व्यापमं घोटाला (Vyapam Scam explained in Hindi)

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प्रस्तावना:- व्यापंम अर्थात व्यायवसायिक परीक्षा मंडल घोटाला है जो देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत गंभीर मसला है, इसकी सीबीआई जांच करानी ही चाहिए। इस घोटाला में ऐसे मंत्रियों, राजनेताओं व बड़ी हस्तियों के नाम है जो एसटीएफ, सीआईडी, जैसी जांच एजेंसियों को किसी भी हद तक प्रभावित कर सकते है। जब इस मामले पर राज्य के मुख्यमंत्री पर और न्यायपालिका पर भी आरोप लग रहे हैं तो इसकी सीबीआई जांच कराने के लिए सरकार के पास पर्याप्त कानूनी आधार है। मध्यप्रदेश का यह व्यावसायिक परीक्षा मंडल घोटाला अब मोतौ की वजह से ओर चर्चा में हो गया है।

घोटला:- व्यापंम अर्थात व्यायवसायिक परीक्षा मंडल घोटाला सरल शब्दों में कहें तो यह प्रवेश और भर्ती का घोटाला है, जिसमें राज्य परीक्षाएं दे रहे और रोजगार पाने के लिए व्यग्र प्रत्याशियों दव्ारा स्थानीय अधिकारियों का रिश्वत देकर हुई सांठगांठ शामिल हैं। 2500 से ज्यादा आरोपितों में विदेशी मुद्रा विनियम कानून का उल्लंघन कर टैक्स रियायत वाले किसी दव्ीप पर अय्याशी करने वाले लोग शामिल नहीं हैं। इनमें ज्यादातर निम्न मध्यमवर्ग के युवक-युवतियां हैं। यह घोटाला आज की बात नहीं है यह सन् 2008 से ही शुरू हो गई थी लेकिन तब यह घोटला इतना बड़ा नहीं था क्योंकि उस समय जनता को यह समझ नहीं आता था कि यह है क्या? बाद में जब मामले में खुलासा आया तो लोगों को समझ में आया कि यह बहुत बड़ा घोटाला हैं। इस मामले में विपक्ष के दबाव बनाने से पहले ही भाजपा को राज्य से बाहर जांच कराने के आदेश दे देने चाहिए जिससे जो भी सच है सामने आ जाएगा।

व्यापंम से यह उजागर हुआ है कि सरकारी खैरात बांटने के इस गोरखधंधे की जड़ें कितनी गहरी हैं और यह कितना संस्थागत रूप ले चुका है। भाजपा नेता ने दावा किया कि राज्य में कांग्रेस सरकार के जमाने में भी नौकरियां इसी तरह स्थानीय आकाओं और उनके ग्राहकों के नेटवर्क से बंटती रही हैं। जहां यह सही है वहीं 2003 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद जिस पैमाने पर और जिस दुस्साहस के साथ यह सब हुआ वह चौंकाने वाला है।

कई रहस्यमय मौतों के बावजूद एक पत्रकार की त्रासद मृत्यु के बाद मीडिया का ध्यान व्यापंम मामले पर केंद्रित हुआ। यह तथ्य समकालीन माध्यमों के बारे में बहुत कुछ बताता है। टीआरपी से चलने वाली दुनिया में ललित मोदी और सेलेब्रिटी संपर्को को बॉक्स ऑफिस की तरह देखा गया है। इसके विपरीत ऐसे घोटाले की वाकई में किसे चिंता है, जिसका नाम व्यावसायिक परीक्षा मंडल जैसे अनाकर्षक हिंदी नाम का संक्षिप्त रूप है।

मध्यप्रदेश के व्यापंम घोटाले का भ्रष्टाचार के साथ ’मौत घोटाले’ में तब्दील होना चिंताजनक है। देश के लिए भी और उस भाजपा के लिए भी जो राजनीति में नैतिक मूल्यों की दुहाई देते नहीं थकती। तीन दिन में व्यापंम घोटाले की जांच से जुड़े पत्रकार, डॉक्टर और प्रशिक्षु महिला सब इंस्पेक्टर की रहस्यमय मौत ने मामले को संगीन बना दिया है। प्रदेश की स्पेशल टास्क फोर्स चार साल पुराने इस मामले की तीन साल से जांच कर रही है। सैकड़ों आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं। 46 लोगों की अब तक संदिग्ध मौत हो चुकी है लेकिन मामला उलझता जा रहा है। निष्पक्ष जांच के लिए विपक्ष इसकी सीबीआई जांच की मांग कर रहा है लेकिन इसके लिए न तो प्रदेश की भाजपा सरकार राजी है और न केंद्र सरकार।

किरण बेदी के अनुसार - फर्जीवाड़े दो ही कारण से होते हैं। पहला सुविधा संपन्न लोग हैसियत बनाए रखने के लिए करते हैं, दूसरा कमजोर लोग सुविधाओं के लिए करते है। मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश में यही देखा गया है।

लोग:- मामला राज्य के बच्चों के भविष्य के साथ तो जुड़ा ही है, इससे राज्य व देश के सरकारी अमले की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि एक-एक कर केवल उन लोगों की मौत हो रही है जिनका व्यापंम अथवा डीमेट घोटाले से किसी न किसी तरह का संबंध है।

जांच की निगरानी पर रही एसआईटी व जांच एजेंसी एसटीएफ दोनों राज्य सरकार के नियंत्रण में है। इसी वजह से लगातार हो रही मौतों का सच सामने नहीं आ पा रहा है। सीबीआई स्वतंत्र एवं स्वशासी(इंडिपेंडेंट एंड ऑटोनॉमस) संस्था है। यदि मामले की जांच सीबीआई करती है तो जांच में होने वाला स्थानीय हस्तक्षेप समाप्त हो जाएगा। हजारों बच्चों का भविष्य व देश की प्रतिष्ठा इस मामले में दांव पर हैं, इसलिए इसकी सीबीआई जांच कराई जा सकती है।

जांच:- सुप्रीम कोर्ट के लिए मध्यप्रदेश के घोटाले की जांच केंद्रीय अनुसंधान ब्यूरों (सीबीआई) को सौंपने का आदेश देना आसान था, क्योंकि किसी पक्ष ने इसका विरोध नहीं किया। मध्यप्रदेश सरकार ने भी सहमति दी, जो पहले जबलपुर हाईकोर्ट की निगरानी में जांच जारी होने की दलील के आधार पर इसके खिलाफ थी। अब तक हुई जांच से व्यापंम घोटाले की व्यापकता जाहिर है। इसे अजांम देने में बड़े-बड़े राजनेताओं, नौकरशाहों, आम सरकारी कर्मचारियों, दलालों और अनुचित तरीके से नौकरी या शिक्षण संस्थानों में दाखिला पाने वाले आम लोगों ने भूमिका निभाई। इस मामले से जुड़े दर्जनों अभियुक्त/गवाहों की रहस्यमय मौतों से संकेत मिला कि घोटाले का संचालक नेटवर्क कितना खूंखार है। इसलिए यह मांग अधिक से अधिक तार्किक होने लगी कि इसकी जांच राज्य से बाहर की एजेंसी को सोंपी जाए। घपले की राष्ट ्रीय राजनीतिक मुद्दा बनने और सर्वोच्च न्यायालय के दखल से अंतत: यह जिम्मेदारी सीबीआई का रिकॉर्ड उज्जवल नहीं हुआ कहा जा सकता। लेकिन फिर भी इस मामले की सीबीआई जांच होनी ही चाहिए।

शिवराज:- अब वे राहत महसूस कर रहे हैं। एक बोझ था जो उतर गया क्योंकि अब इस घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है। जांच वाले कहते हैं कि वे राहत कैसे महसूस कर सकते है जबकि देश का सबसे दर्दनाक घोटला उनके कार्यकाल में हुआ था। इतिहास में इतना गहरा, इतना उलझा और इतना फैला दूसरा घोटाला नहीं हैं। जबकि इस घोटाले में उनके स्वयं के स्टाफ का नाम आ रहा है। उनके परिवार तक का नाम उछाला जा रहा हैं। उनकी सरकार पर भयावह दोष लग चुका है। इससे वे कैसे कह सकते है कि बोझ उतर गया। जबकि बोझ तो अब आएगा जब मध्यप्रदेश के नौजवान, फर्जी डॉक्टर के रूप में हिन दृष्टि से देखेंगे। अब यह नफरत जोरो पर शुरू हो चुकी है वो इसलिए कि शिवराज सरकार कुछ नहीं किया।

सरकार, प्रशासन, पुलिस और कानून कई तरह से काम करते हैं। अक्सर एक-दूसरे से पूरी तरह अलग या उल्टे और सबकुछ एक तयशुदा नियम, कायदे, कानून के अंतर्गत फिर धाराएं उपधाराएं, रेड विद् सेक्शन बी, क्लॉज डी-3, सब सेक्शन जी। हर बात कागज पर लिखे किसी नाम के तहत। यही सरकारी जटिलता है जो घोटालों का कारण बनती है। यही घोटालों और घोटालों करने वालों को बेनकाब भी करती हैं।

ऐसा ही इस दावे के मूल में हो सकता है। पूरा व्यावसायिक परीक्षा मंडल इसमें कहीं न कहीं दोषी है। कोई भ्रष्टाचार के तो कोई भ्रष्ट आचरण के कारण। फिर भी व्यापंम ने अपने ही विरूद्ध पहली शिकायत पर एक जांच पैनल बना दिया। यह शिकायत डॉ. आनंद रॉय ने की थी, जो आज पूरे कांड को सामने लाने वाले तीन व्हिसलब्लोअर में से एक हैं। यहीं से आठ नाम मिले है जिसमें 280 प्रॉक्सी है। किसी के नाम पर परीक्षा दे रहे रैकेट का पहला सिरा। फिर क्राइम ब्रांच, इंदौर में डॉ. जगदीश सागर को पकड़ पाई। वहां 317 नामों की लिस्ट मिली। फिर हजारों नाम खुले। इसलिए केस दर्ज होना ही था। लेकिन यह सब संयोगवश हुआ।

इसे आप सरकार की कार्रवाई कह सकते हैं। सख्ती बता सकते हैं। श्रेय ले सकते है किन्तु महीनों बल्कि कई सालों तक लक्ष्मीकांत शर्मा की गिरफ्तारी रोकने को क्या कहेंगे, जो पहले शिवराज सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रह चुके थे? मेंडिकल भर्ती घोटाले से शुरू यह सिलसिला जब सरकारी नौकरियों में शिक्षा, खाद्य, पुलिस सब इंस्पेक्टर नियुक्तियों को खोलने लगा तो मामले कम, मौते ज्यादे सामने आने लगी।

केस की जांच के बाद जो एफआईआर हाईकोर्ट में दर्ज की गई, उसमें आरोपी क्रमांक 10 के रूप में रामनरेश यादव का नाम दर्ज था। आगे बाकायदा ’गवर्नर’ लिखा था। हाईकोर्ट ने कहा चूंकि उन्हें कन्स्टीट्यूशल इम्यूनिटि प्राप्त है, इसलिए उन पर मुकदमा नहीं चल सकता है। किन्तु यह भी कहा गया है कि जब वे पद पर नहीं रहेंगे, तब यदि सरकार चाहे तो केस चल सकता है। यानी दोषी मान लिया जाएगा।

शिवराज सरकार चाहती तो केंद्र से, पार्टी से या सीधे सुप्रीम कोर्ट से अपील कर सकती थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसलिए वे शक के घेरे में आ गई। यह घोटाला राजभवन से संचालित हो रहा था जिसमें यादव के बेटा आरोपी था। इससे पहले कुछ बचाव हो पाता उसकी मौत हो गई। किन्तु यादव के बना रहना तो यह सिदव् करता है कि उन्हें कोई आघात नहीं पहुंचा। उन्हें किसी अपराध का कोई बोध ही नहीं हैं। उन्हें राजभवन का ही मोह है। इसमें पूरी तरह शिवराज सरकार ही नहीं नरेंद्र मोदी सरकार भी इसमें दोषी है। इन घोटाले में अफसर, कमर्चारी, नेता और जो सरकारी में काम करते है। वे सब अपनी- अपनी सुविधा से घोटाले कर रहे थें।

शिवराज सरकार कहती है कि सांच को आंच नहीं, हाथ कंगन को आरसी क्या। किन्तु सांच क्या है? क्योंकि सीबीआई भी यदि एसटीएफ की जांच को ही आधार मान लेगी तो फाइल आत्महत्या पर ही बंद हो जाएगी। तो इसमें सांच कहा रह जाएगा।

शिवराज ने अब जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया है कि कांग्रेस व उनके विरोधी मध्यप्रदेश को बदनाम करना चाहते हैं। जबकि बदनाम करने की न तो गुजरात में कोई साजिश है न तो मध्यप्रदेश में। मध्यप्रदेश बदनाम इसलिए हो रहा है क्योंकि वहां इतना बड़ा घोटाला वो भी रक्तरंजित हो रहा है।

नेतृत्व वही है जो हर अच्छे काम का श्रेय अपने साथियों को दे और हर बुरे काम की जिम्मेदारी खुद ले। ऐसा नेतृत्व मिलना असंभव है। नेतृत्व में साहस होना चाहिए कि वह अपना दाग, अपने सच से धो सके। ऐसा शिवराज सरकार को समझना चाहिए।

चर्चित मौतें:- नम्रता डामोर की लाश उज्जैन में रेलवे ट्रेक में मिली। पुलिस ने पहले हत्या मानी फिर आत्महत्या बाद में केस बंद कर दिया गया जबकि डॉक्टर के मुताबिक दम घुटने से उसकी मौत हुई थी। दूसरा मामला आया था जबलपुर मेडिकल कॉलेज के डॉ. अरूण शर्मा का। वे 200 से अधिक दस्तावेज एसटीएफ को सौंप चुके थे। इस तरह से शत-प्रतिशत अपराधियों के निशाने पर थें पर पुलिस को उनकी मौत नेचरल लगती है।

उपसंहार:- अब उत्तरोतर यह स्पष्ट होता जा रहा है कि व्यापंम को संघ परिवार के स्थानीय नेतृत्व का आर्शीवाद प्राप्त था। यह ऐसा प्रदेश हैं, जहां देश के अन्य हिस्सों की तुलना में आरएसएस का परंपरागत रूप से अधिक प्रभाव रहा है। ऐसे तो कई घोटाले हुए हैं पर जो मध्यप्रदेश में घोटाला हुआ हैं इनमें कई मौते हो चुकी हैं। इसलिए इसे सबसे बड़ा घोटला कहा जा रहा है। इससे मध्यप्रदेश में करोड़ों नौजवानों के सपने टुट गए। इसलिए अब निष्पक्ष जांच दव्ारा इस घोटाले पर अकुंश लगा देना चाहिए जिससे आगे अब किसी की मौत न हो। साथ ही व्यापंम की एक नई शुरूआत हो सके।

- Published/Last Modified on: August 6, 2015