प्राचीन धरोहरों को लौटाया गया (Old Heritage Retrieved – Culture)

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• हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 200 से अधिक चुराई गई कलाकृतियाँ भारत को वापस देने की प्रक्रिया आरंभ की है।

• लगभग 2000 वर्ष पूर्व उन्हें भारत के सर्वाधिक संपन्न धार्मिक स्थलों से लूटा गया था और उनका अनुमानित मूल्य लगभग 100 मिलियन (अत्यधिक विशाल मात्रा में/दस लाख या अधिक) डॉलर (अमेरिका आदि की प्रचलित मुद्रा) है।

• वापस की जा रही कलाकृतियाँ अमरीकी अधिकारियों दव्ारा बरामद की गई उन 3000 कलाकृतियों का केवल एक छोटा सा अंश है जिन्हें अंतत: भारत को वापस कर दिया जाएगा।

पृष्ठभूमि

• सांस्कृतिक संपत्ति के स्वामित्व पर यूनेस्कों कन्वेंशन (रूप परिवर्तन), 1970, सांस्कृतिक पुरावशेषों सहित सांस्कृतिक संपत्ति के अवैध हस्तांतरण और स्वामित्व के व्यापार को प्रतिबंधित करती है।

• किसी विदेशी देश में चुराई गई वस्तु का पता चलने पर उसे वापस प्राप्त करने की प्रक्रिया उस देश में भारतीय मिशन (नियोग) दव्ारा संचालित की जाती हैं।

सी.बी.आई. की आर्थिक अपराध शाखा पुरावशेषों संबंधी अपराधों से निपटती है। तमिलनाडु में अत्यधिक मात्रा में कलाकृतियां हैं इसलिए वहां सी.आई.डी की मूर्ति शाखा है।

चुराई गयी कलाकृतियां

• 2013 में 10वीं शताब्दी की 400 किग्रा वजनी वृषानन योगिनी की एक मूर्ति पेरिस से वापस लाई गई थी।

• 2014 में, ऑस्ट्रेलिया ने नटराज और अर्धनारीश्वर की मूर्तियाँ भारत को वापस लौटायी थीं।

• वर्ष 2015 में तीन मूर्तियाँ भारत को वापस की गयी-कनाडा से तोते वाली महिला, जर्मनी से महिषासुरमर्दिनी और सिंगापुर से उमा परमेश्वरी।

• इससे पहले इस वर्ष, बलुआ पत्थर से निर्मित तीर्थकर ऋषभनाथ की 10वीं शताब्दी की जिला और 8वीं शताब्दी के अश्वारोही देवता रेवन्त और उसके दल का चित्रण करता कई मिलियन (अत्यधिक विशाल मात्रा में/दस लाख या अधिक) डालर (अमेरिका आदि की प्रचलित मुद्रा) मूल्य का एक अति दुर्लभ बलुआ पत्थर पैनल (नामिका) अमेरिका में खोजा गया था।

चुनौतियाँ

• भारत में स्मारक और पुरावशेष के लिए राष्ट्रीय मिशन के पास मौजूद और चोरी की जा चुकी कलाकृतियों का एकीकृत डेटाबेस (कंम्यूटर में संग्रहीत विशाल तथ्य सामग्री) शायद ही मौजूद है, इसलिए चोरी के मामलों की पर्याप्त जानकारी प्राप्त होना बहुत कठिन है।

• सी.बी.आई. अपने विशेष अपराध विभाग के रूप में पुरावशेष की चोरी के मामलों को संभालती है। इस पर अत्यधिक कार्यभार है और साथ ही इसके पास ऐसे मामलों के संदर्भ में अपेक्षित योग्यता भी नहीं है।

• कुछ राज्य सरकारों में राज्य के पुलिस बल के विशेष विभाग के रूप में विशेष शाखाएं है किन्तु इनमें भी कर्मचारियों और योग्यता की कमी है।

• पुरावशेषों को पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृतियाँ अधिनियम 1972, के अंतर्गत दर्ज कराने की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है और यह अधिनियम भी पुराने ढंग का है।

• अनावश्यक रूप से सरकार का ध्यान आकर्षित करने का भय भी पंजीकरण करने से रोकता है।

• 2013 में पुरावशेषों पर जारी कैग की रिपोर्ट देश में अधिग्रहण, प्रलेखन और संग्रहालयों जैसी संरक्षण प्राणालियों की दयनीय स्थिति के संबंध में टिप्पणी करती है।

• वर्ष 2007 में अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले 70 लाख पुरावशेषों के प्रलेखन हेतु संस्कृति मंत्रालय दव्ारा पहल की गई थी। इस पहल के बाद वर्ष 2014 तक केवल 8 लाख पुरावशेषों का ही प्रलेखन हो पाया था।