उच्च बीस समाचार(Top Twenty News - in Hindi) Part - 2 Oct 2017 (Download PDF)

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अमेरिका: - लास वेगास के रूट 91 हार्वेस्ट फेस्टिवल (त्यौहार) में जब गोलियां चलनी शुरू हुई, तो वहां जमा हुए संगीत प्रेमियों को लगा कि यह लाउडस्पीकर (ध्वनि-विस्तारक यंत्र) की खराबी है। गोलिया रूकने तक यह आधुनिक अमेरिकी इतिहास का सबसे भीषण नरसंहार बन चुका था।

58 से ज्यादा मौते हुई और कम से कम 527 लोगों को गोलियां लगी। यह सब एक ऐसे इंसान ने किया, जिसके पास इसका कोई कारण या मकसद नहीं था। उसने 23 हथियार अपने होटल (सराय) के कमरे में जमा कर लिए और भीड़ पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाने लगा। उसके 12 राइफल वैध तरीके से खरीदे गए थे। वे हर सेकंड (क्षण) नौ राउंड (गोल) फायर (हमला) करने में सक्षम थे। ऐसा लड़ाई के मैदानों में भी कम ही देखने को मिलता है। साल दर साल सामूहिक नरसंहारों की घटनाएं नए रिकॉर्ड (प्रमाण) बन रही हैं, जबकि बंदूको से संबंधित प्रावधानों का मुद्दा सत्ता शीर्ष पर अटका हुआ है। इधर हथियार रखने का हिमायती पक्ष मौजूदा नियमों को भी कमजोर करने के तरीके निकाल रहा है। यह समस्या ऐसी नहीं है जिसका हल नहीं निकाला जा सके। नए प्रावधान इसकी भीषणता को कम कर सकते हैं। पहले ही फैसला लिया जा चुका है कि ग्रेनेड लॉन्चर (लड़ाई के जहाज की सबसे बड़ी नाव) आसानी से उपलब्ध न हों। हर मिनट 400 राउंड से ज्यादा फायर करने वाले हथियारों के मामले में भी इसे लागू किया जा सकता है। इस मामले में राजनीतिक मतभेद भी उतने गंभीर नहीं हैं। नेशनल (राष्ट्रीय) राइफल (एक प्रकार की बंदूक) एसोसिएशन (संघ) और उसके सहयोगियों का प्रभाव सीमित है। बंदूक रखने वालों का बहुमत इसको लेकर नियम-कायदों के पक्ष में है। रिपब्लिकन (गणतंत्र) पार्टी (दल) के कई सांसद भी अपने नजरिये में बदलाव का संकेत दे चुके हैं। दरअसल, समस्या बंदूक रखने के अधिकार से ज्यादा संबंधित भी नहीं है, यह मुद्दा कई तरह की आजादी से जुड़ा है। खतरनाक हथियारों पर बंदिशें लगाने की छोटी कोशिश को भी अमेरिकी नागरिक उनके अधिकारों को सीमित करने के रूप में देखते हैं। लेकिन लास वेगास जैसी घटनाओं से यह सोच जोर पकड़ने लगी है कि हथियार रखने पर बंदिशें होनी चाहिए।

इसके राजनीतिक पहलुओं को समझना थोड़ा मुश्किल है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (विश्वद्यािलय) के अध्ययन के मुताबिक अमेरिका में करीब 27 करोड़ बंदूक है। यह संख्या पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में डाले गए कुल वोटाें (मत) से भी ज्यादा है। ये हथियार देश की 30 फीसदी वयस्क आबादी के पास हैं। इनकी राजनीतिक ताकत की अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन सभी हथियार मालिक बंदिशों के खिलाफ नहीं हैं। जून, 2017 में हुए एक सर्वे में 94 फीसदी मतदाताओं ने बंदूक खरीदने वालों की पृष्ठभूमि की जांच का समर्थन किया था। इनमें 93 फीसदी रिपब्लिकन (गणतंत्रवादी) पार्टी (दल) के समर्थक भी थे। प्यू के एक सर्वे में 30 फीसदी बंदूक मालिकों ने इससे संबंधित प्रावधान कड़े करने की वकालत की। फिर भी खतरनाक हथियारों और पृष्ठभूमि की जांच से संबंधित कानून नही बन पा रहे हैं क्योंकि एक छोटा लेकिन प्रभावशाली समूह इनके विरोध में है। उसका तर्क है कि यदि मौजूदा कानून नरसंहारों को नहीं रोक सकते तो नए कानूनों के बेहतर होने की क्या गांरटी (भरोसा) है। इसमें तर्क से ज्यादा बड़ी बाधा राजनीतिक डर है। एनआरए जैसे संगठन राजनीतिज्ञों के चुनाव में हार के डर को भुनाते है। उसकी बात मानने वालों का समूह कड़े चुनावी मुकाबलों में निर्णायक हो सकता है। साल 2004 में बिल क्लिंटन द्वारा असॉल्ट राइफल पर लगाए गए प्रतिबंधों की समयसीमा खत्म होने के बाद गन राइटस (बंदूक अधिकार) को सीमित रखने का पक्षधर समूह नए कानून की प्रतीक्षा कर रहा था तो विरोधी पक्ष राज्यों में बंदिशों को कमजोर करने में लगा था। नेवादा में 38 फीसदी वयस्कों के पास बंदूक हैं, लोग वैध तरीके से उन्हें खरीद सकते हैं और मैग्जीन की क्षमता पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

लास वेगास की घटना के बाद भी पिटल हिल के नजरिये में कोई बदलाव नहीं दिखा है। सदन में डेमोक्रेटिक (लोकतांत्रिक) पार्टी (राजनीतिक दल) की नेता नैन्सी पेलोसी गन वायलेंस (बंदूक बल प्रयोग) पर एक स्थायी समिति बनाए जाने का अभियान चला रही हैं। रिपब्लिकन पार्टी के लिए भी इसका विरोध करना मुश्किल होगा। वे हथियारों से पैदा होने वाले स्वास्थ्य संबंधी खतरों के अध्ययन के लिए फंड (मूलधन) हेतु रिपब्लिक पार्टी को मनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें मदद की उम्मीद राष्ट्रपति ट्रंप से है। एनआरए ने उनके चुनाव अभियान पर 3 करोड़ डॉलर खर्च किए थे और पिछले 34 वर्षो में इसके अधिवेशन में शामिल होने वाले वे पहले राष्ट्रपति बने, लेकिन साल 2000 में उन्होंने लिखा था कि वे असॅल्ट राइफल पर प्रतिबंध के पक्ष में हैं। उन्होंने बंदूक खरीदने की प्रतीक्षा सीमा भी ज्यादा रखने की वकालत की थी।

एशियाई देश: - पिछले 21 सितंबर को वैज्ञानिकों ने एक नए तरह के मलेरिया की चेतावनी दी है जिस पर दवाओं का असर नहीं होता। कंबोडिया से शुरू होकर यह वियतनाम के दक्षिण हिस्सों तक पहुंच चुका है और दुनिया से मलेरिया को खत्म करने के प्रयासों में सबसे बड़ी मुश्किल बन सकता है। वर्ष 2008 में मेडिकल (चिकित्सा संबंधी) शोधकर्ताओं ने इस बीमारी की पहचान की थी, जिस पर मलेरिया की दवा आर्टेमिसिनिन का असर नहीं होता। यह दक्षिणपूर्व एशिया में पहली बार सामने आया। इसे सुपर (आश्चर्यजनक) मलेरिया नाम दिया गया। कंबोडिया और वियतनाम के अलावा थाईलैंड और लाओस में भी इसका असर देखने को मिला है। बैंकॉक के माहिडोल ऑक्सफोर्ड ट्रॉपिकल (उष्णकटिबंध प्रदेश) मेडिसन (चिकित्सा संबंधी) रिसर्च (अध्ययन) यूनिट (ईकाइ) के शोधकर्ताओं ने नए अध्ययन में बताया है कि अब इस बीमारी पर मलेरिया की दूसरी दवा पिपरेक्विन का भी असर नहीं होता। इस साल अप्रैल में वियतनाम के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि सुपर मलेरिया का असर पांच प्रांतो में है और यह मेकॉन्ग नदी घाटी क्षेत्र में फैल सकता है।

देश में 2015 में मलेरिया के चलते केवल तीन मौते हुई, लेकिन इस साल अब तक 19 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। शोधकर्ताओं को डर है कि यह बीमारी अफ्रीकी देशों में फैल गई तो समस्या गंभीर हो जाएगी। पूरी दुनिया में मलेरिया के चलते होने वाली मौतो का 92 प्रतिशत अफ्रीका में होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2030 तक इस बीमारी को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। जिस तेजी से सुपर मलेरिया का विस्तार हो रहा है, वह इसमें मुश्किले खड़ी कर सकता है।

अन्य देश के चुनाव: - वर्ष 2017 में यूरोपीय देशों में शुरू हुआ पॉपुलिज्म अब तक शांंयद ज्यादा असर नहीं छोड़ पाया है, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो मौजूदा व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। 24 सितंबर को जर्मनी में हुए चुनाव में भी मर्केल चांसलर के पद पर लगातार चौथी बार निर्वाचित हुई, लेकिन प्रवासियों का विरोध करने वाली और यूरोप को संदेह की निगाहों से देखने वाली अल्टरनेटिव (विकल्प) फॉर (के लिये) जर्मनी भी 1945 के बाद संसदीय चुनाव जीतने वाली पहली अति दक्षिणपंथी पार्टी बनी। ऐसा ही हॉलैंड और फ्रांस में भी हुआ। हॉलैंड में ग्रीट वाइल्डर्स और फ्रांस में मारिल ली पेन के नेतृत्व वाली पार्टियां चुनाव में दूसरे स्थान पर रही। दोनो ही पार्टियां (दलों) यूरोपीय संघ की विरोधी हैं।

स्पेन में बीते 1 अक्टूबर को कैटेलोनिया में आजादी के लिए जनमत संग्रह हुआ। अदालतें इस चुनाव को पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी थीं, लेकिन अलगावादी नेताओं ने इसे रद्द करने के सरकार के आदेशों को मानने से इंकार कर दिया। पुलिस ने दर्जनों नेताओं को गिरफ्तार किया, लेकिन इससे विरोध और बढ़ गया। खर्च कम करने के यूरोपीय संघ के निर्देश का विरोध करने वाली वामपंथी पार्टी पोडेमोस ने सोशलिस्ट (सामाजिक) पार्टी (दल) से प्रधानमंत्री को हटाने के अभियान में साथ आने की अपील की है ताकि नई सरकार के साथ कैटेलोनिया की आजादी के लिए बातचीत हो सके।

फ्रांस में मध्यवमार्गी और यूरोपीय संघ के समर्थक इमानुएल मैक्रों राष्ट्रपति चुने गए, लेकिन उनका चुनाव व्यवस्था के पक्ष में नहीं था। देश में वर्षो से सत्ता पर काबिज रही पार्टियों को इसमें पराजय का सामना करना पड़ा। मैक्रों की पार्टी केवल दो साल पुरानी है, लेकिन उनकी लोकप्रियता मई में 62 फीसदी से कम होकर अगस्त में 40 फीसदी रह गई। 23 सितंबर को जब उन्होंने श्रम सुधारों की घोषणा की तो पूरे देश में हजारों लोग इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए।

यूनाईटेड किंगडम में जून में हुए चुनावों में लेबर पार्टी इतनी सींटे जीत गई कि प्रधानमंत्री थेरेसा में की कंजर्वेटिव (अपरिवर्तनवादी) पार्टी (दल) का संसद में बहुमत खत्म हो गया। अब आशंका है कि विपक्ष ब्रेक्जिट के शर्तों में बदलाव के लिए दबाव बना सकता है। लेबर पार्टी जिन 162 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव जीती, उनमें मतदाताओ के बहुमत ने यूरोपीय संघ छोड़ने के पक्ष में वोट दिया था। ऐसे कोई संकेत नहीं है कि उनके नजरिये में कोई बदलाव आया है।

इटली राजनीतिक गतिरोध का शिकार है और अगले साल चुनाव होने की संभावना है। लेकिन इससे भी ज्यादा उम्मीद नहीं है। चुनाव के बाद भी या तो गठबंधन सरकार आएगी या फिर कॉमेडियन (हास्य अभिनेता) बेप्पे ग्रिलो की फाइव (पांच) स्टार (सितारा) पार्टी (दल) सत्ता में आएगी, जो यूरोपीय संघ की विरोधी है। दोनों की हालत में देश में राजनीतिक या आर्थिक-सुधारों की कोई संभावना नहीं दिखती। यहां समस्या का कारण अप्रवासियों का मुद्दा है, जो यूरोप के बाकी देशों में अब गंभीर नहीं रहा, लेकिन इटली के लिए चिंता का विषय है।

मीडिया (संचार माध्यम) में भी इन देशों में व्यवस्था में बदलाव के लिए अभियान चला रहे नेताओं को खूब चर्चा मिलती है। इसका कारण यह है कि उनकी सभाओं में खूब भीड़ जमा होती है। उनके समर्थक परिवर्तन चाहते हैं, जो अब तक उन्हें नहीं मिला।

अमेरिका वित्तमंत्री: - अमेरिका के वित्तमंत्री स्टीव मनुचिन के पिछले छह महीने कर व्यवस्था में प्रस्तावित सुधारों पर चर्चा के लिए होने वाली बैठकों में बीतें हैं। रिपब्लिकन पार्टी के एजेंडा (कार्यसूची) में शामिल इन सुधारों पर आम सहमति बनाने की उनकी कोशिशें अब तक कारगर नहीं हुई हैं, क्योंकि 25 सितंबर को उन्होंने जो प्रस्ताव सामने रखा, उसके प्रावधान ही पूरी तरह स्पष्ट नहीं है न ही उसमें भविष्य की कोई रूपरेखा है। मनुचिन के प्रस्ताव में कॉपोरेट (निगम) कर की दर 36 फीसदी से कम कर 20 फीसदी और कर की न्यूनतम दर को 10 फीसदी से बढ़ाकर 12 फीसदी करने का प्रावधान है। इसका लक्ष्य उन लोगों की तादाद बढ़ाना है जिन्हें कर नहीं देना पड़े। लेकिन इन प्रावधानों का अंतिम स्वरूप क्या होगा और इसका मध्य और निम्नवर्गीय लोगों पर असर क्या होगा, इसकी कोई चर्चा नहीं की गई है। कर में छूट ये संबंधित प्रावधान भी अस्पष्ट हैं। रिपब्लिकन पार्टी को इन सुधारों से काफी उम्मीदें हैं, लेकिन अगले साल की शुरूआत से पहले इसका स्वरूप स्पष्ट होने की कोई संभावना नहीं हैं। इससे पहले पार्टी को यह फैसला करना होगा कि वह क्या बदलाव करना चाहती है।

मनुचिन के लिए यह काम आसान नहीं है। वे अप्रैल, 2016 में ट्रंप के संपर्क में आए और नेशनल (राष्ट्रीय) फाइनेंस (वित्त) चेयरमैन (अध्यक्ष) बने। इसके कुछ सप्ताह बाद ही उन्हें वित्तमंत्री बना दिया गया। इसका कारण वित्तीय मामलो में उनकी विशेषज्ञता से ज्यादा राष्ट्रपति के साथ नजदीकी थी। कर सुधारों का सार्वजनिक चेहरा तो बनए गए, लेकिन यही उनके लिए मुश्किल भी बन रहा है। 21 अप्रैल को ट्रंप ने अचानक घोषणा कर दी कि मुनचिन एक सप्ताह के अंदर कर सुधारों से संबंधित प्रावधान सार्वजनिक कर देंगे। इसको पूरा करने में तमाम मुश्किले हुई। मुनचिन इसके बाद भी गलतियां करते गए। जून महीने में उनकी शादी के आयोजन की चमक-दमक और खर्च की अब भी चर्चा होती है। अधिकारी 21 अगस्त को चन्द्र ग्रहण देखने के लिए पत्नी के साथ उनके एयर फोर्स (हवाई सेना) विमान में यात्रा की भी जांच कर रहे हैं। उन्होंने हनीमून के लिए भी वायु सेना के विमान की मांग की थी, हालांकि बाद में यह मांग वापस ले ली।

कॉर्पोरेट (निगम) कर मेें छूट देकर राजकीय घाटे को बढ़ाना राष्ट्रपति के लोकप्रियतावादी मुद्दों से भी मेल नहीं खाता। वे खुले तौर पर इसकी प्रशंसा कर रहे हैं, लेकिल न्यूसिन की चिंताएं भी बढ़ा रहे हैं। ट्रपं अंत तक कॉर्पोरेट कर की दर 15 फीयदी रखने के पक्ष में थे जबकि इसे 20 फीसदी रखने का फैसला पार्टी पहले ही कर चुकी थी। ऐसे में संभावना यही है कि संसद में पार्टी के नेता इस मुद्दे को अपने हाथों में लेंगे। फिर मनुचिन का भविष्य क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है।

भारत: - भू जल के साथ देश की नदियों का पानी भी सूखता जा रहा है। लेकिन, यह भी देखने में आ रहा है कि कहीं-कहीं बाढ़ के हालात भी बन जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए हमें जल को सहेजना होगा। तो क्या नदियों को जोड़ने से हम ऐसा कर पाएंगे? क्या ऐसा करना सही उपाय है? या फिर, कुछ और भी करना होगा?

भारत में आधे से ज्यादा छोटी नदियां सुख कर मर गई हैं। अब तो चन्द बड़ी नदियां ही नाले के रूप में समुद्र में जाकर मिलती हैं। बड़ी नदियां भी अब केवल वर्षा के दिनों में ही समुद्र तक पहुंचती हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हमारी नदियों को सुखाने का काम जंगलों की कटाई के साथ ही शुरू हुआ है। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत की 98 प्रतिशत नदियां भू-जल से ही बनती और बहती है। जैसे-जैसे भूजल खाली होता है, वैसे ही नदियां सुख जाती हैं। इसके साथ ही सुखी नदियों को पुनर्जीवित करना बहुत कठिन नहीं है। यह बहुत ही सरल और आसान काम है। हम वर्षा के जल को मिट्‌टी को घोल कर अपने साथ बहा ले जाने से रोके। धरती का पेट शुद्ध पानी से भरना होगा। धरती का पेट भरते ही अंदर के जल दबाव से स्राव की बहुत सारी धाराएं मिलकर ही नदी का प्रवाह बनाती हैं। हमें नदियों को शुद्ध सदानीरा बनाकर भारत की खेती, व्यापार और जीवन को दुरूस्त करने के इस रास्ते पर चलना होगा। सवाल यह उठता कि इसके लिए क्या करना होगा? सबसे पहले तो हमें इस रास्ते पर चलने के लिए जहां पानी बरसता है और मिट्‌टी को साथ लेकर दौड़कर चलता है, उसे धरती का खुला पेट देखकर उसमें बैठा देना होगा। फिर उसको सूरज की नजर नहीं लगेगी अर्थात पानी उड़ेगा नहीं। जब वाष्पीकरण नहीं होगा तो धरती का पेट पानी से भर जाएगा। वही जल, धरती से निकरलर झरने का रूप लेकर, जल धारा बनाएगा और बहुत सारी जलधाराएं मिलकर नदियां बनाएंगी। पूरे भारत में इसी प्रकार का काम करने का संकल्प लिया है। जिन जिलो में सूखा है, वहां बीजापुर ’राष्ट्रीय जल सम्मेलन’ की जल घोषणाओं के प्रकाश में वर्षा जल को सहेजने का कार्य शुरू किया है। पूरे भारत देश में ’जल बिरादरी’ और ’जल जन जोड़ो अभियान’ के लोग बाढ़-सूखा मुक्त भारत बनाने के लिए अपने-अपने कार्य क्षेत्र में जुटे हुए हैं।

हमने भारत के सभी राज्यों में छोटी-छोटी नदियों पर एक-एक, दो-दो गावों में जल सरंक्षण के लिहाज से ’सामुदायिक विकेन्द्रित जल प्रबंधन’ के काम भी शुरू किए हैं। हमारा समाज देश भर में इस काम को अपना काम मानकर स्वयं करने लगा है। इस अनुभव को विस्तार देने के उद्देश्य से जल साक्षरता का एक राष्ट्रीय अभियान भी शुरू हुआ है। इसका पहला सम्मेलन कर्नाटक के बीजापुर में था और दूसरा सम्मेलन बुन्देलखंड में इसी साल नवंबर में होगा। लोगों को सूखा और बाढ़ मुक्त बनाने के लिए यह अभियान पूरे जोरों से देश भर में चलाया जा रहा है। समाज के सभी वर्गो को जल साक्षरता के लिए प्रशिक्षित करने का प्रशिक्षण कार्यक्रम भी भारत भर में शुरू किया गया है। इसके तहत उन्हीं कार्य क्षेत्रों में जा कर उन्हें जल सरंक्षण कार्य समझने, जल सहजने, जल के सभी पक्षों को लोगों को समझाने तथा जल के अतिक्रमण, प्रदूषण व शोषण को रोकने के लिए ’जल जुम्बिश’ योजना शुरू की गई है। इस जल जुम्बिश का नाम ’जल जन जोड़ो अभियान’ रखा है। इसकी शुरूआत का कारण बिल्कुल साफ है। देश के ज्यादातर इलाकों में सूखा या पानी की कमी अकसर देखने और सुनने को मिल रही है। हालात ये हो गए हैं कि सितंबर 2017 में ही तमिलनाडु और पूरा कर्नाटक सूखे की चपेट में आ गए। बुन्देलखंड क्षेत्र जिसमें उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिले आते हैं, केरल, गुजरात, महाराष्ट्र तेलगांना और छत्तीसगढ़ राज्य भी लगभग आधे से ज्यादा सूखाग्रस्त हैं। मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड, उड़ीसा व पश्चिम बंगाल आधे से कुछ कम सूखाग्रस्त हैं। प्राप्त रिपोर्टो (विवरण) के मुताबिक सितंबर के पहले सप्ताह में ही भारत के 254 जिले और 19 राज्य सूखा प्रभावित हो गए थे। यह सूखा, नदियों को जोड़कर मिटाया नहीं जा सकता है। सोच समझकर पर्यावरणीय दृष्टि से जहां उचित हो वहां नदियों को तालाबों से जोड़ना उचित है।

उदाहरण के तौर पर बुन्देलखंड क्षेत्र, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि राज्यों में नदियों को तालाबों से जोड़ना उचित होगा। इस कार्य में हमारा सरकारी खजाना खाली नहीं होगा। देश के गरीब से गरीब गांवों के लगभग सभी समुदायों को जीने के लिए अन्न, जल व काम मिलेगा। खेती व व्यापार के लिए जल के रूप में एक बड़ा सहारा भी उपलब्ध हो सकेगा। इस कार्य से जल विवादों में न केवल कमी आएगी बल्कि यह धीरे-धीरे करके मिटेगा अन्यथा बिना सोचे-समझे नदी जोड़ने के काम से तो जल विवाद बढ़ेगा ही। और इसलिए हमें जल संरक्षण का सामुदायिक प्रबंधन करना चाहिए। 21वीं शताब्दी के लिए इसकी आवश्यकता है। भारत में सुशासन के लिए देश का बाढ़ और सूखा मुक्त होना बेहद जरूरी है। इसके लिए तत्काल जुट जाना चाहिए। भारत बाढ़ और सूखा मुक्त देश बन सकता है। बाढ़ सूखों को सहवरण करने योग्य बनाया जा सकता है। हमें तत्काल मिलजुल कर भारत को बाढ़ व सूखा मुक्त बनाने के कार्य में जुट जाने की जरूरत है। इसी कार्य से भारत की सभी छोटी-छोटी नदियों के पेट में पानी रहेगा। सूखी नदियां पुन: जीवित होकर शुद्ध सदानीरा बन जाएगी।

राजेन्द्र सिंह, जल संरक्षण के लिए कार्यरत, सामुदायिक नेतृत्व के लिए रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित

कनाडा: - भारतवंशी जगमीत सिंह के कनाडा के एक प्रमुख राजनीतिक दल का मुखिया बनने पर जश्न मनाया जा रहा है। कनाडा के तीसरे सबसे बड़े राजनीतिक दल ’नेशनल (राष्ट्रीय) डेमोक्रेटिक (लोकतांत्रिक) पार्टी’ (एनडीपी) का प्रमुख बनने पर जगमीत सिंह ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खिया बटोरी। जंगमीत, पंजाब से कनाडा गए, वे एक सिख प्रवासी की संतान हैं। जगमीत सिंह की विजय से कनाडा को बहुनस्लीय देश के रूप में आगे बढ़ने में मदद मिलेगी। वे अब 2019 में होने वाले चुनाव में वर्तमान प्रधानमंत्री जस्टिन टुडू को प्रधानमंत्री पद के एक गंभीर उम्मीदवार के रूप में चुनाती देंगे। वे आगे की रेस (दौड़) में कहां तक पहुंच पाएगे यह आने वाले समय में ही पता चलेगा। पर इस समय एनडीपी सत्तारूढ़ लिबरल (उदार) पार्टी (दल) के लिए गंभीर चुनौती देने वाले दल के रूप में नहीं दिख रही। वर्ष 1972 से 1974 के बीच थोड़े समय के लिए एनडीपी संघीय सरकार में हिस्सेदार रही थी और उस सरकार का नेतृत्व पियरे टूडू कर रहे थे जो जस्टिन टूडू के पिता थे। वर्ष 2011 में एनडीपी को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा प्राप्त था पर अगले आम चुनाव में इसकी 59 सीटें कम हो गई जिससे यह अपना दर्जा बरकरार नहीं रख पाई। आगामी चुनाव से पहले जगमीत सिंह को श्वेत लोगों में आधार मजबूत करके खुद को गंभीर और स्वतंत्र पहचान वाले नेता के रूप में स्थापित करना होगा। उनके दल को अभी सिखों सहित अल्पसंख्यकों और हाशिए पर पड़े लोगों का अच्छा समर्थन मिल रहा है। जगमीत सिंह ने अभी भारतीय राजनीति पर ज्यादा कुछ नहीं बोला है पर वे मोदी के आलोचक के रूप में जाने जातें है मोदी जी ने 2015 में जब कनाडा की यात्रा पर थे तब उन्होंने कनाडा सरकार से भारत में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों का मुद्दा उठाने की मांग की थी।

भारत में ऑब्जर्वर्स (समीक्षा करना) का मानना है कि कनाडा की सरकार वहां खालिस्तान के समर्थन में चलने वाले अभियान के प्रति अनजान बनी रहती है। जगमीत सिंह ने एक प्रस्ताव का समर्थन करते हुए 1984 के सिख विरोधी दंगो को जनसंहार कहा था। यह वाकया अप्रेल के माह में हुआ था जब ओंटारियो प्रांतीय विधानसभा की एक सिख महिला सदस्य ने यह प्रस्ताव रखा था। यह महिला लिबरल पार्टी से थी। जगमीत सिंह के गृह राज्य ओंटारियों में जस्टिन टूडू ने खालिस्ज्ञतन समर्थकों के एक कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया था। वर्ष 2013 में जगमीत सिंह को भारत आने के लिए वीजा देने से इनकार कर दिया था। जगमीत सिंह ने यूपीए सरकार में मंत्री रहे कमलनाथ की कनाडा यात्रा के दौरान सक्रिय रूप से विरोध किया था। कनाडा में रहने वाले कई अन्य खालिस्तान से सहानुभूति रखने वाले और कार्यकार्ताआंे की भांति ही जगमीत सिंह 1984 के सिख विरोधी दंगों के मुद्दे को ’युद्ध अपराध’ या ’जनसंहार’ के रूप उठाते रहे हैं। जब ओंटारियों प्रांतीय विधानसभा में भारत विरोधी प्रस्ताव पारित हुआ था तब भारत सरकार ने कनाडा सरकार के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज करवाई थी पर भारतीय आपत्ति ज्यादा प्रभावनी नहीं रही। इसका एक कारण यह भी है कि कनाडा एक उदारवादी और सहिष्णु समाज माना जाता है जो खालिस्तान समर्थक कार्यकर्ताओं को पूरी आजादी देता है। भारत से अलग होने के चलते खालिस्तान आंदोलन जब कमजोर पड़ गया तो इसके अधिकतर नेता पश्चिमी देशों और कनाडा में गए। कनाडा जाने वाले नेताओं की संख्या सबसे ज्यादा रही। भारतीय मीडिया (संचार माध्यम) में ऐसी रिपोर्ट (विवरण) छपती रही है कि कनाडा में बड़ी संख्या ऐसे नेता जाते रहे है जिनका पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (शाखा) आईएसआई के निरंतर संर्पक बना हुआ है।

कनाडा के रक्षा मंत्री हरजीत सिंह भारत आए तो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिदर सिंहं ने यह कहकर उनका विरोध किया कि वे खलिस्तानियों से सहानुभूति रखते हैं। और उनसे मिलने से इनकार कर दिया। कुछ लोगों का मानना है कि यह दोनों की आपसी नाराजगी है पर इस बात का कुछ तो आधार होगा ही। इसके बाद में हरजीत सिंह ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी देश को तोड़ने वाले लोगों को बढ़ावा नहीं देते हैं। एक संघीय सरकार में मंत्री होने के नाते हरजीत सिंह के पास इस तरह का बयान देने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं था। भारत सरकार के लिए चिंता का विषय यह कि कनाडा सरकार ने अलगाववादी कार्यकर्ताओं और खालिस्तान समर्थकों की गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए है। जगमीत सिंह के विजय समारोह में खालिस्तान समर्थकों की सख्या ठीकठाक थी जिसमें सुखविंदर सिंह भी उपस्थित था जो आजाद खालिस्तान का समर्थक माना जाता है। कनाडा के जनप्रतिनिधि यह विश्वास रखते दिख रहे हैं कि भारत में सिखो के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव और अत्याचार किया जाता है, जो कि गलत है। कनाडा में खालिस्तानी संगठनों की अच्छी-खासी संख्या देखी जा सकती है और इनके कनाडा के प्रभावशाली नेताओं से संपर्क है जिसमें जगमीत सिंह भी शामिल है। बहरहाल जगमीत सिंह ने कहा है कि उनके साथ बचपन में नस्ल के आधार पर भेदभाव हुआ है और वो इसे ठीक करेगे पर ऐसे पूवाग्रहों को मिटाना इतना आसान भी नहीं है।

अतुल कौशिश, राजनीतिक टिप्पणीकार, तीन दशक की पत्रकारिता का अनुभव

फोर्ब्स: - फोर्ब्स की ओरसजारी भारतीय अमीरों की ताजा सूची में मुकेश और अनिल अंबानी के बीच 44 पायदान का फर्क है। सूची में मुकेश देश के सबसे अमीर शख्स हैं, वहीं अनिल 45 वें क्रम पर हैं, जबकि 12 साल पहले दोनों की संपत्ति लगभग बराबर थी। धीरूभाई अंबानी के दोनों बेटों की उम्र में सिर्फ दो साल का फर्क है, लेकिन सोच बिल्कुल विपरीत है। 12 साल पहले जब दोनों भाइयों ने अलग-अलग बिजनेस (कारोबार) शुरू किया, तब कहा जा रहा था कि भविष्य अनिल के हाथों में हैं। लेकिन बीते 12 सालों में कारोबार की दुनिया ने जो कुछ देखा वह बिल्कुल जुदा था। मुकेश तेजी से आगे बढ़े और अनिल की कारोबारी सोच मुनाफे में तब्दील नहीं हो सकती। नतीजन दोनों के बीच फासला 12 गुना बढ़ गया है।

कारण-

अनिल नये प्रयोगों और ग्लैमर (चमक/मोह) को देते हैं तरजीह

कहां से शुरू किया था दोनों ने सफर? - अनलि अंबानी ने 1983 में बतौर को -चीफ (मुख्य) एग्जियूकेटिव (प्रबंधक) ऑफिसर (अधिकारी) रिलायंस इंडस्ट्री (उद्योग) में काम शुरू किया था। पहली बार अनिल ने ही कंपनी (संगठन) की अंतरराष्ट्रीय बाजार में सार्वजनिक पहुंच बनाई। इसी की बदौलत उदारीकरण की शुरुआत के पहले 1991 में रिलायंस का विदेशी फाइनेंस (वित्त) मार्केट (बाजार) 12 हजार करोड़ रूपए तक पहुंचा। मुकेश 1981 में कंपनी (संगठन) से जुड़े और टेक्सटाइल (कपड़ा) बिजनेस (कारोबार) से शुरूआत की। उन्होंने 60 से ज्यादा निर्माण इकाइयों के साथ मैन्यूफैक्चरिंग (विनिर्माण) क्षमता 10 लाख टन प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 1.20 करोड़ टन प्रति वर्ष तक पहुंचाई।

अनिल जी का जीवन परिचय-

  • जन्म: 04 जून 1959-अनिल अंबानी चेयरमैन (अध्यक्ष), अनिल, धीरूभाई अंबानी ग्रुप (समूह)
  • कपनिंया-कंपनियां आरकॉम, रिलायंस कैपिटल (पूंजी), रिलायंस एनर्जी (ऊर्जा) और नेचुरल (प्राकृतिक) रिसोर्सेज (साधन), रिलायंस ब्राडकास्ट (प्रसारण) नेटवर्क (जाल पर कार्य) लिमिटेड (सीमित)
  • शिक्षा- विज्ञान में बैचलर (अविवाहित) डिग्री (उपाधि) । पेन्सिलवेनिया से एमवीए किया। कुल संपत्ति 20 हजार करोड़ रुपए।
  • परिवार–टीना अंबानी (पत्नी), दो बेटे अनमोल और अंशुल। 45 वें नंबर पर है अनिल अंबानी भारत के सबसे अमीरों की सूची में 75 हजार करोड़ रुपए के सरकारी रक्षा सौदे में है हिस्सेदारी विदेशी कंपनियों के साथ।

मुकेश जी का जीवन परिचय

भविष्य पर नजर रखते हैं मुकेश-

  • जन्म: 19 अप्रैल 1957 मुकेश अंबानी चेयरमैन (अध्यक्ष) और एमडी, रिलायंस इंडस्ट्रीज (उद्योग), कुल संपत्ति 2.50 लाख करोड़ रुपए
  • कंपनियां -रिलायंस इंडस्ट्रीज (उद्योग), रिलायंस पेट्रोलियम, आईपीसीएल व रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर (आधारिक संरचना) लिमिटेड (सीमित) ।
  • शिक्षा- कैमिकल (रासायनिक) इंजीनियरिंग (अभियंता) में बैचलर (अविवाहित) डिग्री (उपाधि) । एमबीए करने स्टेनफोर्ड गए, कोर्स (पाठयक्रम) पूरा नहीं किया।
  • परिवार- नीता अंबानी (पत्नी), दो बेटे आकाश और अनंत, एक बेटी ईश अंबानी

2005 के बाद कैसा रहा कारोबार? - 2005 में मुकेश-अनिल की कारोबारी राहे अलग हुई, तब आइआईएल की कुल संपत्ति लगभग 80 हजार करोड़ थी, जिसे दोनों भाइयों में बराबर बांटा गया। मुकेश के पास निर्माण, तेल रिफाइनरी और टैक्सटाइल (कपड़ा) जैसे कारोबार रहे, तो अनिल के हाथ टेलीकॉम, एनर्जी और इंटरनेट जैसे कारोबार आए। बीतें 12 साल में मुकेश ने अपने मूल कारोबार में मुनाफे को सूत्र बनाया। वहीं अनिल ने कई क्षेत्र में पैसा लगाया।

6 दशक का साथ, पर सोच अलग-

वह क्या है, जो अलग करता है अंबानी बंधुओं को एक-दूसरे से?

मुकेश अंतर्मुखी हैं और लोगों से मेलजोल में असहज रहते हैं। वहीं अनिल को ग्लैमर लुभाता है। मुकेश के लिए कारोबार ही पूरी दुनिया है, तो अनिल के लिए कारोबार अपनी सोच पूरी करने का जरिया। यानी मुकेश के लिए कारोबार लक्ष्य है, अनिल के लिए लक्ष्य तक पहुंचने का साधन। अनिल के दोस्तों का दायरा काफी फैला है, वहीं मुकेश की दोस्तियों में कारोबार तक सीमित हैं। मुकेश के उलट अनिल फिटनेस पर संजीदा है। अनिल से जुदा मुकेश में धीरूभाई की झलक है।

कैसे बढ़ता गया मुकेश का करोबार? -मुकेश ने अपने मूल कारोबार पर ध्यान दिया और जो नए कारोबार शुरू किए वे बड़े पैमाने पर शुरू किए। टैक्सटाइल (कपड़ा), ऑयल (तेल) और मैन्यूफैक्चरिंग (विनिर्माण) की मांग कभी कम नहीं होती और मुकेश ने इसकी का फायदा उठाया। वे लंबे समय के मुनाफे पर यकीन रखते है। इसलिए रिटेल (खुदरा), पेट्रोलियम और जियों तक में उन्होंने प्रतिदव्ंदव्यों को ऐसी चुनौती पेश की, जिसका कोई तोड़ नहीं था।

कहां चुके अनिल अंबानी फैसलों में? -अनिल की रिलायंस इंफ्रा के पास मुंबई मेट्रो समेत पॉवर (ताकत) संबंधी कई प्रोजेक्ट (परियोजना) हैं, लेकिन उसका कारोबारी मुनाफा एक दशक बाद मिलेगा। इससे पहले 2008 की मंदी ने भी अनिल को काफी झटका दिया। जनवरी 2008 में आरकॉम के शेयर 90 प्रतिशत की गिरावट के साथ 796 रुपए से 80 रुपए पर आ गए थे। इससे वे अब तक नहीं उबर सके हैं। विदेशी वित्त में भी उन्हें नुकसान उठाना पड़ा।

क्या फिर से एक हो सकते हें अनिल और मुकेश के कारोबार?

बीतें 12 सालो में यह सवाल कई तरह से सामने आया है। दोनों के कारोबार एक होते हैं, तो वे संयुक्त रूप से दुनिया के सबसे अमीर शख्स होंगे। हाल ही में अनिल अंबानी ने कहा था कि रिलायंस जियो और रिलायंस टेलीकॉम वर्चुअली (वास्तव में) एक साथ काम कर रही हैं। दोनों के परिवारों के बीच अभी दूरियां नहीं हैं। बीते साल राष्ट्रपति भवन में धीरूभाई अंबानी को मरणोपरांत दिए गए पदम पुरूस्कार से संबंधित कार्यक्रम के दौरान दोनों भाइयों ने करीब एक घंटे साथ वक्त बिताया। यानी दोनों के बीच 12 साल पुरानी कटुता अब नहीं रही।

- Published/Last Modified on: November 1, 2017

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