दस उच्च समाचार (Top Ten News - In Hindi) Part - 2 (Download PDF)

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गूगल:- अब गूगल से भी ऑनलाइन पेमेंट (भुगतान) कर सकेंगे। गूगल जल्दी ही भारत में अपनी मोबाइल (गतिशील) पेमेंट (भुगतान) सर्विस (सेवा) लॉन्च (प्रक्षेपण) करने जा रहा है। इसका नाम ‘तेज’ है। भारत दुनिया का तीसरा देश होगा, जहांँ गूगल अपनी मोबाइल पेमेंट सर्विस लॉन्च करेगा। अभी गूगल की मोबाइल पेमेंट सर्विस सिर्फ अमेरिका और ब्रिटेन में उपलब्ध है। इस सर्विस के लिए गूगल देश के बड़े निजी बैंको (अधिकोष) के साथ समझौता भी कर सकता है।

मीडिया (संचार माध्यम) रिपोट्‌र्स (संवाददाताओं) के मुताबिक गूगल अपनी इस तेज पेमेंट सर्विस को 18 सितंबर को लॉन्च करने वाला है। हालाकि, गूगल की ओर से इस बारे में अभी तक कोई आधिकाधिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। भारत में गूगल द्वारा अपनी मोबाइल पेमेंट सर्विस लाने की वजह ऑनलाइन मार्केट (बाजार) की ग्रोथ (विकास) है। इसके अलावा मोबाइल इंटरनेट यूजर्स (उपयोगकर्ता) की बढ़ती संख्या और स्मार्टफोन की बिक्री भी है। भारत अभी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन मार्केट (बाजर) है। वहीं, गूगल और रिसर्च (अनुसंधान) एजेंसी (शाखा) बीसीजी की एक रिपोर्ट (विवरण) के मुताबिक 2020 तक भारत मेें डिजिटल (अंकसंबंधी) पेमेंट (भुगतान) मार्केट (बाजार) 32 लाख करोड़ रुपए तक हो जाएगा। यह देश की जीडीपी का 15 प्रतिशत होगा। इसलिए गूगल इस मार्केट (बाजार) को खोना नहीं चाहता है। वहीं, देश में डिजिटल (अंक संबंधी) पेमेंट्‌स (भुगतान) का इंफ्रास्ट्रक्चर (आधारिक संरचना) 2017 के आखिर तक तीन गुना बढ़ने की उम्मीद है। इलेक्ट्रॉनिक्स (विद्युत) एंड (और) आईटी मंत्रालय के मुताबिक इस साल के आखिर तक देश में करीब 50 लाख इलेक्ट्रॉनिक (विद्युत) प्वाइंट (बिन्दु) ऑफ (का) सेल (बेचना) मशीने (यंत्र) हो जाएगी। गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने जनवरी में ही कहा था कि कंपनी (संगठन) भारत में पेमेंट सर्विस लाने के बारे में सोच रही है। तेज, यनिफाइड पेमेंट्‌य इंटरफेस (यूपीआई) बेस्ड डिजिटल पेमेंट सर्विस होगी। इसमें लोगों को गूगल वॉलेट (बटुआ) और एंड्रायड (मानव रूपी रोबोट) पेमेंट (भुगतान) की सर्विस (सेवा) भी मिलेगी। दरअसल, यूपीआई एक पेमेंट (भुगतान) सिस्टम (व्यवस्था) है, जिसे नेशनल (राष्ट्रीय) पेमेंट्‌स (भुगतान) कॉरपोरेशन (निगम) ऑफ (का) इंडिया (भारत) (एनपीसीआई) ने लॉन्च (प्रक्षेपण) किया है। इसे रिजर्व (आरक्षित) बैंक (अधिकोष) ऑफ (का) इंडिया (भारत) नियंत्रित करता है। यूपीआई मोबाइल (गतिशील) प्लेटफॉर्म (मंच) पर दो बैंक (अधिकोष) अकाडंट्‌स (खातों) के बीच तुरंत फंड (धन) ट्रांसफर (स्थनातांतरण) की सहूलियत मुहैया कराता है।

पिछले महीने वाट्‌सएप ने कहा था कि वह अपने एप में जल्द ही पैसे ट्रांसफर (स्थानांतरण) वाला फीचर (सुविधा) लाने जा रहा है। वाट्‌सएप ने इसके फीचर (सुविधा) को अपने बीटा (संक्षिप्त आत्मकथा) वर्जन में भी दिखाया है। हालांकि अभी यह सर्विस शुरू नहीं हुई है। भारत में वाट्‌सएप के 20 करोड़ यूजर्स हैं। इसके अलावा फेसबुक, टूकॉलर, फ्लिपकॉर्ट टेक कंपनियां (संगठन) भी मोबाइल पेमेंट सर्विस को लॉन्च करने की बात कह चुकी हैं।

(अरुणाचल प्रदेश) चकमा शरणार्थी:- केन्द्र सरकार ने चकमाओं को भारतीय नागरिकता देने का फैसला किया है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी उनके पक्ष में है। लेकिन, मामला जितना सरल दिखता है, उतना सरल है नहीं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि चकमाओं को नगारिकता मिल भी गई तो जहां वे रहते हैं यानी क्या वे अरुणाचल प्रदेश के नागरिक कहलाएंगे?

भारत सरकार ने चकमा शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देना तय किया है। यह बहुत ही पेचीदा स्थिति है। इस फैसले से सब अंचभित है। कारण साफ है। कि सरकार अरुणाचल प्रदेश में रहने वाले करीब एक लाख चकमाओं को नागरिकता देने के आदेश जारी भी कर देती है तो भी उन्हें अरुणाचल प्रदेश वासियों की भांति उन्हें नागरिकता अधिकार शायद ही मिल पाएं। अरुणाचल प्रदेश में 1873 का कानून चलता है। यह कानून अरुणाचल प्रदेश के बाहर के लोगों को वहां पर जमीन खरीदकर स्थाई तौर पर रहने से रोकता है। देश जब आजाद हुआ तो कांग्रेस सरकार विशेषतौर पर हमारे पहले प्रधानमंत्री ने भी अरुणाचल प्रदेश के कबीलों, वहां की पहचान, इतिहास को संरक्षित करने के उद्देश्य से ही अरुणाचल प्रदेश में भूमि खरीद-बेचान से संबंधित इस कानून में परिवर्तन नहीं होने दिया। आज भी अरुणाचल प्रदेश की स्थिति यह है यदि अन्य किसी राज्य का नागरिक वहां किसी कार्यवश रहता भी है तो इसे इनर (भीतरी) लाइन (रेखा) परमिट (अनुमति) (आईएलपी) हासिल करना होता है। जब जरा इस ऐतिहासिक संदर्भ में चकमा शरणार्थियों की कहानी भी समझ लें। जब हिन्दुस्तान का विभाजन हुआ तो सैद्धांतिक तौर पर यह तय हुआ था कि हिन्दू बहुल इलाके हिन्दुस्तान में और मुस्लिम बहुत इलाके पाकिस्तान में शामिल होंगे। लेकिन, जिस चितगोंग हिल ट्रेक्ट्‌स (पहाड़ी इलाका) (सीएचटी) क्षेत्र में चकमा रहा करते थे, वह मुस्लिम बहुतल था ही नहीं। वहां 98 फीसदी गैर मुस्लिम या कहें बौद्ध और हिन्दु समुदाय के लोग रहा करते थे। मुस्लिम बहुल नहीं होने के बावजूद यह क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। लेकिन, वहां पर इस समुदाय पर जातिगत आधार पर घोर अत्याचार होते रहे। उन्हें जबरन मुस्लिम बनकर पाकिस्तानी बनकर रहने के लिए दबाव डाला जाता रहा। इस बीच 1962 में सीएचटी क्षेत्र में बांध बनने की शुरुआत हुई और चकमाओं को विस्थापित होने को मजबूर होना पड़ा। उस दौरान पंडित नेहरू के कहने पर ही वह इलाका जो पूर्व में नॉर्थ ईस्ट (ईशान कोण) फ्रंटियर (सीमांत) एजेंसी (शाखा) (नेफा) क्षेत्र जो अब मुख्यरूप से अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्र में है, लाकर बसाया गया। उस दौर में किसी ने भी चकमाओं के वहां बसने पर किसी किस्म की आपत्ति भी नहीं की। इस दौरान पूर्व में पूर्वी पाकिस्तान रहे बांग्लादेश ने इन चकमाओं को बांग्लादेशी नागरिकता देने से इनकार कर दिया। इधर, भारत में भी अब स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। अरुणाचल प्रदेश के लोगों में अपनी पहचान और अपनी भूमि को लेकर जागृति आ चुकी है। वहां चकमा लोगों के विरोध में विशेषतौर पर उन्हें वहां बसाए जाने के विरोध में माहौल बना हुआ है। ऐसे में भी चकमा शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देना तो समझ में आता है लेकिन उन्हें किस क्षेत्र का नागरिक मानेंगे यह समझ नहीं आता। यद्यपि वे अरुणाचल प्रदेश में लंबे समय से रह रहे हैं फिर भी उन्हें अरुणाचल प्रदेश के भारतीय नागरिक नहीं कहा जा सकता। इसके लिए कानून में ही परिर्वतन करना होगा। यदि उन्हें कार्यकारी आदेश से नागरिकता दी जाती है तो अरुणाचल प्रदेश के बाहर के भारतीय नागरिको के समान ही अधिकार हासिल होंगे। वे फिर से विस्थापित होने और अरुणाचल प्रदेश के लिए लड़ने-मरने को तैयार चकमाओं के लिए यह बहुत ही विकट परिस्थिति होगी। स्पष्ट कर दूं कि 1996 में ही भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा था, अरुणाचल प्रदेश में रहने वाले सभी चकमा शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलनी चाहिए। फिर, सितंबर 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पिछले फैसले को दोहराते हुए सरकार से पूछा था कि अब तक चकमा शरणार्थियों को नागरिकता क्यों नहीं मिली? लेकिन, अब जबकि संवैधानिक और व्यवहारिक पेचीदगियां जस की तस हैं, सरकार का फैसला समझ से परे है। इस फैसले पर कई तरह के सवाल भी हैं।

डॉ. दीपक के. सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

अमरीका में तूफान: -

तकनीकी रूप से बहुत एडवांस (अग्रिम) अमेरिका ने पिछले दिनों भयावह तूफानों का सामना किया है। उसके बाद मैक्सिको, क्यूबा और कैरिबियाई सागर में भी तूफान ने असर दिखाया। कई लोग मारे गए, खरबों डॉलर की संपत्ति का नुकसान हुआ। इस नुकसान का एक ही कारण है-अव्यवस्थित निर्माण। अगर ऐसा न होता तो प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान में भारी कमी लाई जा सकती है। इसके लिए शहरी निर्माण विशेषज्ञों को प्लानिंग (योजना) के तरीके बदलने होंगे।

एक तूफान में अगर प्रचंड तीव्रता हो तो वह कई शहरों को तबाह कर देता है। अमेरिका ने हाल के दिनों में यही देखा है। हार्वे तूफान का असर ह्यूस्टन (टेक्सास) में कई महीनों तक रहेगा, हो सकता है कई वर्ष लग जाएं। फिर इरमा तूफान ने कैरिबियाई सागर से फ्लोरिडा तक तबाही मचाई है। ये तूफान उठने के प्राकृतिक कारण हैं। लेकिन शहरों में तबाही इतनी अधिक क्यों हैं, इस बारे में शहर की संरचना तैयार करने वाले जिम्मेदार लोग ज्यादा अच्छे से बता सकते हैं। ऐसा तो नहीं है कि तूफान अचानक आता हो। इसका पहले से पता होता है, लेकिन भारी तकनीक के बावजूद उससे होने वाली तबाही रोकी नहीं जा सकती।

हार्वे ने ह्यूस्टन शहर को गहरे जख्म दिए हैं, यह अच्छी बात है कि अब स्थिति सामान्य हो रही है। उसने अपने पीछे बड़े पैमाने पर नुकसान के निशान छोड़े हैं, लेकिन ज्यादातर दिखाई नहीं देंगे। हम या कोई भी यह नहीं जानता कि कितना जहरीला रसायन पानी में मिल गया है और कितने तरह के रिएक्शन (प्रतिक्रिया) उसके कारण लोगों तक पहुंचेगे। ऐसा इसलिए क्योंकि कैमिकल (रासायन) प्लांट (कारखाना) , वेस्ट (पश्चिम) डंप (ढेर) वाली खतरनाक जगहों पर आई बाढ़ के कारण संयंत्रों, रसायनों से भरे विशाल टैंको को नुकसान पहुंचता है। डंप यार्ड तक जलमग्न हो गए। उनकी हालत देखने कोई नहीं पहुंचा है। कल्पना करना मुशिकल है कि उनसके कितना जहरीला रसायन पानी में घुला होगा।

बड़ी भारी मात्रा में जहरीली चीजें पानी में बही हैं। आज नहीं तो कल उसका असर जमीन के अंदर तक होगा। जो शेष रहेगा, वह समुद्र तक जरूर पहुंचेगा। उसके असर से समुद्री जीवों, संसाधनों, कोरल (प्रवाल) रीफ (चट्‌टान) को नुकसान पहुंचेगा। इस बारे में कोई सोच ही नहीं पाया। क्या हम ऐसे ही शहरों में रहने के लिए बने हैं, जो तूफान आने पर तहस-नहस हो जाएं? क्या शहरों का विकास करने वालों ने प्राकृतिक आपदा से निपटने के कोई उपाय नहीं किए? क्यों तूफानी बारिश से बड़ा क्षेत्र जलमग्न हो जाता है। इस वातावरण में किसी को इस बात पर विश्वास हो कि ट्रंप प्रशासन तूफानों से अच्छी तरह निपट रहा है। यह सभी को दिखा कि ट्रंप प्रशासन ने अपने कर्त्तव्यों का त्याग कर दिया, उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का अहसास तक नहीं है। उदाहरण के लिए ट्रंप प्रशासन को छोड़ दीजिए, पर्यावरण बचाने का प्रचार करने वाली ‘एन्वॉयरन्मेंट (पर्यावरण) प्रोटेक्शन (सुरक्षा) एजेंसी’ (शाखा) तक नदारद रही। हार्वे और इरमा तूफान अमेरिका के लिए महाआपदा साबित हुए कारण बिल्कुल स्पष्ट है ‘खराब नीतिया’ । आज कई लोग इस विषय पर बात कर रहे हैं कि ह्यूस्टन में ग्रेटर न्यूयॉर्क की तुलना में एक तिहाई लोग रहते हैं, लेकिन बराबर क्षेत्र कवर (आवरण) कर रखा है। बहुत ही कम ऐसी कोई जमीन छूटी होगी, जिस पर पेविंग (पक्की सड़क) या कोई निर्माण न हो। ह्यूस्टन में जब बारिश तेज हुई तो जरूरत से ज्यादा सीमेंटीकरण के कारण पानी को कहीं जाने की जगह नहीं मिली और वह इकट्‌ठा होते गया। ह्यूस्टन की यह त्रासदी महत्वपूर्ण तब है, जब आने वाले समय में ‘अर्बन लैंड (शहरी भूमि) यूज़ प्लानिंग’ (उपयोग योजना) में नियमों का ध्यान रखा जाए। ना कि डेवलपर (विकासक) जहां चाहे -जैसा चाहे निर्माण करने लगे।

इसे समझने के लिए सेन फ्रांसिस्को का उदाहरण सही रहेगा। एक तरफ ह्यूस्टन इमारतों आदि के निर्माण में नियमों की धज्जियां उड़ाने के लिए मशहूर है, दूसरी तरफ सेन फ्रांसिस्को ‘निम्बीयिज्म’ नियमों के लिए मशहूर है। वहां नए निर्माण पर बहुत सख्त नियम हैं। वहां के बे ऐरिया (खाड़ी क्षेत्र) की अर्थव्यवस्था सिलिकॉन वैली के कारण अच्छी है, लेकिन आप देखेंगे कि पिछले कई वर्षों में वहां नई हाउसिंग (आवास) यूनिट (इकाई) शामिल नहीं की गई। इसलिए वहां रहने के लिए घरों और किराया राशि अधिक है। वहां एक बेडरूम (शयनकक्ष) वाले फ्लैट (समतल) का किराया औसत दो लाख रुपए है, जो देश में सर्वाधिक है। इसी तरह मध्यम स्तर के घर की कीमत 5.3 करोड़ रुपए है।

सेन फ्रांसिस्को के खाड़ी क्षेत्र में रहना न्यूयॉर्क से भी अधिक महंगा है। कुछ लोग कहते हैं कि वहां ऊंची इमारतें बनाकर घरों की कमी पूरी क्यों नही की जाती, लेकिन ऐसा नहीं है। सख्त नियमों के कारण नए और अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगी हुई हैं।

पॉल कुगमैन, ख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री एवं स्तंभकार

हार्वे तूफान के बारे में वैज्ञानिकों ने पहले ही बता दिया था, लेकिन उसकी रोकथाम के लिए अपनाई गई सारी तकनीक एवं व्यवस्था पानी में बह गई। 38 से अधिक लोग इस तूफान में मारे गए हैं, जो अमेरिका जैसे देश में सामान्य बात नहीं है। खरबों डॉलर की संपत्ति को नुकसान पहुंचा है। सवाल उठ रहे हैं कि जब सब पता था तो स्थिति संभालने के लिए गंभीरता से प्रयास क्यों नहीं किए गए? टेक्सास जैसा पूरा राज्य पानी में डूबा है। क्या अब अमेरिकी व्यवस्था तूफान सहने की स्थिति में नहीं है?

अमेरिकी प्रशासन व वैज्ञानिक इस तूफान का आकलन करने में विफल क्यों साबित हुए, क्या ऐसी कोई तकनीक नहीं थी जिससे पता लगाया जा सके कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला है। इसके पहले ऐसी तकनीक मौजूद होने के दावे किए जाते रहे हैं इसलिए कहना सही होगा कि वह तकनीक विफल साबित हुई है।

यह नहीं कहा जा सकता है कि इस तरह के तूफान किस क्षेत्र में कितना कहर बरपाते हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तूफान की अपनी भयावहता तूफान के आंकड़े देखें, जिसने मध्य अमेरिका में कहर बरपाया था तब 11 हजार से 19 हजार के बीच लोग मारे गए थे, ज्यादातर हॉन्डुरास और निकारागुआ में। उसके करीब एक दशक बाद चक्रवाती तूफान नरगिस ने म्यांमार में तबाही दिखाई थी, उसमें 1.38 लाख लोग मारे गए थे। प्राकृतिक आपदाएं जिन्हें हम तूफान, भूकंप, भू-स्खलन, सूखा, महामारी आदि कहते हैं, इनसे होने वाली तबाही की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि ये कितना असर दिखाएंगे। लेकिन, इनका प्रभाव अलग-अलग नहीं होता है।

अमेरिका जैसे विकसित देश में हार्वे तूफान जैसी आपदा का अनुभव और आकलन पहले से होता है, ऐसी स्थिति में आपदा से होने वाले नुकसान को कीमत में ज्यादा आंका जाता है। जबकि विकासशील एवं आर्थिक रूप से कमजोर देश में जान जाने पर उनकी भयावहता दिखाई देती है।

अमेरिका के ही सरकारी आंकड़े देखें तो वर्ष 1940 से 2016 तक अलग-अलग तूफानों में यहां 3,348 लोगों की जान गई है। यानी सालाना औसत 43 लोग मारे गए। यह प्राकृतिक आपदा की बात है, उसकी तुलना में वर्ष 1991 में बांग्लादेश में आए तूफान को देखें तो तब 1.40 लाख लोगों की जान गई थी। सवाल उठता है कि प्राकृतिक आपदा का सामना विकसित देश आर्थिक रूप से कमजोर देश की तुलना में कैसे करते हैं? केवल बेहतर नियमों के कारण ऐसा नहीं होता है। वर्ष 1957 में वहां आए भयावह भूकंप के बाद इमारतों की कोडिंग (संकेतावली) का नियम सख्ती से वहां लागू किया गया था। इसके बावजूद 1985 में आए भूकंप में शहर को बचाया नहीं जा सका। फिर पता चला कि कोडिंग के उस नियम को भ्रष्ट अफसरों, इमारतों निरीक्षकों ने वर्षों तक नजरअंदाज किया। परिणामस्वरूप हजारों लोग इमारतों के मलबे में दबकर मारे गए। नियम तभी अच्छे या खराब होते हैं, जब उनका पालन किया जाए।

हार्वे तूफान की चपेट में आए टेक्सास में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला। वहां सरकारी जिम्मेदारी और मदद करने के प्रति लोगों के उत्साह ने अलग-अलग रंग दिखाए। उसमें फिर एक सवाल लोगों की संपत्ति को नुकसान पहुंचने का था वहां बच्चा-बच्चा यह बात जानता है कि ईंट-क्रंकीट से बने घर ज्यादा सुरक्षित हैं, बजाय लकड़ी या बंबुओं के घरों के। इसमें घर बनाने की लागत का विषय सामने आता है।

संभव है कि हार्वे तूफान के बाद नुकसान के आकलन में हजारों घरों को नुकसान पहुंचने की बातें सामने आई हैं। लेकिन, आसपास के सारे मकान बह जाएं ऐसा भी नहीं होता। रिसर्च (खोज) फर्म मूडी के आकलन के अनुसार हार्वे के कारण ह्यूस्टन को 503 खरब डॉलर का नुकसान होगा और आर्थिक प्रगति दो महीने पिछड़ जाएगी। विश्वविद्यालय ऑफ (का) कोलेराडो के रोजर पिल्क के अनुसार अगर इस तूफान के नुकसान की गणना वैश्विक आधार पर देखें वह करीब 0.3 फीसदी होती है।

हेना रिची एवं मैक्स रोज़र की अध्ययन रिपोर्ट (विवरण) के अनुसार पृथ्वी के बढ़ते तापमान के बावजूद तूफान से मरने वालों की दर में कमी आई है। वह 1990 के दशक में 04 हो गई है। पर्यावरण कार्यकर्ता मानते हैं कि आर्थिक प्रगति के कार्यों में पर्यावरण की गणना नहीं करने के कारण ऐसी प्राकृकि आपदाएं आती हैं।

ब्रेट स्टीफन्स, पुलित्जर पुरस्कार विजेता

अमेरिका में दो सप्ताह के भीतर एक और तूफान इरमा तबाही मचाने वाला है। यह अटलांटिक सागर का अब तक का सबसे शक्तिशाली तूफान है। ये कैरेबियन दव्ीप बारबुडा से 297 किमी प्रति घंटे की गति से टकराया। अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत में इमरजेंसी (आपातकालीन) लगा दी गई है। यहां तूफान के देर रात पहुंचने की आशंका है। 166 साल में यह दूसरा मौका है, तब 15 दिन में अमेरिका में दो शक्तिशाली तूफान आए हैं। तूफान से प्यूटों रिको आइसलैंड की बिजली व्यवस्था चरमरा गई है। यहां बिजली बहाल करने में छह माह लगेंगे।

कैटरीना तूफान से दोगुना तबाही मचा सकता है इरमा-

Hurricane Irma Forecast Track
  • कैटरीना (2005) -नुकसान 9 लाख करोड़, स्पीड (गति) 225किमी/घंटा, मौत: 1000
  • हार्वे (अगस्त 2017) - नुकसान: 4 लाख करोड़, स्पीड: 180 किमी/घंटा, मौत: 80
  • इरमा (आंशका) - नुकसान: 13.5 लाख करोड़ रु. , स्पीड 300 किमी/घंटा

दक्षिण एशिया:-दक्षिण एशिया में आतंकवाद के सबसे बड़े पोषक के रूप में पाकिस्तान सामने आता है। हालांकि, एक विशेष भौगोलिक-आर्थिक क्षेत्र में आतंकवाद पनपने में पारिस्थितिकीजन्य घटको का कितना योगदान है यह पता लगाना मुश्किल है। लेकिन पाक के जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट है कि आतंकवाद पनपने की एक बड़ी वजह जनसंख्या वृद्धि भी है।

पाकिस्तान की जनगणना 2017 के प्रावधायी परिणाम 25, अगस्त 2017 को जारी किए गए। इसके अनुसार, पाकिस्तान की जनसंख्या 20, 77,74, 520 पाई गई। पिछले 19 वर्षो में जनसंख्या में 57 प्रतिशत का इजाफा देखा गया। प्रावधायी परिणामों में गिलगित-बाल्टिस्तान और आजाद कश्मीर के आंकड़े शामिल नहीं है। 2018 में आने वाली अंतिम रिपोर्ट (विवरण) में इन आंकड़ों के शामिल किए जाने की संभावना है। ऐसा लग रहा है कि जो आंकड़े बताए गए हैं, वो कम करके दिखाए जा रहे है, पाकिस्तान की जनसंख्या कम से कम 25 करोड़ होनी चाहिए। दरअसल ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान की जनसंख्या जानबूझ कर कम बताई जा रही है। सिंध प्रांत की सरकार इस संदर्भ में पहले ही विरोध जता चुकी है। भारत की जनसंख्या 1998 से 2017 के बीच 30 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि पाकिस्तान की आबादी उसी अवधि में 57 प्रतिशत बढ़ी है, भारत की वृद्धि दर से लगभग दुगुनी। वर्तमान में भारत की जनसंख्या में 1.1 प्रतिशत सालाना की दर से वृद्धि हुई है। पाक जनगणना के नतीजे बताते है कि 1998 से जनसंख्या में वार्षिक दर 2.4 प्रतिशत पाई गई, जबकि कुल आबादी 13.2 करोड़ थी। दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखा जाए तो जनसंख्या में यह वृद्धि दर काबिल-ए-गौर है। वैश्विक हित को देखते हुए कई मायनों में महत्वपूर्ण है। दक्षिण एशिया या भारतीय उपमहादव्ीप में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका सहित सात देश हैं। दक्षिण एशिया की जनसंख्या 2017 में 184 करोड़ थी। या यूं कहें कि विश्व जनसंख्या का एक चौथाई हिस्सा दक्षिण एशिया में बसता है। इसलिए यह एशिया का सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला क्षेत्र माना जाता है। इसमें भी भारत सबसे बड़ा व सर्वाधिक जनसंख्या वाला राष्ट्र है। पाकिस्तान 21 करोड़ की आबादी के साथ दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। विश्व में चीन, भारत, अमरीका और इंडोनेशिया के बाद यह पांचवे स्थान पर आता है। कुल मिला कर यह दक्षिण एशिया की आबादी का 12 प्रतिशत है। पाकिस्तान की 97 फीसदी आबादी मुस्लिम है और साक्षरता दर काफी कम। नेपाल के बाद पाकिस्तान इस क्षेत्र के गरीबतम देशों में से एक कहा जा सकता है, जिसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी 6 है। पाकिस्तान संघ में पंजाब, खैबर पख्तुनवा, सिंध और बलुचिस्तान आते हैं।

इसके अलावा चार केन्द्र शासित प्रदेश गिलगित-बाल्टिस्तान और आजाद कश्मीर। जनगणना के परिणाम दर्शाते हैं कि खैबर पख्तूनवा, बलूस्तािन और संघ शासित आदिवासी क्षेत्रों की जनसंख्या में वृद्धि देखी गई है। ये क्षेत्र आतंकवादी गतिविधियों के केन्द्र हैं। पंजाब व सिंध की जनसंख्या में गिरावट देखी गई। रिपोर्ट के अनुसार खैबर पख्तूनवा में 3.1 करोड़ लोग रहते हैं, फाटा में 50 लाख, सिंध में 4.8 करोड़, बलूचिस्तान में 1.3 करोड़ जबकि पंजाब में सर्वाधिक जनसंख्या 11.1 करोड़ निवास करती है। पाकिस्तान के सबसे कम विकसित प्रति बलूचिस्तान में 1998 के बाद से 3.4 प्रतिशत की दर से सबसे तेजी से विकास हुआ है। पंजाब की औसत वार्षिक वृद्धि दर सबसे कम 2.1 प्रतिशत रही, जो कि राष्ट्रीय औसत 2.4 प्रतिशत से थोड़ी कम है। पाकिस्तान के गरीब और आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ती जनसंख्या का उच्च घनत्व नई चुनौतियां पैदा करता है। ये इलाके आतंकियों की पनाहगाह हैं। सामाजिक व राजनीति विज्ञान की मूल समस्या यही है कि आतंकवाद की असली जड़ क्या है, यह स्पष्ट करना मुश्किल है।

साहित्य ने आतंकवाद के कई पहलुओं की व्याख्या की है। हालांकि, एक विशेष भौगोलिक-आर्थिक क्षेत्र में आतंकवाद पनपने में पारिस्थितिकीजन्य घटकों का कितना योगदान है यह पता लगाना मुश्किल है। जनगणना आंकड़ों से स्पष्ट है कि आतंकवाद पनपने की बड़ी वजह जनसंख्या वृद्धि भी है। मध्य-पूर्व में यही तो हुआ है। बढ़ती जनसंख्या वृद्धि बहुत बड़ी समस्या है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अफगानिस्तान के खिलाफ जंग की घोषणा करते हुए कहा था कि हम आतंक के पनाहगाह बन चुके पाकिस्तान के सुरक्षित ठिकानों तालिबान व अन्य गुटों को लेकर अब और ज्यादा चुप नहीं बैठ सकते, जिनके पूरे क्षेत्र को खतरा है। एक जनसुख्या विशेषज्ञ के मुताबिक ‘पाकिस्तान में इस जनसंख्या वृद्धि को रोका जाए, ऐसा करने में कही बहुत देर ना हो जाए।’ यहां बांग्लादेश का उदाहरण उल्लेखनीय है। पाकिस्तान के मुकाबले इसकी जनसंख्या वृद्धि दर कम है। जुलाई 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (जो अब बांग्लादेश है) की जनसंख्या 75 करोड़ थी और पश्चिमी पाकिस्तान की 6.5 करोड़। 46 साल बाद बांग्लादेश की जनसंख्या 16.7 करोड़ थी, जबकि पाकिस्तान की 20.8 करोड़। बांग्लादेश ने परिवार नियोजन, महिला शिक्षा के विस्तार, सशक्तीकरण, जन स्वास्थ्य सुविधाओं का तेजी से विकास कर जनसंख्या नियंत्रण पाया है। पाकिस्तान को जनसंख्या नीति पर पुनर्विचार के परिवार नियोजन को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। जनसंख्या नियंत्रण में विफलता का अर्थ है स्वास्थ्य शिक्षा व अन्य सामाजिक क्षेत्रो में सुधार ही होना। इसका परिणति आतंकवाद के फैलाव के रूप में सामने आती है।

देवेन्द्र कोठारी, जनसंख्या विशेषज्ञ, निदेशक, फोरम (मंच) फॉर (के लिए) पापुलेशन एक्शन (प्रतिक्रिया) , आईएचएमआर में अध्यापन, संयुक्त राष्ट्र व एनसीएईआर के पूर्व सलाहकार

मोदी जी के मंत्रिमंडल का ताजा विस्तार व फेरबदल:- आखिर लंबे इंतजार के बाद मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार हो ही गया। अपनी टीम (दल) में मोदी ने नौ नए चेहरों को जगह देने के साथ ही चार मंत्रियों को पदोन्नत भी कर दिया। साथ ही सहयोगियों के विभागों में बड़ा फेरबदल भी किया। इस मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल के बाद राजनीतिक विश्लेषण के बीच एक बात साफ हो गई है कि सारी कवायद मिशन (दूतमंडल) -2019 के लक्ष्य को साधने की है। नौ नए मंत्रियों में चार पूर्व नौकरशाही पर भरोसा जता मोदी ने अपना सारा ध्यान डिलीवरी (पहुँचाने वाला) पर फोकस (ध्यान) कर लिया लगता है। खराब प्रदर्शन के कारण पांच -छह मंत्रियों की छुट्‌टी करके बाकी मंत्रियों को भी साफ संदेश देने की कोशिश की गई। मंत्रिमंडल विस्तार और विभागों के फेरबदल की सबसे बड़ी बात देश को मिले नए रक्षा मंत्री के रूप में सामने आई है। पदोन्नति पाकर मंत्रिमंडल मंत्री बनाई गई निर्मला सीतारमन देश की पहली महिला रक्षा मंत्री बन गई हैं। यूं पहले इंदिरा गांधी भी यह पद संभाल चुकी हैं लेकिन तब वे प्रधानमंत्री थी। आजादी के 70 सालों में यह पहला मौका होगा जब हमारे देश में विदेश और रक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं आसीन हैं। सुरेश प्रभु के इस्तीफा देने से खाली हुआ रेल मंत्री का पद पीयूष गोयल के हिस्से में आया है। लोकसभा चुनाव में अब महज डेढ़ साल बचा है। सवाल यह है कि जिस उम्मीद के साथ देश की जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत सौंपा था उन उम्मीदों को पूरा करने के लिए क्या यह समय पर्याप्त माना जा सकता है? रोजगार के मुद्दे पर सरकार के पास गिनाने के लिए कुछ खास नहीं है। महंगाई के मुद्दे पर भी सरकार अपनी पीठ ठोकने की हालत में नहीं है। चीन-पाकिस्तान से बिगड़ते संबंधों और आतंकवाद ने उसे परेशानी में डाल रखा है। प्रधानमंत्री जिस नए भारत की कल्पना कर रहे हैं, वह कुछ करके दिखाने से ही बनेगा। मंत्रिमंडल विस्तार में भाजपा के सहयोगियों का शामिल न होना हालांकि एनडीए का आतंरिक मामला है लेकिन शिवसेना ने जिस तरह सवाल उठाए हैं, उसे गठबंधन राजनीति के लिए शुभ नहीं माना जा सकता। नए चेहरों पर दांव खेलना भाजपा के लिए कितना फायदेमंद साबित होगा, ये तो समय ही बताएगा लेकिन इतना तय है कि मोदी सरकार को कुछ अलग करके जरूर दिखाना होगा।

केन्द्र में मंत्रिमंडल का ताजा फेरबदल आमजन को जताने की कोशिश लगती है कि सरकार अपने शेष कार्यकाल में जनता से किए गए वादों पर खरा उतरने की पूरी ताकत लगा देगी। इसलिए फेरबदल में परफोरमेंस (प्रदर्शन) पर जोर दिया गया है। मिशन (दूतमंडल) -350 को लक्ष्य करते हुए अगले चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा के लिए कैसा रहेगा यह फेरबदल?

प्रधानमंत्री मोदी जी ने चौकाने वाले फेसलों के लिए जाने जाते हैं। इस बार भी मंत्रिमंडल विस्तार व फेरबदल हुआ तो उनके फैसले सियासी पंडितों के अनुमान के विपरीत निकले। हमेशा की तरह इस बार भी शामिल किए जाने वाले व हटाए जाने वाले मंत्रियों के बारे में कयास से आगे नहीं बढ़ पाए। पहले जब मंत्रियों से इस्तीफे लिए गए तब भी और उसके बाद जब फेरबदल व विस्तार हुआ तब भी तमाम राजनीतिक अटकलों के विपरीत नतीजे आए। जो सबसे चौंकाने वाला फेसला रहा वह था निर्मला सीतारमण को देश की रक्षा मंत्री का अहम जिम्मा सौंपा। निर्मला सीतारमण को देश की पहली महिला रक्षामंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ है। वरिष्ठ मंत्री वेकैया नायडु के उपराष्ट्रपति बनने और अनिल माधव दवे के असामायिक निधन से सूचना एवं प्रसारण और वन व पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय की रिक्तियों को भरना था। अरुण जेटली भी वित्त एवं रक्षा जैसे दो महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल रहे थे। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार जरूरी समझा जा रहा था। इस फेरबदल में जहां मंत्रियों के अब तक के कामकाज को आधार बनाते हुए कुछ मंत्रियों को पदावनत किया गया, वहीं कुछ को पदोन्नत भी किया गया। यानी, प्रधानमंत्री ने एक तरह से संकेत देने की कोशिश की है कि मंत्रियों को परिणाम देने ही होंगे। ऐसा इसलिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि यह बात जनमानस में घर करने लग गई थी कि सरकार के कई महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट (परियोजना) सिर्फ बातों तक ही सीमित हैं। गंगा पुनरुद्वार, स्किल इंडिया (कौशल भारत) , मेक इन इंडिया (भारत में बनाना) व स्मार्ट सिटी (आकर्षक शहर) जैसे प्रोजेक्ट (परियोजना) प्रधानमंत्री की मंशा के अनुरूप गति नहीं पकड़ पा रहे थे। अपने मंत्रालयों में कमजोर परफोरमेंस (प्रदर्शन) के कारण राजीव प्रताप रूडी व संजीव बालियान को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। वहीं सुरेश प्रभु लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं की वजह से आलोचना के घेरे में आ गए थे। ऐसे में उनका मंत्रालय बदलने में किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। यह बात और है कि प्रभु पहले ही सार्वजनिक तौर पर अपने इस्तीफे की पेशकश कर चुके थे। कहा तो यह जा रहा है कि भाजपा की फायरब्रांड (तेजतर्रार) नेत्री उमा भारती खुद ही स्वास्थ्य कारणों से मंत्री पद छोड़ना चाहती थी। लेकिन पर्दे के पीछे यह कहानी भी है कि संघ की चेहती होनी की वजह से मोदी-अमित शाह की जोड़ी उनको बाहर का रास्ता नहीं दिखा सकी। खेल मंत्री का स्वतंत्र प्रभार देख रहे विजय गोयल को खराब स्वास्थ्य और दिल्ली की राजनीतिक में खेल मंत्रलाय को घसीटने के कारण विभाग बदलकर संसदीय मामलों व सांख्यिकी जैसे मंत्रालय का राज्यमंत्री बनाया गया।

मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने कई पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों को अहम जिम्मेदारियां सौंपी थी। उनका मानना है कि पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अधिक कुशलता व तत्परता से काम को अंजाम देते हैं। इसी गुजरात मॉडल (आर्दश) के तहत उन्होंने इस विस्तार में पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों को जगह दी है। नौकरशाह रहे आर. के सिंह, हरदीप पुरी और अल्फोंज कन्नथानम के अनुभवों का भी सरकार चलाने में फायदा मिलेगा, यह उम्मीद की जानी चाहिए। एक तरह से इस फेरबदल में यह संकेत देने की कोशिश भी की गई है सिर्फ चुनाव जीत कर आने वाले ही नहीं काबिल व्यक्तियों की तलाश सदनों से बाहर भी की जा सकती है। जहां तक किसी महिला को रक्षा मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद संभालने का सवाल है सीतारमण ने वाणिज्य उद्योग व वित्त राज्यमंत्री रहते हुए अपने कामकाज की छाप छोड़ी है। रक्षा क्षेत्र में भी सरकार एफडीआई लाना चाहती है। ऐसे में सीतारमण की स्वच्छ छवि, वित्त मामलों की समझ और निर्णय लेने की क्षमता पर भरोसा करते हुए मोदी ने उनको यह दायित्व सौंपा है। रक्षा मंत्री जैसे अहम पद पर महिला को लाकर भाजपा का एक लक्ष्य महिला वोटरों (मतदाता) को रिझाना हो सकता है। यह भी देखना होगा कि वेंकैया नायडु के उपराष्ट्रपति बनने के बाद भाजपा के पास दक्षिण में कोई बड़ा चेहरा नहीं है। सीतारमण को आगे कर दक्षिण में आंशिक ही सही, इसे वैंकेया की जगह लेने की भी कवायद भी समझा जा रहा है। हां, एनडीए के सहयोगी दलों में से किसी को इस विस्तार में शामिल नहीं करना जरूर चौंकानें वाला रहा। वर्ष 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं। इससे पहले मोदी के गृह राज्य गुजरात समेत कई राज्यों में भाजपा को विधानसभा चुनावों का भी सामना करना है। पंजाब को छोड़कर भले ही भाजपा का विजय रथ देशभर में आगे बढ़ा है लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि दो साल बाद होने वाले चुनावों में भाजपा को कहीं न कहीं एंटी (विरोधी) इंकम्बेंसी (पदग्राही) फैक्टर (कारक) का सामना भी करना पड़ सकता है। इस कारण उत्तरी भारत में यदि कोई नुकसान होता है तो भाजपा इसकी भरपाई दक्षिण से करना चाहेगी। इसलिए वह दक्षिण में जनाधार खड़ा करना चाहती है। मिशन (दूतमंडल) -350 के तहत वर्ष 2019 में भाजपा का लक्ष्य अकेले दम पर लोकसभा की 350 सीटें हासिल करना है। ऐसे में यह फेरबदल एक तरह से आगामी चुनावों पर निशाना साधने जैसा ही माना जाना चाहिए। अब ओैर फेरबदल होगा इसकी उम्मीद कम ही है।

नीरजा चौधरी, राजनीति विश्लेषक, तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय, कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों साथ जुड़ी रही हैं।

ब्रिक्स देश का नौवां शिखर सम्मेलन:-

BRICs Country Summit 9

शियामेन-आतंकवाद को पालने-पोसने और बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान के खिलाफ भारत को बड़ी सफलता मिली है। खास बात यह है कि सफलता चीन की धरती पर मिली जो हमेशा से वैश्विक मंत्रो पर पाक और वहां के आतंकी संगठनों को शह देता रहा है। शियामेन में शुरु हुए सम्मेलन में मोदी जी द्वारा आतंकवाद का मुद्दा उठाने के बाद सभी सदस्य देश इस पर चिंता जताते हुए आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई पर सहमत हुए। 43 पेज के घोषणापत्र में क्षेत्रीय सुरक्षा, इस्लामिक स्टेट (राज्य) , ईस्टर्न तुर्किस्तान, इस्लामिक मूवमेंट (आंदोलन) , इस्लामिक मूवमेंट (आंदोलन) ऑफ (का) उज्बेकिस्तान द्वारा की गई हिंसा पर चिंता जताई गई।

ब्रिक्स देश के नौवें शिखर सम्मेलन में भारत को बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल हुई है। पहली बार ऐसा हुआ है जब पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंककारी गुटों का नाम ब्रिक्स घोषणा पत्र में शामिल किया गया। इतना ही नहीं, ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों ने आतंकवाद के विभिन्न स्वरूपों की कड़ी निंदा करते हुए आंतकियों, उनके पोषकों और समर्थकों को आंतकी घटना के लिए बराबर जिम्मेदार मानने की बात कही है। इस सम्मेलन की खास बात यह रही कि संरक्षणवाद के मुख्य मुद्दे से इतर सम्मेलन का घोषणा पत्र पूरी तरह आतंकवाद के खात्मे पर केन्द्रित रहा। डोकलाम सीमा विवाद में चीन के खिलाफ कुटनीतिक जीत के बाद मोदी के नेतृत्व में भारत की यह एक और बड़ी सफलता मानी जा रही हैं। क्योंकि अभी तक चीन के रवैये के कारण जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर जैसे आतंकियों को संयुक्त राष्ट्र की आतंकी सूची में शामिल करवाने में भारत सफल नहीं हो पार रहा था। लेकिन अब चूंकि चीन ने भी ब्रिक्स घोषणा पत्र जैेस महत्वपूर्ण दस्तावेज में जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, तहरीक-ए-तालीबान पाकिस्तान (टीटीपी) और जैश और हिज्ब-उल-तहरीर (पाकिस्तान में स्थित गुट) सहित तालीबान, आईएसआईएस, अलकायदा तथा हक्कानी नेटवर्क (जाल पर कार्य) को क्षेत्र में आतंकवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया है। सम्मेलन में मोदी जी ने आतंकवाद के मुद्दे को मजबूती से उठाया। सदस्य देशों के नेताओं ने इसका समर्थन किया। अब भारत को इस अभियान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और तेज करना होगा ताकि मसूद अजहर और पाकिस्तान में बैंठे आतंक के पोषकों पर कार्रवाई हो सके। इस घोषणा पत्र पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सहमति तो है लेकिन भीतर ही भीतर चीन भारत की इस सफलता को पचा नहीं पा रहा होगा। क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर मुद्दे पर वही अडंगा लगाता रहा है। लेकिन अब वह इस मुद्दे पर विरोध नहीं कर पाएगा। आतंकवाद पर नकेल से जहां ब्रिक्स देशों में आपसी आर्थिक और व्यापारिक संबंध मजबूत होंगे, क्षेत्र में शांति भी स्थापित होगी। बस हमें अपना अभियान पुरजोर जारी रखते हुए चीन पर दबाव कायम रखना होगा।

चीन-बीते साल गोवा में आठवें ब्रिक्स सम्मेलन में चीन ने घोषणापत्र में पाक समर्थित आतंकी संगठनों को शामिल करने का विरोध किया था। अभी चल रहे सम्मेलन से पूर्व भी चीन ने यह मुद्दा न उठाने की बात कही थी। पाक चीन के भरोसे भारत को मात देने की कोशिश करता रहा है। पिछले दिनों जैश आतंकी मसूद अजहर के मुद्दे पर चीन के वीटों से उसका मनोबल बढ़ा था। घोषणा पत्र से उसकी फजीहत हुई हैं। कुल 10 संगठनों का इसमें जिक्र है। घोषणा-पत्र में 17 जगह आतंकवाद का जिक्र है। विदेश मंत्रालय में सचिव (पूर्व) प्रीति सरन ने कहा कि घोषणा पत्र में पाक स्थित आतंकी संगठनों का नाम होना महत्वपूर्ण है।

यूएन-घोषणा पत्र में आतंकवाद की सख्त निंदा के बावजूद जैश प्रमुख मसूद अजहर को यूएन द्वारा वैश्विक आतंकी घोषित करने पर चीन का अड़ियल रुख नहीं बदला। चीनी प्रवक्ता ने कहा-आतंक के खिलाफ हमारा पहले जो रुख था, वो आज भी वही है। यूएन में मसूद के खिलाफ पेश प्रस्ताव पर चीन ने दो साल से अड़ंगा लगा रखा है। हालांकि, इस बारे में प्रवक्ता ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

फिनलैंड:- फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था के स्तर को बनाए रखने के लिए प्रयास करने की जरूरत है। आंकड़े बताते हें कि प्राथमिक शिक्षा पाने 10 - 15 प्रतिशत बच्चे पढ़ तो सकते हैं लेकिन वे यह नहीं बता पाते कि वे क्या पढ़ रहे हैं। आज देश में अनपढ़ युवाओं की संख्या बढ़ रही है। खासतौर पर लड़कों की साक्षरता दर लड़कियों से कम होती जा रही है। सामाजिक स्तर पर भी साक्षरता में अंतर देखा जा सकता है। संपन्न परिवारों में साक्षरता दर तेजी से घट रही हे। गिरती साक्ष्रता दर फिनलैंड के लिए खतरे का संकेत है। अगर क्या पढ़ रहे हैं यही नहीं समझ पा रहे तो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। सैंकडरी (माध्यमिक) के बाद अधिकतर युवा स्कूल (विद्यालय) छोड़ देते हें, इसके लिए व्यावसायकि शिक्षा को दोषी ठहराया जा रहा है। घटती शिक्षा दर नागरिकों को अधिकारविहीन कर देती है और अंतत: उन्हें गरीबी की ओर धकेलती है। देश के शिक्षा के ढांचे को दुरुस्त करना होगा। इसके लिए सख्त फैसले लेने होंगे।

सरदार सरोवर बांध:-सरोदार सरोवर बांध परियोजना देश को समर्पित कर दी गई। बांध की ऊंचाई या इसकी पानी छोड़ने की क्षमता कुछ भी हो लेकिन अहम सवाल यह है कि गुजरात के जिस कच्छ और सौराष्ट्र इलाके को पानी उपलब्ध कराने के लिए यह परियोजना शुरू हुई क्या वह उद्देश्य सफल है? यदि नही ंतो क्या वह केवल राजनीतिक उपलब्धि का ढिंढोरा भर है?

भारत के तीसरे सबसे ऊंचे बांध सरदार सरोवर आखिर देश को समर्पित हो ही गया। पानी छोड़ने की क्षमता के लिहाज से भी इसे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बांध बताया जा रहा है। जैसा कि बांधों के बारे में कहा जाता है कि इनसे सिंचाई की सुविधा मिलेगी, बिजली बनेगी और बाढ़ नियंत्रण का काम आसान होगा, इस बांध के बारे में भी ऐसा ही कहा जा रहा है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अप्रेल 1961 में इस बांध की आधारशिला रखी लेकिन इस परियोजना की शुरूआत 1979 में हो सकी। लेकिन शुरू से ही यह परियोजना अनेक विवादों से घिरी रही। इन्हीं विवादों के बीच तीन साल पहले बांध ऊंचाई को बढ़ाकर 138.62 मीटर (मापक) कर दिया गया। लेकिन, अब जबकि इसे देश को समर्पित कर दिया गया तो बहुत सी बातों पर अंगुलियां उठाई जा रही है। एक तो यही कहा जा रहा है गुजरात के जिस कच्छ और सौराष्ट्र क्षेत्र को पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इस परियोजना की शुरूआत की गई, वहां तक तो पानी पहुंचा ही नहीं। इसका कारण बताया जा रहा है कि बांध परियोजना से जुड़ी नहरों के नेटवर्क का काम अभी तक 50 फीसदी भी पूरा नहीं हो सका। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब राजस्थान को भी पानी उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है, तो यह कब उपलब्ध होगा? फिर 1961 में गुजरात के जिस इलाके को पानी उपलब्ध कराने का ख्वाब दिखाया गया, यदि वही पूरा नहीं हो पाया है तो राजनीतिक उपलब्धि का ढिंढोरा पीटने भर के लिए ही किया गया है? आखिर, कब हमारे राजनेता देश और यहां की जनता के बारे में सोचेंगे? यह बात सही है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भाखड़ा-नागल बांध के लिए कहा था- ‘ये हमारे नए तीर्थ हैं, लोगों को इन्हें आकर देखना चाहिए’ । लेकिन, बाद में उन्होंने अपने निधन से कुछ समय पूर्व इस बात को स्वीकार किया था कि देश के लिए बांध जैसे बड़े-बड़े ढांचे तैयार करना हमारी गलती रही है। इन पर बहुत समय और धन खर्च होता है। पर्यावरणविद व पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिवंगत अनिल माधव दवे ने भी राज्यसभा में कहा था कि अब समय आ गया है कि हमें बड़े बांधों को बनाने के उद्देश्य और नीति के बारे में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। देश में अब तक जितने भी बड़े-बड़े बांधो का निर्माण किया गया है, वे उन उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, जिनको लेकर उनका निर्माण किया गया था।

यही वजह है कि हमारे-नीति -निधार्रकों को सोचने और काम करने के तरीके में बदलाव करने की जरूरत है। देश में आज भी सिंचाई और पेयजल का बड़ा हिस्सा छोटे जल संसाधनों जैसे तलाब, कुएं, बावड़ी आदि से जुड़ा है। दूसरी ओर हम जल संसाधन जुटाने के मामलें में बड़ी राशि बांधो जैसे बड़े संसाधनों पर खर्च करते रहे है। जरा सोचिए, देश में दस हजार से अधिक आबादी वाला ऐसा कौनसा कस्बा या शहर है जो 15 मिनट की तेज बरसात के पानी को अपने ही धरातल में सहेज पाता हो? कारण साफ है कि हमने तालाबों व नदियों के बहाव क्षेत्र तक में तो कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए पर पानी के भराव के लिहाज से इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। देश में कभी भी छोटे संसाधनों को सहेजने की ओर ध्यान नहीं दिया है। आजादी के समय हमारे देश में डार्क (गहरा) जोन (क्षेत्र) नाममात्र के थे। हमारी सरकारे पानी सहेजने के लिए बड़े-बड़े बांधों की योजनाएं बनाती रहीं, करोड़ों रुपए खर्च करती रही, उनके बन जाने के बाद कितने अधिक डार्क जोन बढ़ गए?

सरदार सरोवर बांध बनाते समय यह परियोजना 6400 करोड़ रुपए की थी लेकिन इस पर खर्च करीब 50 हजार करोड़ रुपए हो गया। यह तो सिर्फ एक आंकड़ा है लेकिन वास्तविक खर्च का अंदाजा लगाना बेहद कठिन है। नर्मदा नदी जल बंटवारे को लेकर पंचाट बना और उसकी 1979 की रिपोर्ट (प्रमाण) के मुताबिक इस बांध बनना चाहिए था। लेकिन, 50 हजार लोगों को ठीक से बसाया नहीं गया। करीब 10 हजार मछुआरों की आजीविका छिन गई। उनके बारे में नहीं सोचा गया। हजारों एकड़ जंगल बर्बाद हो गए। जंगलों से मिलने वाले औषधीय पौधे गायब हो गए, इसकी कीमत का तो शायद ही किसी ने अंदाजा लगाया हो। सबसे बड़ी बात यह कि अन्य बांधो की तरह ही सरदार सरोवर बांध के कैचमेंट (जलग्रह) क्षेत्र में भी मिट्‌टी के रिसाव को रोकने के लिए वृक्षारोपण नहीं हुआ। यह मिट्‌टी जो धीरे-धीरे बांध में जमा होती जाती है, बांध की क्षमता को कम करती है। येन-केन प्रकारेण यहां पानी भी उपलब्ध करा लिया जाएगा तो जिन्हें यह पानी मिलेगा, वह आखिर कब तक मिलता रहेगा? हो सकता है कि पांच-छह साल भी पानी उपलब्ध करा दिया गया हो क्या 50 हजार करोड़ रुपए की लागत वाले इस बांध को सफल कहा जाएगा? क्या हमें अपने छोटे प्राकृतिक संसाधनों को सहेजने पर धन खर्च नहीं करना चाहिए था, यह सवाल तो जरूर उठेगा। जरूरत यह है कि अब हमें सरदार सरोवर बांध परियोजना जैसी किसी भी परियोजना से पहले इन बातों पर भी विचार जरूर करना चाहिए।

राकेश दीवान, वरिष्ठ पत्रकार, नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े रहे हैं, पर्यावरण मामलों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन

अमेरिका:- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रक्षा बजट 700 बिलियन (एक अरब) डॉलर (अमरीका मुद्रा) (45 लाख करोड़) करने का प्रस्ताव रखा है। यह पिछले बजट से 81 बिलियन डॉलर अधिक है। यानी ट्रंप 14 प्रतिशत रक्षा बजट बढ़ाना चाहते है। अगर सीनेट इसे मंजूरी देती है तो यह 2003 के बाद सर्वाधिक बढोत्तरी होगी। 2001 में हुए 9 ⁄ 11 हमले के बाद अमेरिका ने रक्षा बजट में 26 प्रतिशत की थी। खास बात यह है कि फरवरी में ट्रंप ने रक्षा बजट में 54 अरब डॉलर बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था। पर सनकी देश उ. कोरिया के हाइड्रोजन बम और बैलिस्टिक (प्रक्षेप) मिसाइलों (प्रक्षेपास्त्रों) के परीक्षण के बाद और ज्यादा वृद्धि के संकेत दिए हैं। ट्रंप सरकार ने बजट की जो रूपरेखा तैयार की है, उसके तहत विदेशी देशों को दी जाने वाली मदद और घरेलू कार्यक्रमों में कटौती कर यह रकम जुटाई जाएगी। पाकिस्तान को नॉन-नाटो ग्रुप (समूह) के तहत मिल रही हैसियत को कम कर दिया जाएगा। बजट प्रस्ताव से जुड़े मामलों की जानकारी रखने वाले अधिकारियों का कहना है कि जिन विभागों में कटौती हो सकती है, उनमें पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (शाखा) , विदेश मंत्रालय और विदेशी मदद होगी। बजट बढ़ाने पर तर्क दिया गया है कि इससे देश की सैन्य क्षमता में इजाफा होगा।

ऐसे खर्च होगा बजट-

  1. 4 लाख करोड़ विदेशी सैन्य मिशन (लक्ष्य) के लिए।
  2. 41 लाख करोड़ पेंटागन के लिए, जो जवानों के लिए हथियार खरीदी और सैनिकों के वेतन पर खर्च होंगे।
  3. 60 अरब डॉलर यानी करीब 3.9 लाख करोड़ रुपए अफगानिस्तान, इराक, सीरिया जैसे युद्ध की मार झेल रहे अन्य देशों में मिशन पर।
  4. रडार से बच निकलने वाले एफ-22 राप्टर जैसी हथियार प्रणाली पर खर्च किए जाने वाले बजट में कटौती होगी। टोही और अन्य प्रौद्योगिकी वाले हथियारों पर बजट बढ़ाया जाएगा।
  5. प्रस्ताव के तहत पाकिस्तान की नॉन नाटो सदस्य देश के तौर पर मिलने वाली हैसियत कम की जाएगी। आर्थिक मदद में कटौती भी की जाएगी।

कोशिश-बड़े बजट से ट्रंप की उ. कोरिया को संदेश देने की कोशिश उ. कोरिया ने प्रतिबंधों के बावजूद हाइड्रोजन बम, बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया है। उ. कोरिया का तानाशाह किम जोंग उन लगातार अमेरिका को मिटाने की धमकी भी दे रहा है। इससे दक्षिण कोरिया, जापान समेत अमेरिका में तनाव है।

आईएस के बेस कैंप (चुंबन शिविर) और सीरिया में तेज होंगे अमेरिकी हमले डोनाल्ड ट्रंप ने चुनावों में आतंकी संगठन आईएसआईएस के खात्मे का वादा किया था। यही वजह है कि विदेशी सैन्य मिशन के बजट में बढ़ोत्तरी की गई है। साथ ही दक्षिण चीन सागर में चीन की विस्तारवादी नीति को रोकना भी बड़ा कारण है।

सियोल-अमेरिका और उ. कोरिया के बीच तनाव कम होता नजर नहीं आ रहा है। कोरिया की ओर से आंखे तरेरे जाने के बाद अमेरिका ने भी पलटवार किया और कोरियाई प्रायदव्ीप के ऊपर अपने विमान उड़ाकर ताकत का अहसास कराया। दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय ने अमेरिका के चार एफ 35-बी फाइटर (लड़ाकू) विमान और दो बी-1 बम वर्षक विमानों के इस क्षेत्र में उड़ान भरने की पुष्टि की है। हाल ही में उ. कोरिया ने न्यूक्लियर (नाभिकीय) और मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) परीक्षण करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका को दबाव में लाने का प्रयास किया था।

पिछले छह दशक का ट्रेंड (प्रवृत्ति) : युद्ध और हमले हुए तो बढ़ा, हालात थमे तो घटता गया अमेरिकी बजट

Table Contain Shows the Trend of the Past Six Decades
दशकरक्षा बजटतुलनाकारण
6025.65 लाख करोड़बढ़ावियतनाम युद्ध का तनाव
7018.28 लाख करोडघटाअमेरिकी सेनाएं वियतनाम से हटीं
8028.86 लाख करोडबढ़ाखाड़ी युद्ध
9019.88 लाख करोडघटास्थिर हालात
200040.08 लाख करोडबढ़ा9 - 11 हमला
201033.09 लाख करोडघटाअमेरिकी सेनाएं इराक से हटीं
201744.89 लाख करोडब्ढ़ाउ. कोरिया संकट के कारण
Table Contain Shows the India՚s Defense Budget
जितना भारत का रक्षा बजट, उससे ज्यादा की वृद्धि
45154.43.532.6 (आंकड़े लाख करोड़ में)
अमेरिकाचीनरूसभारतब्रिटेनजापान

बिटकॉइन (अंकीय मुद्रा का एक प्रकार) : -दुनिया में अनेक अनोखी मुद्राएं चल रही हैं, जो वास्तविक नहीं हैं, जिनको जारी करने वाली कोई अधिकारिक संस्था अथवा सरकार नहीं होती, फिर भी उस मुद्रा का लेन-देन होता है और कई स्थानों पर उसके द्वारा भुगतान भी किया जाता है। इसे आभासी अथवा वर्चुअल (वास्तविक) मुद्रा भी कह सकते हैं। चूंकि इसकी जानकारी गुप्त ही रहती है इसनिए उन्हें क्रिप्टो (गुप्त) करंसी (मुद्रा) भी कहा जाता है। इनमें से एक सर्वाधिक चर्चित मुद्रा है, बिटकॉइन (अंकीय मुद्रा का एक प्रकार) । कहा जाता है कि इसका अन्वेषण एक अनजान कंप्यूटर (परिकलक) प्रोग्रामर (क्रमादेशक) या प्रोगामरों के एक समूह ने किया। जिसे ‘सतोशी नाकामोटो’ के नाम से जाना जाता है। वास्तव में यह नाम भी छदम है। सतोशी नाकामोटो को खोजने की तमाम कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं। इसे वर्ष 2009 में एक ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर यानी खुले स्रोत वाले सॉफ्टवेयर के रूप में जारी किया गया। इसका लेनदेन दो लोगों के बीच सीधे तौर पर होता है और उसमें कोई बिचौलिया नहीं होता। लेनदेन को नेटवर्क (जाल में कार्य) के संकेतों द्वारा सत्यापित किया जाता है और ब्लॉकचेन के नाम से एक सार्वजनिक खाते पर इसको रिकॉर्ड (प्रमाण) किया जाता है। हाल ही में दुनिया भर में कंप्यूटर अपराधियों द्वारा वैश्विक स्तर पर साइबर हमले किए गए जिससे 150 देशों के 2 लाख से ज्यादा कंप्यूटर बुरी तरह से प्रभावित हो गए।

इस साइबर हमले से जुड़े अपराधियों ने कंप्यूटर (परिकलक) डाटा (आंकड़ा) वापस देने के लिए फिरौती बिटकॉइन में मांगी गई थी। सामान्य तौर पर हम क्रेडिट या डेबिट कार्ड, ऑनलाइन बैंकिंग (महाजन) आदि से ऑनलाइन लेनदेन करते हैं। ये लेनदेन वैध और भलीभांति रिकॉर्ड (प्रमाण) होते हैं। इसमें लेनदेन करने वालों की जानकारी होती है लेकिन बिटकॉइन लेनदेन में ब्लॉकचेन विधि का प्रयोग होता है जिसे ‘डार्कवेब’ पर ही ब्राउज (सरसरी नजर) किया जाता है, जिस कारण उस लेनदेन से जुड़े लोगों का पता लगाना बहुत कठिन होता है। ये लेनदेन अपरिवर्तनीय होते हैं इसलिए अपराधियों के लिए यह सुरक्षित लेनदेन का तरीका बन चुका है। बिटकॉइन के अपराध में बढ़ते उपयोग ने सुरक्षा एजेंसियों और वित्तीय नियंताओं का जीना दुभर किया हुआ है। ‘मनी लांड्रिग’ (कालेधन को वैध बनाना) का यह सबसे सुरक्षित तरीका है और इसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति बिटकॉइन वॉलेट (बटुआ) में पैसा डालकर उसे किसी भी ‘टैक्स (कर) हैवन’ में स्थानांतरित कर सकता हैं। बिटकॉइन लेनदेन को कोई व्यवस्था पकड़ नहीं पा रही। इसकी नकल संभव नहीं यानी आभासी मुद्रा होने के बावजूद यह धारकों के लिए विश्वसनीय है क्योंकि अन्य मुद्राओं की तरह नकली बिटकॉइन बनाना असंभव है। इसकी पूर्ति सीमित है और इसकी आपूर्ति बिटकॉइन व्यवस्था में निर्धारित एक निश्चित गति से ही बढ़ सकती है।

भारतीय रिजर्व (आरक्षित) बैंक का कहना है कि बिटकॉइन में धन लगाना अवैध है और, सरकार द्वारा यह कहे जाने पर भी कि इसमें पैसा डालना ‘मनी लांड्रिंग’ का अपराध माना जाएगा, अभी तक भारत में 5 लाख से ज्यादा लोगों ने बिटकॉइन नेटवर्क को डाउनलोड किया हुआ है। दुनिया के किसी केन्द्रीय बैंक (अधिकोष) का इसे समर्थन नहीं है। इसे किसी बैंक ने जारी नहीं किया इसलिए यह वैध मुद्रा नहीं है और, इसलिए इस पर कोई टैक्स (कर) भी नहीं लग पाता। चूंकि मांग-पूर्ति के आधार पर बिटकॉइन की बाजार कीमत तय होती है और इसमें उतार-चढ़ाव काफी मात्रा में होते हैं। इसलिए बिटकॉइन सट्‌टेबाजी में भी खूब लोकप्रिय रहता है। वर्ष 2010 में जहां 1000 बिटकॉइन तक पिज्जा के मूल्य के बराबर थे, सितंबर 2017 तक आते-आते एक बिटकॉइन की कीमत 5000 डॉलर के बराबर पहुंच गई, यानी 3 लाख 20 हजार रुपए प्रति बिटकॉइन। स्विट्‌जरलैंड शायद पहला ऐसा देश बन गया, जहां कुछ स्थानीय निकायों में बिटकॉइन में कर अदा किया जा सकता है। सभी को मालूूम है कि स्विट्‌जरलैंड के बैंक (अधिकोष) दुनिया भर के कालेधन के स्वर्ग बने हुए हैं। कंपनियों (संगठन) द्वारा आईपीओ यानी इंनिशियल (प्रारंभिक) पब्लिक (जनता) ऑफर (प्रस्ताव) में तमाम प्रकार के नियमों की अनुपालन जरूरी है। लेकिन आजकल कंपनियों ने क्रिफ्टों (गुप्त) करंसी (मुद्रा) के माध्यम से पूंजी जुटाने का एक तरीका अपनाना शुरू कर दिया है, जिसका नाम है ‘आईसीओ’ यानी इनिशियल (प्रारंभिक) कॉइन (सिक्का) ऑफर (प्रस्ताव) । इसमें एक कंपनी निश्चित मात्रा में कॉइन (सिक्का) जारी करती है और उसे लोग खरीदते हैं। सभी कॉइन बिकने पर बिक्री बंद हो जाती है और इन ‘कॉइनों’ के धारक उनका जैसा चाहे उपयोग कर सकते हैं। बाजारों में उथल-पुथल और बढ़ती गैरकानूनी गतिविधियों के मद्देनजर चीन ने क्रिफ्टो करंसी एक्सचेंजो (अदला बदली) पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारत और कई अन्य देशों में यह पहले से ही प्रतिबंधित हैं। गौरतलब है कि चीन ‘बिटकॉइन’ व्यापार का एक बड़ा केन्द्र है और विश्व के 23 प्रतिशत लेनदेन चीन में ही होते हैं। इसी प्रकार से रूस ने भी बिटकॉइन सरीखी करंसियों के आम नागरिकों के बीच लेनदेन पर प्रतिबंध लगाने का संकेत दिया है। वित्तीय अनुशासन को भंग करती, अपराधियों एवं मनी लांड्रिंग (कालेधन को वैध बनाना) को बढ़ावा देती इस बिटकॉइन सरीखी क्रिफ्टो करंसियों का चलन दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। इससे अर्थव्यवस्थाओं और समाज को कोई लाभ नहीं होता बल्कि लोगों की गाढ़ी कमाई इसमें बर्बाद जरूर होती है। इन गैरकानूनी आपराधिक मुद्राओं से मानवता को निजात मिलनी चाहिए। भारत में भी इच्छाशक्ति दिखाते हुए कागजी स्तर ही नहीं तकनीकी तौर पर इसे प्रतिबंधित करना चाहिए।

डॉ. अश्विनी महाजन, अर्थशास्त्री, दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन, स्वदेशी जागरण मंत्र के राष्ट्रीय सह-संयोजक

बिटकॉइन ‘लक्ष्मी’ -नोटबंदी के बाद भारतीय रिजर्व बैंक एक और बड़ा फैसला लेने जा रहा है। केंद्रीय बैंक वैश्विक तौर पर खतरनाक कही जाने वाली क्रिप्टोकरंसी बिटकॉइन के मुकाबले के लिए अपनी क्रिप्टोकरंसी ‘लक्ष्मी’ की शुरुआत करने जा रहा है। क्या कालाधान और आपराधिक कार्य में इस्तेमाल होने वाली मुद्रा बिटकॉइन का यह मुकाबला कर पाएगी? क्या देश इस मुद्रा के लिए तकनीकी तौर पर तैयार है? क्या होंगे लाभ और क्या हो सकती हैं हानियां? इन्हीं मुद्दों पर आज की बड़ी बहस

विचार-भारत में हर रोज हजारों लोग गुप्त मुद्रा के कारोबार से जुड़ते रहे हैं। इस कारोबार से जुड़ने वालों का मुख्य उद्देश्य जल्द से जल्द और अधिकाधिक धन कमाना होता है। अधिकाधिक धन जल्द से जल्द कमाना किसी ईमानदार व्यक्ति का भी उद्देश्य हो सकता है लेकिन गुप्त मुद्रा विशेषतौर पर बिटकॉइन में निवेश के जरिये ऐसा करना बेहद खतरनाक होता जा रहा है। इसे लेकर विदेश में भी काफी चिंताएं जताई गई लेकिन इसे रोकने के ठोस प्रयास नहीं हो पा रहे। हालांकि यह भी जानकारी आई कि चीन में तो इसके कारोबार पर पूर्णरूप से पांबदी लगा दी लेकिन अन्य देश ऐसा नहीं कर पा रहे है। बिटकॉइन ऐसी मुद्रा है जिसे किसी भी देश के केंद्रीय बैंक ने जारी नहीं किया इसलिए इसे वैध मुद्रा नहीं कहा जा सकता। चूंकि इस विशेषता के साथ ये लेनदेन अपरिवर्तनीय भी होते हैं इसलिए अपराधियों के लिए यह सुरक्षित लेनदेन का माध्यम बन गया है। पिछने दिनों कई देशों के बैंको (अधिकोष) , अस्पतालों (चिकित्सालय) , पुलिस विभाग और सुरक्षा विभागों से जुड़े कंप्यूटरों (परिकलकों) पर साइबर हमले किए गए। यूरोपीय देशों में तो निजी जानकारियां विशेष तौर पर बीमारियों से संबंधी जानकारियां कंप्यूटरों पर ही होती हैं। यही वजह थी कि साइबर हमले में बहुत से अस्पतालों के कंप्यूटर भी ठप हो गए लोगों के लिए इलाज करा पाना कठिन हो गया। साइबर हमलावारों ने कंप्यूटर चालू करने के लिए बिटकॉइन में ही फिरौती मांगी थी। इसने साफ कर दिया कि अवैध मुद्रा बिटकॉइन के जरिए अपराधों विशेषतौर पर आतंकवाद के लिए धन जुटाया जाता रहा है। जरूरी तो यही है कि इस मुद्रा पर पाबंदी लगे लेकिन रिजर्व बैंक की ओर से इस मुद्रा में निवेश कर धन कमाने वाले ईमानदार लोगों के लिए अपनी ओर से गुप्त मुद्रा लाने की योजना निश्चित तौर पर सही दिशा में उठाया गया कदम कहा जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि जो लोग ईमानदारी से कर देकर अपना धन तेजी से बढ़ाना चाहते हैं, वे बिटकॉइन की बजाय भारतीय रिजर्व बैंक की गुप्त मुद्रा ‘लक्ष्मी’ में निवेश के इच्छुक होंगे। इसका एक तो सीधा लाभ यही है कि भारती धन भारतीय मुद्रा में ही निवेश किया जा सकेगा और चूंकि यह सफेद धन होगा, भारत सरकार को भी कर के जरिए इससे आय हो सकेगी। दूसरी बात ये कि बिटकॉइन के जरिए आतंकियों तक पहुंचने वाले धन के प्रवाह को रोकने मेे काफी हद तक मदद मिल सकेगी।

प्रो. वी. एस. व्यास, पदमभूषण से सम्मानित व्यास प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के साथ आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड (परिषद) में सदस्य भी रहे हैं।

देश में यदि गुप्त मुद्रा की शुरुआत होती है तो इसकी सोच सकारात्मक हो सकती है और इसकी सोच को लेकर किसी प्रकार का संशय नहीं कर रहे। एक सोच के लिहाज से भारतीय रिजर्व बैंक की गुप्त मुद्रा जिसे लक्ष्मी नाम देने की बात हो रही है, बहुत अच्छी बात हो सकती है लेकिन जहां तक बिटकॉइन से मुकाबले का मामला है तो यह ठीक नहीं है। सवाल मुकालने का नहीं बल्कि इस बात का है कि क्या हमें इस तरह की मुद्रा की जरूरत हैं? रिजर्व बैंक भले ही इसे जारी कर रहो लेकिन इससे कालाधान रूकने की बजाय बढ़ेगा ही। देश अभी तकनीकी तौर पर इसके लिए तैयार नहीं लगता। हमारे देश में अब भी कई तरह के ‘चेक एंड बैलेंस’ की व्यवस्था है लेकिन गुप्त मुद्रा से यह व्यवस्था स्वत: ही होगी। यदि एक बार तकनीकी चूक हुई तो फिर इसे सही कर पाना कठिन है। अभी तो अकाउंटिग (लेखांकन) की स्वतंत्र इकाई है और एक बार ऑडिटर (लेखा परीक्षक) से गड़बड़ी होती है तो दूसरा ऑडिटर उसे तुरंत पकड़ लेता है। लेकिन, गुप्त मुद्रा में ऐसा कर पाना बेहद कठिन है। दूसरी बात यह है कि धन का इस्तेमाल कहां और कैसे होगा, इसकी जानकारी शायद ही किसी को लग पाए। यानी कालेधन को कहीं और खपाने और बच निकलने की आशंका इस व्यवस्था में अभी बहुत ज्यादा लगती है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यदि रिजर्व बैंक एक पुख्ता व्यवस्था के साथ अपनी गुप्त मुद्रा को लाता भी है तो क्या इसको इस्तेमाल करने वाले लोगों के पास पर्याप्त तकनीक है? यदि आम लोगों के हित में तकनीक सुधारने पर धन का भारी-भरकम निवेश कर भी दिया जाए तो आज की आवश्यकताओं को देखते हुए कम से कम हमारे देश के लिए तो यह प्राथमिकता में नहीं लगता। जो तकनीकी तौर पर परिपक्व देश है, अभी तो उन्होंने भी इस तरह की मुद्रा को चलन में लाने की पहल नहीं की है। इसके अलावा अन्य देशों में ऐसी मुद्रा नहीं होने से यह भी संभव है कि वैश्वीकरण के माहौल में हम ही अलग न पड़ जाएं। इसका कारण यह है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार तो दो एक सी प्रचलित मुद्राओं के बीच होता है लेकिन यदि मुद्राओं के साथ व्यापार करना कठिन होगा तो व्यापार पर विपरीत प्रभाव पड़ना ही है। फिलहाल यह समय नहीं है कि हम बिटकॉइन हो या अन्य मुद्रा, किसी से भी मुकाबले के लिए अपनी गुप्त मुद्रा लेकर आएं। इसके अलावा यदि ऐसी मुद्रा लाने का फैसला कर भी लिया गया है तो जरूरी है कि किसी एक आर्थिक क्षेत्र में इसकी शुरुआत की जाए। कुछ सयम बाद इस क्षेत्र के कामकाज के लाभ-हानियों का विश्लेषण कर लिया जाए। इसके बाद यदि प्रयोग सफल रहता तो जरूर लागू करें लेकिन जल्दबाजी में किसी भी किस्म का फैसला करना देश के हितों के खिलवाड़ करना ही होगा।

प्रो. गौरव वल्लभ, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ और एक्सएलआरआई जमशेदपुर में अध्यापन

- Published/Last Modified on: October 11, 2017

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