उच्च बीस समाचार(Top Twenty News - in Hindi) Part - 1 Oct 2017 (Download PDF)

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नेपाल चुनाव: -लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पड़ोसी देश नेपाल में तय समय से पूर्व चुनावी बिगुल बज चुका है। जीत सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस बार गठबंधन कर चुनावी रण में उतरने की तैयारी की है। देखना दिलचस्प होगा कि ये चुनाव नेपाल में एक स्थायी सरकार दे पाते हैं या फिर एक बार वही ढाक के तीन पात।

नेपाल में राजनीति अखाड़े में एक बार फिर सियासी दांवपेचों की तैयारी की जा रही है। पिछले सप्ताह ही नेपाल के प्रधामंत्री शेर बहादुर देउबा ने मंत्रिमंडल विस्तार किया था। हैरत की बात यह है कि मंत्रिमंडल विस्तार के कुछ दिन बाद ही नेशनल (राष्ट्रीय) असेंबली (सभा) को भंग करते हुए प्रतिनिधि सभा और प्रांतीय सभा के चुनावों की घोषणा कर दी गई। नेपाल में चुनावी प्रक्रिया शुरू भी हो गई है। यह पहली बार होगा जब नेपाल में लोकतंत्र बहाली के बाद चुनाव होने जा रहे हैं। इससे पूर्व जो भी चुनाव हुए वे या तो राजतांत्रिक प्रणाली के तहत हुए या पुराने संविधान के अंतर्गत। वर्ष 2015 में नया संविधान पारित होने के बाद नेपाल पूर्णत: लोकतांत्रिक देश बन चुका है। अब इसे रिपब्लिक (गणतंत्र) ऑफ (के) नेपाल के नए नाम से जाना जाता है। नए संविधान के अनुच्छेद 84 के अंतर्गत नेपाल में दव्सदनीय व्यवस्था को अपनाया गया है। यानी एक राष्ट्रीय सभा और दूसरी प्रांतीय सभा। गौरतलब है कि राष्ट्रीय सभा की 275 सीटों पर चुनाव होने है। इनमें से 165 सीटों पर ’फर्स्ट (पहला) पोस्ट (पद) द (यह) पोस्ट (पद) ’ के जरिए चुनाव होने है। यानी अन्य देशों के चुनावों की तरह जिस उम्मीदवार ने सर्वाधिक मत प्राप्त किए वो ही जीत जाता है। वहीं शेष 110 सीटों पर चुनाव अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार करवाया जाएगा। अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाने का मुख्य उद्देश्य सदन में अल्पसंख्यक वर्ग खासकर महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। हालांकि नेपाल में अचानक चुनाव की घोषणा ने सभी को चौंका दिया है। मंत्रिमंडल विस्तार के बाद यह माना जा रहा था कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी।

मंत्रिमंडल विस्तार में कमल थापा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी के चार मंत्रियों को शामिल किया गया था। राजनीतिक क्षेत्रों में इस सियासी उलटफेर के अलग-अलग अर्थ लगाए जा रहे हैं। यह भी माना जा रहा है कि सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस को आशंका थी कि उनको समर्थन दे रही प्रमुख सहयोगी कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (राजनीतिक) ऑफ (के) नेपाल (माओवादी) किसी भी समय अपना समर्थन वापस ले सकती है। इससे नेपाल की जनता को फिर से राजनीतिक अस्थिरता की तरफ घकेला जा सकता है। इसका प्रमुख करण रहा पुष्प दहल कमल प्रचंड के नेतृत्व वाली कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) (साम्यवादी) पार्टी (राजनीतिक दल) ऑफ नेपाल (माओवादी) जिसे माओवादी सेंट्रल (केंन्द्रीय) भी कहा जाता है, का सत्ता में शामिल रहते हुए प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दल केपी ओली के नेतृत्व वाली कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) से चुनावी गठबंधन करना। राजनीतिक हल्कों और नेपाल की आम जनता द्वारा इस गठबंधन को राजनीतिक हल्को और नेपाल की आम जनता द्वारा इस गठबंधन को राजनीतिक अवसरवादिता बताते हुए सवाल उठाए जा रहे हैं कि एक राजनीतिक दल पक्ष और विपक्ष दोनों में एक साथ कैसे रह सकता है? यानी सत्ता में भी है और चुनावी फायदे के लिए विपक्ष से भी गठबंधन में है। उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले पुष्प दहल प्रचंड ने गठबंधन की शर्तों के अनुरूप यह कहते हुए प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया था कि मेरा नौ महीने का कार्यकाल समाप्त हो गया है और देउबा को प्रधानमंत्री बनाने में पूरा समर्थन दिया था। प्रचंड के इस कदम से उनकी लोकप्रियता में काफी इजाफा हुआ था और उन्हें नैतिकवादी बताया जा रहा था। लेकिन, इस गठबंधन ने प्रचंड की उस कुर्बानी को बौना साबित कर दिया और उनकी छवि एक अवसरवादी राजनेता की बना दी। यू ंतो नेपाल में सभी दल चुनावी जोड़-तोड़ की राजनीति में लिप्त हैं। नेपाल में इसी वर्ष अप्रेल-जून में स्थानीय निकाय चुनाव हुए थे। स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों के आधार पर सभी राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरणों की तरफ बढ़ने लगी। हालांकि इन चुनावों के केन्द्र में सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ा दल बनकर उभरी थी और वामपंथी दल पूरे नेपाल में खासकर तराई क्षेत्रों में काफी पिछड़ गए थे। प्रमुख मधेशी दल, फेडरेल (संघीय) सोशलिस्ट (समाजवादी) फॉरम (मंच) ऑफ (के) नेपाल दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा था। वहीं मधेशियों का दूसरा सबसे बड़ा दल राष्ट्रीय जनता पार्टी (नेपाल) तीसरे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई। इन नतीजों से वामपंथी दलों में बौखलाहट है। इसी परिप्रेक्ष्य में सभी प्रमुख वामपंथी दलों ने सम्मिलित होकर अपना गठबंधन बनाया। इसे कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) एलयांस नाम दिया गया। वहीं दूसरी ओर नेपाली कांग्रेस ने भी वाम दलों की चुनौती से निपटने के लिए लोकतांत्रिक गठबंधन बनाया। मधेशी राजनीति में एक-दूसरे की प्रमुख विरोधी रही राष्ट्रीय जनता पार्टी और फेडरेल सोशलिस्ट पार्टी ने भी एक साथ आकर मधेशी गठबंधन बनाया है। इन गठबंधनों से जो परिदृष्य उभर कर सामने आ रहा है उससे साफ होता है कि जो दल चीन के समर्थक है और भारत का विरोध करते रहे हैं वे एक साथ आ गए हैं। दूसरा जो उदारवादी गठबंधन बना है वह भारत का महत्व जानते हुए उससे अच्छे संबंध रखने का हिमायती है। अगर नेपाली साथ मिलकर चुनाव लड़ते तो जीत की संभावना ज्यादा होती। लगातार उतार-चढ़ाव के दौर के बाद समूचे क्षेत्र के लिए यह आवश्यक है कि नेपाल में एक स्थायी और लोकतांत्रिक सरकार बने जिससे वहां कि नागरिक शांति का जीवन व्यतीत कर सके।

प्रो. संजय भारद्वाज, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

पनामा पेपर्स की पत्रकार की हत्या: - पनामा पेपर्स से 52 देशों के भ्रष्टाचार उजागर करने वाली संस्था से जुड़ी पत्रकार की हत्या।

पनामा पेपर्स मई 2016 में सामने आए थे। इसके तीन महीने पहले ही माल्टा की पत्रकार डैफ्ने कैरुआना गैलिजिया ने दावा किया था कि माल्टा के प्रधानमंत्री जोसेफ मस्कट ने भी भ्रष्टाचार किए हैं। डैफ्ने ने अपने ब्लॉग (चिट्‌ठा) में लिखा था कि पीएम की पत्नी और उनके चीफ (मुखिया) ऑफ (के) स्टाफ (सदस्य) कीथ शेंब्री भी पनामा की एक कंपनी (संगठन) के मालिक हैं। अवैध रूप से धन के लेन-देन के लिए इस कंपनी का इस्तेमाल किया जाता है। डैफ्ने के खुलासे से माल्टा में सरकार हिल गई थी। जोसेफ को इस्तीफा देना पड़ा। फिर से चुनाव हुए। हालांकि इसमें जोसेफ फिर जीत गए थे। इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) मीडया (संचार माध्यम) ने डैफ्ने को ’वन-वूमेन (एक महिला) विकिलीक्स’ नाम दिया था। 17 अक्टूबर को 53 साल की डैफ्ने की कार को बम से उड़ा दिया गया। डैफ्ने किसी मीडिया (संचार माध्यम) संस्थान से नहीं जुड़ी थीं। सिर्फ ’रनिंग कमेंट्री (आखो देखा हाल) ’ नाम से ब्लॉग (चिट्‌ठा) लिखती थी। माल्टा की आबादी 4.5 लाख है, 4 लाख लोग डैफ्ने के ब्लॉग पढ़ते थे। 17 अक्टूबर को भी उन्होंने ब्लॉग लिखा था। इसमें कीथ शेंब्री के बारे में लिखा गया था। 2 बजकर 35 मिनिट पर डैफ्ने ने ये ब्लॉग अपडेट (नवीनीकरण) किया और कार लेकर निकली। इसके 35 मिनिट बाद ही कार में विस्फोट हो गया।

डैफ्ने के बेटे मैथ्यू भी पत्रकार हैं। उन्होंने सोशल (सामाजिक) मीडिया (संचार माध्यम) पर लिखा-’मेरी मां कानून और इसे तोड़ने वाले के बीच हमेशा खड़ी रहीं। इसलिए मारी गई। जब सिस्टम (प्रबंध) फेल हो जाता है तो ऐसा ही होता है। ऐसे में आखिरी तक लड़ने वाला व्यक्ति पत्रकार ही होता है………. और सबसे पहले मारा जाने वाला भी पत्रकार ही होता है। पीएम जोसेफ मस्कट, कीथ शेंब्री और पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। वही जिम्मेदार हैं।’

माल्टा के प्रधानमंत्री जोसेफ ने बयान जारी कर कहा कि हत्याकांड में उनका हाथ नहीं है। मस्कट ने कहा-’ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। डैफ्ने राजनीतिक और व्यक्तिगत तौर पर मेरी आलोचकों में से एक थीं। पर इन बातों का हत्या से कोई संबंध नहीं है।’

इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) मीडिया (संचार माध्यम) -

  • बीबीसी- डैफ्ने ने तथ्यों के आधार पर सरकार की जमकर आलोचना की। उनका ही असर था कि देश के पीएम को कुर्सी बचाने के लिए दोबारा चुनाव तक कराना पड़ा।
  • इंडिपेंडेंट (स्वतंत्रता) - बड़े स्तर पर चल रहा राजनीतिक भ्रष्टाचार सामने लाने के बाद डैफ्ने पर खतरा था। इसी वजह से उनकी हत्या कर दी गई।
  • माल्टा टूडे (आज) - डैफ्ने के अंदर एक बहुत बड़ी क्षमता थी। वो किसी मुद्दे पर लोगों को डिबेट (बहस) करने के लिए प्रेरित कर देती थीं। उनकी बातें सुनकर आप चुप नहीं रह सकते। यही उनकी पत्रकारिता की सफलता का राज था।
  • सीएनएन- माल्टा की राजनीति में जो भी भ्रष्टाचार है, उसे उजागर करने में सबसे पहले डैफ्ने का ही नाम लिया जाएगा। उनकी पत्रकारिता ने पूरे यूरोप को प्रभावित किया।

अमरीका और भारत: - अमेरिकी आईटी को भारत में काम करने के लिए अच्छा वातावरण मिल रहा है। इसके चलते वे लगातार यहां अपने कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि कर रही हैं। हाल ही में दुनिया की सबसे बड़ी आईटी कंपनी (संगठन) आईबीएम ने रिपोर्ट (विवरण) जारी की है, जिसमें पता चलता है कि अमेरिका से भी ज्यादा कर्मचारी उसके भारत स्थित परिसरों में काम कर रहे हैं। इसका मूल कारण कम लागत में अच्छी प्रतिभा मिलना है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने ऐसी कंपनियों की आलोचना करनी शुरू कर दी है।

दुनिया की सबसे बड़ी आईटी कंपनी आईबीएम के बारे में संभव है कि सभी को पता नहीं होगा कि कम्यूटिंग (संगणना) क्षेत्र में उसने कई बड़े आविष्कर किए हैं और वह भी माइक्रोसॉफ्ट और गूगल से बहुत पहले। मूल रूप से इस अमेरिकी कंपनी का 170 से अधिक देशों में कामकाज फैला है, इसके बावजूद भारत में उसके अमेरिका से भी ज्यादा कर्मचारी काम करते है। उसने दुनयाभर में गुरुत्वाकर्षण का केन्द्र भारत को बना रखा है, जो ’ग्लोबलाइजेशन (भूमंडलीकरण) ट्रेंड’ (प्रवृत्ति) का सबसे हाईटेक (उच्च प्रोद्यौगिकी) उदाहरण है। शायद इसलिए अमेरिका का ट्रंप प्रशासन आईबीएम के इस ट्रेंड (प्रवृत्ति) के खिलार्फ हो गया है।

कम्प्यूटिंग क्षेत्र के शुरूआती आविष्कार जैसे मैनफ्रेम (अधिसंसाधित्र), फ्लॉपी डिस्क आदि आईबीए ने ही किए हैं। उसके कार्यालय और कारखानें न्यूयॉर्क से लेकर सिलिकॉन वैली तक फैले है। पिछले दशक में आईबीएम ने एक कार्ययोजना बनाई और भारत को अपने कामकाज का केन्द्र बना लिया। आज भारत में उसके 1 लाख 30 हजार कर्मचारी काम करते हैं, जो कुल कर्मचारी संख्या के एक तिहाई हैं। अमेरिका ही नहीं, किसी भी देश की तुलना में इसके सबसे अधिक कर्मचारी भारत में है। यह कंपनी (संगठन) कम्प्यूटिंग (संगणना) एंड (और) मैनेजिंग (प्रबंध) स्तर पर कई तरह की सुविधाएं देती है एवं उत्पाद तैयार करती है। इसमें विजुअल (दृश्य) सर्च (खोज), आर्टीफिशियल (कृत्रिम) इंटेलिजेंस (बुद्धि) और सेल्फ ड्राइविंग (स्वयं चालक) कारों के लिए कम्प्यूटर (परिकलक) विजन (दृष्टि) भी शामिल है। कई नामी आईटी कंपनियां भी उसकी सेवाएं लेती हैं। उसके अंतर्गत एक कंपनी तो सिर्फ टीवी सीरीज ’सीसेम स्ट्रीट’ (गलियारा) तैयार करती है, जिससे अमेरिका में बच्चों को नया सीखने में मदद मिलती है।

भारत में आईबीएम की चैयरमैन (अध्यक्ष) (आपॅरेशन) (शल्यक्रिया) विनिता नारायण कहती हैं- आईबीएम इंडिया (भारत) का सही अर्थ है ’ आईबीएम का सूक्ष्म दर्शन’। भारत में कंपनी का कामकाज लागत कम बनाए रखने के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। लगातार पिछली तिमाही से राजस्व में कमी आ रही है। मुख्य कारोबार को रिफ्रैशन करने में संघर्ष करना पड़ा रहा है। इसमें कॉर्पोरेशन (निगम) एवं सरकार को आईटी सेवाएं प्रदान करना भी शामिल है।

वैसे आईटी उद्योग के लिए दूसरे देशों में नौकरी शिफ्ट करना नई बात नहीं है। ऑरेकल, डेल जैसी अन्य प्रमुख आईटी कंपनियां भी अमेरिका के बाहर कामकाज कर रही हैं। लेकिन, आईबीएम का मामला अलग है। अपने देश से ज्यादा कर्मचारी उसके दूसरे देशों में काम कर रहे हैं। वर्ष 2007 से लेकर अब तक भारत में उसने अपने कर्मचारियों की संख्या दुगनी की है जबकि अमेरिका में कटौती की है। वर्ष 2007 में जहां उसके 1 लाख 30 हजार कर्मचारी अमेरिका में काम करते थे, उनकी संख्या घटकर करीब 1 लाख पर आ गई है। रिसर्च (अध्ययन) फर्म (दृढ़/व्यवसाय-संघ) ग्लासडोर के अनुसार इसका एक कारण यह भी है कि अमेरिका की तुलना में भारत में उसे कर्मचारियों को कम वेतन देना पड़ता है। यह नौकरी पर भी निर्भर करता है।

आईबीएम को भारत में कम वेतन में अच्छी अंग्रेजी बोलने वाले प्रतिभाशाली कर्मचारी मिल जाते हैं। भारत सरकार एवं अन्य संस्थाएं बड़े पैमाने पर हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और आईटी सेवाओं की खरीदार हैं। पिछले वर्ष यहां 2, 500 अरब रुपए का करोबार इन सेवाओं के लिए हुआ था। हॉवर्ड विश्वविद्यालय में वैश्वीकरण एवं आप्रावसान पर शोध करने वाले एसोसिएट प्रोफेसर रोनिल हिरा के अनुसार आईबीएम भारत में जिस तहर कई तरह की सेवाएं दे रही है, उससे अच्छे वेतन वाले अमेरिकी नौकरी के लिए खतरा पैदा हो रहा है। यह जागने का समय है, यह केवल निचले स्तर वाले नौकरी की बात नहीं है, उच्च स्तर के नौकरी पर भी इसका खतरा बढ़ेगा।

अन्य दिग्गज आईटी कंपनियों ने भी भारत में अपने सैटेलाइट (उपग्रह) कैम्पस (परिसर) स्थापित किए हैं, इसके चलते अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ध्यान आईबीएम की तरफ आया है। उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में कंपनी पर आरोप लगाया था कि वह अमेरिकी नौकरी भारत भेज रही है, हालांकि कंपनी ने आरोप नकार दिए थे। उसके बाद से ट्रंप लगातार इस कंपनी की आलोचना करते रहे हैं। वे मानते हैं कि कई विदेशी अमेरिकियों से नौकरी छीन रहे हैं। अप्रैल में उन्होंने आदेश जारी करके एच-बी अस्थायी वीस कार्यक्रम रद्द करने की बात कही थी। उसके कारण कम वेतन वाले आईटी -नौकरी करने वले भारतीयों को परेशानी हुई। आईबीएम इस वीसा वाले कर्मचारियों में छठे नंबर पर है।

आईबीएम, डेल, ऑरेकल, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और सिस्को जैसी कंपनियों को भारत में अच्छा वातावरण मिल रहा है। यहां विविधता बहुत है और नियम आसान होने से कामकाज में उन्हें असानी होती हैं।

- Published/Last Modified on: November 1, 2017

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