दस उच्च समाचार (Top Ten News Part - 2 in Hindi) (Download PDF)

()

Download PDF of This Page (Size: 365.34 K)

जापान:- पिछले साल जापान की होटलों में इंसानी कर्मचारीगण के स्थान पर जब रोबोटिक कर्मचारीगण के काम करने की खबरें आईं थीं, तभी से आशंका हो गई थी कि इनसे बड़ा खतरा हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उस होटल के मालिक ने एक कर्मचारी को छोड़कर अन्य सभी नौकरों को नौकरी से निकाल दिया था। उसके बाद जापान के अलग-अलग शहरों से ऐसी खबरों आने लगीं। होटलों के बाद रेस्तंराओं में भी रोबोटिक कर्मचारी बढ़ने लगे थे। सर्वप्रथम जापान की जनसमूहों ने ऐसे रोबोट का जोर-शोर से प्रचार किया, जो इंसानों जैसे दिखते और उनकी तरह काम करने में कुछ हद तक सक्षम थे। जापान के बाद चीन व अन्य देशों में यह चलन बढ़ा और इंसानों की जगह रोबोट से काम लेने में हजारों लोगों की नौकरियां चली गई। रोबोट जैसी बनावटी तकनीकी आईटी उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। इस व्यापार के नुकसान को भांपते हुए दुनिया की पांच दिग्गज आईटी जनसमूह एकजुट हो गई हैं। उन्होंने ऐसा संगठन बनाया है, जो रोबोटिक तकनीकी से नौकरियों और इंसानों को बचाएगा।

ये जनसमूह एमेजॉन, फेसबुक, गूगल, आईबीएम और माइक्रोसॉफ्ट हैं। इनका उद्देश्य लोगों के उस डर को खत्म करना है कि मशीनें उनकी तरह सोचने-विचारने लगी हैं और उनकी नौकरियां छीन लेगी। साथ ही नई तकनीक पर सरकार के नियमों को लेकर कॉपोरेट्‌स (सहयोग) की चिंताओं को दूर करना है। दिग्गज जनसमूहों का यह संगठन ऐसे वक्त तैयार किया गया है, जब बनावटी तकनीकी को लेकर सार्वजनिक बहसें तेज हो गई हैं इन बहसों में कई वेरायटी (विविधता) वाले रोबोट और चतुर प्रबंध सेल्फ (स्वयं) ड्राइविंग (चालन योग्यता/चालक) कारें और कार्यस्थलों के ऑटोमेशन (स्वतंत्र) प्रबंध के विषम भी शामिल हैं। इस औद्यौगिक समूह ने इंजीनियरिंग के विकास और साइंटिफिक खोज के नए बुनियादी नैतिक मानक तैयार किए हैं और नए पांच सदस्यों ने इन्हें मंजूरी दी है। इन जनसमूहों के पांच शीर्ष चतुर खोजकर्ता ने हाल ही में सम्मेलन में कहा- हमें लगता है कि यह तकनीक दुनियाभर में सामाजिक और आर्थिक लाभ के लिए बलपूर्वक लाई जा रही है, लेकिन इसके साथ ही हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि इसका कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गलत उपयोग भी हो सकता है। खोजकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि-हमारा उद्देश्य यह बिल्कुल नहीं है कि तकनीकी जनसमूह इस नई तकनीक का उपयोग अपने बनाए नियमों के अनुसार करने लगे। इसकी बजाय वे चाहते हैं कि लोग इसे अच्छी तरह समझें और बनावटी तकनीकी से जुड़े कार्य बेहतर तरीके से किए जाएं।

गूगल के दव्ारा 2014 में खरीदी गई बनावटी तकनीकी विकास जनसमूह ’डीपमाइंड’ के प्रमुख मुस्तफा सुलेमान कहते हैं- हमारा मानना है कि इस तकनीक की क्षमता विश्व को सकारात्मक- में ले जाने की होनी चाहिए। फिलहाल यह सोच पाना मुश्किल है कि इसके नए नमूना को लोगों के साथ कैसे जोड़ा जाए। नया नमूना यानी ’उद्योगों में सहयोग और हर तरह के कार्य में पारदर्शिता’ काम में भी नजर आए।

आईटी उद्योग के समूह ने आठ सिद्धांत जारी किए हैं, जो मशहूर लेखक आईजैक असिमोव के मूल सिद्धांत ’द लॉ ऑफ रोबोटिक्स’ (विधि व्यवस्था, दव्ारा, मनुष्य की तरह काम करने वाली मशीन हैं) पर आधारित है। 1942 में भी विज्ञान से संबंधित कहानियों में उनका वर्णन किया गया है। नए सिद्धांतों के उच्चस्तरीय विचारों में यह बात प्रमुखता में शामिल है कि बनावटी तकनीकी के लाभ ज्यादा से ज्यादा लोगों को मिलें और वे लाभान्वित हों। जनसमूहों यह भी समझ रही हैं कि नई तकनीक के लिए स्थायी नैतिक स्थितियों होनी चाहिए। उन्होंने इंजीनियरों से साफ कह दिया है कि वे हथियारों और ऐसे अन्य टूल्स (कारीगार का औजार) में बनावटी चतुर तकनीकी के उपयोग के खिलाफ हैं, जिनसे मानवाधिकारों का उल्लघंन होता हो। माइक्रोसॉफ्ट खोज के मैनेजिंग (संचालन) िनर्देशक एरिक हॉर्विट्‌ज कहते हैं-पिछले दो या चार सालों में बनावटी चतुर के बारे में जितना जान पाए हैं, उससे चिंताए बढ़ी हैं और उनके बारे में सरकार को भी गलत सूचनाएं दी गई हैं।

खोजकर्ताओं ने कहा कि अब वे एपल और खोज प्रयोगशाला एवं ओपनएआई जैसे गैर लाभकारी संस्थाओं से भी कहेंगे कि वे इस संगठन में शामिल हों और अपनी प्रभावी भूमिकाएं निभाएं।

                                                                                                                                     जॉन मार्कोफ, तकनीकी व ट्रेंड (प्रचलित) विशेषज्ञ

भारत में आईटी उद्योग :-दुनिया के दूसरे देशों की तरह भारत में भी आईटी उद्योग की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। एक वर्ष पहले तक देश की आईआईटी और एनआईटी से लेकर सभी प्रमुख इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय में जिस तरह आईटी ब्रांच (शाखा) के छात्रों को आसानी से केम्पस (महाविद्यालय और विश्वविद्यालय का परिसर) प्लेसमेंट में बेहतर जॉब (नौकरी) मिल जाता था, इन दिनों उसमें बीस से तीस प्रतिशत की गिरावट देखने को मिल रही है। वेतन पैकेज में भी गिरावट देखने को मिल रही हैं। हाल ही वैश्विक सॉफ्टवेयर डाटा और मीडिया कंपनी (आंकड़ा व तथ्य और संचार माध्यम जनसमूह) ब्लूमबर्ग की विवरण-2016 के अनुसार भारतीय आईटी उद्योग की चमक धीरे-धीरे कम होती जा रही है। यह उद्योग अब ऐसी स्थिति में पहुंच रहा है जिससे उबरना काफी मुश्किल हो जाएगा।

आईटी परिदृश्य में मोटे तौर पर तीन तरह की चिंताएं उभर कर सामने आ रही है-

  1. पहली चिंता आईटी क्षेत्र में कारोबार घटने को लेकर है। यूरोपीय संघ के ब्रिटेन से बाहर निकलने (ब्रेग्जिट) के कारण यूरोप और ब्रिटेन में भी आईटी कारोबार घटा है।
  2. दूसरी चिंता अमरीका से आउटसोर्स हो रही आईटी से जुड़ी नौकरियों को कड़ाई से रोकने के लिए अमरीका की ओर से उठाए गए संरक्षणवादी कदमों की है। दुनिया के दूसरे देश भी इन नीतियों को प्रोत्साहन देते दिख रहे हैं।
  3. तीसरी चिंता आईटी कंपनियों (जनसमूहों) में नौकरियों में आ रही भारी कमी की है। ऑटोमेशन रोबोटिक्स तथा कृत्रिम इंटेलिजेंस व्यवस्था बढ़ने के कारण भारतीय आईटी कंपनियों में निचले और मंझोले स्तर पर नौकरियों में भारी कमी हो गई है।

ऐसे में हमे दो बातों पर खास ध्यान देना होगा। ब्रिटेन, अमरीका समेत दुनिया के विकसित देशों को यह बताना होगा कि उनकी ओर से विश्व व्यापार संगठन के तहत उठाए जा रहे संरक्षणवादी कदम न्यायसंगत नहीं है। नई तकनीक बड़ी संख्या में आईटी से जुड़े कार्मिकों को बेकार बना रही है। हमें डिजिटल (अंको दव्ारा संख्या या मात्रा व्यक्त करना) तकनीक और डिजाइन थिकिंग (गंभीर व महत्वपूर्ण विषयों पर विचार करने का सामर्थ्य) जैसी नई तकनीक का प्रशिक्षण देना होगा। हमें आईटी उद्योग की चमक बनाए रखनी होगी।

डॉ. जयंती लाल भंडारी, अर्थशास्त्री, आर्थिक विषयों पर 40 वर्ष के अध्यापन का अनुभव, भारत सरकार की नेशनल एकेडमी फॉर ट्रेनिंग एंड रिसर्च इन सोशल सिक्योरिटी में शोध सलाहकार रहे हैं।

चीन में रोबोट:- चीन ने एक नया प्रयोग करते हुए गुआंगडोंग प्रांत के तीन बंदरगाहों पर दस रोबोट (मनुष्य की तरह काम करने वाला यंत्र) ने सीमा शुल्क अधिकारियों के रूप में काम शुरू कर दिया है। अधिकारियों ने बताया है कि गोंगबेई, हेंगकिन और झोगशान बंदरगाहों पर चीन के सीमा शुल्क अधिकारियों के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा, यह रोबोट का पहला बैच है। शियाओं हाई नामक रोबोट स्टेट ऑफ द आर्ट (राजस्थान की कला हैं) प्रौद्योगिकी से लैस (कम) हैं और सुनने, बात करने, सीखने, देखने और चलने में सक्षम हैं।

रोबोट की खासियत निम्न हैं-

  • पहचान- गोंगबेई कस्टम कार्यालय के निर्देशक जाओं मिन ने बताया कि चेहरा पहचानने वाली तकनीक से युक्त ये रोबोट संदिग्ध लोगों का पता लगाकर अलार्म बजा सकते हैं।
  • भाषा- एक विशेष सीमा शुल्क संबंधी डेटाबेस (कम्यूटर में संग्रहीत विशाल तथ्य सामग्री) के आधार पर यह रोबोट कैंटोनीज, मंदारिन, अंग्रेजी और जापानी सहित 28 भाषाओं और बोलियों में संवालों का जवाब दे सकते हैं। गोंगबेई सीमा शुल्क निदोक झाओ मिन के मुताबिक ये कुछ समस्याओं को हल नहीं कर सकते हैं। सीमा शुल्क अधिकारियों का कहना है कि वह रोबोट को भविष्य में अपने ग्राहक सेवा हॉटलाइन से जोड़ देंगे।

अटलांटिक:-

  • सागर का पहला टेलीग्राफ केबल (मोटी तार) आयरलैंड में टेलीग्राफ (तार भेजने का उपकरण) फील्ड (खेत/मैदान) और न्यूफाउंडलैंड में हाट्‌र्स (गरम) कंटेट के बीच एक जहाज के डेक (जहाज का फ़र्श) से डाला गया था। उसे बिछाने में चार वर्ष लगे थे और 1858 में टूटने से पहले उसने तीन सप्ताह काम किया था। आज समुद्र के अंदर 312 केबल हैं। ये सब मानव के बाल जैसे पतले ग्लास रेशें के इर्दगिर्द लिपटे हैं। ये विश्व का 99 प्रतिशत अंतरमहादव्ीपीय डेटा (आंकड़ व तथ्य) ले जाते हैं क्योंकि उपग्रह से डेटा को पहुंचने में अधिक समय लगता है। इसमें 670 खरब रुपए का कारोबारी लेनदने शामिल है। हर तीसरे दिन एक केबल की रिपेयरिंग (मरम्मत) होती है।
  • सामन्यत: मछलीगर जहाज का लंगर केबल को नुकसान पहुंचाते हैं। हालांकि, 2015 में अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने पाया कि रूसी पनडुब्बियां और पानी के अंदर काम करने वाले उपकरणों से लैस (कम) एक जासूसी जहाज केबल रुट के आसपास चल रहे थे। समुद्र तट के पास केबल लाइनें (रेखाएं) सुरंगों के भीतर दबी रहती है। लेकिन, गहरे समुद्र में वे तलहटी पर पड़ी रहती हैं। नए रूट (रास्ता) के सर्वे का खर्च बचाने के लिए उन्हें पुरानी लाइनों के पास ही बिछाया गया है।
  • शीत युद्ध के दौरान अमेरिका सोवियत सेना की केबल लाइन पर नजर रखता था। हर माह टेप (फीता, कुछ बाँधने के लिए) निकालने के लिए गोताखाारोंं को समुद्र में भेजा जाता था। आज वे रेशे ऑप्टिक (दृष्टि संबंधी) केबलों (तारों) में संदेश ले जाने वाले प्रकाश का रास्ता बदलने के लिए प्रिज्म का उपयोग करते हैं। लेकिन, एडवर्ड स्नोडेन ने बता दिया है, अमेरिका को चिंता करने की जरूरत नहीं है। राष्ट्र सुरक्षा एजेंसी (कार्यस्थान) की पहुंच अमेरिका से गुजरने वाले हर डेटा तक है।
  • यह स्थिति जल्द बदल सकती है। ग्लोबल वार्मिंग से आर्कटिक सागर की बर्फ पिघलने के कारण उत्तर पश्चिम का रास्ता एशिया से यूरोप के बीच केबल बिछाने वाले जहाजों के लिए खुल गया है। इससे मिली सेंकड की चिंता करने वाले फाइनेंशियल (वित्तीय) कारोबारियों के लिए ट्रांसमिशन (भेजना) तेजी से हो सकेगा। भविष्य में केबल लाइनें अमेरिका की सामान्य निगरानी में रहेंगी। वैसे, केबल लाइनों को खतरे और भी हैं। 2012 में हार्वर्ड की एक खोज में चेतावनी दी थी कि समुद्र तटों के पास केबल के टर्मिनल (बिजली के तारो के सिरे) हैकरों या विदेशी सेंध का निशाना बन सकते हैं। केबलों की सुरक्षा परमाणु प्रतिष्ठान के समान ही होनी चाहिए।

आंकड़े निम्न हैं-

  • 2017 में आर्कटिक के दूरस्थ इलाकों में हाई स्पीड (उच्च गति) इंटरनेट पहुंच सकती है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के कारण पहले बर्फ से ढंके रहने वाले पानी में केबल बिछाए जा रहे हैं।
  • 10 डॉलर (अमेरिका आदि की प्रचलित मुद्रा) प्रति शब्द के हिसाब 1866 में पहले ट्रांस (उस पार) अटलांटिक केबल के माध्यम से टेलीग्राफ भेजा गया था।
  • केबलों को लंगर डालनें और मछलीमार जहाजों से 70 प्रतिशत क्षति पहुंचती हैं। हर साल 100 से अधिक केबल टूटते हैं।
  • समुद्री केबल किसी मानवीय बाधा या क्षति के बिना 25 प्रतिशत औसतन चल सकते हैं।

                                                                                                                                                                       कार्ल विक, एमिली बरोन

अमेरिका:-

  • इंटरनेट की एड्रेस (पता) किताब पर जिसका नियंत्रण है, उसके ही हाथ में नेटवर्क के जीवन और मृत्यु का अधिकार है। डोमेन नेम हटा दीजिए तो किसी वेबसाइट का पता नहीं लगेगा और ई-मेल नहीं भेजे जा सकेंगे। वर्तमान में यह अधिकार अमेरिका के पास है, लेकिन यह लंबे समय तक नहीं रहेगा। 1 अक्टुबर को अमेरिकी सरकार यह ठेका खत्म होने देगी, जिसके तहत उसका इंटरनेट कॉपारेशन फॉर एसांइड नेम्स एंड नंबर्स (नाम और संख्या) (आईसीएएनएन) पर नियंत्रण नहीं रहेगा। यह संस्था इंटरनेट का एड्रेस संभालती है।
  • रिपब्लिकन पार्टी (दल) के सीनेटर (सीनेटर सदस्य) टेड क्रूज (युद्ध) सहित कई लोगों का तर्क है, यह तो इंटरनेट छोड़ने जैसा होगा। क्रूज इसे रोकने के लिए सरकारी कामकाज ठप (शटडाउन) करने का जोखिम उठाने तक के लिए तैयार हैं। उनका कहना है- नियंत्रण छोड़ने से चीन, ईरान और रूस जैसे देशों की तानाशाह सरकारों के हाथ में ऑनलाइन कंटेट आ जाएगा, जबकि सच इसके उलट है। इंटरनेट को संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर सरकारी संगठन से मुक्त रखने के लिए अमेरिकी सरकार ने 1998 में आईसीएएनएन के गठन में सहायता की थी। इसमें न केवल सरकारों बल्कि इंजीनियरों (अभियंतो) नेटवर्क ऑपरेटों (कार्य में होना) और इंटरनेट यूजर (उपयोगकर्ता) तक का दखल है। चूंकि इस तरह के संगठन की कोई परंपरा नहीं थी और वैधता का प्रश्न उठने की आशंका थी, इसलिए अमेरिका ने इंटरनेट एड्रेस की मास्टर (मालिक) सूची में परविर्तन का अधिकार अपने पास रखा। उसने वादा किया कि संगठन के सक्षम होने के बाद वह हट जाएगा।
  • जब आईसीएएनएन का गठन हुआ तब ऐसे प्रबंध का अर्थ था क्योंकि इंटरनेट का तेवर अमेरिकी था और उसके अधिकतर यूजर भी अमेरिकी थे, लेकिन अब अधिकतर नेटिजन्स कहीं और रहते हैं। इनकी सबसे अधिक संख्या चीन और भारत में है। 2013 में पता लगने के बाद कि राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (कार्यस्थान) ने दुनियाभर में इंटरनेट यूजर्स की जासूसी की है, अमेरिका पर वादा निभाने और नियंत्रण खत्म करने का दबाव बढ़ा। 2014 में अमेरिकी सरकार ने कहा- वह ऐसा करने के लिए तैयार है, बशर्त आईसीएएनएन वास्तव में स्वतंत्र हो और अन्य सरकारों व्यावसायिक ताकतों के दबाव में निपटने में सक्षम हो। आईसीएएनएन दव्ारा इस वर्ष कई सुधार लागू करने पर सहमति जताने के बाद ओबामा प्रशासन ने संगठन को पूरी जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय लिया है। ऐसा करना उचित है। इंटरनेट को ग्लोबल होना चाहिए। लेकिन, सुरक्षा के राष्ट्रीय प्रबंध (फायरवॉल) और संबंधित देश में कुछ वेरायटी के डेटा स्टोर (आंकड़ा व तथ्य को एकत्र) करने के नियमों से इसके विभाजित होने का खतरा पैदा हो गया है। 1 अक्टुुबर से प्रभावी नए डेटा नियम में रूसी नागरिकों से संबंधित व्यक्तिगत जानकारी रूस स्थित डेटाबेस (कंयूटर में आंकड़ों का समूह) में रखने का प्रावधान है। आईसीएएनएन की निगरानी से अमेरिका के हटने पर चीन, रूस अपने क्षेत्र के इंटरनेट पर अपने नियम लागू करने की कोशिश करेंगे। दूसरी तरफ आईसीएएनएन की आजादी रोकने से इंटरनेट को आगे बढ़ाने वाला नमूना कमजोर हो जाएगा। साइबर सुरक्षा घृणा फेलाने वाले कंटेट, डेटा फ्लो (आपूर्ति) जैसे इंटरनेट के पेचीदा मुद्दे राजनीतिक और तकनीक प्रकृति के हैं।
  • आईसीएएनएन में खामियां हैं उसकी प्रक्रियाएं अफसरशाही जैसी हैं, फिर भागीदारी का नमूना इंटरनेट एड्रेस के लिए उलझन भरी समस्याओं को सुलझा सकता है। टेड क्रूज इंटरनेट पर अमेरिकी सरकार के नियंत्रण की समाप्ति रोकने में विफल हो सकते हैं। लेकिन, कानूनी अनिश्चिताएं बनी रहेंगी। रिपब्लिकन सांसद अदालत जाकर हस्तांतरण की प्रक्रिया रोक सकते हैं और अमेरिकी सरकार को आईसीएएनएन का नियंत्रण वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
  • अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के कंप्यूटर प्रबंध को हैक (काटना) करने का मामला सुर्खियों में छाया रहा। इस बात पर लोगों का ध्यान कम ही रहा कि रूसी हैंकरों की दो टीमें (दले) काम कर रही थीं। वे एक-दूसरे की गतिविधियों से अनभिज्ञ थीं। इनमें से एक फैन्सी बियर (यह नाम साइबर सुरिक्षा फर्म क्राउड स्ट्रइक ने दिया है।) का संबंध रूसी सेना की खुफिया एजेंसी जीआरयू से है। उसका उद्देश्य सूचना लीक (उजागर) करना था। एक अन्य समूह कोजी बियर डेमोक्रेटिक पार्टी के कंप्यूटर नेटवर्क के अंदर था। वह पार्टी की अंदरूनी कार्यप्रणाली की सूचनाएं एकत्र कर रहा था। अगर ई मेल लीक नहीं होते तो प्रभावित पक्ष को पता ही नहीं लगता कि उनकी निगरानी हो रही है। अमेरिका में सबसे बड़ी चिंता हैंकिग नहीं बल्कि वोटिंग (मतदाता) मशीनों (यंत्रो) को निशाना बनाने की आशंका से जुड़ी है। इससे चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती हैं।

इस समय दुनियाभर में 1.1 अरब वेबसाइट ऑनलाइन हैं और इस वर्ष पहली बार ग्लोबल इंटरनेट ट्रैफिक एक जेटाबाइट से आगे निकल जाएगा। एक जेटाबाइट ट्रैफिक 15.20 करोड़ वर्ष हाई डेफिनेशन वीडियों के बराबर है।

कनाडा और जर्मनी:-

  • में पानी के अंदर ग्रिड (जाली) की बिजली को एकत्र करने का प्रयोग किया जा रहा है। टोरंटो में ओंटारियों झील की तलहटी में एक वर्ष पहले प्रोजेक्ट (योजना) की शुरुआत की गई है। केमरन लुइस की कंपनी (जनसमूह) हाइड्रोस्टोर (जल विषयक, एकत्र) ने उसका डिजाइन (रूपरेखा) किया है। प्लांट (पौधा) को स्थानीय बिजली जनसमूह टोरंटो हाइड्रो संचालित कर रही है।
  • बिजली एकत्र करने का प्लांट हवाओं से चलता है। जमीन पर हवा को अवदाब करने के बाद ढाई किलोमीटर के पाइपों के जरिये सतह से 55 मीटर नीचे झील की तलहटी पर एक स्टेशन (स्थान) में भेजा जाता है। वहां पानी की एक टंकी वातावरण के सामान्य दाब से पांच गुना अधिक दबाव पैदा करती है। हवा को एक्युमुलेटर्स नामक छह गोलाकार थैलों गुब्बारा में एकत्र करते हैं। एक थैले की क्षमता 100 क्यूबिक (घनाकार) मीटर है। दबाने से वायु गर्म होती है और इस तरह उत्पन्न गर्मी को बाद में उपयोग के लिए एकत्र कर लेते हैं। अवदाब हवा में एकत्र हो गई एनर्जी (शक्ति) से जब बिजली बनाते हैं तो पूरी प्रक्रिया उलटी कर दी जाती है। हवा को पाइपों में छोड़ते हैं और वह सतह पर स्थिति प्लांट में जाती है। वहां उसके फेलने से टर्बाइन(इंजिन या मोटर)चलते हैं और बिजली बनती है। जिस तरह हवा दबाने से वह गर्म होती है, वैसे ही फेलाने से ठंडी पड़ती है। हाइड्रोस्टोर के अनुसार ओंटारियो प्लांट उसमें एकत्र की गई 60-70 प्रतिशत बिजली को फिर पैदा कर सकता है। वह करीब 400 किलोवॉट बिजली बनाता है।
  • जनसमूह अब अमेरिकी इंजीनियरिंग फर्म ऐकॉम के साथ मिलकर ओंटारियों राज्य में हुरन झील पर 1.75 मेगावॉट का प्लांट लगाएगी। पानी के अंदर बिजली एकत्र करने का दूसरा प्लांट 11 नवंबर से कैसल, जर्मनी में शुरू होगा। इसका विकास फ्राउन (तेवर) होफर विंड (हवा) एनर्जी इंस्टीट्‌यूट और एनर्जी सिस्टम टेक्नोलॉजी (शक्ति, संस्थान और शक्ति, प्रबंध, शिल्प कला विज्ञान में निपुण) ने किया है। इसमें हवा की जगह पानी का उपयोग किया जाएगा। कांस्टेंस झील में 100 मीटर नीचे पानी का स्टोर कर वातावरण के सामान्य दाब से दस गुना अधिक दबाव पैदा किया जाएगा। पानी का स्टोरेज कांक्रीट की गोल टंकियों में होगा। स्टोरिंग एनर्जी एट-सी नामक सिस्टम जब चालू होगा तो टंकियों का पानी झील में छोड़ा जाएगा। फिर पानी के अंदर खींचने से टर्बाइन चलने लगेंगे और बिजली पैदा होगी। प्लांट की पूरी मशीनरी पानी के अंदर होने के कारण इसकी सर्विसिंग (मरम्मत) में कठिनाई होगी।

निकारगुआ:-

  • मध्य अमेरिका के सबसे बड़े देश निकारागुआ में पूर्व मार्क्सवादी छापामार डेनियल ओर्तेगा लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति बन गए हैं। वे उससे पहले भी एक बार राष्ट्रपति रह चुके हैं। उनकी पत्नी रोजारियों मुरिलो देश की उपराष्ट्रपति होंगी। वामपंथी विद्रोही रहे ओर्तेगा देश में बेहद लोकप्रिय है। मतदान के बाद मतों की गिनती तक उन्हें 72 प्रतिशत मत मिल चुके हैं। उनके निकटतम प्रतिदव्ंदव्ी मैक्सिमिनो रोद्रग्वेज को केवल 14.2 प्रतिशत मत ही मिल सके है। चुनाव के दौरान अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को निगरानी की इजाजत नहीं दी गई थी। परिणाम आते ही सड़कों पर हजारों लोग जश्न मनाने निकल पड़े। निकारागुआ में 1979 में तानाशाह अनासतासियों सोमोजा के तख्ता पलट के बाद से चुनाव लगभग इकतरफा ही रहे हैं।
  • डेनियल ओर्तेगा 11 नवंबर 1945 को जूते बनाने वाले परिवार में जन्में। क्यूबा की मदद से तानाशाह सोमोजा का तख्ता पलटा। 1979 से 1985 तक निकारागुआ के शासके रहे। 1985 से 1990 तक राष्ट्रपति। फिर 2007 से अब तक राष्ट्रपति। विपक्ष ने तानाशाही और परिवादवाद का आरोप लगाया। लेकिन पत्नी को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना कर बताया कि लोकतंत्र के रास्ते ही सत्ता चलाएंगे।
  • ओर्तेगा की पत्नी रोजारियों निकारागुआ की पहली महिला हैं और अब पहली महिला के साथ ही उपराष्ट्रपति भी होंगी। वे पहले से ही राष्ट्रपति भवन में सबसे ताकतवर हस्ती रही हैं। सरकार की प्रवक्ता रही हैं। 22 जून 1951 को जन्मी रोजारियो ने 1979 में डेनियल से शादी की थी। दोनों के 8 संतान हैं। 1969 में वे सांदिनिस्ता छापामार गुट में शामिल हुई। स्विट्‌जरलैंड से विद्यालयी और महाविद्यालय की शिक्षा ली, कैंब्रिज और निकारगुआ में पढ़ाई की। अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषा में सर्टिफिकेट कोर्स (प्रमाणपत्र पाठ्‌यक्रम) किए। वे स्पेनिश, इटैलियन और जर्मन की भी जानकार हैं। उन्होंने प्रमुख अखबार ’ला प्रेन्सा’ में काम किया और कई किताबें लिखी हैं। वे राष्ट्रपति बनने की इच्छा भी जता चुकी हैं।

                                                                                                                                                                             एजेंसी, मानागुआ

सार्क सम्मेलन:-

  • पाकिस्तान के इस्लामाबाद में नवंबर में प्रस्तावित दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सम्मेलन में भाग लेने से भारत समेत चार देशों ने मनाही कर दी है। वहीं सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे नेपाल ने इसके स्थगन की घोषणा कर दी है। मौजूदा परिस्थिति पाक प्रायोजित आतंकवाद का ही नतीजा है। पहले पठानकोट और अब उरी में आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को अलग-थलग करने के भारत के अभियान में इस कदम को बड़ी सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। दक्षिण एशिया के आठ सदस्य देशों के इस सम्मेलन में इन देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होते हैं। यह पहली बार है जब भारत ने सार्क में हिस्सा लेने से इनकार किया है। यह भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जा सकती है। इससे विश्वव्यापी संदेश जाएगा। दुनिया को मालूम चलेगा कि पाकिस्तान आतंक का केंद्र बन चुका है और पड़ोसी देश उसके फैलाए आतंक से परेशान हैं। अमरीका सहित पश्चिमी देशों को भी पाक के आतंक को गंभीरता से लेना पड़ेगा। भारती की संयुक्त राष्ट्र संघ में भी पैठ बढ़ेगी। जिस तरह से अन्य सार्क देशों ने भारत का साथ दिया है उससे सभी को लगेगा कि भारत दक्षिण एशिया प्रतिनिधित्व करता है।
  • सार्क का गठन वर्ष 1985 में दक्षिण एशिया के राष्ट्रों के बीच पारंपरिक संबंधों को बढ़ावा देने के मकसद से किया गया था। इसमें आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग शामिल था। सार्क के गठन के समय दो मुख्य नियम निर्धारित किए गए थे। पहला यह कि सार्क के निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएंगे और दूसरा नियम था कि सार्क में दव्पक्षीय मुद्दों पर चर्चा नहीं की जाएगी। सार्क का धीरे-धीरे विकास हुआ तो नए मुद्दे सामने आते गए। पर्यावरण, ऊर्जा जैसे मुद्दों पर चर्चा की जानी लगी। इसी दौरान दक्षिण एशिया में आतंकवाद जोर पकड़ने लगा। भारत, श्रीलंका जैसे देशों में पनपते आतंकवाद के मद्देनजर 1987 में सार्क में आतंकवाद के खिलाफ सहयोग को लेकर भी समझौता हुआ। सार्क में व्यापार की सुगमता के लिए 1996 में समझौते की पहल की गई जो 2006 में जाकर पूरा हुआ। भारत ने नेपाल, बांग्लादेश और भूटान जैसे छोटे देशों को व्यापारिक रियायतें दी। कुछ देशों को मोस्ट फेवर्ड नेशन (सर्वोच्च वरीयता वाले राष्ट्र) का दर्जा दिया जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है। इसमें किसी तरह की अतिरिक्त सुविधा नहीं दी जाती लेकिन यह निश्चित किया जाता है कि उस देश के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा। हम यह देख रहे हैं कि इन सबके बावजूद दक्षिण एशिया के इन देशों के बीच आपसी व्यापार कुल व्यापार का पांच फीसदी से भी कम है। सार्क में आपसी विवाद पहले भी हावी रहे हैं। आपसी विवाद की वजह से ही सार्क सम्मेलन 1998 के बाद 2002 में हो पाया। भारत की मंशा शुरू से ही क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने की रही है पर अन्य राष्ट्रों खासकर पाकिस्तान की वजह से इसमें कई बार बाधाएं आ जाती है। पाकिस्तान अन्य देशों के आतंरिक मामलों में दखल कर रहा है। इसका सबसे बड़ा शिकार बांग्लादेश बना है। वहां पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (कार्यस्थान) आईएसआई को बढ़ावा देती रही है अफगानिस्तान में तालिबान को भी पाक बढ़ावा दे रहा है। अफगान सरकार सुरक्षा मामलों में पाकिस्तान से सहयोग चाहती थी पर यह सहयोग नहीं मिलने से भी वह पाक से रूष्ट है। भूटान और भारत के संबंध बहुत बेहतर है और दोनों एक-दूसरे का साथ दते रहे हैं। सार्क सम्मेलन के बहिष्कार की बांग्लादेश ने पहल की ओर कहा कि जो देश इसका आयोजन कर रहा है वह दूसरे देशों के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप कर आतंकवाद का समर्थन करता है। इसलिए बांग्लादेश सम्मेलन में शामिल नहीं होगा। इन देशों का साथ आना सरकार की सबसे पहले पड़ोसी की नीति की जीत है।
  • सार्क देशों के साथ भारत ने सदैव सहयोग की नीति अपनाई है। मोदी के शपथग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रमुखों को आमंत्रित किया गया। उन्होंने रिश्ते सुधारने के लिए लाहौर की यात्रा तक की परवाह नहीं की लेकिन पाक के रवैये में कोई सुधार नहीं हुआ। भारत ने पिछले सार्क सम्मेलन में सार्क सैटेलाइट (उपग्रह) की घोषणा की थी पर पाक इससे पीछे हट गया सार्क पावरग्रिड (शक्ति जाली) की बात हो या सार्क कनेक्टिविटी की, पाक ने हर बार अड़ंगा लगाया। इन कारणों से पाक सार्क में पहले ही अलग-थलग हो गया था। भारत ने सार्क के इतर संगठनों में बांग्लादेश, भूटान, इंडिया (भारत) और नेपाल के लिए (बीबीआईएन) व भारत, बांग्लादेश, म्यांगामर, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान, नेपाल (बिस्मेटक) शामिल है। हालांकि भाारत ने इन संगठनों के माध्यम से पाक को अलग करते हुए पड़ोसी देशों से संबंध ओर मजबूत किए है। अफगानिस्तान को सार्क में शामिल कराने में भी भारत की भूमिका ही रही। यह माना जाना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी मजबूत होगी। द. एशिया से भारत स्वाभाविक दावेदार माना जाएगा।

प्रो. संजय भारदव्ाज, दक्षिण एशिया मामलों के जानकार, जेएनयू नई दिल्ली में अध्यापन का 16 वर्ष का अनुभव, अंतरराष्ट्रीय मसलों पर शोध कार्य

नई दिल्ली:-

  • सार्क सम्मेलन रद्द होने से पाक की किरकिरी हुई है। अब भारत बिमस्टेक यानी ’द बेय ऑफ बंगाल इनिशिएटव फॉर मल्टी सेक्टरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कॉरपोरेशन’ (तकनीकी विधियां और अर्थशास्त्र संस्था) की बैठक के जिरए पड़ोसी को कड़ा संदेश देगा। भारत बिमस्टेक में अफगानिस्तान व मालदीव जसे देशों को भी आमंत्रित कर रहा है जो इसके सदस्य नहीं है। सार्क बैठक में जो मुद्दे उठने थे, उन पर भी इस दौरान चर्चा की जा सकती है। जानकारों का मानना है कि भारत की रणनीति से पड़ोसी मूल्क अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़रों में अलग थलग पड़ जाएगा। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि बिमस्टेक में आतंकवाद का मुद्दा उठाया जाएगा। विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि मोदी ने बेहद असरदार कूटनीति को चुना है।
  • भारत अब सार्क के बजाय बिमस्टेक पर ध्यान देना चाहता है। इस कारण अक्टूबर में गोवा में होने वाली ब्रिक्स देशों के नेताओं को भी न्यौता दिया है। इस मौके पर भारत एक नए संगठन की नींव रख सकता है जिसमें पाक के लिए कोई जगह नहीं होगी और ना ही वो इसमें बाधा डाल पाएगा। विदेश नीति के जानकारों को कहना है बिमस्टेक की बैठक पाक पर चोट की तरह होगी

भारत और न्यूजीलैंड:-

  • के संबंधों को यूं तो सिर्फ क्रिकेट और कॉमनवेल्थ (राज्य संघ) की सदस्यता की साम्यता से जोड़ा जाता है लेकिन पिछले पांच वर्षो से दोनों देशों के बीच कई मामलों में समानता सामने आई है। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री जॉन की, 2011 में भारत आए थे और उनकी भारत यात्रा मुम्बई से शुरू होकर दिल्ली से होते हुए कोच्ची में पूरी होगी। इन दिनों भारत अपनी विदेश नीति में दो बातों को लेकर फोकस (क्रियाविधि, रुचि आदि का केंद्र बिंदु) कर रहा है। पहली न्यूक्लियर सप्लायर्स समूह (एनएसजी) की सदस्यता और दूसरी आतंकवाद का मुकाबला। मोदी जी और जॉन की के बीच बातचीत का प्रमुख मुद्दा भारत को एनएसजी की सदस्यता का रहने वाला है। जून में सियोल में हुई बैठक में एनएसजी के 48 सदस्य देशों में से ग्यारह ने भारत के प्रति नकरात्मक रुख रखा था। इनमें चीन के तीखे तेवरों का साथ देने वाले देशों में न्यूजीलैंड भी शामिल था। उसने भी चीन की इसी बात को दोहराया कि अभी इस मसले पर विचार विमर्श की जरूरत है। हमारे प्रधानमंत्री न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री को यह बताने की कोशिश जरूर करेंगे कि एनएसजी की सदस्यता क्यों जरूरी है। परमाणु अप्रसार के मामले में भारत का प्रमाण दुनिया की नजर में बहुत अच्छा है। हमने जलवायु परिवर्तन के संबंध में पेरिस समझौते पर भी हस्ताक्षर कर इस बात का आश्वासन दिया है कि हम 2030 तक गैर शैलीय ऊर्जा संसाधनों से 40 फीसदी तक बिजली का उत्पादन करेंगे। इस तरह की बिजली के उत्पादन के लिए न्यूक्लियर (परमाणु अस्त्र) तकनीक की आवश्यकता है। न्यूक्लियर ऊर्जा को तुलनात्मक रूप से स्वच्छ ऊर्जा माना जाता है। इसलिए न्यूजीलैंड को इस बात का समर्थन करना चाहिए कि भारत को एनएसजी की सदस्यता हासिल हो। विएना में एनएसजी की सभा होने वाली है। ऐसे में यहां दोनों देशों के बीच बनने वाली सहमति काफी महत्व रखती है। भारत के लिए यह अवसर इसलिए भी अहम है कि वह न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री से यह उम्मीद करता है कि जब दोनों देशों प्रधानमंत्री संयुक्त वक्तत्य जारी करें तो आतंकवाद के मसले पर न्यूजीलैंड भी भारत के साथ खड़ा नजर आना चाहिए। भारत की विदेश नीति में आतंकवाद से लड़ने का मुद्दा हमेशा से अहम रहा है।
  • न्यूजीलैंड के पीएम की यह यात्रा एकतरफा नहीं हैं जाहिर हैं कि न्यूजीलैंड भी उभरती आर्थिक व्यवस्था वाले भारत से व्यावसायिक संबंध मजबूत करना चाहता है। क्योंकि शीत युद्ध के दौर में न्यूजीलैंड का दोस्त अमेरिका था तो हमारी तत्कालीन सोवियत संघ से प्रगाढ़ता थी। इसलिए न्यूजीलैंड से हमारे संबंध मधुर तो रहे लेकिन प्रगाढ़ कभी नहीं रहे। शीतयुद्ध के बाद हमने लुक (अभिव्यक्ति) ईस्ट (पूर्व दिशा) नीति पर गौर किया तो न्यूजीलैंड से ब्रिटिश भारत के दौर में भी हमारे व्यापारिक संबंध रहे हैं। हमारे यहां से तम्बाकु, चीनी व चाय न्यूजीलैंड जाती थी और इसकी एवज में वहां से टिम्बर आता था। लेकिन न्यूजीलैंड हमसे 1974 के दौर में खफा हुआ जब हमने परमाणु परीक्षण किया। इसके बाद राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में दोनों देशों में फिर से संबंध थोड़े प्रगाढ़ हुए। फिर से वर्ष 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव आता रहा। देखा जाए तो भारत-न्यूजीलैंड का राजनीतिक व सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है।
  • हमारे शहरों जैसे नाम वहां भी है। भारतीय मूल के करीब दो लाख लोग वहां रहते हैं। करीब 23 हजार भारतीय विद्यार्थी वहां पढ़ते हैं। ऐसे में चीन के साथ न्यूजीलैंड के संबंध केवल व्यावसायिक हैं और हमारे संबंध सामाजिक भी हैं। कृषि, पर्यटन व शिक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों की साझेदारी है। एक उम्मीद यह भी की जा रही है कि इस यात्रा से दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग की शुरुआत भी हो सकती है। दोनों देश संयुक्त नोसेना अभ्यास कर चुके हैं। सूडान व कोसोवो में गई संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना में दोनों देशों के जवान शामिल रहे हैं। जब हमारा पड़ोसी देश चीन आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान का खुला समर्थन करता दिख रहा है, तो भारत व न्यूजीलैंड के बीच सामरिक सहयोग से बेहतर नतीजे आ सकते हैं। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी गत मई में न्यूजीलैंड जाकर आए हैं। ऐसे में भौगोलिक दृष्टि से दूर दोनों देशों के बीच संबंध कारोबारी व सामाजिक दृष्टि से आगे सामरिक और सुरक्षा साझेदारी की नजदीकियों की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं।

प्रो. स्वर्ण सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार, जेएनयू, नई दिल्ली में कार्यरत, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, निरस्त्रीकरण और रक्षा नीति मामलों के विशेषज्ञ

- Published/Last Modified on: January 10, 2017

None

Monthy-updated, fully-solved, large current affairs-2018 question bank(more than 2000 problems): Quickly cover most-important current-affairs questions with pointwise explanations especially designed for IAS, CBSE-NET, Bank-PO and other competetive exams.