उच्च बीस समाचार(Top Twenty News - in Hindi) Part - 3 (Download PDF)

()

Download PDF of This Page (Size: 427.96 K)

भारत और ईयू: - आतंकवाद के मुद्दे पर यूरोपियन यूनियन (संघ) (ईयू) ने भारत का साथ देने की प्रतिबद्धता जताई है। यहां भारत-ईयू शिखर सम्मेलन में विश्व स्तर पर आतंक के खिलाफ मिलकर संघर्ष करने और निवेश, व्यापार, स्वच्छ प्रौद्योगिकी समेत आर्थिक क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। सम्मेलन के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया (संचार माध्यम) से कहा कि यूरोपीय संघ के साथ भारत की साझेदारी, रणनीतिक भागीदारी महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ मिलकर काम करने और इस पर सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर ईयू हमारे साथ है। 1962 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना के बाद भारत उससे कूटनीतिक संबंध स्थापित करने वाले अग्रणी देशों में था।

सम्मेलन में पीएम मोदी के साथ यूरोपियन काउंसिल (परिषद) के प्रेसिडेंट (अध्यक्ष) डोनाल्ड फ्रांसिस्जेको टस्क और यूरोपियन कमीशन (आयोग) प्रेसिडेंट (अध्यक्ष) जीन क्लाउडे जंकर के साथ काफी समय से लंबित मुक्त व्यापार संधि पर भी चर्चा हुई। इसमें रोहिंग्या संकट और कोरियाई प्रायदव्ीप में मंडरा रहे युद्ध के संकट सहित दव्पक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी विस्तार से बातचीत हुई।

भारत और ईयू ने स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के पालन की बात कही और इस संबंध में सुरक्षित, सस्ती और सतत ऊर्जा की साझी प्राथमिकताओं पर सहमति जताई।

इन पर हुए समझौते-

  • विमान संपर्क बढ़ाने पर।
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और अनुसंधान एवं नवाचार के क्षेत्र में आपसी सहयोग।
  • यूरोपीय निवेश बैंक के साथ ऋण करार।
  • आपसी विश्वास और समझ आधारित संबंधों को।

भारत-ऑस्ट्रेलिया: - भारत और ऑस्ट्रेलिया के शीर्ष अधिकारियों की संचालन समिति की नई दिल्ली में पहली बैठक हुई। इसमें आतंकवाद, साइबर अपराधों की रोकथाम और अंतरराष्ट्रीय अपराध मामलों में सहयोग बढ़ाने के मुद्दे पर बातचीत की गई। दौरान अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय अपराधों पर सहयोग बढ़ाने के करार किए गए। केन्द्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी बयान में बताया कि इस बैठक में मनी लॉन्ड्रिंग (काले धन को वैध बनाना) पर रोकथाम, कालेधन पर सूचना के आदान-प्रदान पर भी चर्चा हुई। दोनों देशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों (शाखाओ) के बीच मानव तस्करी, स्मगलिंग (तस्करी), ड्रग (दवा) तस्करी को लेकर सूचनाएं देने पर भी विमर्श किया गया। अप्रैल में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैलकम टर्नबुल की नई दिल्ली यात्रा के दौरान पीएम मोदी से चर्चा के दौरान इस पर सहमति बनी थी।

उ. कोरिया-दक्षिण कोरिया: - उ. कोरिया के हैकरों ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया के वार प्लांस को हैक किया है। इसमें दावा किया गया है कि उ. कोरिया के हाथ अमेरिका और दक्षिण कोरिया के वे दस्तावेज लगे हैं, जिनमें तानाशाह किम जोंग-उन सहित अन्य नेताओं की हत्या की साजिश रची गई है। दक्षिण कोरिया के सांसद री चेओल ही ने कहा कि उ. कोरियाई सेना के हैकरों ने पिछले साल अगस्त-सितंबर में दक्षिण कोरिया के रक्षांं मंत्रालय के इंट्रानेट में सेंध लगाई थी। हैकरों ने 235 जीबी डेटा हासिल किए थे, लेकिन करीब 10, 700 डाक्यूमेंट की ही पहचान हो पाई है। 80 प्रतिशत डाक्यूमेंट की पहचान करना बाकी है। इसमें दक्षिण कोरिया के सैन्य ठिकानों कोरिया और अमेरिकी सेना के संयुक्त युद्ध अभ्यास का ब्योरा भी है। री के अनुसार 2015 में बने ’ओपीएलएएन 5015’ नाम सीक्रेट प्लाल में दक्षिण कोरिया और अमेरिका की उ. कोरिया के खिलाफ युद्ध की पूरी योजना दर्ज है। दक्षिण कोरिया के रक्षांं मंत्रालय ने इसके इंट्रानेट में हैकरों के हमले की बात मानी थी।

उ. कोरिया और दक्षिण कोरिया: - उ. कोरिया ने दक्षिण कोरिया के चार पत्रकारों को देश का अपमान करने वाली एक किताब की समीक्षा के लिए मौत की सजा सुनाई है। सरकारी मीडिया (संचार माध्यम) ने इसकी जानकारी दी। कंजरवेटिव (अपरिवर्तनवादी) समाचार पत्र से चोसुन इलबो और डोग-ए इलबो नामक व्यक्तियों ने ”नार्थ (उत्तर) कोरिया कॉन्फिर्डशियल” (गुप्त) के कोरियाई संस्करण की समीक्षा की थी। सोल स्थित दो ब्रितानी पत्रकारों ने सबसे पहले वर्ष 2015 में इस किताब का प्रकाशन किया था।

उ. कोरिया में दैनिक जीवन में बाजार की बढ़ती भूमिका की विस्तृत जानकारी देते हुए इसमें बताया गया था कि कालाबाजारी के जरिए दक्षिण कोरियाई टेलीविजन नाटकों को वितरित किया जाता है और फैशन (चलन) सामग्री एवं केश सज्जाओं की दक्षिण कोरिया से नकल की जाती है। इसमें कहा गया कि जिन लोगों के कब्जे से दक्षिण कोरिया के टीवी नाटको वाली डीवीडी या यूएसबी बरामद की गई वे किसी भी परेशानी से बाहर निकलने के लिए अपने तरीके से प्रलोभन दे सकते हैं।

नॉर्थ (उत्तर) कोरिया और साउथ (दक्षिण) कोरिया-वॉशिंगटन और सियॉल के बीच नई सैन्य संधि हुई है, जिसे लेकर नॉर्थ कोरिया ने जोरदार आलोचना की है। नॉर्थ कोरिया ने अमेरिका की चेतावनी भरे शब्दों में कहा है कि पड़ोसी देश साउथ कोरिया के साथ इस सैन्य संधि को सीधे तौर पर युद्ध का आधार माना जाएगा। इस संधि के अंतर्गत साउथ कोरिया में अमेरिकी सेना को तैनात किया जाता है, जो पड़ोसी मुल्क नॉर्थ कोरिया को परेशान कर रहा है।

नॉर्थ कोरियाई सरकार का मुख्य पत्र रोडोंग सिन्मन ने कहा है कि इस प्रकार संधि से नॉर्थ कोरिया पर आक्रमण करने के लिए भ्रम को वास्तविकता में बदलने की साजिश रची जा रही है। अखबार ने लिखा है कि म्युच्युअल (आपसी) डिफेंस (रक्षा) संधि से युद्ध के लिए अमेरिका की लापरवाह को दर्शाता है। इस संधि से अब लग रहा है कि नॉर्थ कोरिया पर कभी भी युद्ध का बटन दबाया जा सकता है।

तानाशाह किम जोंग उन के इस अखबार ने आगे कहा कि इस संधि को बिना किसी विलंब खत्म किया जाना चाहिए। नॉर्थ कोरिया के अनुसार, यह संधि बताती है कि यदि अमेरिका या साउथ कोरिया में से किसी एक को बाहरी हमलों का सामना करना पड़ा तो एक-दूसरे की मदद के लिए ये देश आगे आएगा।

अमेरिका और साउथ कोरिया के बीच कोरियाई युद्ध के बाद पहली बार 1 अक्टूबर 1953 को सैन्य संधि हुई थी। इसके बाद नॉर्थ कोरिया और साउथ कोरिया के बीच कभी भी शांति के लिए संधि नहीं हुई, यानी दोनों देश आज भी युद्ध की राह पर ही खड़े हैं।

नॉर्थ कोरिया ने इससे पहले भी युद्ध की धमकी दी थी। डोनाल्ड ट्रंप ने ट्‌वीट कर जब प्योंगयांग के विनाश की आत कही थी तो नॉर्थ कोरिया ने यूएस के साथ करो या मरो युद्ध जैसे शब्दों का प्रयोग किया था।

अमेरिका और नॉर्थ (उत्तर) कोरिया-अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नॉर्थ कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन की जुबानी जंग ने युद्ध जैसी परिस्थितियां खड़ी कर दी है। दोनों ही देश एक-दूसरे को परमाणु हमले की धमकी तक दे चुके हैं। दरअसल, नॉर्थ कोरिया और अमेरिका की यह लड़ाई बहुत लंबी और पुरानी है, दोनों ही देशों ने दूसरे विश्व युद्ध से लेकर सालों से लड़ते हुए भयंकर नरसंहार मचाया है। आइए आपको बताते हैं आखिर क्या कारण है, जिस वजह से नॉर्थ कोरिया और अमेरिका की जंग थमने का नाम नहीं ले रही है।

विश्व युद्ध में अमेरिका ने तबाही मचाही थी। दोनों देशों के बीच 27 जुलाई, 1953 को जब युद्ध विराम हुआ, तक तक नॉर्थ कोरिया ने अपने 10 लाख 30 हजार नागरिक और सैनिक को खो दिए। उस दौरान 9.6 करोड़ आबादी वाले नॉर्थ कोरिया पर अमेरिकी विमानों में जमकर कहर ढाया था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह क्षेत्र सिर्फ कोरिया हुआ करता था और इस पर जापान का राज था। दूसरे युद्ध के दौरान अमेरिका ने जब जापान पर हमला किया तब कोरिया के उत्तरी और दक्षिण भाग पर भी जमकर तबाही मचायी थी। इस दौरान अमेरिकी विमानों ने नॉर्थ कोरिया पर करीब 6, 35000 टन वाले विस्फोटक पदार्थों से हमला किया था।

इस युद्ध के बारे में पूरा विश्लेषण करने के बाद प्रोफेसर चाल्मर्स ने हैरान करने वाली रिर्पार्ट जारी की है। अमेरिका और नॉर्थ कोरिया के बीच जारी जुबानी जंग अगर हथियारों के युद्ध में बदली तो भयंकर नरसंहार होने वाला है। सूत्रों की मानें तो नॉर्थ कोरिया की हरकतों को देखते हुए अमेरिका बड़े स्तर पर सैन्य कार्यरवाई कर सकता है। ब्रिटेन के डिफेंस (रक्षा) एंड (और) सिक्योरिटी (सुरक्षा) स्टडीज (अध्ययन करते हैं) के प्रोफेसर (आचार्य) माल्कम चाल्मर्स ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा है कि अगर दोनों देशों के बीच युद्ध भड़का तो खतरनाक परिस्थितिया होने वाली है। उन्होंने युद्ध की विभीषिक से हानेे वाले हैरानी भरे मौत के आंकड़े जारी किए हैं। प्रोफेसर चाल्मर्स की रिपोर्ट (विवरण) के अनुसार, अगर ट्रंप ने एक भी हमला किया तो नॉर्थ कोरिया की राजधानी सियॉल को बनाएगा, जिसमें अनगिनत लोगों की मौते हो सकती है। चाल्मर्स के अनुसार, इस युद्ध में नॉर्थ कोरिया एक हफ्तें में ही एक लाख लोगों में मौत के घाट उतार देगा।

इस युद्ध से लाखों लोगों को एक देश से दूसरे देश में पलायन होना पड़ेगा। इस युद्ध से लोगों को चीन और रूस में शरण लेनी पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि अगर किम जोंग उन ने एक भी न्यूक्लियर (नाभिकीय) बम छोड़ दिया तो युद्ध अपने अलग स्तर पर पहुंच जाएगा, जिसका नुकसान कल्पना से भी परे होगा।

देश की अर्थव्यवस्था: - देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती है। नोटबंदी और जीएसटी का प्रभाव अर्थव्यवस्था में अब दिखने लग गया है। बैंको का एनपीए लगातार बढ़ता जा रहा है और नियंत्रित नहीं हो पा रहा है। बैंको की माली हालात सुधारने के लिए बड़ी पूंजी की आवश्यकता है पर सरकार उतना उपलब्ध नहीं करा रही है।

देश की आर्थिक स्थिति में बड़ा विरोधाभास है। एक तरफ मुद्रस्फीति कम है। विश्व के आर्थिक हालात को देखते हुए विकास की दर अच्छी है। अच्छी मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार है। चालू और वित्तीय घाटा दोनों नियंत्रण में है। चालू वित्तीय घाटा तो मात्र 1 फीसदी के आसपास चल रहा है। दूसरी तरफ समस्या यह कि रोजगार में कमी आई है। विश्व बैंक (अधिकोष) अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) रिजर्व (आरक्षित) बैंक (अधिकोष) ने विकास की अनुमानित दर को कम किया है। रिजर्व बैंक ने पहले इसका अनुमान 7.3 फीसदी लगाया था जिसे अब 6.7 कर दिया है। रोजगार का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है रोजगार की स्थिति भयावह होती जा रही है। नोटबंदी और जीएसटी का प्रभाव अभी तक अर्थव्यवस्था पर बना हुआ है। इस प्रकार बड़ी विरोधाभास की स्थिति बनी हुई है। इस विरोधाभास का सबसे बड़ा कारण बैंकिंग (महाजन) सेक्टर (क्षेत्र) है। देश के बैंकिंग सेक्टर के हालात बहुत खराब है। खराब का मतलब यह है कि सरकारी बैंको को जो पूंजी सरकार से मिलनी चाहिए थी वो मिल नहीं पा रही हे। बैंको का एनपीए (गैर निष्पादित आस्तियां) लगातार बढ़ रहा है। एनपीए बढ़कर 9 लाख करोड़ से अधिक हो गया है। अभी जो पूंजी दी जा रही है वो ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है। सरकार बैंको का मर्ज कर रही है पर यह स्थायी समाधान नहीं है। यह केवल दर्द निवारक दवा की तरह है जो कुछ समय के लिए राहत दे सकती है। अभी रीयल (वास्तविक) इंटरेस्ट (ब्याज) रेट (कीमत) 4 फीसदी चल रही है। जो काफी उच्च है। अर्थव्यवस्था में बेहतरी के लिए हम इंडोनेशिया का उदाहरण ले सकते हैं जो करीब 23 करोड़ की आबादी वाला देश हैं। इस आबादी में से सिर्फ 1 करोड़ लोग ही टैक्स (कर) देने वाले है। इंडोनेशिया ने एमेंनेस्टी (आम माफ़ी) वॉलंटीयर (स्वयंसेवक) डिसक्लोजर (प्रकटीकरण) स्कीम (योजना) लागू की। इस स्कीम में 365 अरब डॉलर मिले जो वहां कि अर्थव्यवस्था की लगभग 40 फीसदी रकम है। हम भी कई बार डिसक्लोजर स्कीम लागू कर चुके हैं लेकिन अभी तक कुछ खास हासिल नहीं हुआ है।

अब देश को एक नई डिसक्लोजर स्कीम की आवश्यकता है। इस स्कीम में जुर्माना राशि कम से कम रखी जाए और इससे आने वाले पैसे का कुछ हिस्सा निश्चित समय तक सरकार इस्तेमाल के लिए अपने पास रखे। इस हिस्से पर 4 - 5 फीसदी ब्याज दिया जा सकता है। सिंगापुर और स्विट्‌जरलैंड के साथ आर्थिक संधियां हुई हैं जिससे वहां पर कालाधन रखना मुश्किल होता जा रहा है। कम जुर्माने और दूसरे देशों से संधियों के कारण स्कीम के सफल होने की संभावना अधिक है। पर जुर्माने की राशि अधिक रखी जाती है तो इसका हश्र पहले वाली स्कीम्स (योजना) जैसा हो सकता है। स्कीम से मिलने वाली रकम को दो क्षेत्रों में लगाया जाना चाहिए। एक तो आधारभूत ढांचे और दूसरा बैंको (अधिकोषों) में पूंजी डाली जाए। वर्तमान सरकार बनी तब उसने बैंक बोर्ड (परिषद) ब्यूरो (सरकारी विभाग) बनाया, बैंको मेें कई प्रोफेशनल (व्यावसायिक) लोगों को नियुक्त करके व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया। पर बैंक अधिकारियों में भय बैठा हुआ है और लोन (ऋण) को लेकर निर्णय नहीं लिए जा रहे हैं। इसका कारण तीन ’सी’ हैं। ये हैं सीबीआई, सीवीसी और सीएजी। इनके भय के कारण जो लोग ईमानदारी से काम करना चाहते हैं वो भी काम नही कर पा रहे हैं। जब तक बैंको में निर्णय लेने की क्षमता नहीं आएगी तब तक अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना मुश्किल होगा। तीसरा कारण है कि देश में ’मेक इन इंडिया’ की तो बहुत बात हो रही है लेकिन मेरा मानना है कि मेक इन इंडिया के साथ में ’डू इन इंडिया’ (भारत में क्या) भी होना चाहिए। जब वर्तमान सरकार का गठन हुआ था तब भारत सेवा क्षेत्र के सिरमोर के रूप में जाना जाता था पर अब ताइवान, मलेशिया जैसे छोटे-छोटे देशों से प्रतिस्पर्द्धा करनी पड़ रही है। डू इन इंडिया के जरिए सेवा क्षेत्र को आगे ले जाया जा सकता है जो मध्यम वर्ग का जन्मदाता रहा है। यदि वही क्षेत्र पीछे रहा तो देश को बड़ा नुकसान होगा। मौजूदा सरकार नई मामलों में खुश किस्मत भी रही है। वर्ष 2012 - 13 में कच्चे तेल का आयात 164 अरब डॉलर का था जो कच्चे तेल की दरें कम होने से 2016 - 17 में 83 अरब डॉलर रह गया। अब सरकार को बड़े निवेश का बड़ा हिस्सा दिया जाना चाहिए। जीएसटी के आने के बाद बड़े कृषि उत्पाद भंडार गृह बनाने की योजना लाई गई है। इसमें निवेश होना चाहिए। कृषि का उत्पादन तो अच्छा है लेकिन उत्पाद सड़ रहे है। कृषि क्षेत्र में जब तक बड़ा निवेश नहीं होता तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी। अर्थव्यवस्था अभी भी जीएसटी और नोटबंदी से नहीं उबर पाई है। जीएसटी के आने के बाद पहले दो क्वार्टर में इसका नकारात्मक असर दिखना ही था। यह आश्चर्य नहीं हैं। जीएसटी का प्रभाव मार्च तक बना रहेगा। मार्च के बाद स्थिति सुधार हो जाएगा। इसलिए बैंको का ऋण देने के मामले में भय दूर किया जाए। जब तक बैंक ऋण नहीं देेंगे तब तक निजी निवेश नहीं होगा। निजी निवेश नहीं होता तो रोजगार सृजित नहीं हो पाएंगे और ऐसी स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना बहुत ही मुश्किल होगा।

प्रो. गौरव वल्लभ, अर्थषास्त्री, एक्सएलआरआई, जमशेदपुर में अध्यापन

इजराइल: -अब इजराइल भी यूनेस्को से अलग होने जा रहा है। अमेरिका ने यूएन की सांस्कृतिक संस्था यूनेस्को से बाहर होने की घोषणा की थी। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि अमेरिका ने एक बहादुरी और नैतिकता भरा फैसला लिया है। क्योंकि यूनेस्को बेहूदेपन की नाटयशाला बन गया है। उन्होंने विदेश मंत्री को अमेरिका की तरह यूनेस्को से अलग होने की तैयारी शुरू करने का निर्देश दिया है। वहीं, अमेरिका के यूनेस्को से बाहर होने का फैसला 31 दिसंबर 2018 से प्रभावी होगा। तब तक अमेरिका यूनेस्को का पूर्णकालिक सदस्य बना रहेगा। इससे पहले अमेरिका ने यूनेस्को पर इजराइल विरोधी रूख अपनाने का आरोप लगाया था।

विदेश विभाग की प्रवक्ता हीथर नाउर्ट का कहना है कि यह फैसला यूं ही नहीं लिया गया है, बल्कि यह यूनेस्को पर बढ़ती बकाया रकम की चिंता और यूनेस्को में इजराइल के खिलाफ बढ़ते पूर्वाग्रह को जाहिर करता है। संस्था में मूलभूत बदलाव करने की जरूरत है। वहीं, यूनेस्को की प्रमुख इरीना बोकोवा ने अमेरिका के फैसले को यूएन परिवार के लिए निराशाजनक और क्षति बताया है।

वैसे तो यूनेस्को विश्व धरोहरों को संरक्षण देने के लिए मशहूर है, लेकिन उसका काम सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्था कई अन्य अहम काम भी करती है। विश्व धरोहरों को संरक्षण: यूनेस्को दुनिया भर में उन स्थलों की पहचान करती है। इसमें प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों तरह के स्थल शामिल होते हैं। अन्य काम-

  • अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस: यूनेस्को हर साल 8 सिंतबर को विश्व साक्षरता दिवस आयोजित करता है।
  • जागरूकता- होलोकॉस्ट जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा देने पर तेजी से काम किया है।
  • जलवायु परिवर्तन: यूनेस्को जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया में जागरूकता लाने का भी काम करती है।
  • भाषायी विकास: यूनेस्को दुनिया में भाषाओं के संरक्षण का काम भी करती है।

अमेरिका हर साल यूनेस्को को करीब 519 करोड़ रुपए देता है, जो उसके कुल राजस्व का करीब 22 फीसदी है। अमेरिका के यूनेस्को से अलग होने से उसे आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। इससे उसके रिसर्च (खोज) कार्यक्रम बंद हो सकते हैं।

नाराजगी- यूनेस्को ने वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम में गतिविधियों के लिए इजराइल की आलोचना की थी। इस पर अमेरिका और इजराइल ने नारजगी जताई थी। यूनेस्को ने पुराने हिब्रू शहर को फिलिस्तीन के विश्व धरोहर के रूप में मान्यता दी थी। तब इजराइल ने कहा था कि यूनेस्को के इस कदम ने यहूदियों के इतिहास को खारिज कर दिया गया है।

ट्रंप राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की ओर से यूएन को दी जाने वाली मदद पर नाराजगी दिखा चुके हैं। अमेरिका यूएन के सामान्य बजट का 22 प्रतिशत और पीसकीपिंग का 28 प्रतिशत बजट फंड (मूलधन) करता है।

अमरीका का संयुक्त राष्ट्र की संस्था एजुकेशनल (शिक्षात्मक) साइंटिफिक (वैज्ञानिक) एंड (और) कल्चरल (सांस्कृतिक) ऑर्गनाइजेशन (संस्थान) (यूनेस्को) से बाहर आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यूनेस्को लंबे समय से अमरीका की आंख का कांटा बना हुआ है। शीतयुद्ध के दौरान अमरीका यह संदेह करता रहा है कि पेरिस स्थित यह एजेंसी (शाखा) रुस समर्थित है। वर्ष 1984 में रोनाल्ड रीगन ने इसी आधार पर यूनेस्को से अमरीका के बाहर निकलने की घोषणा की थी। वर्ष 2002 में जॉर्ज बुश के समय में फिर वापसी हुई। वर्ष 2011 में बराक ओबामा प्रशासन ने फिलिस्तीन को सदस्य बनाने के विरोध में यूनेस्को को दी जाने वाली सहायता राशि में कटौती कर दी। अब अमरीका के यूनेस्को छोड़ने के बाद इजरायल ने भी यूनेस्को छोड़ने का ऐलान कर दिया। यूनेस्को डायरेक्टर (निदेशक) ने इन देशों के अलग होने पर गहरा दुख व्यक्त किया है। अब अमरीका और इजरायल यूनेस्को के नॉन मेंबर (गैर सदस्य) ऑब्जर्वर (देखने वाला) होंगे। यूनेस्को सामान्यतया विश्व के पुरामहत्व के स्थलों की सुरक्षा के लिए जाना जाता है। लेकिन यह शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में भी कार्य करता है। अमरीका में यूनेस्को द्वारा घोषित पुरामहत्व के 23 स्थल हैं और इस दृष्टि से उसका विश्व में 10वां स्थान है जबकि भारत 35 पुरामहत्व के स्थलों के साथ 6वें स्थान पर है। इजरायल का मानना है कि यूनेस्कों पुरामहत्व के स्थलों की सुरक्षा करने की बजाए उन्हें बर्बाद कर रहा है। इजरायल-अमरीका ने कई बार इस बात का विरोध दर्ज कराया है कि यूनेस्को ने इजरायल के दक्षिणी हिस्से में फिलिस्तीनी क्षेत्र हेबरॉन को अधिकृत कर रखा है। इस इजरायल अधिकृत क्षेत्र को फिलिस्तीन के पुरामहत्व के स्थल के रूप में घोषित किया गया। यूनेस्को अब तक बने विभिन्न देशों के डायरेक्टर (निर्देशक) में से कतर, मिश्र और फ्रांस से बने डायरेक्टर (निर्देशक) को छोड़कर अमरीका ने किसी भी डायरेक्टर को अपना मित्र नहीं माना है। माना जा रहा है कि गुप्त मतदान की प्रकिया से शीर्घ ही नया डायरेक्टर (निर्देशक) चुन लिया जाएगा।

अतुल कौशिश, वरिष्ठ पत्रकार, राजनीति टिप्पणीकार, तीन दशक की पत्रकारिता का अनुभव

टेक्नोलॉजी रिसर्च (तकनीकी खोज): - अलीबाबा के संस्थापक और चेरयमैन (अध्यक्ष) जैक मा भविष्य की टेक्नोलॉजी के रिसर्च में सिलिकॉन वैली का वर्चस्व तोड़ना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने रिसर्च में एक लाख करोड़ रुपए का भारी-भरकम निवेश करने की योजना बनाई है। यह निवेश चीन, रूस, इजरायल, सिंगापुर और अमेरिका की रिसर्च लैब (प्रयोगशाला) में किया जाएगा। नई लैंब भी खोली जाएगी। इनमें इंटरनेट, ऑफ (के) थिंग्स (विचार) क्वांटम (मात्रा) कंप्यूटिंग (संगणना), फाइनेंशियल (वित्तीय) टेक्नोलॉजी (तकनीकी) और मनुष्य व मशीन (यंत्र) के बीच इंटरएक्शन (बातचीत) पर काम होगा। मार्च 2017 तक तीन साल में रिसर्च (खोज) एंड (और) डेवलपमेंट (विकास) पर करीब 50 हजार करोड़ रुपए खर्च किए थे।

रिसर्च के लिए नई यूनिट (ईकाइ) बनाई गई है। इसका नाम ’अकादमी (विद्यापीठ) फॉर (के लिये) डिस्कवरी (खोज), एडवेंचर (साहसिक), मोमेंटस (क्षणों) एंड (और) आउटलुक’ (दृष्टिकोण) (डेमो अकादमी) रखा गया है। कंपनी (संगठन) के चीफ (प्रमुख) टेक्नोलॉजी (तकनीक) ऑफिसर (अधिकारी) जेफ झांग इसके प्रमुख बनाए गए हैं। कम से कम 100 रिसर्चस को नियुक्त करने की योजना है। इसमें कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) और दूसरे संस्थानों की भी मदद ली जाएगी। झांग ने ही इस योजना का एलान किया। दरअसल, अलीबाबा और अमेजन के बीच मार्केट (बाजार) पर कब्जे की लगातार होड़ लगी है। दोनों ई-कॉमर्स (वाणिज्य) की दिग्गज कंपनियां हैं। मार्केट कैप के लिहाज से अमेजन सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी है।

कुछ समय के लिए अलीबाबा का मार्केट कैप इससे ज्यादा हो गया था। लेकिन चंद घंटो में ही अमेजन ने दोबारा नंबर वन का तमगा हासिल कर लिया। इस साल जनवरी से अब तक अलीबाबा के शेयर भाव दोगुने हो चुके हैं जबकि अमेजन ने 33 प्रतिशत बढ़त हासिल की है। ग्रुप (समूह) के बढ़ते बिजनेस (कारोबार) को देखते हुए नई टेक्नोलॉजी में निवेश को विशेषज्ञ जरूरी मानते हैं। अमेजन की तरह अलीबाबा ने भी ग्राॅंसरी स्टोर (शब्दकोष दुकान), ऑनलाइन पेमेंट (भुगतान) और क्लाउड (समूह) सर्विसेज (सेवाएँ) जैसे बिजनेस (कारोबार) वर्टिकल (खड़ा) बनाए हैं। चीन की शीर्ष कैब (किराये की गाड़ी) सर्विसेज (सेवाएँ) वर्टिकल (खड़ा) बनाए हैं। चीन की शीर्ष कैब सर्विसेज कंपनी दीदी चक्सिंग समेत कई स्टार्टअप्स में इसने निवेश भी किया है।

जैक मा ने कुछ दिनों पहले कहा था, आर्टिफिशियल (कृत्रिम) इंटेलिजेंस (बुद्धि) दुनिया को पूरी तरह बदल देगी। यह किसी कंपनी (संगठन) के सीईओ की जगह ले सकती है। 200 साल तक मैन्यूफैक्चरिंग (विनिर्माण) रोजगार का बड़ा साधन था। लेकिन एआई और रोबोट की तरक्की को देखते हुए कहा जा सकता है कि अब मैन्यूफैक्चरिंग में ज्यादा नौकरियां नहीं निकलेंगी। भविष्य में मेड (बनाया गया) इन (में) चाइना या मेड (बनाया गया) इन (में) अमेरिका नहीं दिखेगा। इसकी जगह मेड इन इंटरनेट होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अलीबाबा को तेजी से इनोवेशन (नवाचार) करना पड़ेगा। अभी तक अमेरिका की टेक्नोलॉजी कंपनियां आगे रही हैं। अमेजन ने पिछले साल ही टेक्नोलॉजी रिसर्च पर एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निवेश किया था। जबकि जैक मा ने तीन साल में एक लाख करोड़ रुपए निवेश की योजना बनाई है।

इंग्लैंड: - ऐसे समय जब भारत में लकड़ी-कोयला जैसे ठोस ईंधन की जगह रसोई गैस (एलपीजी) के प्रयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है, इंग्लैंड ने 2050 तक रसोई गैस का इस्तेमाल खत्म करने की योजना बनाई है। इसकी जगह कम कार्बन उत्सर्जन वाले विकल्पों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए 21, 000 करोड़ रुपए की ’क्लीन (स्वच्छ) ग्रोथ (विकास) स्ट्रैटजी’ (रणनीति) बनाई गई है। इससे पहले इंग्लैंड की सरकार 2040 तक पेट्रोल और डीजल कारे बंद करने की घोषणा कर चुकी है। दरअसल, वहां की सरकार ने 30 साल में ग्रीनहाउस (हरितगृह प्रभाव) गैसों का उत्सर्जन 80 प्रतिशत कम करने का समझौता किया है। यह सब कवायद उसी का हिस्सा है।

इंग्लैंड के घर और ऑफिस (कार्यालय) को गर्म रखने में भी गैस का इस्तेमाल किया जाता है। नए विकल्प क्या होंगे, अभी यह तय नहीं है। एक विचार यह है कि 2025 से ग्रामीण इलाकों में जो भी नए घर बनाए जाएं, उनमें हीट (गर्मी) पंप (पिचकारी) जैसे विकल्पों का इस्तेमाल हो। इसमें पाइप (नलिका) के जरिए जमीन के भीतर की गर्मी का प्रयोग किया जाएगा। कम ऊर्जा खपत वाले घरों के प्रति लोगों को आकर्षित करने के लिए इन पर स्टांप (मुहर) ड्‌यूटी (कर्तव्य) भी घटाई जा सकती है। ऐसे दूसरे इन्सेंटिव (प्रोत्साहन) देने पर भी विचार किया जा सकता है।

खाना बनाने में हाइड्रोजन या बायोगैस का इस्तेमाल करने का विचार है। इसके लिए ओवन और दूसरे अप्लायंसेज (उपकरण) की बनावट बदलने की जरूरत पड़ सकती है। शुरू में यह थोड़ा खर्चीला होगा, लेकिन लंबे समय में इससे पैसे की बचत होगी। इसके अलावा नुकसानदायक गैसों का उत्सर्जन भी नहीं होगा। स्मार्ट (आकर्षक) एनर्जी (ऊर्जा) स्टोरेज (एकत्रित) (अत्याधुनिक बैटरी), रिन्युएबल (अक्षय) एनर्जी (ऊर्जा) और नई न्यूक्लियर (नाभिकीय) टेक्नोलॉजी (तकनीकी) में भी खर्च करने की योजना है। इसके अलावा हवा से कार्बन डाइ ऑक्साइड सोखने की नई तकनीक विकसित की जाएगी। इसके लिए नए जंगल भी तैयार किए जाएंगे। इंग्लैंड के ऊर्जा मंत्री ग्रेग क्लार्क और यूके नर्जी रिसर्च (शोध) सेंटर (केन्द्र) के डायरेक्टर (निदेशक) जिम वाटसन ने कहा, यह तो तय है कि प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल बंद किया जाएगा। लेकिन यह साफ नहीं है कि इसके लिए कौन सी तकनीकी सबसे अच्छी होगी।

सरकार ने पेट्रोल-डीजल से चलने वाली कारों को इलेक्ट्रिक (बिजली) कार में बदलने की भी योजना बनाई है। इसके लिए 8, 500 करोड़ रुपए रखे गए हैं। इसमें से कुछ रकम कार-टैक्सी (किराये की कार) मालिकों को दी जाएगी और कुछ रकम का इस्तेमाल चार्जिंग (कार्य भार) स्टेशन (स्थान) बनाने में होगा। पेट्रोल पंपों पर भी चार्जिंग प्वांइट (बिन्दु) होंगे।

एक रिपोर्ट (विवरण) के अनुसार भारत के शहरी इलाकों में 81.7 प्रतिशत गांवों में 32.5 प्रतिशत परिवार रसोई गैस पर खाना बनाते हैं। कोयला और लकड़ी जैसे ईंधन का प्रयोग गांवों में 63 प्रतिशत और शहरों में 13.6 प्रतिशत परिवार करते हैं। उज्जवला स्कीम (योजना) के तहत 2018 - 19 तक करोड़ परिवारों को एलपीजी कनेक्शन (संबंध) देने का लक्ष्य रखा गया है।

चीन: - चीन में कम्युनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (राजनीतिक) ऑफ (का) चाइना (सीपीसी) 18 अक्टूबर से अपनी 19वीं नेशनल (राष्ट्रीय) कांग्रेस की आयोजन करने जा रही है। यह बैठक हर 5 साल बाद होती है। इसमें पार्टी (राजनीतिक दल) को नया नेता और देश को नया राष्ट्रपति मिलता है। शी जिनपिंग का एक बार फिर राष्ट्रपति बनना लगभग तय है। इससे पहले 11 से 14 अक्टूबर तक सीपीसी की सेंट्रल कमेटी (आयोग) की बैठक हुई। इसमें जिनपिंग ने अपने कई करीबियों को पार्टी पदाधिकारी बनाया है। जिनपिंग 2012 में सत्ता में आए थे। तब से उनका कद चीन में काफी बढ़ गया है। जिनपिंग को ’कोर (मूल) लीडर (नेता) ऑफ (का) चाइना’ का टाइटल (शाीर्षक) मिला है। वहीं, इस बार सीपीसी में जिनपिंग के सहयोगी बढ़ गए हैं। कहा जा रहा है कि ऐसे में पार्टी संविधान में संशोधन कर ’शी जिनपिंग थॉट’ को शामिल करेगी। यदि ऐसा होता है तो जिनपिंग, माओ और जियाओपिंग जैसे नेताओं के स्तर पर पहुंच जाएंगे। चीन में अभी मार्क्सिज्म-लेनिनिज्म, माओ थॉट, देंग जियाओपिंग थ्योरी (सिद्धांत) को फॉलो (अनुकरण करना) किया जाता है।

चीन राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया व जिनपिंग के कार्य-

  • 140 करोड़ वाले देश में 200 लोग चुनते हैं राष्ट्रपति- सीपीसी नेशनल (राष्ट्रीय) कांग्रेस में महासचिव का चयन करती है। वही दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश चीन (1.40 अरब) की कमान संभालता है। सीपीसी में कुल 2, 300 प्रतिनिधि हैं। इस बार 2, 287 प्रतिनिधि ही कांग्रेस में शामिल होंगे। 13 प्रतिनिधियों को निकाल दिया गया है। सीपीसी की सेंट्रल (केंद्रीय) कमेटी (आयोग) में 200 सदस्य होते हैं। यही कमेटी (आयोग) पोलित ब्यूरो (सरकारी विभाग) का चयन करती है। इसके जरिए स्थायी समिति का चयन होता है। पोलित ब्यूरो में 24 सदस्य हैं, जबकि स्थाई समिति में 7 सदस्य हैं। इन दोनों कमेटियों के पास सबसे अधिक शक्तियां होती हैं।
  • कम उम्र के नेताओं को कोर टीम (दल) में मिलेगी जगह- 19वीं नेशनल कांग्रेस में शी जिनपिंग अगले 5 सालों के लिए चीनी नीति की दिशा और दशा को लेकर रिपोर्ट (विवरण) पेश करेंगे।

पोलित ब्यूरों और स्थाई समिति में नए लोगों के आने के आसार हैं। उम्मीद की जा रही है सीपीसी में भविष्य के नए नेताओं को जगह मिलेगी। सीपीसी ने अहम पदो ंके लिए उम्र सीमा तय की है। ऐसे में ज्यादातर पोलित ब्यूरो सदस्य हट जाएंगे, क्योंकि वो 68 की उम्र पार कर चुके हैं। इसमें भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी (शाखा) के प्रमुख वॉन्ग किशान भी शामिल हैं। हालांकि वॉन्ग, जिनपिंग के अहम सहयोगी हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि उन्हें पद पर बने रहने दिया जा सकता हैं।

  • जिनपिंग ने 5 साल में 10 लाख भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई की-जिनपिंग ने 5 साल से भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चला रखा है। इसमें 10 लाख भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई की है। ’शी’ नाम से चीन में एक आंदोलन भी हुआ। जिससे जिनपिंग की लोकप्रियता काफी बढ़ी। अब लोग उन्हें प्यार से ’शी दादा’ भी कहते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दक्षिण चीन सागर का विस्तार और ’वन (एक) बेल्ट (पट्‌टा) वन (एक) रोड (सड़क) ’ जिनपिंग की अहम कामयाबी रही है। इनके नेतृत्व में चीन ने दुनिया के सामने खुद को वैकल्पिक सुपर (शानदार) पावर (ताकत) के रूप में पेश किया है। उ. कोरिया के खिलाफ भी उन्होंने कड़े कदम उठाए हैं।

चीन में शासन निम्न हैं- कम्यूनिस्ट पार्टी चीन पर 68 साल से शासन कर रही है। पार्टी ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं, पर इसकी ताकत में लगातार इजाफा हुआ है।

  • पहली कांग्रेस-1921 में बेहद गोपनीय तरीके से शंघाई में हुई थी। इसमें कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) नेता माओत्सेतुंग भी मौजूद थे, हालांकि तब यह बहुत युवा थे।
  • जब माओ बने नेता-7वीं कांग्रेस 1945 में उस समय बुलाई गई, जब चीन-जापान युद्ध खत्म होने ही वाला था। कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (राजनीतिक दल) के गढ़ यानान में यह बैठक हुई। इसमें माओ सुप्रीम (सर्वोच्च उच्चतम) लीडर (नेता) के तौर पर उभरे। इसी कांग्रेस में माओ के ’विचारों’ को पार्टी की विचारधारा का आधार बनाया गया।
  • सांस्कृतिक क्रांति- 9वीं नेशनल कांग्रेस 1969 में हुई। यह वह दौर था, जब चीन में सांस्कृतिक क्रांति अपने चरम पर थी। सत्ता पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए माओ ने इस क्रांति का इस्तेमाल किया था।
  • चीनी समाजवाद-1982 में 12वीं कांग्रेस हुई। इसमें चीनी नेता तंग शियाओफिंग ने चीनी समाजवाद का प्रस्ताव रखा। इससे चीन में आर्थिक सुधारों का रास्ता तैयार हुआ। देश पूरी तरह से कम्यूनिस्ट विचारधारा से पूंजीवाद की तरफ बढ़ा।
  • पूंजीपतियों को जगह- 2002 में 16वीं कांग्रेस हुई इसमें औपचारिक रूप से निजी उद्यमियों को पार्टी का सदस्य बनने की अनुमति दी गई।
  • जिनपिंग का उदय- 2007 में 17वीं कांग्रेस हुई। इसमें पांचवीं पीढ़ी के शी जिनपिंग और ली केकियांग को सीधे सीपीसी की स्थायी समिति का सदस्य बनाया गया। जबकि उस समय वह पार्टी के 25 सदस्यों वाले पोलित ब्यूरो के सदस्य भी नहीं थे।

- Published/Last Modified on: November 2, 2017

News Snippets (Hindi)

Monthy-updated, fully-solved, large current affairs-2018 question bank(more than 2000 problems): Quickly cover most-important current-affairs questions with pointwise explanations especially designed for IAS, CBSE-NET, Bank-PO and other competetive exams.