चन्देस्वरर की चोल मूर्तिकला चेरामन जुमा मुस्जिद (Chandeshwar's Trick Sculpture Cheraman Juma Mosque – Culture)

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10वीं सदी ईसवी की मानी जाने वाली चंदेस्वरर की एक मूर्ति तमिलनाडु के त्रिची में उम्मैयलपूरम के निकट सुंडईक्कई गांव में प्राप्त हुई है।

मूर्तिकला का विवरण

• इस मूर्ति के सिर के बालों को ’जटभरा’ (एक प्रकार का हेयर (बाल) स्टाइल (बनाना), जिसे शिव धारण करते थे) के रूप में व्यवस्थित किया गया है, जिसे सामान्यत: वृहत संख्या में चोटियों के झुण्ड के रूप में धारण किया गया है।

• कूल्हे की पोषक छोटी और लहराती हुई अवस्था में है, जो कमर के चारों ओर एक अच्छी तरह से लिपटी हुई वस्त्रों से सुरक्षित है, जिसे ’इडाक्कात्तु’ कहा जाता है।

• यह मूर्ति ’सुहासन’ की मुद्रा में है, जहाँ एक पैर मुड़ा हुआ और आसन पर टिका हुआ है, जबकि दूसरा पैरा मूर्तितल पर है।

• इस मूर्ति को एक पवित्र धागे, पेट पर एक बैंड (गाँठ) तथा थोड़े से आभूषणों से सजाया गया है।

चन्देस्वरर के बारे में

• चन्देस्वरर शैव संप्रदाय के 63 नयनार संतो में से एक हैं और इन्हें मंदिरो में सबसे पहले जगह मिली थी।

• इन्हें इष्टदेव के समक्ष सभी शैव मंदिरो के उत्तरी किनारे पर एक अलग मंदिर में स्थापित किया गया है।

• चन्देस्वरर का सबसे प्रतिष्ठित मंदिर तंजावुर के राजराजेस्वरम में राजराजा प्रथम दव्ारा बनवाया गया था।

नयनार

• 7वीं से 9वीं सदी के दौरान, दक्षिण भारत में नयनार (शिव को समर्पित संत) और अलवार (विष्णु को समर्पित संत) संतो (जो ”अछूत” माने जाने वाली जातियों सहित सभी जातियों से संबंधित थे) के नेतृत्व में नए धार्मिक आंदोलन देखने को मिलते हैं।

• वे बौद्ध और जैन संप्रदायों की आलोचना किया करते थे तथा मोक्ष के मार्ग के रूप में शिव या विष्णु की आराधना/भक्ति का प्रचार करते थे।

• उन्होंने संगम साहित्य में प्रदर्शित प्यार और वीरता के आदर्शों से सीख लिया तथा उन्हें भक्ति के मूल्यों के साथ मिश्रित किया।

• नयनारों की कुल संख्या 63 थी, तथा वे विभिन्न जातिगत पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते थे, जैसे-कुम्हार, अछूत, मजदूर, किसान, शिकारी, सैनिक, ब्राह्यण और प्रमुख।

• उनमें से अप्पार, संबंदर, सुन्दरर और मानिक्कावसगर सर्वाधिक लोकप्रिय थे।

• उनके गीतों के संकलन के दो संग्रह/खंड हैं-तेवरम और तिरुवाककम।

चेरामन जुमा मुस्जिद (Cheraman Juma Mosque – Culture)

• केरल के त्रिशूर जिले में अवस्थित चेरामन जुमा मुस्जिद भारत में अरब व्यापारियों दव्ारा 629 ईसवी में निर्मित प्रथम मस्जिद है।

• यह भारत और अरब के बीच प्राचीन काल से सक्रिय व्यापारिक संबंधों का प्रतीक है।

• मस्जिद में एक प्राचीन दीपक है जो सदैव प्रज्वलित रहता है। सभी धर्मों के अनुयायी इस दीप के लिए चढ़ावे के रूप में तेल लाते हैं।

• संख्या में निरंतर बढ़ते हुए आगंतुकों के समायोजन हेतु मस्जिद का कई बार निर्माण किया गया।

सुर्खियों में क्यों?

• प्रधानमंत्री मोदी ने सऊदी अरब के सुल्तान बिन अब्दूलाज़िज अल सउद को चेरामन जुमा मुस्जिद की एक गोल्ड (स्वर्ण)-प्लेटेड (चित्र) प्रतिकृति भेंट की।

यह मान्यता है कि यह मस्जिद चेरामन पेरुमल (एक चेर राजा जो अरब गया था तथा मक्का में पैगम्बर मोहम्मद से मुलाकात के बाद ईस्लाम ग्रहण कर लिया था) के समकालीन मलिक बिन दिनार दव्ारा निर्मित की गई थी।