उच्च दस समाचार भाग-1 (Top Ten News Part - 1) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- पूर्व की भांति हम इस बार भी हम आपके लिए दस चुनिंदा खबर लाये जो देश-विदेश में होने वाली घटनाओं में आधारित हैं। भारत और पाकिस्तान, दोनों को कश्मीर में चल रही प्रचंड हिंसा को शांत करना होगा। भारतीय कश्मीर में राज्य सरकार ने इस दिशा में योजना बना ली है, जिसका दोनों देशों की ओर से सकारात्मक ढंग से अनुसरण करने की दरकार है।

भारत और पाकिस्तान में शांति की राह-

  • यह कोई पहली बार नहीं है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध खराब हूए हैं। असल में मौजूदा स्थिति भी दोनों देशों के बीच बरसों से चली आ रही थोड़े समय की मधुरता और फिर लंबे समय तक कटुता के चक्र का ही हिस्सा है। गणितीय दृष्टिकोण से इसे समझे तो दुर्भाग्य यह है कि दोनों देश का एक कदम आगे बढ़ाते हैं और फिर दो कदम वापस पीछे खींच लेते हैं। परेशानी पैदा करने वाले सवाल यह है कि, आखिर आगे बढ़कर वापस कदम पीछे खींचने का यह सिलसिला कब तक चलेगा?
  • संबंधों में निरंतर आपसी उतार-चढ़ाव के इस ’पैटर्न (व्यवस्थित किए जाने का ढंग/अनुसरण करना)’ के दुष्परिणाम का अहसास दोनों ओर नहीं लगता है। जब भी ताल्लुकात धरातल में चले जाते हैं, जैसी स्थिति आज बनी हुई है, तब आपसी बातचीत पर खतरे, धमकियां और अस्थिरता हावी हो जाती है। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर होने वाली वाक्‌पटुता कई बार कुछ बॉलीवुड अथवा लॉलीवुड फिल्मों के हिंसात्मक और धमकियों से भरे घटिया भाषणों की तरह लगते हैं। भारत चूंकि अपनी बढ़ती हुई सैन्य शक्ति और राजनीतिक ताकत के चलते समझौते पर बहुत कम और डांट-डपटने में अधिक ध्यान देता हैं। पाकिस्तान पर इसकी असुरक्षा का भाव हावी है और वह भी विध्वंस की धमकियां देता रहता है। दोनाेे देशों में बढ़ती धार्मिकता और अविवेकपूर्ण निर्णयों को मंजूरी मिल रही है। दूसरी ओर खास बात पाकिसतान व भारत में यह है कि ये घटना आधारित प्रतिक्रियाशील है।
  • आज भी दोनों के संबंधों में गिरावट कश्मीर में चल रही हिंसा और तनाव के कारण आई है। पाकिस्तान अकसर भारत पर कश्मीर में मानवाधिकार उल्लघंन का आरोप लगाता रहा है तो भारत ने भी पीओके, बलुचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान में मानवाधिकार उल्लघंन और पाकिस्तान के दमन पर प्रतिक्रिया दी है। दुखद बात है कि दोनों देशों की विदेश नीति एक दूसरे पर हावी होने और एक-दूसरे को चालाकी से हराने पर ही केंद्रित है जबकि संबंधों को सुधारने पर उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऐसा लगता है कि दोनों ओर इंटेलीजेंस (होशियार) एस्टेब्लिशमेंट ही विदेश नीति चला रहा है जो कि एक खतरनाक तरीका है। दशकों तक, दोनों देशों से समाज के नागरिक के प्रबुद्ध लोग ’ट्रेक-2 अनुबंध’ के जरिए दोनों सरकारों को आगे बढ़ने और स्थायी शांति स्थापित करने में मदद के लिए सुलभ और तरीके सौंपते रहे हैं।

ये पांच सूत्र हैं, जिनसे दोनों देशों में आगे शांति की राह तलाशी जा सकती हैं।

  1. भारत और पाकिस्तान, दोनों को कश्मीर में चल रही प्रचंड हिंसा को शांत करना होगा। भारतीय कश्मीर में राज्य सरकार ने इस दिशा में योजना बना ली है, जिसका दोनों देशों की ओर से सकारात्मक ढंग से अनुसरण करने की दरकार है। दिल्ली पर बड़ा दारोमदार रहेगा, वहीं पाकिस्तान को हिंसा को हवा देने से खुद को रोकना होगा।
  2. विदेश नीति चलाने का कार्य दोनों देशों में राजनीतिक नेतृत्व और कूटनीतिज्ञों के जिम्मे रहना चाहिए। सुरक्षा और हौसियार कार्यकर्ताओं को परंपरागत कार्य तक सीमित रखना चाहिए, उन्हें विदेश नीति नहीं चलाने देनी चाहिए।
  3. दक्षिण एशिया में परमाणु बराबरी ने परंपरागत युद्ध की आशंकाओं को सीमित कर दिया है लेकिन भारत और पाकिस्तान अपने छिपे उपकरणों का उपयोग एक-दूसरे को अस्थिर करने के लिए कर रहे हैं। दोनों देशों को आपस में शांति स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध होना पड़ेगा और इसी में क्षेत्रीय शांति भी छिपी है। दोनों देशों के प्रतिष्ठित विचारक और विदव्ान मान चुके हैं कि खुशहाली की दिशा में बढ़ने के लिए स्थिरता पहली जरूरी शर्त है।
  4. भारत और पाकिस्तान दोनों को भाषा, नस्ल और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना होगा न कि धार्मिक राष्ट्रवाद को। पाकिस्तान में इस्लामिक राष्ट्रवाद और भारत में हिंदू राष्ट्रवाद के बढ़ने से दोनों देशों में अस्थिरता ही रहेगी।
  5. भारत और पाकिस्तान में दशकों के अनुभव के बाद कह सकते हैं कि राजनीतिक नेतृत्व को सुरक्षा और हौसियार कार्यकर्ताओं के मानसिक उन्माद को नजरअंदाज कर समझदारी से आगे बढ़ना होगा।

दोनों देशों ने समय-समय पर चिरस्थायी शांति की प्रक्रिया शुरू करने के कई वादे किए हैं। लेकिन किसी न किसी कारण से शांति की दिशा में आगे नहीं बढ़ सके। यह उचित होगा कि दोनों ओर से प्रधानमंत्रियों को किसी मंच पर संयुक्त एक सूत्रीय घोषणा करने लगे कि ’हम एक-दूसरे को किसी भी तरह अस्थिर नहीं करेंगे, न छिपकर न खुले रूप में। हम एक -दूसरे के घरेलू मामलों में दखलअंदाजी नहीं करेंगे। दोनों अपने नागरिकों की बेहतरी और दक्षिण एशिया क्षेत्र की शांति के लिए मिलकर कार्य करेंगे।

पाक के पूर्व मेजर जनरल व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, यूएस में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत, पाकिस्तान में ’जनरल शांति’ के नाम से मशहूर महमूद ईरानी, कूटनीति विशेषज्ञ

चीन में जी-20सम्मेलन-चीन में सोंग राजवंश की पुरानी राजधानी हांगचू शहर में 4 व 5 सितंबर को 11वें जी-20 सम्मेलन की मेजबानी की थी। दुनियाभर के शीर्ष नेता एवं वीवीआईपी (बहुत महत्वपूर्ण लोग) यहां पहुंचे थे। चीन की नई उभरती अर्थव्यस्था वाले इस शहर को कई कारणों से बीजिंग से बेहतर माना गया है, जिनमें पर्यावरण, जीवनशैली, खान-पान, संस्कृति बेहतर वातावरण प्रमुख हैं।

कारण-निम्न हैं-

  • चीन के सबसे बड़े शहर शंघाई से मात्र 180 कि.मी. दूर स्थित इस शहर को मार्को पोलों की ओर से बेहतरीन और सबसे शानदार शहर बताया गया है।
  • शंघाई के रहवासी भी कह चुके हैं कि उन्हें हांगचू में वीकेंड (अवकाश) मनाना बहुत पंसद है, क्योंकि वहां शांति भी है और अच्छा वातावरण भी।
  • ’वेस्ट झील’ पूरे शहर को खूबसूरत बनाती है, जो कलाकारों, कवियों और दार्शनिक हस्तियों को भी आकर्षित करती हैं।
  • जहां पूरा चीन दो से चार पहियों की ओर बढ़ रहा है, लेकिन यह शहर साइकिल पसंद करता है। पूरे शहर में साइकिल स्टैंड (स्थान) आम बात हैं। चीन की सबसे महंगी और बेहतरीन चाय ’लान्गजिन’ भी यही मिलती हैं। इसलिए इस शहर में में जी-20 सम्मेलन 2016 में हुए।

जी-20- विश्व के विकसित देशों में जब आर्थिक मंदी आती हैं तो वे दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अपने साथ जोड़ते हैं ताकि मंदी के दौर से निकला जा सके। 2008 में जी-20 की स्थापना भी इसी उद्देश्य के लिए की गई थी। विश्व के विकसित देशों के संगठन जी-8 के सदस्य देशों ने विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं को जोड़कर जी-20 की यह 11वीं बैठक होगी। आज के दौर में भारत और चीन को छोड़कर अन्य विकासशील देशों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। भारत की आर्थिक विकास दर 7.1 और चीन की 7 फीसदी रहने की उम्मीद हैं। विश्व को आर्थिक मंदी की स्थित से उबारने के लिए जी-20 की नजर भी इन दो देशों पर टिकी हुई हैं। 18 देश इसी उम्मीद में होंगे कि कैसे ये दो देश मंदी से उबार सकते हैं चीन ने इस सम्मेलन का लक्ष्य आर्थिक ही रखा है। यह बात जरूरी है कि वह दक्षिण चीन सागर पर किसी तरह की चर्चा से बचना चाहेगा। इसलिए माना जाना चाहिए कि इस सम्मेलन में सामरिक, सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा नहीं होगी। पिछले सालों भारत व चीन के संबंधों में कुछ मुद्दों को लेकर खटास आई है। इसके बावजूद दक्षिण चीन सागर को लेकर अंतरराष्ट्रीय पंचाट के फेसले पर भारत ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। भारत ने कहा कि चीन और फिलीपींस आपसी बातचीत से मुद्दे को सुलझाएं।

                                                                                                                            प्रो. स्वर्ण सिंह, विदेश मामलों के जानकार

  • मोदी जी की वियतनाम यात्रा:-दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती दखलंदाजी के बीच भारत के प्रधानमंत्री अपनी वियतनाम यात्रा में चीन को घेरने की कोशिश करने वाले हैं। चीन में जी-20 सम्मेलन से ठीक पहले प्रधानमंत्री की वियतनाम यात्रा को भारतीय रणनीति का अहम हिस्सा माना जाना चाहिए। यह यात्रा इसलिए भी अहम हो गई है कि क्योंकि यह माना जा रहा है कि जी-20 सम्मेलन में चीन पर इस बात का दबाव डाला जाएगा कि वह दक्षिण चीन सागर को लेकर द हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फेंसले को मानें। दरअसल, प्रधानमंत्री की यह यात्रा भारत वियतनाम के बीच रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा है। चीन और वियतनाम के बीच दक्षिण चीन सागर को लेकर लंबे समय से विवाद हैं। द. चीन सागर के करीब 85 फीसदी हिस्से पर चीन अपनी दावेदारी ठोकता है। उसके इस रवैये का वियतनाम के साथ-साथ सिंगापुर, मलेशिया, फिलीपींस और इंडोनेशिया विरोध कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फेसले को चीन जिस तरह से नजरअंदाज कर रहा है उससे इन देशों की चिंता और बढ़ गई हैं। चीन जिस तरह से हमारे पड़ोसी देश नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों तक अपनी सामरिक और व्यापारिक पहुंच बढ़ाने में लग रहा है, उसे देखते हुए भारत के लिए भी चीन पर दबाव बढ़ाना जरूरी हो गया है।
  • हमारे प्रधानमंत्री इस सम्मेलन से पहले वियतनाम की यात्रा पर गए है। दोनों देश एक दूसरे को संकेतो में समझा भी रहे है। आतंकवाद वैश्विक मुद्दा बन चुका है और दुनियाभर में लगातार आतंकी हमले हो रहे हैं। इसलिए हम इस मसले पर चर्चा की उम्मीद कर सकते हैं।
  • भारत और वियतनाम-भारत, वियतनाम के साथ सुरक्षा साझेदारी पहले से ही कर रहा है। वियतनाम को ब्रह्योस मिसाइल नियार्त का प्रस्ताव पहले से ही है और अब समझा जा रहा है कि प्रधानमंत्री वियतनाम को पेट्रोलिंग नौकाएं भी देने पर सहमति देंगे। वियतनाम को अतिरिक्त सामरिक सहायता भी दी जा सकती हैं। सामरिक दृष्टि से वियतनाम को मजबूत करने के साथ-साथ भारत को व्यापार की दृष्टि से भी वियतनाम से साझेदारी करनी है। भारत वहां प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में निवेश का इच्छुक है। जबकि अभी दक्षिण चीन सागर के अधिकतम संसाधनों का दोहन चीन ही कर रहा है। इस एकाधिकार को खत्म करना भी जरूरी हो गया है। क्योंकि दक्षिण चीन सागर से सटे दूसरे देशों में इसे घबराहट है। दरअसल मोदी ने ’लुक (छवि) ईस्ट’ नीति को अब ’एक्ट (कानून) ईस्ट’ में बदलना शुरू किया है। एक्षिण पूर्व एशियाई देशों के लिए वे थ्री-सी फेक्टर (घटक) पर काम कर रहे हैं। ये घटक संस्कृति, कनेक्टिविटी (संयोजक) व कॉमर्स (वाणिज्य) के हैं। जाहिर हैं कि दक्षिण पूर्व एशिया में छोटे देशों का सामरिक मददगार बनकर भारत चीन के सामने एक नया मोर्चा खोलने में कामयाब हो सकता हैं। हमारी यह रणनीति भी है कि चीन को उसके आसपास ही उलझाए रखा जाए।
  • अमरीका व चीन-राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दक्षिणी चीन सागर पर फिर चीन को चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फेसले को चीन को मानना ही होगा। ओबामा की यह टिप्पणी चीन दव्ारा फेसले को नहीं मानने की धमकी पर की गई हैं। ओबामा ने लाओस में एशियाई नेताओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, जुलाई में आए अंतरराष्ट्रीय पंचाट के ऐतिहासिक, बाध्यकारी फेसले ने क्षेत्र में समुद्री अधिकारों को स्पष्ट करने में मदद की है। ओबामा ने चीन से कानून के शासन के अनुरूप चलने के लिए कहा है। उन्होंने चीन से यह भी कहा है कि वह तनाव बढ़ा सकने वाले एकपक्षीय कदम न उठाए।
  • वाशिंगटन:-सात माह बाद फिर ब्लैंक सी पर रूस व अमरीका के लड़ाकू विमान आमने सामने आ गए। ब्लैंक सी के ऊपर अमरीका जासूसी विमान को रोकने के लिए रूसी एसयू-27 लड़ाकू जेट उसके 10 फीट तक पास आ गया। इस दौरान दोनों विमान 19 मिनिट तक करीब रहे। अमरीका ने रूस के इस रवैये को गैरजिम्मेदार और भड़काने वाला बताया है। रूस ने कहा कि एसयू-27 सिर्फ यह पता लगाने गया था कि अमरीकी विमान सीमा के नजदीक क्या कर रहा हैं?
  • ब्रिक्स सम्मेलन:-जी-20 के बाद गोवा में ब्रिक्स देशों का सम्मलेन भी होने वाला हैं। इसी सिलसले में ब्रिक्स देशों के प्रमुखों को भी एक अलग से बैठक होगी। इसमें गोवा सम्मेलन को लेकर कुछ बड़ी घोषणाओं पर सहमति बनाने के प्रयास होंगे। चीन के विदेश मंत्री की हाल की भारत यात्रा में दोनों देशों ने जी-20 और ब्रिक्स के आयोजन को सफल बनाने के लिए आपसी सहयोग पर सहमति बनी थी। जी-20 में होने वाली चर्चा ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता का आधार बनने वाली हैं ब्रिक्स में मुख्य रूप से निवेश के लिए ब्रिक्स रेटिंग (गुणवत्ता आदि अनुसार वर्ग विभाजन) कार्यकर्ता का गठन, ब्रिक्स वीजा (देश में आने या जाने की अनुमति) और सदस्य देशों के बीच आपस में अपनी करेंसी (मुद्रा) में ही व्यापार करने के मुद्दों पर सहमति बन जाती है तो भारत के लिए भी यह ऐतिहासिक आयोजन का मौका होगा।
  • ऑस्ट्रेलिया:-बीते कुछ सालों में कई प्रधानमंत्री देख चुका ऑस्ट्रेलिया राजनीतिक स्थिरता की ओर बढ़ चला है। 2013 के बाद वहां तीन प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। चुनाव के पूर्व ऐसा लग रहा था कि मैल्कम टर्नबुल को हार का सामना कर पड़ सकता है। लेकिन चुनाव पूर्व अनुमानों को धता बताते हुए टर्नबुल ने जीत हासिल की है।
  • मजबूर- 2013 के बाद से टर्नबुल देश के चौथे प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने सितंबर 2015 में दल मत में लिबरल नेता टोनी एबॉट को पद से हटने पर मजबूर किया था।
  • सीटें- 150 सदस्यों वाले हाउस ऑफ रिप्रेजेंटिव्स (घर के प्रतिनिधि) में बहुमत के लिए 76 सीटों की जरूरत होती है। जो टर्नबुल ने हासिल कर ली हैं।
  • हार- विपक्षी लेबर दल के नेता बिल शॉर्टन ने पूरे नतीजे आने से पहले ही राष्ट्रीय चुनाव में अपनी हार स्वीकार कर ली।शॉर्टन ने मेलबर्न में कहा कि यह स्पष्ट है कि मिस्टर टर्नबुल और उनका गठबंधन सरकार बनाएंगे।उन्होंने मिस्टर (महाशय) टर्नबल से बात करके उन्हें व उनकी पत्नी लूसी को बधाई दी थी।

मोदी की तंजानिया यात्रा:-भारत के प्रधानमंत्री मोदी की तंजानिया यात्रा के दौरान प्रस्तुत तमाम तथ्य सामने आए हैं।

  • तंजानिया के 17 शहरों में पीने के पानी का इंतजाम दुरुस्त करने के लिए भारत काम कर रहा है। इनके लिए तंजानिया को 50 करोड़ डॉलर (करीब 3,368.50 करोड़ रूपए) का रियायाती कर्ज देने के लिए भी तैयार हैं। तंजानिया के जलसंसाधन विकास के अलावा स्वास्थ्य सेवाओं, दवाई और मानव संसाधन जैसे क्षेत्रों में भी भारत उसकी मदद करेगा।
  • लघु उद्योगों विकास और वहां आर्थिक विकास व संस्थान बनाने में भी सहयोग देगा।
  • इसके अलावा जंजीबार के जल सप्लाई व्यवस्था के लिए 9.2 करोड़ डॉलर (करीब 619.80 करोड़ रूपए) तक का कर्ज देगा।
  • भारत तंजानिया की राजधानी दार-ए सलाम में 10 करोड़ डॉलर (करीब 671 करोड़ रूपए) की लागत वाली जल संवर्धन परियोजना पूरी कर चुका हैं इस देश में पहले से ही भारत का निवेश करीब तीन अरब डॉलर (लगभग 201 अरब) के बराबर हैं।
  • स्वागत-दार-ए सलाम में भारतीय और अफ्रीकी दोनों मूल के लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया। मोदी ने भी इन्हें निराश नहीं किया। लोगों के पास जाकर हाथ मिलाए। लाल जाजम पार करने के बाद स्थानीय पंरपरा के अनुसार लकड़ी के दो ड्रम रखे हुए थे, एक पर भारत का और दूसरे पर तंजानिया का झंडा लगा हुआ था। इस दौरान मोदी को ड्रम पर भी हाथ आजमाने का मौका मिला। उन्होंने और तंजानिया के राष्ट्रपति मगुफुली दोनों ने अपने-अपने झंडे वाले ड्रम बजाए। कुछ देर बाद मगुफुली रुक गए लेकिन मोदी मूड में थे। उन्हें ड्रम बजाते देख मगुफुली ने फिर से बजाना शुरू किया। इसे ’भारत-तंजानिया जुगलबंदी’ का नाम दिया गया।
  • इस मौके पर दोनों देशों के बीच रिश्ते मजबूत करने और सहयोग बढ़ाने के लिए पांच समझौतो पर दस्तखत किए गए। तंजानिया के राष्ट्रपति जॉन पोंबे जोसेफ मगुफुली से बातचीत के बाद मोदी ने संयुक्त प्रेस (जन समुदाय) सम्मेलन को संबोधित किया। इस मौके पर तंजानिया को भारत का बेहद अहम साझेदार बताया गया। कहा ”राष्ट्रपति मगुफुली और रक्षा और सुरक्षा सहयोग का मजबूत करने पर सहमत हैं। हमने क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर गहराई से बातचीत की।

पांच समझौते निम्न हैं-

  1. जंजीबार जल सप्लाई व्यवस्था के लिए।
  2. जल संसाधन प्रबंधन में भारत का सहयोग।
  3. जंजीबार में वोकेशनल (स्वप्रेरणा से चुना योग्यता) प्रशिक्षण केंन्द्र बनेगा।
  4. डिप्लोमेंट (राजनीतिक कुशल) और आधिकारिक पासपोर्ट धारकों को वीजा (देश आने जाने की अनुमति) में छूट।
  5. भारतीय लघु उद्योग निगम तथा तंजानिया लद्यु उद्योग विकास संगठन के बीच समझौता।

                                                                                                                          नरेश चंद्रा, भारत अमेरिका मामलों के जानकार

  • केरल:-अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस (8 सितम्बर) के मौके पर देश में सबसे पहले संपूर्ण साक्षर हुए केरल के शहर कोट्टयम की इस सफलता की कहानी अभियान से सक्रिय रूप से जुडे कोट्टयम के तत्कालीन कलक्टर अलफांस की जुबानी से।
  • हमारे देश में संपूर्ण साक्षरता अभियान की शुरुआत इसलिए की गई ताकि निरक्षरता का कलंक मिटाया जा सके। साक्षरता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं और इनके नतीजे भी आए है लेकिन आज भी देश संपूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया हैं। मुझे केरल के कोट्टयम जिले में कलक्टर रहने के दौरान यह गौरव हासिल हुआ जब 1989 में कोट्टयम शहर को संपूर्ण साक्षर घोषित किया गया। यह वह दौर था जब हमने संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम की देश में शुरुआत ही की थी। किसी एक शहर को संपूर्ण साक्षर घोषित करने का यह उदाहरण न केवल भारत बल्कि दुनिया में अनुठा था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कोट्टयम में ऐसा क्या था कि लोगों में साक्षर होने की ललक जाग उठी और देश के अन्य कई हिस्सों में आजादी के इतने साल गुजरने के बाद भी हम लोगों के संपूर्ण साक्षर होने का इंतजार कर रहे हैं।
  • कोट्टयम सिद्धांत-दरअसल, कोट्टयम में हमने निरक्षरों को केवल अक्षर या अंकों के ज्ञान तक ही सीमित नहीं रखा। हमार मानना था कि जब तक किसी व्यक्ति को भाषा में दक्ष नहीं किया जाएगा तब तक उसे साक्षर की परिभाषा में रखना ठीक नहीं। कोट्टयम की तरह ही देश के सभी हिस्सों में साक्षरता कार्यक्रम हाथ में लिया जाए तो संपूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल नहीं है। जरूरत इस बात की है कि इसे सरकार का नहीं बल्कि जनता का कार्यक्रम बनाया जाए। मैं कोट्टयम को संपूर्ण साक्षर शहर घोषित करने के लक्ष्य को पाने में जनता के जुड़ाव को जरूर रेखांकित करना चाहूंगा। केरल के महात्मा गांधी विश्वविद्यालय ने 1988 में कोट्टयम शहर का एक सर्वे (दौरा) किया था उसके मुताबिक तब यहां साक्षरता की दर 84 प्रतिशत थी। इस शहर को शतप्रतिशत साक्षर करना कोई कठिन लक्ष्य था भी नहीं था। कलक्टर के नाते मुझे साक्षरता अभियान के लिए बनी समन्वय समिति का अध्यक्ष बनाया गया। नगर निकाय, सरकार और नागरिक सब साक्षरता में जुड़ गए। हमने नारा दिया ’ईच वन टीच वन’ यानी प्रत्येक साक्षर व्यक्ति एक निरक्षर को पढ़ाएगा। करीब 14 हजार स्वयंसेवक तैयार हुए जिनमें 12 हजार महिलाएं थी। इन स्वयंसेवकों ने रहने -खाने या पढ़ाने को कोई खर्चा नहीं लिया। एक तरह से अमीर-गरीब सब इस अभियान में सक्रिय रूप से शामिल थे। अक्षर ज्ञान के बजाए हमने भाषा ज्ञान पर जोर दिया ताकि निरक्षरों को साक्षर होने के बाद वह दैनिक जीवन में उपयोगी रहे। हमारा प्रयास रंग लाया और साल भर में ही हम कोट्टयम को संपूर्ण साक्षर करने में कामयाब हो गए। इन्हें 2009 में श्रेष्ठ विधायक का सम्मान मिला।

                                                                                                                             कलक्टर अलफांस के.जे, केरल पूर्व आईएस

  • भारत और रूस:-अमरीका के साथ हुए ड्रोन समझौते के बाद रूस से भी बड़ा रक्षा सौदा करेंगा। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत अपने पूराने साझेदार रूस के साथ पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान (एफजीएफए) और हल्के हेलिकॉप्टर कैमोव केए-226 टी के निर्माण में साझेदारी करेंगे। इस बड़ा डिफेंस (आक्रमण) योजना के लिए दोनों देश बड़ी डील कर सकते हैं। यह डील परमाणु पनडुब्बी पर होगी। रूस के साथ एस-400 डिफेंस मिलिट्री सिस्टम (आक्रमण फौज व्यवस्था/सिद्धांत/तंत्र) की खरीद के लिए 39 हजार करोड़ का सौदा और परमाणु पनडुब्बी की लीज के लिए भी समझौता हो सकता हैं।

- Published/Last Modified on: October 14, 2016

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