Emergency provision, Digestive States in India, Urban Governance in India

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34 आपात उपबंध (Emergency provision)

  • भारतीय संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल का उपबंध हैं- राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352), राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) और वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360)।

  • राष्ट्रीय आपात- इसकी घोषणा युद्ध, ब्राह्य आक्रमण एवं सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर राष्ट्रपति दव्ारा किया जा सकता है। 44वें संशोधन (1978) के अनुसार राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा आंतरिक अशांति के आधार पर नहीं बल्कि केवल सशस्त्र विद्रोह के आधार पर किया जाएगा।

  • राष्ट्रपति दव्ारा की गई आपात की उद्घोषणा एक माह तक प्रवर्तन में रहती है और यदि इस दौरान इसे संसद के दो-तिहाई बहुमत से अनुमोदित करवा लिया जाता है तो वह 6 माह तक प्रवर्तन में रहती है। संसद इसे पुन: इसी विधि से 6 माह के लिए बढ़ा सकती है।

  • यदि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 1/10 सदस्य आपात उद्घोषणा को वापस लेने वाले संकल्प को प्रस्तावित करने के अपने आशय की सूचना, सत्र चल रहा हो तो लोक सभा अध्यक्ष और नहीं चल रहा हो तो राष्ट्रपति को देते है तो ऐसी सूचना के प्राप्त होने के 14 दिन के भीतर लोकसभा की बैठक आयोजित की जाएगी।

  • यदि लोकसभा साधारण बहुमत से आपात उद्घोषणा को वापस लेने का प्रस्ताव पारित कर देती हैं, तो राष्ट्रपति उसे वापस लेने के लिए बाध्य होता है।

  • राष्ट्रपति आपात की उद्घोषणा संपूर्ण देश या देश के किसी एक समस्याग्रस्त क्षेत्र के लिए की जा सकती है अर्थात संपूर्ण देश में इसे लागू करने की अनिवार्यता नहीं है।

  • राष्ट्रपति आपात की उद्घोषणा का प्रभाव-

    • राज्य की कार्यपालिका शक्ति संघीय कार्यपालिका के अधीन हो जाती है, किन्तु राज्य सरकार निलंबित नहीं की जाती है।

    • संसद को राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

    • अनुच्छेद 358 के अनुसार अनुच्छेद 19 में वर्णित मौलिक अधिकार स्वत: निलंबित हो जाता है और अनुच्छेद 359 के अनुसार राष्ट्रपति अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर समस्त मौलिक अधिकार निलंबित कर सकता है।

    • राष्ट्रपति केंद्र और राज्यों के वित्तीय संबंध में परिवर्तन कर सकता है।

  • राष्ट्रपति आपात की उद्घोषणा-अब तक तीन बार हुई हैं-

    • पहली बार 26 अक्टूबर 1962 को चीनी आक्रमण के समय ब्राह्य आक्रमण के आधार पर राष्ट्रीय आपात की घोषणा की गई, जिसे 10 जनवरी 1968 को वापस लिया गया।

    • दूसरी बार 13 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के आक्रमण के समय ब्राह्य आक्रमण के आधार पर राष्ट्रीय आपात की घोषणा की गयी।

    • तीसरी बार 26 जून 1975 को आंतरिक अशांति की अशंका के आधार पर राष्ट्रीय आपात की घोषणा की।

  • दूसरी और तीसरी उद्घोषणा 21 मार्च 1977 को एक साथ वापस ले लिया गया।

  • राज्य में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 365)-राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाने पर राष्ट्रपति आपात स्थिति की घोषणा कर सकता है। राष्ट्रपति दव्ारा इस शक्ति का प्रयोग न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है।

  • राज्य में आपात घोषणा के बाद संघ न्यायिक कार्य छोड़कर राज्य प्रशासन के समस्त कार्यो को अपने हाथ में ले लेता है, जिसका संचालन राज्यपाल दव्ारा किया जाता है।

  • राज्य में आपात उद्घोषणा की अवधि दो मास होती है। इससे अधिक के लिए संसद से अनुमोदन करना होता है तब यह 6 माह की होती है। लगातार अधिकतम तीन वर्ष तक यह एक राज्य के प्रवर्तन में रह सकती है। एक वर्ष से आगे विस्तार करने वाला संकल्प पारित करते समय दो शर्तें पूरी होनी अनिवार्य हैं, ये हैं आपात स्थिति लागू हो या निर्वाचन आयोग चुनाव कराने में असमर्थ हो।

  • सर्वप्रथम राष्ट्रपति शासन पंजाब में 20 जून 1951 को मंत्रिमंडल के पतन के कारण लागू हुआ। उसके बाद क्रमश: पेप्सू (1953), आंध्र प्रदेश (1954) और केरल (1956) में लागू हुआ।

  • सर्वाधिक समय तक अनुच्छेद 356 का प्रयोग पंजाब में ही हुआ है। (11 जून 1987 से 25 फरवरी 1992) तक।

  • सबसे अधिक बार अनुच्छेद 356 का प्रयोग उत्तर प्रदेश तथा केरल (9 बार) और सबसे कम महाराष्ट्र, मिजोरम, मेघालय तथा अरूणाचल (केवल एक बार) में हुआ है।

  • वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360)- इसकी उद्घोषणा को किसी भी समय वापस ले सकता है। ऐसे भी अब तक इस आपात की घोषणा एक बार भी नहीं हुई है।

वित्तीय आपात का प्रभाव

  • राष्ट्रपति आर्थिक दृष्टि से किसी भी राज्य सरकार को निर्देश दे सकता है।

  • राष्ट्रपति को छोड़कर सभी के वेतन एवं भत्ते में कमी की जा सकती है।

  • राष्ट्रपति केंद्र तथा राज्यों में धन संबंधी विभाजन के प्रावधानों में आवश्यक संशोधन कर सकता है।

  • राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त हो जाता है कि वह राज्य सरकारों को यह निर्देश दे कि राज्य के समस्त वित्त विधेयक उसकी स्वीकृति से विधान सभा में प्रस्तुत किए जाए।

35 भारत में पंचायती राज (Digestive States in India)

  • प्चाांयती राज की शुरूआत स्वतंत्र भारत में सर्वप्रथम 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिला में प्रधानमंत्री नेहरू दव्ारा किया गया। इसके बाद 1959 में आंध्र प्रदेश, 1960 में असम, तमिलनाडु एवं कर्नाटक और 1962 में महाराष्ट्र में पंचायती राज का गठन हुआ।

  • पी. के. थुंगन समिति के आधार पर 73वाँ संविधान संशोधन किया गया, जिसका संबंध पंचायती राज से है। इसके दव्ारा संविधान से भाग 9 अनुच्छेद 243 (क से ण तक) तथा अनुसूची 11 का प्रावधान किया गया और पंचायतों को संविधानिक मान्यता प्रदान की गई।

73वाँ संविधान की विशेषता

Committees Formed for the State of Digestion
Committees formed for the state of digestion

प्चांयाती राज के लिए गठित समितियाँ

बलवंत राय मेहता समिति

1957

अशोक मेहता समिति

1977

पी.वी. के. राय समिति

1985

एल. एम. सिंघवी समिति

1986

पी. के. थुंगन समिति

1988

64वाँ संविधान संशोधन

1984

73वाँ संविधान संशोधन

1993

विभिन्न राज्यों में पंचायत समिति के नाम

बिहार, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान

प्चाांयत समिति

आंध्र प्रदेश

मंडल पंचायत

तमिलनाडु

पंचायत यूनियन

पश्चिमी बंगाल, असम

आंचलिक परिषद्

उत्तर प्रदेश

क्षेत्र समिति

मध्य प्रदेश

जनपद पंचायत

कर्नाटक

तलुका डेवलमेंट बोर्ड

  • इसके दव्ारा संविधान के भाग 9 में 16 अनुच्छेद एवं 11वीं अनुसूची में 29 विषय शामिल किया गया।

  • पंचायती राज संस्था के प्रत्येक स्तर में एक-तिहाई स्थानों पर महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। किन्तु बिहार (सर्वप्रथम), मध्यप्रदेश, उत्तराखंड आदि राज्य दव्ारा महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है।

  • इसका कार्यकाल पाँच वर्षों का है।

  • जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है वहाँ दो स्तरीय और जहाँ 20 लाख से अधिक है वहाँ त्रि-स्तरीय पंचायती राज्य की स्थापना की जाएगी।

  • पंचायत व्यवस्था के अंतर्गत सबसे निचले स्तर पर ग्रामसभा होती है।

  • राज्य की संचित निधि से इन पंचायतों को अनुदान देने की व्यवस्था है।

  • राज्य वित्त आयोग की सिफारिश पर पंचायत को धन उपलब्ध कराया जाता है।

Table 1 Supporting: Emergency provision, Digestive States in India, Urban Governance in India

Tablutation of: स्तर, संरचना, मुख्य अधिकारी, निर्वाचन

स्तर

संरचना

मुख्य अधिकारी

निर्वाचन

ग्राम स्तर

ग्राम पंचायत

प्रधान मुखिया/सरंपच

प्रत्यक्ष

प्रखंड स्तर

प्चाांयत समिति

प्रमुख

अप्रत्यक्ष

जिला स्तर

जिला परिषद्

अध्यक्ष/चेयरमैन

अप्रत्यक्ष

73वाँ संशोधन के आधार पर सर्वप्रथम कर्नाटक में पंचायती राज (अधिनियम) का निर्माण किया गया।

36 भारत में नगरीय शासन (Urban Governance in India)

  • भारत में सर्वप्रथम नगर निगम की स्थापना 1687 में ब्रिटिश सरकार दव्ारा मद्रास में की गई।

  • 73वाँ संशोधन अधिनियम दव्ारा संविधान में भाग-9 (क), अनुच्छेद 243 (त से यछ तक) एवं 12वीं अनुसूची जोड़ी गयी। इस संशोधन का संबंध नगरपालिका से है।

73वाँ संशोधन अधिनियम की विशेषता:-

  • नगरपालिका तीन प्रकार की होगी-

    • नगर परिषद-ऐसा ग्रामीण क्षेत्र जो नगर क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा हो, जिसकी जनसंख्या 10,000 से 20,000 तक हो।

    • नगर परिषद्-छोटे नगर क्षेत्र के लिए, जिसकी जनसंख्या 20,000 से 3 लाख तक हो।

    • नगर निगम -बड़े क्षेत्र के लिए जिसकी जनसंख्या तीन लाख से अधिक हो।

  • महिलाओं के लिए एक-तिहाई (वर्तमान में कुछ राज्य 50 प्रतिशत) आरक्षण की व्यवस्था।

  • अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था।

  • नगरीय संस्थाओं की अवधि पाँच वर्ष होगी और विघटन की स्थिति में छ: माह के अंदर चुनाव करना आवश्यक होगा।

  • नगर वाडों में बांट दिया जाता है। वार्ड पार्षदों में से महापौर का निर्वाचन किया जाता है। महापौर किसी नगर का प्रथम नागरिक होता है।

नोट:- 25 अप्रैल 1993 से 73वाँ और 1 जून 1993 से 74वाँ संशोधन अधिनियम प्रवर्तन में है।

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