Minimum Capital Requirements, Enhancing Risk Coverage, Leverage Ratio

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बेसेल III

  • भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत में बासेल III पूँजी विनियमन को लागू करने के लिए प्रस्तावित दिशानिर्देशों को दर्शानें वाला प्रारूप् जारी किया। उक्त दिशानिर्देश दिसंबर 2010 में जारी बैंकिंग पर्यवेक्षण पर बासेल समिति (बीसीबीएस) के बेसेल III बैंकों प्रणालियों को अधिक लचीला बनाने के लिए एक वैश्चिक विनियामक ढांचा नामक व्यापक सुधार पैकेज के अनुपालन में जारी की गई है।

  • प्रारूप दिशानिर्देशों की मुख्य-मुख्य बातें निम्नानुसार है:-

यूनतम पूँजी आवश्यकताएँं (Minimum Capital Requirements)

  • सामान्य ईक्विटी टियर (सीइटी) पूँजी को जोखिम भारित आस्तियों (आरडब्लूए) का कम-से-कम 5.5 प्रतिशत होना चाहिए।

  • टियर 1 पूंजी जो जोखिम भारित आस्तियों का कम -से-कम 7 प्रतिशत होना चाहिए और

  • कुल पूँजी को जोखिम भारित आस्तियों का कम -से-कम 9 प्रतिशत होना चाहिए।

  • पूँजी संरक्षण बफ्फर (Capital Conservation Bffuer)

  • पूँजी संरक्षण बफ्फर को जोखिम भारित आस्तियों का 2.5 प्रतिशत सामान्य इक्विटी के रूप में होना चाहिए।

  • अंतरण व्यवस्थाएंँ (Transitional Arrangements)

  • यह प्रस्तावित है कि न्यूनतम पूँजी आवश्यकताओं और सामान्य इक्विटी से कटौती को लागू करने की अवधि 1 जनवरी 2013 से शुरू होगी और 31 मार्च 2017 को पूर्ण रूप से लागू हो जाएगी।

  • पूँजी संरक्षण बफ्फर आवश्यकताओं को 31 मार्च 2014 और 31 मार्च 2017 के बीच लागू करने का प्रस्ताव है।

  • ऊपर उल्लिखित लागू करने का समय इन दिशानिर्देशों पर प्राप्त प्रतिसूचना को ध्यान में रखते हुए अंतिम रूप से निर्धारित किया जाएगा।

  • विनियामक पूँजी लिखतों के रूप जो लिखत अब अर्हक नहीं है को चरणबद्ध रूप से 1 जनवरी 2013 से 31 मार्च 2022 के दौरान हटा दिया जाएगा।

जोखिम कवर को बढ़ाना (Enhancing Risk Coverage)

काउंटरों पर किए डेरिवेटिवज के लिए मौजूदा एक्सपोजर पद्धति के अंतर्गत काउंटर पार्टी चूक जोखिम के लिए पूँजी प्रभार के अलावा बैंकों को अतिरिक्त ऋण मूल्य समायोजन (सीवीए) जोखिम पूँजी प्रभार की गणना करनी होगी।

लिवरेज अनुपात (Leverage Ratio)

लिवरेज अनुपात के लिए समकक्ष दौर 1 जनवरी 2013 से 1 जनवरी 2017 तक होगा, जिसके दौरान बैंको से अपेक्षा की जाती है कि वे 5 प्रतिशत का न्यूनतम टियर पर लिवरेज अनुपात को प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। लिवरेज अनुपात आवश्यकताएँ को बासेल समिति के अंतिम प्रस्ताव को ध्यान में लेते हुए उसे अंतिम रूप दिया जाएगा।

केवायसी

  • ”अपने ग्राहक को जानिए” के लिए एक परिवर्णित शब्द केवायसी है, जिसका उपयोग ग्राहक पहचान प्रक्रिया के लिए किया जाता है। इसमें खातों के हितार्थी स्वामी की सही पहचान, निधि के स्त्रोत, ग्राहक के उद्योग का स्वरूप, ग्राहक के कारोबार के संबंध में खाते के परिचलान में उचितता इत्यादि शामिल जिससे बैंकों को विवेकसम्मत जोखिम प्रबंधन में मदद मिलती है। केवायसी दिशानिर्देशों का उद्देश्य है कि अपराधिक तत्वों दव्ारा जानबूझकर अथवा अनजाने में काले धन को वैध बनाने के लिए बैंकों का प्रयोग करने से बचाता।

  • केवायसी में दो घटक हैं पहचान और पता। जब पहचान वही रहती है पता बदल सकता है और इसलिए बैंको को चाहिए कि वे उनके अभिलेखों को आवधिक अंतराल पर अद्यतन करें।

  • ये दिशानिर्देश बैंककारी विनियमन अधिनियम 1949 की धारा 35 क तथा धनशोधन निवारण (लेने-देन) की प्रकृति और मूल्य के अभिलेख का रखरखाव, बैंकिंग कंपनियों वित्तीय संस्थाओं और मध्यवर्ती संस्थाओं के ग्राहकों की पहचान के अभिलेख का सत्यापन और रखरखाव तथा सूचना देने का समय व रखरखाव की क्रियाविधि नियमावली 2005 के अंतर्गत जारी किये गये हैं।

  • ग्राहक की पहचान से तात्पर्य ग्राहक को अभिनिर्धारित करना और विश्वसनीय, स्वतंत्र स्त्रोत, दस्तावेज अथवा सूचना दव्ारा उनका सत्यापन करना। बैंकों को विभिन्न स्तर पर सूचित किया गया है की वित्तीय लेनदेन करने अथवा पहले प्राप्त की गयी ग्राहक पहचान के बारे में बैंको को उसकी प्रामाणिकता/सत्यता अथवा पर्याप्तता के बारे में संदेह है, बैंकिंग संबंध स्थापित करते समय विभिन्न स्तर पर ग्राहक पहचान प्रक्रिया निर्धारित करें।

  • ग्राहकों की जानकारी जैसे कि उसका सामाजिक/वित्तीय स्तर, कारोबार की गतिविधि का स्वरूप उनके ग्राहकों का कारोबार और स्थान, खाता खोलने का प्रयोजन और कारण, रिश्ते के अंतर्गत उपयोग में लाये जाने वाले निधि का स्रोत और व्यवसाय/नौकरी संबंधी विवरण, संपत्ति का स्रोत, अपेक्षित मासिक विप्रेषण, अपेक्षित मासिक आहरण इत्यादि के संबंध में बैंक ग्राहक प्रोफाइल तैयार करते हैं। जब खातें के लेनदेन के संबंध में और प्रोफाइल में विसंगति पायी जाती है, बैंक आवश्यकता होने पर अतिरिक्त जानकारी/दस्तावेजों की मांग कर सकता है। यह केवल यह सुनिश्चित करने के लिए है कि खाते का प्रयोग काले धन को वैध बनाने/आतंकवादी/अपराधी गतिविधियों के लिए नहीं किया जा रहा है।

  • ग्राहक पहचान के दो पहलू है। एक पहचान स्थापित करना है और दूसरा वर्तमान आवासीय पता स्थापित करना। पहचान स्थापित करने के लिए बैंक को ऐसी प्रमाणित दस्तावेज की जरूरत है जिसमें ग्राहक का फोटोग्राफ जैसे कि वाहन चलाने का लाइसेंस/पारपत्र/पैन कार्ड/ मतदाता कार्ड इत्यादि हो। यद्यपि इन दस्तावेजों पर आवासीय पता होता है, फिर भी हो सकता है कि यह पता उनका वर्तमान पता न हो। ग्राहक का वर्तमान पता स्थापित करने के लिए पारपत्र/वाहन चलाने का लाइसेंस/मतदाता कार्ड/पैन कार्ड के अलावा, बैंक टेलीफोन/बिजली जैसी सेवा बिल की मांग कर सकता है।

बेस रेट

  • यह व्यवस्था पहली जुलाई 2010 से लागू हुई। बेस रेट को बैंचमार्क प्राइम लेंडिंग रेट की जगह लागू किया जा रहा है। इसके लागू हो जाने के बाद कोई भी व्यापारिक बैंक बेस रेट से कम दर पर लोन नहीं दे सकेगा।

  • इस व्यवस्था के बारे में संभावनाएँ जताई जा रही है कि इसके लागू हो जाने पर छोटे उद्यम को लाभ होगा। अभी तब बैंक बड़ी कंपनियों को बहुत कम ब्याज दर पर लोन दे देते थे और छोटे उद्यमों को ज्यादा दर पर कर्ज मिलता था।

कैपिटल एडिक्केसी रेश्यो

  • कैपिटल एडिकेवसी रेश्यो यानी सीएआर वह पूंजी होती है जो बैंकों को निश्चित अनुपात में हमेशा अपने पास रखनी होती है। इसका प्रयोग डिपोजिटर्स की सुरक्षा के लिए होता है। इसके साथ ही बाजार में पूंजी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका उपयोग किया जाता है।

  • बैंकों की टियर वन कैपिटल और टियर टु कैपिटल के आधार पर इसका अनुपात तय किया जाता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियमों के मुताबिक बैंको को सीएआर हमेशा अपने पास रखनी होगी और वे इसे खर्च नहीं कर सकते है। इसके कई सारे फायदे हैं।

  • अगर यह पूंजी बैंको के पास रहेगी तो इससे निवेशकों का हित सुरक्षित रहेगा। कम से कम बैंकों के पास अपने निवेशकों को देने के लिए एक न्यूनतम सीमा तक धन हर समय उपलब्ध रहेगा। इसके अलावा बाजार में भी एक सीमा तक हर समय लिक्किडिटी बनी रहेगी। यह बैंकों की देनदारियों की पूर्ति करने में तो सहायक होती है साथ ही क्रेडिट जैसे खतरों से भी बैंकों की सुरक्षा करती है।

  • इससे बैंकिंग सिस्टम में निवेशकों का भरोसा जमाने में भी मदद मिलती है। इसके लिए एक फॉर्मूला बनाया गया है। जिसके आधार पर इसका अनुपात तय किया जाता है। इसे बैंक की टियर वन और टियर टु कैपिटल के आधार पर तय किया जाता है। बैंकों के साथ ही यह निवेशकों के लिए भी फायदेमंद है।

क्रेडिट रेटिंग

  • क्रेडिट रेटिंग किस भी देश, संस्था या व्यक्ति आदि की कर्ज लेने या उसे चुकाने की क्षमता का मूल्यांकन करती है अर्थात कोई व्यक्ति, संस्था या देश आर्थिक रूप से कितना मजबूत है और कितना कर्ज लेने या उसे चुकाने की क्षमता रखता है।

  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँं किसी देश की साख का मूल्यांकन करते समय उसका आर्थिक विश्लेषण करती हैं और यह पता लगाती हैं कि वह कितना सक्षम है। ये एजेंसियाँं किसी भी देश की क्रेडिट रेटिंग तय करते समय कोई निश्चित फार्मूला नहीं अपनाती हैं बल्कि अपने अनुभवों और आंकड़ों का इस्तेमाल करती हैं। वे खुद ही किसी देश या संस्था की रेटिंग तय करती हैं।

  • ये रेटिंग एजेंसियांँ रेटिंग तय करते समय आंकड़ों और भविष्य की संभावनाओं का भी ख्याल रखती हैं। हालांकि क्रेडिट रेटिंग जारी करने वाली एजेंसियों पर भी कई तरह के सवाल उठाए जाते हैं लेकिन फिर भी इन एजेंसियों दव्ारा जारी की जाने वाली रेटिंग का अलग ही महत्व होता है। क्रेडिट रेटिंग अगर ऊंची होती है तो संबंधित देश या संस्था को कर्ज आदि लेने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती है।

  • ऊंची क्रेडिट रेटिंग का मतलब है कि संबंधित देश या संस्था की आर्थिक स्थिति मजबूत है और वह जो कर्ज ले रहा है वह सुरक्षित है। यही कारण है कि बड़ी कंपनियां और सभी देश इस बात की कोशिश करते हैं उनकी क्रेडिट रेटिंग हमेशा ऊंची बनी रहे।

क्रिसिल

  • वर्ष 1987 में क्रेडिट रेटिंग इन्फॉर्मेशन सर्विसेज ऑफ इंडिया क्रिसिल लिमिटेड की स्थापना के साथ ही क्रेडिट रेटिंग की शुरुआत हुई। आज भारत में कई क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां कार्यरत हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने 31जनवरी, 1998 से जमा राशि लेने वाली ऐसी सभी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए क्रेडिट रेटिंग करवाना अनिवार्य कर दिया है जिनकी निवल स्वाधिकृत निधि 25 लाख या उससे अधिक है।

  • वर्तमान में 2 करोड़ या उससे अधिक निवल स्वाधिकृत कंपनियों को वर्ष में कम-से -कम एक बार किसी अनुमोदित क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से रेटिंग करवाना आवश्यक हैं इसके अलावा इन कपंनियों के लिए यह भी सुनिश्चित किया गया है कि वे बिना ’न्यूनतम निवेश ग्रेड’ के जनता से जमा राशि नहीं जुटा सकती हैं। ’भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी विनियमन-1999’ से ’सेबी’ को भारत में कार्यरत क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को विनियमित करने का अधिकार मिलता है, सेबी के पास पंजीकरण के लिए किसी रेटिंग एजेंसी को जिन आवश्यक मानदंडों को पूरा करना होता है। इसका उल्लेख इस विनियमन में किया गया है। सेबी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की प्रतिभूति बाजार से संबंधित गतिविधियों को ही नियंत्रित करती है।

  • भारत में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के लिए सेबी दव्ारा निर्धारित ’कोड ऑफ कंडक्ट’ का पालन करना अनिवार्य है और सामान्यत: ये कोड ऑफ कंडक्ट, ’इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ सिक्योरिटी कमीशन’ दव्ारा रेटिंग एजेंसियों के लिए निर्धारित नियमों के समान ही होते हैं। सेबी ने 15 जून, 2011 को निम्नलिखित के संदर्भ में भारत में कार्यरत क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों दव्ारा प्रयुक्त किए जा रहे रेटिंग संकेतों तथा उनकी परिभाषा का मानकीकरण कर दिया है-

    • दीर्घवधि ऋण लिखत

    • अल्पावधि ऋण लिखत

    • दीर्घावधि स्ट्रक्कर्ड फाइनेंस लिखत

    • अल्पावधि स्ट्रक्कर्ड फाइनेंस लिखत

    • दीर्घावधि म्यूचुअल फंड योजना तथा

    • अल्पावधि म्यूचुअल फंड योजना।

’स्टैंडर्ड एंड पुअर’

वर्ष 1987 में स्थापित क्रिसिल ने वर्ष 1988 से परिचालन शुरू किया। इसकी प्रमुख सहयोगी रेटिंग एजेंसी ’स्टैंडर्ड एंड पुअर’ है। यह एजेंसी औद्योगिक कंपनियों, बैंक, गैर बैंकिंग-वित्तीय कंपनियों, इन्फ्रास्ट्रक्टर संस्थाआंे, लघु वित्त, वित्त संस्थाओं, बीमा कंपनियों, म्यूचूअल फंड, राज्य सरकार, शहरी निकाय इत्यादि संस्थाओं के लिए रेटिंग प्रदान करती है।

इकरा

भारत में वर्ष 1991 में स्थापित ’इकरा’ अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी इन्वेस्टर सर्विसेज की सहयोगी है। यह मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों, बैंक व वित्तीय संस्थाओं, आवास वित्त कंपनियों, इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों म्यूनिसिपल तथा अन्य स्ाानीय निकायों दव्ारा जारी ऋण लिखतों की रेटिंग करती है।

केयर

  • वर्ष 1994 में स्थापित केयर (क्रेडिट एनालिसिस एंड रिसर्च लिमिटेड) रेटिंग एजेंसी की प्रमुख शेयरधारक व प्रमोटर आईडीबीआई बैंक, केनरा बैंक और भारतीय स्टेट बैंक है। इसके तहत कॉर्पोरेट रेटिंग, बैंक ऋण रेटिंग, कॉर्पोरेट गवर्नेस रेटिंग एवं सार्वजनिक वित्त रेटिंग की जाती है।

  • फिच इंडिया वर्ष 1996 में स्थापित रेटिंग एजेंसी कॉर्पोरेट रेटिंग, वित्तीय रेटिंग, इन्फ्रास्ट्रक्चर रेटिंग, एमएमई रेटिंग तथा सार्वजनिक वित्त से संबंधित रेटिंग निर्धारित करती है।

एसएमई

  • एसएमई रेटिंग एजेंसी ऑफ इंडिया वर्ष 2005 में स्थापित यह एजेंसी सूक्ष्म-लघु तथा मझौले क्षेत्र को रेटिंग देने वाली भारत की पहली रेटिंग एजेंसी है। इसमें प्रमुख सहयोगी एवं शेयरधारक भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक तथा सार्वजनिक विदेशी एवं निजी क्षेत्र के बैंक शामिल है।

  • वर्ष 2008 में स्थापित ब्रिकवर्क रेटिंग एजेंसी राज्य व स्थानीय सरकार के लिए ईश्युअर रेटिंग, वाणिज्यिक पत्र तथा बैंकों के जमा प्रमाण पत्र के लिए अल्पावधि रेटिंग, कॉर्पोरेट बांड तथा स्ट्रक्टर्ड उत्पाद के लिए दीर्घावधि रेटिंग जारी करती है।

    • आदेश मुद्रा: वह मुद्रा जिसका कोई आंतरिक मूल्य नहीं होता।

    • उच्च शक्तिशाली मुद्रा: देश के मौद्रिक प्राधिकरण दव्ारा अपनाई गई मुद्रा। इसमें मुख्यत: करेंसी आती हैं।

    • संकुचित मुद्रा: करेंसी नोट, सिक्के, मांग जमा, जो जनता के दव्ारा व्यावसायिक बैंकों में रखे जाते हैं।

    • मूल्यहास: गिरती विनियम दरों के अंतर्गत विदेशी मुद्रा के रूप में देश की करेंसी की कीमत में कमी। यह विनियम दरों में वृद्धि के अनुरूप होती है।

    • अवमूल्यन: आधिकारिक कार्रवाई के माध्यम से अधिकीलित विनिमय दरों के अंतर्गत देशीय करेंसी की कीमत में कमी।

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