बारह उच्च समाचार (Top Twelve News) (Download PDF)

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भारत: - यदि आप पर किसी बैंक (अधिकोष) का कर्ज है तो यह आपकी समस्या है। यदि आप पर दस करोड़ का कर्ज है तो बैंक की समस्या है। यदि आप उन कई उद्योगपतियों में से हैं, जो बेकार कंपनियों (संघों) के लिए अरबों का कर्ज लेते हैं, तो यह सरकार की समस्या है।

मोटेतौर पर भारत आज इसी तरह की स्थिति में है। देश की सरकारी बैंको (अधिकोष) ने ऐसी कंपनियों (संघों) को लोन (ऋण) दिया, जो इसे लौटाने में असमर्थ हैं। बैंको की हालत भी उन्हीं कंपनियों की तरह खराब हैं, जिन्हें उन्होंने अविवेकपूर्ण तरीके से लोन दिया। अनुमान है कि दिए गए लोन का 17 फीसदी बेकार नॉन-परफॉर्मिंग (गैर कार्यक्रम) है। बरसों के इनकार के बाद अब जाकर भारत सरकार को इससे व्यापक अर्थव्यवस्था को पैदा खतरे का अहसास हुआ है। अब बैंको के बेकार लोन को ठिकाने लगाने के लिए ’बैड-बैंक’ (बुरा, अधिकोष) की स्थापना करने की योजना है, ताकि लोन देने वाली मूल बैंक स्थित में आ जाए।

फंसे कर्ज का यह झमेला बरसों का नतीजा है। भारत 2007 - 08 के वित्तीय धमाके। (आर्थिक मंदी) से बच गया लेकिन, फिर लापरवाही उठाई गई। बैंक बड़ी-बड़ी योजनाओं के लिए कर्ज देने लगे, खदानों से लेकर सड़को व बिजलीघरों से स्टील (इस्पात) प्लांट (औद्योगिक संयत्र) तक सबके लिए खजाना खोल दिया, जिनका प्राय: अंत निराशा में ही हुआ। क्रेडिट (उधार) सुइसे बैंक के मुताबिक कॉर्पोरेट (संयुक्त संस्था) इंडिया (भारत) को दिया गया 40 फीसदी लोन ऐसी कंपनियों में फंस गया है, जो मूल तो छोड़ों, ब्याज देने की स्थिति में भी नहीं है। नतीजा है ’जुड़वा बैलेंस (संतुलन) शीट (समतल सतह) की समस्या’ जिसके कारण बैंक और कंपनियां दोनों वित्तीय दबाव में हैं। दो दशकों में पहली बार कॉर्पोरेट (संयुक्त संस्था) कर्ज सिकुड़ रहा है। आदर्श विश्व में तो बैंक दिए फंसे कर्ज का मूल्य घटाती है, जिसमें नुकसान होने पर शेयरहोल्डर (हिस्सेदार) से और फंड्‌स (कोष) की जरूरत होगी। भारत इस आदर्श से बहुत दूर है। किसी लोन को बंद करने में चार साल लग जाते हैं (शायद नया दीवालिया कानून कुछ मदद करे) । सर्वाधिक प्रभावित बैंको की शेयर होल्डर तो सरकार ही है तथा वह और नकदी देने के प्रति उदासीन रही है। बैंकर (महाजन) भी लोन से व्यावहारिक तरीके से निपटने से घबराते हैं, क्योंकि प्राय: उसे क्रोनिज्म़ यानी मैत्री या पहचान के आधार पर की गई कार्रवाई समझा जाता है।

अब तक तो इसका समाधान यह जताना ही रहा है कि स्थिति बहुत खराब नहीं है। बैंक कर्ज को इस उम्मीद में आगे बढ़ाते रहे कि अंतत: आर्थिक वृद्धि सब कुछ ठीक कर देगी। यह बहुत कमजोर रणनीति है, जैसा कि 1990 के दशक के जापान व इटली के वित्तीय संकट पर निगाह रखने वाले जानते हैं। यह केवल समय की बात है कि आखिरकार बैंको की कठिनाइयां भारत की आर्थिक संभावनाओं को पटरी से उतार देगी। इसीलिए इस सारे झमेले को ठीक करने के लिए ’बैड (बुरा) बैंक’ (कोष) की बात कही जा रही है।

बैड बैंक का भूतकाल में, जैसे 1990 के दशक में स्वीडन और हाल ही में स्पेन में सफलतापूर्वक इस्तोमल किया गया गया हैं। लेकिन उसे कारगर बनाना है तो खरापन और नकदी दोनों की जरूरत होगी। खरापन, बैंक के फंसे लोन की असली कीमत तय करने में लगेगी। भारतीय नेतााओं को फंसे लोन ’बैडबैंक’ को जल्दी से बेचने के लिए बाध्य करना होगा चाहे फेस (दृष्टि) वैल्यू (मूल्य) से बहुत ज्यादा डिस्काउंट (छूट) देना पड़े। फिर चाहे इससे बैंकों की प्रतिष्ठा या मुनाफे को कितना ही नुकसान पहुंचे। यहीं पर नकदी की भूमिका आती है। जब फंसे लोन की घटी कीमत पूंजी को खाने लगे तो सरकार को इस कमी की पूर्ति करने के लिए तैयार रहना चाहिए, ’फिर चाहे ऐसा करने के लिए और उधार लेना पड़े।

हालांकि यह तो शुरूआत है। बैड बैंक इस संकट का समाधान कर सकता है लेकिन, भविष्य में ऐसा होने की संभावना कम हो तो व्यापक सुधारों की जरूरत होगी। कुछ तो हो भी रहे हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप (मंत्री के किसी चहेते को लोन) और खराब शासन (बैंको के कई शीर्ष अधिकारियों को काम के लिए केवल सालभर का ही कार्यकाल मिलता है।) अब उतनी बड़ी समस्याएं नहीं रही, जो कभी वे होती थी। लेकिन कर्ज देने वाले सरकार में शामिल नहीं होने चाहिए। साफ-सफाई के बाद निजी निवेशकों को बैंको में बड़ी भूमिका निभाने देनी चाहिए। फिर चाहे इसके लिए सरकार को मेजोरिटी (अधिक संख्या) कंट्रोल (नियंत्रण) छोड़ना ही क्यों न पड़े।

भारत के ’प्रमोटर’ (समर्थक) जो बड़े कारोबार समूहों के संस्थापक और मालिक हैं, उन पर भी लगाम लगाने की जरूरत है। कर्ज निपटाने के तौर-तरीके की बातचीत में बड़े व्यापारी व उद्योगपति हावी जो जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि लालफीताशाही, राजनीतिक संरक्षण और पुराने, काल बाह्य कानून डिफॉल्टर (बाकीदार) फर्म की संपत्ति जब्त करने को असंभव बना देते हैं। यह असुंतलन दूर करने से लोन वित्त मंत्री का नहीं, बैंक और कर्ज लेने वाले के लिए बड़ा सिरदर्द हो जाएगा। अच्छी बात है कि नीति निर्णायक भारत की बैंक समस्या के विशाल आकार के प्रति जागरूक हो रहे हैं। हालांकि, समाधान भी उतने ही बड़े आकार का होगा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है।

अत: बैंको के बेकार लोन को ठिकाने लगाने के लिए ’बैड-बैंक’ की स्थापना करने की योजना है।

तिब्बत: - तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा की तवांग यात्रा पर पड़ोसी देश की प्रतिक्रिया-

  • भारत और चीन के बीच बीते महीनों में रिश्ते गर्मजोशी भरे नहीं रहे हैं लेकिन, हाल ही में इसमें बर्फ जैसा ठंडापन आ गया है। दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा पर चीनी नेता आगबबुला हैं, यह वह इलाका है जिस पर चीन दावा करता है। चीन की ओर से मुखर विरोध के बीच 8 अप्रैल को दलाई लामा ने दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं को सीमावर्ती कस्बे तवांग के ऐतिहासिक मठ में संबोधित किया, जहा छठे दलाई लामा का तीन सदी से भी अधिक पहले जन्म हुआ था।
  • भारत और चीन दलाई लामा और अरुणाचल प्रदेश को बहुत भिन्न तरीके से देखते हैं। भारतीय दृष्टिकोण से दलाई लामा तिब्बती बौद्ध समुदाय के आध्यत्मिक प्रमुख है और इसलिए उन्हें तिब्बती बौद्धों के तवांग स्थित महान मठ में अपने अनुयायियों को संबोधित करने का पूरा अधिकार है। चूंकि अरुणाचल प्रदेश भारतीय संघ का राज्य है, वहां जो भी होता है उस पर केवल भारत का फैसला ही चल सकता है। लेकिन चीन की दृष्टि में अरुणाचल प्रदेश वास्तव में भारत का है ही नहीं। हां, अधिकृत रूप से यह भारत का है केवल इसलिए कि यह ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा 1911 में निर्धारित सीमा रेखा मैकमोहन लाइन (रेखा) के भीतर है, जो चीन को स्वीकार नहीं है। (हालांकि चीन ने इसी रेखा के आधार पर म्यांमार से अपना सीमा विवाद सुलझा लिया है।) चीन का कहना है कि दलाई लामा आध्यात्मिक नहीं केवल राजनीतिक नेता हैं। तिब्बितयों के स्वायत्त शासन को उनका समर्थन देखते हुए (चीनी उन्हें गुस्से में ’अलगाववादी’ कहते हैं) संवदेनशील सीमावर्ती क्षेत्र में उनकी यात्रा को चीन उकसावो की कार्रवाई मानता है। चीनी प्रवक्ता के मुताबिक दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश की यात्रा की अनुमति देने से दव्पक्षीय रिश्तों को नुकसान पहुंचेगा और भारत को इसके ’नतीजे भुगतने’ पड़ेंगे। चीन ने औपचारिक विरोध दर्ज कराने के लिए भारतीय दूत विजय गोखले को बुलाया था।
  • भारत ने सुलह-सफाई वाला रवैया अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने पहले तो यह कहकर चीन को शांत करने की कोशिश की कि दलाई लामा की धार्मिक व आध्यात्मिक गतिविधियों को कोई रंग नहीं दिया जाना चाहिए। चीन की बढ़ती तैशी के चलते प्रधानमंत्री मोदी जी की सरकार ने ’वन (एक) -चाइना (चीन) ’ नीति के प्रति अपने सम्मान पर जोर दिया और चीन सरकार से आग्रह किया कि वह ’कृत्रिम विवाद’ पैदा नहीं करें। किन्तु, चीन शांत नहीं हुआ बल्कि जब दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश में आए तो चीन के अधिकृत मीडिया (संचार माध्यम) ने घोषणा की कि चीन ’कड़े कदम उठाने पर मजबूर’ हो सकता है। चीन की कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (राजनीतिक दल) द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी टैब्लॉइड (समाचार पत्रिका) ’द (यह) ग्लोबल (विश्वव्यापी) टाइम्स’ पार्टी (राजनीतिक दल) मुखपत्र, पीपल्स (लोग) डैली (विचरना) ’ ने खासतौर पर धमकाने वाला स्वर अपना लिया। इसमें चीन के भारत से कई गुना अधिक जीडीपी (सकल घरेलू) और उसकी सैन्य क्षमताओं का उल्लेख किया गया ’जो हिंद महासागर’ पहुंच सकती है। कश्मीर से निकटता का भी जिक्र था। पुछा गया, ’यदि चीन भारत के साथ भू-राजनीतिक खेल खेलने लगे तो कौन जीतेगा?
  • ग्लोबल (विश्वयापी) टाइम्स (परिस्थिति/समय) के संपादकीय में जोर देकर कहा गया कि दलाई लामा की यह अरुणाचल यात्रा पहले हुई छह यात्राओं से भिन्न है-अंतिम यात्रा 2009 में हुई थी-क्योंकि इस बार उनकी अगवानी भारत के गृह राज्यमंत्री किरन रिजीजू ने की और वे उनके साथ भी रहे। भारत को किसी महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अवसर पर अरुणाचल के राजनेता के रूप में किरन रिजीजू की वहां मौजदूगी में कुछ भी असामान्य नहीं लगता।
  • किन्तु, चीन रिजीजू की मौजदूगी को आयोजन के राजनीतिक होने का सबूत मानने की तरजीह देता है। उसका संकेत था कि भारत ने इस यात्रा का इस्तेमाल चीन पर दबाव डालने के राजनयिक औजार के रूप में किया है। ग्लोबल (विश्वव्यापी) टाइम्स (समय) ने जोर देकर कहा, मूल तथ्य यह है कि दलाई लामा ’चीनी राजनय में अत्यधिक राजनीतिकृत प्रतीक है’ इतना कि किसी देश का उनके प्रति रवैया चीन के साथ उसके लगभग ’पूरे रिश्तों’ को प्रभावित करता है।’ फिर भी चीन को यह समझना चाहिए कि हाल के वर्षो में उसने भारत सरकार को कोई ऐसी वजह नहीं दी है कि वह उसकी संवदेनशीलता का ख्याल रखे। सच तो यह है कि उसने उस तक पहुंचने के मोदी के कई प्रयासों पर अपमानजनक प्रतिक्रिया ही दी है। मसलन, 2014 में मोदी ने न केवल चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का अपने गृहनगर अहमदाबाद में अपने जन्मदिन पर स्वागत किया बल्कि उसी यात्रा में उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा बंदरगाह और दूरसंचार जैसे संवदेनशील क्षेत्रों में चीन निवेश पर लगाई पाबंदिया भी हटा लीं। तुरंत ही चीनी सैनिकों ने लद्दाख में विवादास्पद सीमा का उल्लंघन कर दिया और वहां टेन्ट (तंबू) तक लगा दिए। उस छोटे संकट के बाद नीतिगत झटके देने वाली पूरी श्रृंखला सामने आई, जिससे पता चला कि विभिन्न मुद्दों पर भारत की संवदेनशीलता के लिए चीन को जरा भी सम्मान नहीं है। परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश का विरोध। फिर जैश. ए. मोहम्मद (पाकिस्तानी गुट) के सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र परिषद की काली सूची में डालने के भारत के अनुरोध को रोका, जबकि इस पहल को परिषद के 14 अन्य देशों को समर्थन था। चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में ’चीन-पाक आर्थिक गलियारा’ भी निर्मित किया है, जबकि चीन खुद उस क्षेत्र को विवादास्पद मानता है। फिर भी उसने भारत की आपत्ति की अनदेखी की।
  • इस पृष्ठभूमि में चीन की यह अपेक्षा कि भारत उसकी संवदेनशीलता का सम्मान करेगा। अतिशयोक्ति ही होगी। चीन का अंहकारी रवैया नया नहीं है। उसका यह व्यवहार दक्षिण चीन समुद्र में उसके व्यवहार से मिलता है, जहां चीन का जोर है कि संप्रभुता उसकी ’नाइन (नव) -डेशलाइन (झुकना/कम होना) ’ से तय होनी चाहिए और दूसरे देशों को झुकना चाहिए जैसा कि राष्ट्रपति रोड्रिगो दूदेर्ते के तहत फिलिपीन्स ने किया। चीन यह दिखाने को आतुर है कि जो नहीं मानते वह उन पर दबाव डाल सकता है जैसा कि जापान व वियतनाम के साथ हुआ है। लेकिन, चीन के अन्य क्षेत्रीय पड़ोसियों की तुलना में भारत कुछ बड़ा है और वह अलग मिट्‌टी का बना है। दलाई लामा की यात्रा पर टकराव बढ़ाने की बजाय चीनी नेताओं की भावनाएं शांत होने देना चाहिए। इसकी बजाय वे धमकाने वाला अंदाज ही बनाए रखते हैं तो उन्हें पता चला जाएगा कि भारत के पास भी चलने के लिए अपने पत्ते हैं।

शशि थरूर, विदेश मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन (सभापति) और पूर्व केंद्रीय मंत्री

कश्मीर: -

  • कश्मीर के बिगड़े हालात के चलते अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एचआर मैकमास्टर का भारत दौरा काफी महत्वपूर्ण बन गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, विदेश सचिव एस. जयशंकर समेत सभी से भेंट करके न सिर्फ दक्षिण एशिया में अमेरिकी हितों के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट किया है बल्कि भारत का पक्ष भी जाना है। वे अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए भारत आ रहे हैं और अगर उनके लिए अफगानिस्तान में बढ़ता आतंकवाद चिंता की बात है तो पाकिस्तान में बढ़ते आतंकी गुट और उनका अपने विरुद्ध इस्तेमाल भारत की चिंता का विषय है। भारत ने मैकमास्टर से कहा है कि कश्मीर के मौजूदा हालात के लिए पाकिस्तान काफी हद तक जिम्मेदार है। इस बारे में मैकमास्टर ने उचित सलाह ही दी है कि पाकिस्तान को अपने हितों के लिए राजनयन का इस्तेमाल करना चाहिए न कि आतंकवाद का।
  • अमेरिका पाकिस्तान को तो नहीं छोड़ सकता लेकिन, वह दक्षिण एशिया में भारत के रूप में विश्वसनीय सहयोगी ढूंढ़ रहा है। पिछले बीस वर्षो में विभिन्न वार्ताओं और संधियों के माध्यम से भारत अमेरिका के करीब गया है। इसमें स्ट्रोब (झिलमिलाती रोशनी) टालबोट से जसवंत सिंह की बातचीत से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह और बुश के बीच हुई परमाणु संधि प्रमुख हैं। बल्कि इस बीच भारत अमेरिका के इतना करीब चला गया है कि रूस जैसा भारत का पारम्परिक मित्र पाकिस्तान की ओर खिसक गया है। अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो आरंभ में रूस के प्रति नरम दिख रहे थे वे अब उससे छिटक रहे हैं और उन्हें पाकिस्तान और अफगानिस्तान में रूस की बढ़ती दखल से दिक्कत भी हो रही है। फिलहाल अमेरिका की दक्षिण एशिया में ताजा सक्रियता का एक मकसद भारत और पाकिस्तान की रुकी हुई वार्ता को शुरू करवाना भी हो सकता है लेकिन, यह तभी हो सकता है जब पाकिस्तान आतंकवाद का निर्यात बंद करें, 26/11 के अपराधियों को दंडित करे और कुलभूषण जाधव की फांसी को रद्द करे। हालांकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ स्वयं भ्रष्टाचार के मुकदमे में किसी सजा का इंतजार कर रहे हैं और अगर वैसा कुछ होता है तो पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिरता फिर प्रभावित होगी। इस अनिश्चित राजनीतिक स्थित में अमेरिकी दखल जरूर कोई रास्ता निकाल सकती हैं।

स्साांर की प्रभावशाली हस्तियां: -

  • संसार की 100 सबसे प्रभावशाली हस्तियां में सबसे असरदार लोगों की सूची में इस बार फिर विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण काम करने वाले चर्चित व्यक्तियों ने जगह बनाई है। इस सूची में राजनीतिज्ञ, सीईओ और सेलेब्रिटी (प्रसिद्ध व्यक्ति) तो हैं ही लेकिन कम विख्यात वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने अपने आविष्कारों, अपनी महत्वाकांशाओं, कल्पनाशीलता और समस्याओं को सुलझाने की अदव्तीय क्षमता के बल पर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। प्रभावशाली लोगों की कतार में दो भारतीय-प्रधानमंत्री मोदी और आंतत्रप्रेन्योर विजयशेखर शर्मा भी जगमगा रहे हैं। पेश है इनमें से कूछ नामी शख्सियतों की झलक।
  • जेफ बेजोस-इनोवेशन के महारथी बज एल्ड्रिन- मैं अंतरिक्ष के मामले में जेफ बेजोस से खास संबंध महसूस करता हूं। चंद्रमा पर चलने के लगभग 50 वर्ष बाद अभी हाल जब मैं सिएटल के निकट जेफ की ब्लू (आसमानी रंग) ओरिजन (मूल) रोकेट (अग्नि बाण) कंपनी (संघ) गया तो यह देखकर प्रसन्न हुआ कि जेफ अपने व्यावसायिक कौशल और कल्पनाशीलता से अमेरिका के अंतरिक्ष कार्यक्रम को आकार दे रहे हैं। बेजोस लगातार इनोवेशन (नवीन प्रवर्तन) में लगे रहते हैं। उन्होंने अमेजन (आश्चर्यजनक) के साथ रिटेल (खुदरा) इंडस्ट्री (उद्योग) की दिशा बदल दी। वाशिंगटन पोस्ट (पद) खरीदकर और अमेजन (आश्चर्यजनक) स्टूडियों (शिल्पशाला) बनाकर वे मीडिया (संचार माध्यम) में भी क्रिएटिविटी (संयोजक) ला रहे हैं। लेकिन, मेरे लिए चंद्रमा और मंगल ग्रह के उनके भावी अभियान सबसे रोमांचक है।

(एल्ड्रिन चंद्रमा पर चलने वाले दूसरे मानव हैं।)

  • नरेंद्र मोदी-दमकता आभामंडल, पंकज मिश्रा-मई 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने इस हिन्दू राष्ट्रवादी नेता ने परंपरागत मीडिया (संचार माध्यम) को दरकिनार रख ट्‌िवटर का उपयोग कर ग्लोबलाइजेशन (भूमंडलीकरण) के कारण पिछड़ गए आम लोगों से सीधा संवाद कायम किया। उन्होंने अपने हितों को साधने में लगे कुलीन वर्ग को उखाड़कर भारत को फिर महान बनाने का वादा किया है। उन्होंने भारत को आर्थिक, भू-राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर मजबूत बनाने का सपना देखा है। सत्ता में आने के लगभग तीन वर्ष बाद भी मोदी के आभमंडल की चमक बरकरार है। वे लोगों को लुभाने की कला में माहिर हैं। मार्च मे भारत के राजनीतिक रूप से सबसे अधिक महत्वपूर्ण राज्य उत्तरप्रदेश में उनकी पार्टी (राजनीतिक दल) भाजपा की शानदार विजय ने पुष्टि की है कि कुलीनों के खिलाफ दुनियाभर में भड़के विद्रोह का प्रमुख रूप से फायदा ताकतवर निर्वाचित नेताओं को मिल रहा है।
  • मोदी जी का कहना है, सभी राजनेताओं के लिए जनता के गुस्से को समझने और पहचानने का समय आ गया है।

(मिश्रा एज (युग) ऑफ (के लिये) ऐंगर (क्रोध) , अ (तर्कशास्त्र में प्रथम काल्पनिक व्यक्ति) हिस्ट्री (इतिहास) ऑफ (के लिये) (यह) प्रेजेंट (प्रस्तुत) पुस्तक के लेखक हैं।)

  • आंत्रप्रेन्योर विजय शेखर शर्मा, नंदन नीलेकणि-मोबाइल (गतिशील) पेमेंट (अदायगी) के मास्टर (महाशय), नवंबर 2016 में जब भारत सरकार ने 86 प्रतिशत करेन्सी (चलमुद्रा) नोटो को रद्द कर दिया तब विजय शेखर शर्मा ने इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया। जबर्दस्त विज्ञापन अभियान के सहारे उनकी डिजिटल (अंकसंबंध) पेमेंट (अदायगी) कंपनी (संघ) पेटीएम ने तेज रफ्तार पकड़ ली। 2016 के अंत तक पेटीएम के 17 करोड़ 70 लाख यूजर (उपयोग करने वाला) हो चुके थे जबकि वर्ष की शुरुआत में यह संख्या 12 करोड़ 20 लाख थी। उन्होंने देश के मानस में जगह बना ली। एक छोटे शहर में हिन्दी मीडियम (मध्यस्थ) स्कूल (विद्यालय) में पढ़े विजय ने देश में एंग्लोफोन कंपनियों (संघों) की दुनिया को जीत लिया। जैक की मां ने ई कॉमर्स (वाणिज्य) कंपनी (संघ) अलीबाबा ने पेटीएम में पैसा लगाया है। वे बैंकिंग (महाजनी) की दुनिया में कदम रख रहे हैं। उनकी योजना डिजिटल (अंक संबंध) खाते ऑफर (प्रस्ताव) करने की है। उन्हें अधिक अनुभवी प्रतिदव्ंदव्यों से नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। लेकिन, जैसा कि मैं विजय को जानता हूं, वे अगली बार भी जीतेंगे।

(नीलकणि आईटी कंपनी (संघ) इंफोसिस के सहसंस्थापक हैं।)

  • मेलिंडा गेट्‌स-महिलाओं की आवाज, शेरिल सैंडबर्ग-बिल और मेलिंडा गेट्‌स फांउडेशन (बुनियाद) के लिए मेलिंडा की परिकल्पना ने लाखों लोगों के जीवन को संवारने में मदद की है। महिलाओं और लड़कियों को अधिकार संपन्न बनाने की उनकी गहरी प्रतिबद्धता फांउडेशन (बुनियाद) द्वारा गरीब देशों में गर्भ निरोधक साधन उपलब्ध कराने में झलकती है। वे साधनहीन महिलाओं के बीच बैठकर उनकी समस्यांए सुनती हें और उन्हें हल करने के रास्ते निकालती हैं। अपने नए संगठन-पिवोटल वेंचर्स (उपक्रम) के साथ उन्होंने सार्थ परिवर्तन की दिशी में एक और शरुआत की है।

(सैंडबर्ग फेसबुक की सीओओ हैं।)

  • डोनाल्ड ट्रंप-पंरपरा को चुनौती, पाल रायन-वे काम पूरा करने का रास्ता खोज ही लेते हैं। जब मैंने और बहुत सारे लोगों ने कल्पना नहीं की थी तब ट्रंप ने ऐतिहासिक विजय दर्ज की। उन्होंने अमेरिका का 45 वां राष्ट्रपति बनने के साथ राजनीति के नियमों को नए सिरे से लिख दिया है। परंपरा को चुनौती देने वाले इस व्यवसायी ने वाशिंगटन को हिला डाला हैं। जहां लोग पीछे हटते हैं, वे आगे निकल पड़ते हैं। मैंने उनमें ऐसा नेता पाया है जिसमें अमेरिका को बदलने वाला व्यक्तित्व बनने की क्षमता है।

(रायन अमेरिकी प्रतिनिधि सदन के स्पीकर (अध्यक्ष) हैं।)

  • डेमिस हसाबिस-बुद्धिमानी के आविष्कारक, रे कूर्जवील-संभावित समय से लगभग दस वर्ष पहलु गूगल के स्वामित्व की कंपनी (संघ) डीप (गहरा) माइंड (ध्यान देना) में डेनिस हसाबिस और उनकी टीम (समुदाय) ने अल्फागो सॉफ्टवेयर (परिकलक के कार्यक्रम की आधार सामग्री) प्रोग्राम (कार्यक्रम) का विकास किया जिसने पेचीदा खेल गो में विश्व के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी ली सेडोल को हरा दिया। यह आर्टिफिशयिल (कृत्रिम) इंटेलीजेंस (बुद्धि) के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। डेमिस का विश्वास है कि एआई गरीबी हटाने, बामीरियों के इलाज, पर्यावरण में सुधार जैसी बड़ी चुनौतियों को सुलझानें में सहायक होगी।

(कुर्जवील गूगल में डायरेक्टर (निर्देशक) हैं।)

  • जीन लियू-राइड (सवारी) शेयरिंग (अंश) इनोवेटर (नवप्रवर्तक), टिम कुक-जीन लियू ने चीन में लोगों के यात्रा करने और एक -दूसरे से संपर्क का तरीका ही बदल डाला है। उन्होंने चेंग वेई के साथ टैक्सी (भाड़े पर चलने वाली मोटर गाड़ी) सर्विस (सेवा) कंपनी (संघ) दीदी शूशिंग बनाकर लाखों लोगों के लिए आवाजाही का सुविधाजनक प्लेटफार्म (मंच) उपलब्ध कराया है। जीन और उनकी टीम (समुदाय) विशाल डेटा (आधार सामग्री) के जरिए अपनी टैक्सी (भाड़े पर चलने वाली मोटर गाड़ी) सेवा को सक्षमता से चलाने के साथ सड़कों पर भीड़ का भी ध्यान रखती है। जीन ने चीन के 400 से अधिक शहरों में सक्रिय ऐसी कंपनी (संघ) बनाई है जो समाज की सेवा भी करती है।

(कुक ऐपल के सीईओ हैं, दीदी के बोर्ड (समिति) में हैं।)

  • नेमार-फुटबॉल के सुपरहीरों, डेविड बैकहैम-वे अभी 25 वर्ष के हैं और संसार के सर्वश्रेषठ खिलाड़ी बनने की राह पर चल पड़े है। 17 वर्ष की आयु में ब्राजील की टीम (समुदाय) सेंटोस से अनुबंध करने के बाद स्पष्ट हो गया कि नेमार एक असाधारण प्रतिभा हैं। वे किसी पीढ़ी में एक बार पैदा होने वाले ऐसे फुटबॉल (हवा भरा हुआ गेंद) खिलाड़ी हैं जिनके पास जब भी गेंद आती है, उनके प्रशंसक रोमांचित हो उठते हैं। लियोनेल मैसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो के सामने विश्व के बेहतरीन खिलाड़ी का ताज पहनने के लिए नेमार एक प्रतिदव्ंदव्ी के रूप में सामने आ चुके हैं।

(बैकहैम इंगलैंड के फुटबॉल खिलाड़ी हैं।)

  • थेरेसा में-ब्रेंग्जिट की बॉस, बिल इंग्लिंश-ब्रिटेन द्वारा यूरोपियन यूनियन (संयोग) छोड़ने के फैसले के कुछ माह बाद प्रधानमंत्री थेरेसा में से मुलाकात करने पर मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि ब्रेग्जिट से उठे तूफान में वे कैसे नेता के रूप में उभरकर आई हैं। उनके पास इच्छाशक्ति और स्पष्टता है। उनके इरादे मजबूत हैं। यूरोप और बाकी दुनिया से नए संबंधों की रूपरेखा तैयार कर उन्होंने देश को दिशा देने और उथलपुथल के बीच आश्वस्त करने की क्षमता दिखाई हैं। वे ब्रिटेन की लोकतांत्रिक इच्छा को आगे बढ़ाने के लिए उपयुक्त पात्र हैं।

(इंग्लिश न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री हैं।)

अमेरिका में एच 1-बी वीसा में बदलाव: -

  • के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि वे ’अमरीका फर्स्ट’ यानी पहले अमरीका की नीति पर चलेंगे। वे इसके तहत अप्रवासियों के लिए नीति में बदलाव करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय अमरीका लोगों के रोजगार पर विदेशियों के काबिज होने पर भी चिंताए जताई थीं। उन्होंने सीधे तौर पर एच-1 बी वीसा में बदलाव की बात भी कही थी। इससे लगता था कि भारतीय लोगों को अमरीका में मिलने वाले रोजगार में कमी आएगी। चुनाव प्रचार के दौरान वे अपने कामकाज और फैसलों को लेकर काफी कठोर भी लग रहे थे। ऐसा समझा जा रहा था कि वे अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बराक ओबामा की नीतियों के विपरीत जाएंगे। लेकिन, देखने में आ रहा है कि अप्रवासी नीति को लेकर वे चुनाव प्रचार के दौरान कही गई अपनी बातों में विनम्रता के साथ बदलाव कर रहे हैं। वे पूर्ण रूप से तो नहीं लेकिन धीरे-धीरे बराक ओबामा की नीतियों की ओर ही लौट रहे हैं, विशेषतौर पर एच-1 बी वीसा के संदर्भ में तो ऐसा ही कहा जा सकता है। दरअसल, उन्हें एक बात समझ में आ गई है कि उनका बहुत बड़ा मतदाता वर्ग अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग हैं। उन्हें नाराज करने का जोखिम वे लेना नहीं चाहते होंगे
  • निस्संदेह स्थानीय अमरिकियों के लिए अमरीका फर्स्ट की नीति बहुत लुभावनी कही जा सकती है। लेकिन, अब शायद उन्हें यह बात समझ में आ रही होगी कि अकुशल लोगों को रोजगार में उतनी परेशानी नहीं है। साथ ही अमरीका को अपने ही देश में अब भी कौशलयुक्त कामगारों की आवश्यकता है। ये कौशलयुक्त कामगार उसे दक्षिण एशिया विशेषतौर पर भारत से मिलते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि अमरीका विदेशी पेशेवरों को एच 1-बी वीसा जारी करता रहा है। हर साल वह लाखों लोगों को एच-1 बी वीसा जारी करता है। यह वीसा उच्च शिक्षा प्राप्त लोग जैसे डाक्टरों (चिकित्सक), इंजीनियरों (अभियंतों), कंप्यूटर (परिकलक) सॉफ्टवेयर (परिकलक के कार्यक्रम की आधार सामग्री) तैयार करने वाले पेशेवरों आदि के लिए जारी किया जाता रहा है। जब-जब एच-1 बी वीसा में परिवर्तन की बात होती थी तब-तब ऐेसे ही कामगारों के रोजगार में कमी की आशंका बन जाती थी। लेकिन, अब बदलाव कौशलयुक्त विदेशी कामगारों के लिए किया जा रहा है। इससे तो भारतीयों को लाभ ही होगा। स्थानीय अमरिकियों को इससे किसी किस्म के नुकसान की आशंका भी नहीं है। एक अन्य बात यह भी रही है कि विदेशों में डोनाल्ड ट्रंप की निजी स्वीकार्यता बनने में कठिनाई हो रही थी। इस छवि के मद्देनजर भी यह फैसला लिया गया होगा।
  • कुल मिलाकर एच-बी वीसा में बदलाव का लाभ भारतीय कौशलयुक्त कामगारों को मिलने वाला है। जहां तक दक्षिण एशिया में एक विशेष समुदाय को अमरीका नहीं आने देने की बात थी, तो कौशलयुक्त कामगारों की बात को रखकर, पर्याप्त जांच भी वे कर सकेंगे। जहां तक ऑस्ट्रेलिया द्वारा वीसा कार्यक्रम 457 में बदलाव की बात है तो वह भी ’ऑस्ट्रेलिया फर्स्ट’ यानी ऑस्ट्रेलिया पहले की नीति के तहत ही लिया गया है। चूंकि वहां के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल कुछ दिनों पहले भारत आए थे और उन्होंने शिक्षा, सुरक्षा, आतंकवाद आदि पर समझौते भी किए थे। ऐसे में उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वे अचानक वीसा कार्यक्रम 457 को रद्द कर देंगे और इसलिए लग रहा है कि यह फैसला भारत के लिए ठीक नहीं है। लेकिन ध्यान दें, उन्होंने इस वीसा कार्यक्रम को रद्द करने के साथ ही कहा कि ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों को रोजगारों को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से विदेशी कामगारों के लिए यह वीसा कार्यक्रम रद्द किया जा रहा है। उन्होंने इस वीसा कार्यक्रम के स्थान पर नया वीसा कार्यक्रम लाने की बात भी कही है।
  • समझा यह भी जाता है कि न्यूजीलैंड भी इसी तरह का कदम उठा सकता है। लेकिन, बहुत निराश होने की बात नहीं है। चार साल के लिए जारी होने वाले इस वीजा (आधिकारिक रुप से स्वीकृत करना) कार्यक्रम के तहत 30 सिंतबर 2016 तक ऑस्ट्रेलिया में करीब 95 हजार लोग पहुंचे थे। सबसे अधिक भारतीयों को यह वीसा जारी किया जाता है। भारतीयों के बाद ब्रिटेन और चीन के लोगों का नंबर आता है। यह वीसा कामकागारों के साथ पढ़ाई करने वालों खासतौर पर प्रबंधन, इंजीनिरिंग (अभियंता) की पढ़ाई करने वालों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। भारतीयों को इस वीसा के रद्द होने से नुकसान तो होगा, लेकिन यह बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। आमतौर पर वहां पढ़ाई करने जाने वालों में दव्तीय या तृतीय स्तर के विद्यार्थी ही होते हैं। प्रथम स्तर के विद्यार्थियों के लिए तो वहां के मुकाबले भारत ही शिक्षा के लिहाज से बेहतर स्थान माना जाता है। जिन विद्यार्थियों को भारतीय शिक्षण संस्थानों में प्रवेश नहीं मिल पाता और जो विदेश में रहकर खर्च उठाने में सक्षम होते हैं, ऐसे विद्यार्थी वहां पढ़ने और रहने के उद्देश्य इस वीसा का इस्तेमाल किया करते थे। बाद में वे वहीं पर नौकरी भी तलाशते थे। नया वीसा कार्यक्रम आने तक भारतीयों के लिए अन्य देशों में जाकर पढ़ाई और काम तलाशने का विकल्प तो खुला ही रहने वाला है। ज्यादातर भारतीय इस कार्यक्रम के तहत वीसा लेने की बजाय अन्य देश में जाने का विकल्प ही तलाशेंगे।

डॉ. मनन दव्वेदी, विदेश मामलों के जानकार, ’सरन्डिपिटी (आकस्मिक लाभवृत्ति) एंड (और) (यह) अमेरिकन ड्रीम (सपना) ’ पुस्तक क ेलेखक, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्यापन से जुड़े

  • अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एच-बी वीसा नियमों को सख्त बनाने के लिए एक अधिकारिक आदेश पर दस्खत कर दिए। साथ ही कहा, ’अमेरिकियों के हिताेें से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। कंपनियों (संघो) को स्किल्ड (कुशल) लोगों को ज्यादा सैलरी (वेतन) देनी होगी। ’ माना जा रहा है कि इस आदेश के बाद भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स (व्यावसायिक) पर गहरा असर पड़ेगा।
  • ट्रंप ने कहा, ’हमारे इमिग्रेशन (अप्रवासी) सिस्टम (प्रबंध) में गड़बड़ी की वजह से अमेरिकियों की नौकरियां विदेशी कर्मचारियों के हिस्से में जा रही हैं। कंपनियों (संघों), कम वेतन देकर विदेशियों को नौकरियों पर रख लेती हैं, जिससे अमेरिकियों की नौकरियां मारी जा रही है। ये सब अब खत्म होगा। लंबे समय से अमेरिकी कर्मचारी वीसा प्रोसेस (संसाधित करना) के गलत इस्तेमाल को खत्म करने की मांग करते रहे है।’
  • ट्र्रंप के मुताबिक, ’हाल में एच-1 बी वीसा लॉटरी (भाग्य का खेल) सिस्टम (प्रबंध) के तहत दिया जाता है। ये गलत है। वीसा ज्यादा स्किल्ड (कुशल) और हाइएस्ट (उच्चतम) पेड (गद्दी/पथिक) एप्लीकेंट्‌स (औपचारिक अनुरोध) को दिया जाना चाहिए। कंपनियां (संघ) किसी भी तरीके से अमेरिकन की जगह किसी और कर्मचारी को नहीं रख सकतीं। जो पहले हो रहा था, वह नहीं होगा। कंपनियों (संघों) को फेयर (सफल रहना) प्रोसेस (संसाधन करना) अपनाना होगा। हमारा प्रशासन ’हायर (उच्चतर) अमेरिकन’ के नियम पर काम करेगा ताकि हमारे लोगों की नौकरी और उनके वेतन को सुरक्षित किया जा सके। हम बाहरी देशों को लंबे समय तक हमारी कंपनियों (संघों) और वर्कर्स (कर्मचारी) को धोखा देने की मंजूरी नहीं दे सकते। मैं साफ कर देना चाहता हूं कि ’बाय (एक विशेष स्थिति में/खरीदना) अमेरिकन, हायर (उच्चतर), अमेरिकन’ की पॉलिसी (नीति) सख्ती के साथ लागू होगी।
  • व्हाइट हाउस से जारी बयान में कहा गया है कि एच-1 बी वीसा के जरिए अमेरिका में ज्यादा स्किल्ड (कुशल) और वेतन वाले लोग लाने चाहिए। स्टडीज (अध्ययन) बताती हैं कि जिन 80 फीसदी लोगों को ये वीसा दिया जाता है, उनका वेतन कम होता है। फिलहाल कंपनियां एच-1 बी वीसा (अन्य देशों में आने, जाने की शासकीय अनुमति) पॉलिसी (नीति) का गलत इस्तेमाल कर रही हैं और अमेरिकियों की जगह बाहरी कर्मचारियों को तरजीह दे रही हैं। ट्रंप अपने राष्ट्रपति चुनाव अभियान के समय से ही एच-1 बी वीसा सिस्टम (प्रबंध) में बदलाव की बात कहते रहे हैं। अमेरिकी रिपोट्‌र्स (संवाददाता) बताती हैं कि हर साल ज्यादातर एच-1बी वीसा भारतीय आईटी कंपनियां (संघ) हासिल कर लेती हैं।
  • नियम- अमेरिका में बढ़ती बेरोजगारी को दूर करने के लिए एच-1 बी वीसा के नियम को सख्त बनाया जा रहा हैं। ट्रंप प्रशासन के एक अफसर ने कहा, हमारे देश में भी क्वॉलिफाइड (योग्य) प्रोफेशनन्स (व्यावसायिक) हैं, जो कंपनियों (संघों) की जरूरत पूरी कर सकते हैं।

लोकसभा चुनाव: -

  • 2019 के लोकसभा चुनाव में हर वोटर (मतदाता) यह जान सकेगा कि उसने जिस उम्मीदरवार को वोट दिया है, वह उसी को मिला है या नहीं। क्योंकि इन चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक (विद्युत संबंध) वोटिंग (मतदान) मशीन (यंत्र) (ईवीएम) के साथ लगने वाली वोट (मत) वैरिफिकेशन (सत्यापन) पेपर (कागज़) ऑडिट (परीक्षण) ट्रेल (निशान) (वीवीपैट) मशीनों (यंत्रो) का इस्तेमाल किया जाएगा। इन मशीनों को खरीदने के लिए चुनाव आयोग ने सरकार से 3, 174 करोड़ रुपए की मांग की थी। इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी। पिछले दिनों ईवीएम से छेड़डाड़ की संभावनाओं पर विवाद के बाद चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को पत्र लिखा था और 2019 के लोकसभा चुनाव में वीवापैट मशीनों के इस्तेमाल की बात कही थी। इस खरीद के बाद हर ईवीएम के साथ वीवापैट मशीन जोड़ी जाएगी।
  • चुनाव आयोग ने जून 2014 में ही तय कर लिया था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सभी मतदान केंद्रो पर वीवापैट मशीनों का इस्तेमाल किया जाएगा। यह फैसला देश में चुनाव सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। क्योंकि वीवापैट मशीनों के इस्तेमाल से भविष्य में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पूरी तरह पारदर्शिता आने की उम्मीद है।

सेकंड (क्षणभर) -

  • वीवापैट यानी वोट (मत) वैरिफिकेशन (सत्यापन) पेपर (कागज़) ऑडिट (परीक्षण) ट्रेल (निशान) । इसे ईवीएम के साथ जोड़ा जाता है। वोटर (मतदाता) जैसे ही किसी प्रत्याशाी के पक्ष में ईवीएम का बटन (सदस्यता का चिन्ह) दबाता है, तो वीवापैट से पर्ची निकलती है। ईवीएम में लगी स्क्रीन (पर्दा) पर यह पर्ची 7 सेकंड (क्षणभर) तक दिखती है और सुरिक्षत हो जाती है। इस पर जिस प्रत्याशी को वोट दिया गया है, उसका नाम और चुनाव चिन्ह छपा होता है। ईवीएम में खराबी की शिकायत या दोबारा मतगणना की स्थिति में इन्हीं पर्चियों के जरिए दोबारा गिनती हो जाती है।

मशीन-

  • देश में लोकसभा चुनाव के दौरान करीब 16 लाख ईवीएम की जरूरत पड़ती है। लिहाजा इतनी ही वीवापैट मशीनों की भी आवश्यकता होगी। इसलिए चुनाव आयोग ने सरकार से 3, 174 करोड़ रुपए की मांग की थी। अभी चुनाव आयोग के पास कितनी वीवापैट मशीनें हैं, इसकी जानकारी नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने केंद्रीय चुनाव आयोग और दिल्ली राज्य चुनाव आयोग को नोटिस (सूचना देना/आज्ञा) जारी कर दो दिन में वीवापैट की उपलब्धता की जानकारी मांगी।

वीवापैट मशीन का उपयोग-

  • देश में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (विद्युत संबंधी) लिमिटेड (सीमित) और इलेक्ट्रॉनिक (विद्युत संबंधी) कॉरपोरेशन (निगम/संघ) ऑफ (के लिये) इंडिया (भारत) लिमिटेड (सीमित) ने वीवापैट मशीन 2013 में डिजाइन (रूपरेखा) की। सबसे पहले इसका इस्तेमाल नागालैंड के चुनाव में 2013 में हुआ था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने वीवापैट मशीन बनाने और इसके लिए पैसे मुहैया कराने के आदेश केंद्र सरकार को दिए थे।
  • 33, 500 वीवापैट मशीनें बनाई बीईएल ने 2016 में। इनका इस्तेमाल इसी साल गोवा विधानसभा चुनाव में किया गया। 20 पोलिंग बूथों (मतदान-स्थल या कमरा) पर यूपी चुनाव में इस साल वीवापैट वाली ईवीएम के जरिए मतदान हुआ था। हाल में हुए 5 राज्यों के विधानचुनाव में 52, 000 वीवापैट का इस्तेमाल किया गया।

विदेश शिक्षा: -

  • शिक्षा के लिहाज से वर्ल्ड (विश्व) बेस्ट (सबसे अच्छा) सिटी (शहर) की रैकिंग (बटोर) तय करने वाली चर्चित एजेंसी (संस्था) क्यूएस ने टॉप (उच्चतम) -5 सिटी (शहर) में इस बार मॉन्ट्रियल, पेरिस, लंदन, सियोल और मेलबर्न को शामिल किया है। 2017 में विदेशी छात्रों के लिए इन शहरों को सबसे बेहतर माना गया है। पेरिस एक पायदान नीचे गिरकर दो पर आ गया तो मॉन्ट्रियल छह पायदन का जंप (बढ़ना) लगाते हुए नंबर एक पर पहुंच गया। एजेंसी (संस्था) की ओर से बेहतर शहर का निर्धारण यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) में विदेशी छात्रों को खपाने की क्षमता, अच्छे अनुभव, नौकरी, शिक्षा की गुणवत्ता और फ्रेंडली (मैत्रीपूर्ण) माहौल के आधार पर तय किया गया है।
  • ग्लोबल (विश्वव्यापी) एजुकेशन (शिक्षा) के दौर में शैक्षिक संस्थानों और शहरों का स्ट्‌ेटस (राज्य) वर्ल्ड (विश्व) रैकिंग (बटोर) से तय होने लगा है। दुनिया के बेहतर संस्थानों से शिक्षा हासिल करने की ख्वाहिश रखने वाले छात्र शहर और यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) की प्राथमिकता इसी आधार पर तय करते हैं। ऐसा करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि रेटिंग (श्रेणी) एजेंसियों (संस्थाओं) ने किन-किन मानकों के आधार पर शिक्षा के क्षेत्र में बेस्ट सिटी (सबसे अच्छा शहर) का निर्धारण किया है। ऐसा इसलिए क्योंकि विदेशी छात्र उन्हीं मानकों के आधार पर शहरों का चयन करते हैं।
  • 2017 में बेस्ट (सबसे अच्छा) फाइव (पांच) और टेन सिटीज (दस शहर) की वर्ल्ड (विश्व) रैंकिंग (बटोर/श्रेणी) क्यूएस ने जारी की है। क्यूएस टॉप (उच्चतम) -5 सिटीज (शहर) में इस बार अमरीका का एक भी शहर नहीं है, जबकि एशियाई देश दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल इसमें शामिल है। टॉप (उच्चतम) -10 में अमरीका का बोस्टन व जापान की राजधानी टोक्यो का नाम शामिल हैं।
  • छात्रों की नजरों में फ्रेंडली (मैत्रीपूर्ण) सिटी (शहर) के आधार पर मॉन्ट्रियल ने इस बार दुनिया के सभी शहरों को पीछे छोड़ दिया है। यहां तक कि लंदन, मेलबर्न, बर्लिन जैसे शहरों को भी।
  • मॉन्ट्रियल-क्यूएस-2017 की रैंकिंग (बटोर) में टॉप (उच्चतम) सिटी (शहर) का ओहदा हासिल कर मॉन्ट्रियल ने अमरीकी, ब्रिटिश, जापानी सहित फ्रांसीसी शहरों को चौंका दिया है। शिक्षा के मामले में यह लंदन या पेरिस की तरह प्रतिष्ठित नहीं है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय छात्रों ने अपने अनुभव के आधार पर इसे बेस्ट (सबसे अच्छा) सिटी (शहर) माना है। विदेशी छात्रों के लिए यह सबसे ज्यादा फ्रेंडली (मैत्रीपूर्ण) सिटी (शहर) है। यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) कैंपस (परिसर) में स्टूडेंट (विद्यार्थी) कैफे (लघु भोजनालय) 24 घंटे खुला रहता है। यहां का नाइट (रात) लाइफ (जीवन) छात्रों को आकर्षित करता है।
  • पेरिस-क्यूएस की बेस्ट (सबसे अच्छा) सिटी (शहर) रैंकिंग (बटोर) में शुरू से लेकर अब तक पेरिस नंबर वन पर रहा। पहली बार ऐसा हुआ है कि पेरिस दूसरे नंबर पर आया है। इसके पीछे मुख्य वजह छात्रों की नजर में शहर का लिविंग कॉस्ट (जीविका वर्ग) ज्यादा होना है। यहां के शैक्षिक संस्थानों से पढ़ाई करना छात्रों का सपना होता है। पढ़ाई के बाद कॅरियर (पेशा) के मामले में भी छात्रों को इस शहर से काफी मदद मिलती है। यहां की डिग्री (उपाधि) को फ्रांस सहित दुनियाभर के नियोक्ता प्राथमिकता देते हैं, जो बेहतर कॅरियर (पेशा) के लिहाज से कारगर साबित होता है।
  • लंदन-शहर के कुल छात्रों में से 41 प्रतिशत छात्र बाहरी हैं। इसमें ब्रेग्जिट (ब्रिटेन के यूरोपियन संघ छोड़ने की प्रक्रिया को ब्रेग्जिट कहा गया है।) रेफरेंडम (जनमत संग्रह) के बाद ज्यादा गिरावट नहीं आई है। रूम (कमरा) रेंट (भाड़ा) और लिविंग (जीविका) कॉस्ट (वर्ग) ज्यादा होने के बावजूद लंदन दो पायदान ऊपर चढ़कर तीसरे नंबर पर आ गया। फ्रेंडली (मैत्रीपूर्ण) सिटी (शहर) के मामले में इस बार पिछड़ गया। ब्रिटिश सरकार की ट्रांसनेशनल (अनुवाद) शिक्षा नीतियों के कारण लंदन आज भी छात्रों की नजर में बेस्ट (सबसे अच्छा) एजुकेशन (शिक्षा) सिटी (शहर) है। हालांकि ईयू से अलग होने के निर्णय से इसके प्रति विदेशी छात्रों का नजरिया पहले जैसा नहीं रहा।
  • सियोल- सियोल कारोबारी और सांस्कृतिक केंद्र है। यह शहर बौद्ध मंदिरों के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। यहां पर पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या 7 प्रतिशत है। यहां से स्नातक करने वाले छात्रों में से 86 प्रतिशत छात्र पीजी डिग्री (उपाधि), शोध एवं अनुसंधान का काम भी यहीं रहकर करना पसंद करते हैं। यह अनुपात दुनिया के किसी भी शहरों में सबसे ज्यादा है। छात्र मानते हैं कि मास्टर (महाशय) डिग्री (उपाधि) व कॅरियर (पेशा) के लिहाज से भी यह शहर बहुत अच्छा है।
  • मेलबर्न-लिविंग (जीविका) और टयूशन -फी (शिक्षा शुल्क) में तेजी से बढ़ोतरी के कारण यह शहर बेहतर शहरों की रैंकिंग (बटोर) में पिछड़ गया है। इसके बावजूद यह शहर विदेशी छात्रों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। इस शहर में 2, 20, 000 छात्र विदेशी छात्र हैं। छात्रों की कुल संख्या में विदेशी छात्रों की भागीदारी 5 प्रतिशत है। यह ऑस्ट्रेलियाई शहर खुले विचारों और नवाचार पर केंद्रित होने की वजह से छात्रों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

Table shows the QS Top 10 University 2016 - 17

Table shows the QS Top 10 University 2016 - 17

क्यूएस टॉप (उच्चतम) 10 यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) 2016 - 17

1

मैसाचुसेट्‌स इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) ऑफ (का) टेक्नोलॉजी (तकनीक) (एमआईटी), यूएस

2

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय), यूएस

3

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय), यूएस

4

यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) ऑफ (का) कैम्ब्रिज यूनाइटेड (संयुक्त) किंगडम (शासन क्षेत्र)

5

कैलिफोर्निया इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) ऑफ (का) टेक्नोलॉजी (तकनीक) (कालटेक), यूएस

6

यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) ऑफ (का) ऑक्सफोर्ड, यूनाइटेड (संयुक्त) किंगडम (शासन क्षेत्र)

7

यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) कॉलेज (महाविद्यालय), लंदन, यूनाइटेड (संयुक्त) किंगडम (शासन क्षेत्र)

8

स्विस फेडरल (राज्यों की परस्पर संधि संबंधि) इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) ऑफ (का) टेक्नोलॉजी (तकनीक), स्विटजरलैंड

9

इम्पीरियल (श्रेष्ठ) कॉलेज (महाविद्यालय), लंदन, यूनाइटेड (संयुक्त) किंगडम (शासन क्षेत्र)

10

यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) ऑफ (का) शिकागों, अमरीका

अमेरिका और उत्तर कोरिया: -

  • अमेरिकी युद्धपोत के कोरयाई प्रायदव्ीप की ओर बढ़ने के साथ ही उ. कोरिया ने अमेरिका को युद्ध की सीधी चेतावनी दे दी है। उसने कहा है कि वह अमेरिकी युद्धपोत कार्ल विंसन पर बम भी गिरा सकता है। यह विमान वाहक पोत कुछ विध्वंसकों के साथ उसी की ओर बढ़ रहा है। वहीं, चीन ने उ. कोरिया की सीमा पर 1, 50, 000 सैनिक तैनात कर दिए हैं। उसने उ. कोरिया पर परमाणु कार्यक्रम रोकने का दबाव बनाने के लिए अपना विशेष दूत दक्षिण कोरिया भेजा है।
  • उ. कोरिया के एक अधिकारी ने कहा कि उनका देश किसी भी उस तरीके से युद्ध को तैयार है जो अमेरिका चाहे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि युद्ध हुआ तो उसकी पूरी जिम्मेदारी अमेरिका की होगी। उसने कहा कि पहले हमला करने का एकाधिकार अमेरिका के पास नहीं है। हम भी कर सकते हैं।
  • उ. कोरिया की सुप्रीम (सर्वोच्च) पीपुल्स (लोग) कांग्रेस की बैठक शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि उ. कोरिया 15 अप्रैल को नए परमाणु कार्यक्रम की घोषणा कर सकता है। उस दिन देश के संस्थापक और वर्तमान शासक के दादा किम इल सुंग का जन्मदिन है। चीन ने कहा है कि अगर उ. कोरिया ने अब परमाणु परीक्षण किया तो वह उसके खिलाफ अमेरिका और दक्षिण कोरिया का साथ देगा। लेकिन उसने कहा कि उ. कोरिया की सुरक्षा की चिंताओं पर भी ध्यान देना होगा। विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ने आश्वासन दिया है कि वे किसी भी कार्रवाई से पहले राष्ट्रपति जिनपिंग को उसकी जानकारी देंगे।
  • अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उ. कोरिया मुश्किल चाहता है। उन्होनें कहा कि अगर चीन उसकी मदद नहीं करता है तो अमेरिकी अकेले ही उसकी मुश्लिक दूर कर देगा। उ. कोरिया के खिलाफ अपना रुख कड़ा करते हुए ट्रंप ने कहा-उ. कोरिया मुश्किल की तलाश में है। अगर चीन उसकी मदद का फैसला करता है तो बहुत अच्छा है। अगर नही ंतो हम उसके बगैर ही उसकी समस्या दूर कर देंगे। एक दूसरे जगह में ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई बातचीत का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अगर वे उ. कोरिया की समस्या हल कर देते हैं तो उनके लिए अमेरिका से व्यापारिक समझौता करना काफी फायदेमंद रहेगा।
  • अमरीका के साथ तनाव के बीच उत्तर कोरिया ने सेना का 85वां स्थापना दिवस मनाया। इस दौरान उत्तर कोरिया ने सैन्य अभ्यास के दौरान सबसे बड़ी फायरिंग (प्रहार करना) ड्रिल (प्रशिक्षण देना) कर ताकत का प्रदर्शन किया। फायर ड्रिल के दौरान कई निशाने साधे गए। वहीं उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने आर्टिलरी (तोपखाना) यूनिट्‌स (इकाई), नौसेना, वायुसेना और टॉरपीडो (जहाज़ तोड़ने का गोला) का निरीक्षण किया। उत्तर कोरिया के मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) और न्यूक्लियर (नाभकीस) प्रोग्राम (कार्यक्रम) के चलते इलाके में तनाव बना हुआ है। अमरीका ने हमले की धमकी भी दी है।
  • उत्तर कोरिया की सीमा से सटे इलाके में अमरीका व दक्षिण कोरिया के 2000 सैनिकों ने लाइव (साीधा) फायर (प्रहार करना) ड्रिल (प्रशिक्षण देना) की। अभ्यास के दौरान बिल्कुल युद्ध जैसे हालात पैदा किए गए। इस दौरान नकली लक्ष्यों को निशाना बनाया गया।
  • इसी बीच अमरीका ने चीन के विरोध के बावजूद दक्षिण कोरिया में एंटी (प्रतिकूल या विरोधी अर्थ का उपसर्ग) बैलेस्टिक (वायु में फेंका हुआ) मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) सिस्टम (व्यवस्था) (थाड) की तैनाती शुरू कर दी है। वहीं जिस जगह पर डिफेंस सिस्टम (सुरक्षा प्रबंध) की तैनात की जा रही है, वहां स्थानीय लोगों ने विरोध किया है। थाड सिस्टम, बैलेस्टिक (वायु में फेंका हुआ) मिसाइलों (प्रक्षेपास्त्रों) को निशाने पर पहुंचने से पहले ही बीच रास्ते में नष्ट करता है। वहीं चीन ने इस फैसले पर विरोध जताया।

अमेरिका व उ. कोरिया-

  • के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। उ. कोरिया की परमाणु हमले की ताजा धमकी के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने उ. कोरिया की तरफ सबसे बड़ी न्यूक्लियर (नाभकीय) पनडुब्बी, जहाजी बेड़ा कार्ल विंसन और थाई मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) को तैनात कर दी है। उ. कोरिया पर अमेरिका की सबसे यह बड़ी सैन्य घेराबंदी है। उ. कोरिया ने 85वें सैन्य दिवस पर अब तक का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास कर इरादे जता दिए हैं। अगले दिन पलटवार करते हुए उ. कोरिया की बॉर्डर (सीमा) पर द. कोरिया, अमेरिका और जापान की सेना ने दशक का सबसे बड़ा संयुक्त युद्धाभ्यास किया।

Table shows the Nuclear Power Korea has an army of 1.2 million

Table shows the Nuclear Power Korea has an army of 1.2 million

न्यक्लियर (नाभकीय) पावर (शक्ति) उ. कोरिया के पास 12 लाख की सेना

आर्मी (सेना)

स्ख्याां

वायुसेना

संख्या

नेवी

संख्या

सैनिक

12 लाख

लड़ाकू विमान

458

विमानवाहक जहाज

0

टैंक (लकड़ी या धातु का बड़ा पात्र)

4200

ट्रांसपोर्ट (एक देश से दुसरे देश में ले जाना) एयरक्राफ्ट (वायुयान)

100

युद्धपोत

3

तोंपे

4300

हेलिकॉप्टर्स

202

लड़ाकू जलपोत

0

रॉकेट (अग्नि बाण) सिस्टम (व्यवस्था)

2400

लड़ाकू हेलिकॉप्टर्स

20

पंडुब्बी

70

दक्षिण कोरिया ने अमेरिका और जापान के साथ इस दशक का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास किया। संदेश दिया कि हम युद्ध के लिए तैयार हैं।

बैठक-

  • ट्रंप ने इस मुद्दे पर अचानक पूरी सीनेट (शासी सभा/राज्य सभा) को व्हाइट हाउस बुलाया है। रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने सदन को डिटेल (विस्तृत) जानकारी दी। चर्चा है कि उ. कोरिया पर हमले के लिए समर्थन जुटाने के लिए यह बैठक बुलाई गई। मिशिगन दुनिया की सबसे बड़ी न्यूक्लियर (नाभकीय) पनडुब्बी है। ये 154 टॉमहॉक मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) से लैस है। 1500 किमी मारक क्षमता है। अमेरिका ने चीन से कहा- वह सहयोगी उ. कोरिया को समझाए। नहीं तो हम एक्शन (कार्यवाही) लेंगे।

उ. कोरिया -

  • के परमाणु कार्यक्रम से क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है। क्योंकि तानाशाह किम जोंग सिविल कानून नहीं मानता है। किम जोंग ने हफ्ते में 4 बार अमेरिका पर परमाणु हमले करने की धमकी दी है। साल 2017 में ही उसने तीन मिसाइलों (प्रक्षेपास्त्रों) के सफल परीक्षण किए। साल 2006 से अब तक वह 5 परमाणु परीक्षण कर चुका है। इस साल उसकी एक मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) जापान के समुद्री क्षेत्र में गिरी थी। इससे भी तनाव बढ़ा।

रूस और सीरिया: -

  • सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद और उन्हें मदद दे रहे रूस के खिलाफ कार्रवाई को लेकर जी-7 देशों में एक राय नहीं बन पाई। ब्रिटेन और अमेरिका के विदेश मंत्री को जर्मनी और इटली को सहमत करने में विफल रहे। जर्मनी और इटली ने इदलिब में रासायनिक हमले की जांच पूरी होने से पहले रूस और सीरिया के फौजी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई के प्रस्ताव को वीटो (रोक देना/निषेधाधिकार) कर दिया। अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने रूस और सीरिया को चेतावनी दी कि रासायनिक हमले जैसी कोई हरकत भविष्य में भी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि रूस असद या अमेरिका में से किसी एक को चुन लें। अब वे संभवतया को रूस का दौरा करेंगे। इससे पहले ब्रिटिश विदेशमंत्री बेरिस जॉनसन ने यस की प्रस्तावित यात्रा रद्द कर दी थी। जॉनसन ने जी-7 की बैठक में कहा कि यह नहीं कह सकते कि रूस को सीरिया में रासायनिक हमले की पहले से जानकारी थी। इससे पहले अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप ने जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल और ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा में से फोन पर बात कर सीरिया मुद्दे पर समर्थन मांगा था। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता शॉन स्पाइसर ने कहा था आइएस आतंकियों को तबाह करने में यस और अमेरिका साथ मिल कर काम कर रहे हैं।

भारत और श्रीलंका: -

  • के बीच आर्थिक परियोजनाओं में सहयोग के मुद्दे को लेकर समझौतो पर दस्तखत हुए। श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंहे और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच यहां कई मुद्दों पर बातचीत हुई। विदेश विभाग के प्रवक्ता गोपाल बागले ने इसकी जानकारी दी। एक अन्य में मोदी ने कहा, ’ विक्रमसिंहे के साथ समग्र बातचीत में भारत और श्रीलंका के रिश्तों को मजबूत करने पर बात हुई ताकि दोनों देशों के नागरिकों को लाभ हो सके। प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंहे पांच दिन की यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे थे। विक्रमसिंहे से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मुलाकात की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दोनों के बीच मुलाकात की जानकरी दी। प्रधानमंत्री मोदी जी मई में वेसाक दिवस समारोह में शामिल होने श्रीलंका जाएंगे।

शिमला: -

  • प्रधानमंत्री मोदी ने रीजनल (क्षेत्रीय) कनेक्टिविटी (संयोजकता) स्कीम (योजना) (आरसीएस) ’उड़ान’ का शुभारंभ किया। उन्होंने शिमला में दिल्ली के लिए उड़ान को हरी झंडी दिखाई। सरकार इस स्कीम (योजना) के जरिए रीजनल (क्षेत्रीय) कनेक्टिविटी (संयोजकता) को बढ़ावा देना चाहती है। इस स्कीम (योजना) में एक घंटे तक के उड़ान के लिए किराया 2500 रुपए से ज्यादा नहीं होगा।
  • सरकार ने पिछले साल अक्टूबर में इस स्कीम (योजना) का ऐलान किया था। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर कडप्पा-हैदराबाद और नांदेड़-हैदराबाद के बीच उड़ाने को भी वीडियो (चित्रमुद्रण) कांफ्रेसिंग (सम्मेलन) के जरिए हरी झंडी दिखाई। प्रधानमंत्री ने कहा कि दिल्ली-शिमला हवाई सेवा का किराया 2036 रु. होगा, जो टैक्सी (मोटरकार) के किराए से भी कम है। उन्होंने कहा -हम मानते थे कि हवाई सेवा सिर्फ राजा और महाराजाओं के लिए है। यह सोच बदलनी चाहिए। उन्होंने कहा- जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में राजीव प्रताप रूढ़ी नागरिक उड्‌डयन मंत्री थे तब मैंने महाराजा की जगह कार्टूनिस्ट (हास्य चित्र बनाने वाला) आर के लक्ष्मण के ’आम आदमी’ को एयर (उड़ान) इंडिया (भारत) का मैस्कट बनाने का प्रस्ताव दिया था।
  • अलांयस एयर शिमला और दिल्ली के बीच उड़ान सेवाएं देगी। यह एयर (उड़ान) इंडिया (भारत) की सहायक कंपनी (संघ) है। दिल्ली जाने के लिए शिमला कें विमान में 12 यात्री सवार हुए। इस विमान पर अधिकतम 15 यात्री ही सवार हो सकते हैं। क्योंकि शिमला एयरपोर्ट (हवाईअड्‌डा) की लंबाई कम हैं। इसके अलावा तापमान और ज्यादा ऊंचाई के चलते भी इस रूट (रास्ता) पर इसी तरह के विमान का परिचालन संभव है।

क्षेत्रीय संपर्क-

  • बढ़ने पर देश के छोटे शहरों का भी विकास होगा। मोदी ने कहा कि इससे उत्तर-पूर्वी इलाके में भी कनेक्टिविटी (संयोजगकता) बढ़ेगी। इससे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा। अलग-अलग संस्कृति और परंपरा के लोग आपस में घुलमिल सकेंगे।

इस्तेमाल-

  • सरकार ने आरसीएस स्कीम (योजना) के तहत देश के ऐसे 45 हवाई अड्‌डों का इस्तेमाल करने जा रही है, जो बेकार पड़े हैं या जिनका पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। मोदी जी ने कहा कि आजादी मिले 70 साल हो गए, लेकिन हमारे पास सिर्फ 70 - 75 हवाईअड्‌डे हैं। उन्होंने ऑपरेटरों (प्रवर्तक) को नांदेड़ साहिब, अमृतसर साहिब और पटना साहिब को जोड़ने वाले सर्कुलर (घूमने वाला/लोगों का मंडल) रूट (रास्ता) के बारे में विचार करने को कहा। इससे दुनिया भर के सिख पर्यटक भारत आना चाहेंगे।
  • हिमाचल के आगामी विधानसभा और नगर निगम शिमला के चुनावों के लिए हवा यूपी, उत्तराखंड और दिल्ली से आ रही है। यह बात पीएम मोदी ने हिमाचल प्रदेश के शिमला में रैली को संबोधित करते हुए कहा। उन्होंने कहा, एक समय था कि पहाड़ों से हवा जाती थी, लेकिन अब यूपी, उत्तराखंड और दिल्ली की ताजा हवा हिमाचल से आ रही है। इस हवा में भाजपा विधानसभा से लेकर नगर निगम शिमला के चुनावों को जीतेंगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि ईमानदारी में देश के युवा साथ दे रहे हैं। हिमाचल के युवा भी बेईमानों लड़ाई में मेरा साथ देंगे। अब ईमानदारी का युग है, जिन्होंने गरीबों का पैसा लूटा है, उन्हें वह पैसा वापस करना होगा। केंद्र सरकार के दो प्रोजेक्ट (परियोजना) के लिए यहां आया हूं। नए इंडिया (भारत) की नींव शिमला से रखी है। मध्यम वर्ग के नागरिक और माध्यम वर्ग के शहर ही अब भारत को बदलेंगे। महज उन्हें दिशा देने की जरूरत है। मेरा सपना है को जो सुविधाएं अमीरों के लिए बनी है, वह हर गरीब को मिलनी चाहिए।

अमेरिका, चीन, उ. कोरिया व एशिया: -

  • हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) के ग्राहम एलिसन का अध्ययन काफी चर्चित है। उसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि कोई उभरती शक्ति पहले से स्थापित शक्ति को चुनौती देती है। यही सबसे बड़ी भूल होती है। बढ़ती हुई शक्ति को खुद पर बहुत ज्यादा आत्मविश्वास हो जाता है, उसे लगता है कि वह सबकुछ कर सकती है। एलिसन लिखते हैं- जब ऐसा होता है, तब बड़ी त्रासदी से इनकार नहीं किया जा सकता। इस अध्ययन में इतिहास की उन 16 में से 12 ऐतिहासिक घटनाओं का जिक्र है, जो पिछले 500 वर्षा में हुई हैं। उनके निष्कर्ष में ’युद्ध’ ही थे, जो त्रासदी से कम नहीं थे। चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के लिए यह एक अलग तरह की बात हो सकती है, क्योंकि चीन और अमेरिका को ही एक-दूसरे का प्रतिदव्ंदव्ी कहा जाता है। यहां हालात अलग हैं। एशियाई ताकतों के इतिहास पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गौर नहीं करेंगे। यह ऐसी स्थिति की बात है, जब एक पक्ष का व्यवहार उग्र हैं। चीन ने दक्षिण चीन सागर में भारी सैन्य विकास किया, जिस पर अमेरिका समेत कई देशों ने आपत्ति जताई है। उ. कोरिया और अमेरिका के बीच व्याप्त चुनौती के मद्देनजर अमेरिका-चीन को चाहिए कि वे बेहतर सहयोग दिखाएं। दोनों ही देशों के अपने हित हैं, उनमें सबसे बड़ा और और महत्वपूर्ण है व्यापार। लेकिन, बड़ी चिंता उ. कोरिया है।
  • वर्तमान में चीन में जो विदेशी कंपनियां (संघ) व्यवसाय कर रही हैं, उन्हें पहले ही निराशा का सामना करना पड़ रहा है। इस वातावरण में नई समस्या उ. कोरिया है। कारण है उसका परमाणु एवं मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) कार्यक्रम। अमेरिका ही नहीं, चीन भी चाहता है कि उ. कोरिया परमाणु कार्यक्रम रद्द कर दे। अमेरिका के प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र ने उ. कोरिया पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। आधिकारिक तौर पर चीन और उ. कोरिया सहयोगी हैं, लेकिन चीन उसके लड़ाकू रवैये से चिंतित है। ऐसी स्थिति में चीन को जिम्मेदार देश रवैया अपनाते हुए अमेरिका का साथ देना चाहिए। दक्षिण कोरिया अपने यहां अमेरिकी मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) प्रणाली जैसे हथियार स्थापित करने की मंजूरी अमेरिका को दे चुका है। उसके बाद अमेरिका उ. कोरिया ही नहीं, चीन पर भी अंदर तक नज़र रख सकेगा।

अमेरिका और चीन-

  • ऐसा भी नहीं है कि चीन और अमेरिका एक-दूसरे को दुश्मन की नजरों से ही देखते हैं। कुछ ही दिन पहले चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने ट्रंप से उनके निजी रिपोर्ट (विवरण) में मुलाकात की थी, जिसे उनके बीच सहयोग की शुरुआत कहा जा सकता है। वर्तमान में चीन से अमेरिका को 382.5 अरब डॉलर (अमेरिका, फ्रांस आदि देशो की प्रचलित मुद्रा) का निर्यात होता है, जबकि अमेरिका से चीन 115.8 अरब डॉलर (अमेरिका, फ्रांस आदि देशो की प्रचलित मुद्रा) का निर्यात होता है। तीन लाख से अधिक चीनी छात्र अमेरिका के विश्वविद्यालयों में अध्ययन कर रहे हैं, जबकि 22 हजार अमेरिकी छात्र चीन में अध्ययन कर रहे हैं। सालभर में 26 लाख चीनी अमेरिका यात्रा करते हैं, लेकिन 21 लाख अमेरिकी ही चीन की यात्रा करते हैं। इन आंकड़ों से कहा जा सकता है कि दोनों देश गंभीर रूप से एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। उनके बीच कारोबार के अतिरिक्त अन्य क्षेत्र में भी सहयोग होता है। यही नहीं, अमेरिका में संपत्ति खरीदने वाले विदेशियों में आधे चीनी होते हैं।
  • यही कारण है कि दुनिया के कई देश चाहते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसे कई विषयों पर गौर करने के बाद ही कोई कदम उठाएं। कई अमेरिकी सवाल उठाते हैं कि उनके देश को खुला मैदान क्यों बना दिया गया है, खासतौर से चीनीयों के लिए। ऐसी स्थिति में अगर चीन यह सोचता है कि उसे जिम्मेदार देश की तरह रवैया अपनाना चाहिए। चीन को यह नहीं भूलना चाहिए कि एशिया आज भी अपने यहां अमेरिकी मौजूदगी चाहता है। इसलिए जरूरी है कि अमेरिका और चीन एक-दूसरे के प्रति सहयोग की भावना ही मजबूत करें और उ. कोरिया के कारण तनाव की स्थिति का मिल-जुलकर समाधान निकालें।

- Published/Last Modified on: May 22, 2017

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