती है और टीपीपी को विफलता मिलती है, तो यह चीन की जीत होगी। अगर अमेरिका ने अपनी नीतियों को लचीलापन दिया, तो यहां चीन की तानाशाही दिखने लगेगी। ट्रेड समझौता के तौर पर ओबामा कह रहे है कि यह अमेरिका के लिए बहुत मायने रखता है विश्व की अर्थव्यवस्था में 40 फीसदी भूमिका इन्हीं देशों की है। क्यूबा के बाद म्यांमार और फिर जापान की यात्रा से अमेरिका के प्रति अन्य देशों की सोच में भी बदलाव देखने को मिल रहा हे। ये ऐसे देश हैं, जो अमेरिका से पहले शत्रु का भाव रखते थे। यह भी सच है कि एशिया महाद्धीप में पिछले दशकों में करोड़ों लोग गरीबी से बहार आ चुके हैं। यह क्षेत्र के हालात सुधरने के संकेत हैं। अमेरिका के साथ ट्रेड समझौते में पेरु, मैक्सिकों, ऑस्ट्रलिया, न्यूजीलैंड, कनाड़ा, मलेशिया आदि देश हैं।

चीन और रूस:- दोनों बड़े और शक्तिशाली देश हैं। वैश्विक पटल पर इनका व्यापक प्रभाव भी है। ये दोनों विश्व राजनीति को प्रभावित भी करते हैं। दोनों देशों के आपसी संबंध अतीत में उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। रूस साम्यवाद का जन्म दाता रहा है तो चीन में अब भी साम्यवादी शासन व्यवस्था है। दोनों देशों में विचारधारा के स्तर पर समानता रही है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीन के दौरे पर हैं। 2013 में शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद पुतिन की यह चौथी चीन यात्रा है।

  • सहमत-यात्रा के दौरान दोनों देश वैश्विक स्थिरता के लिए आपस में सहयोग करने पर सहमत हुए हैं।
  • सहयोग-दोनों देशों की ओर से जारी संयुक्त वक्तव्य में वैश्विक स्थिरता के लिए सहयोग, अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करने, सैन्य क्षमता, देश की सुरक्षा के अनुसार कम से कम स्तर पर रखने और सैन्य एंव राजनीतिक सहयोग बढ़ाने की घोषणा की हैं। दोनों देशों ने एशिया और यूरोप में मिसाइल रोधी तंत्र की तैनाती की आलोचना की और कहा कि इससे क्षेत्र में अस्थिरता उत्पन्न होगी।
  • समझौते व चर्चाएं-सूचना और साइबर क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय काूनन को बढ़ावा देने के समझौते पर भी दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। रूस के राष्ट्रपति ने कहा कि दोनों देश बहुत से मुद्दों पर समान विचार रखते हैंं। दोनों देशों के बीच कोरिया प्रायद्धीप के परमाणु मुद्दे और दक्षिण चीन सागर में स्थिरता को लेकर भी चर्चा हुई है। दोनों देशों के बीच 50 अरब अमरीकी डॉलर की 58 परियोजनाओं पर चर्चा हुई। रूस में तेज गति का गलियारा बनाने को लेकर भी दोनों देश समझौते के करीब हैं।

- Published/Last Modified on: August 17, 2016

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