चौथा प्रतिवदेन शासन में नैतिकता (Fourth Report: Ethics in Government) Part 3

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चौथी रिपोर्ट (विवरण) में आयोग ने नैतिकता के ढाँचे, भ्रष्टाचार से लड़ने की संवैधानिक संरचना, संस्थागत व्यवस्थाओं, सामाजिक ढांचे, सर्वागीण सुधारों और ईमानदार लोक सेवकों के बचाव के साथ-साथ मंत्री लोक सेवक संबंधों एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग की चर्चा की है। शासन में नैतिकता लाने हेतु आयोग ने निम्नांकित सुझाव दिए है-

  • चुनावों में धन के अनुचित एवं अनावश्यक फंडिंग (वित्त पोषण) को रोकने हेतु अंशत चुनाव व्यय सरकार वहन करे।

  • दल-बदल के मामलो में राष्ट्रपति या राज्यपाल दव्ारा निर्वाचन आयोग की सलाह पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

  • गंभीर एवं जघन्य अपराधों के आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को निर्वाचन हेतु अयोग्य ठहराने के लिए कानून में संशोधन होना चाहिए।

  • गठबंधन की नैतिकता बनाए रखने हेतु यह प्रावधान हो कि यदि गठबंधन का कोई घटक दल बीच में दूसरे दल में सम्मिलित होता है तो उस दल या दलों को नया जनादेश लेना चाहिए।

  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की सिफारिश राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री (अध्यक्ष) लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष का नेता, विधि मंत्री और राज्यसभा के उपाध्यक्ष से बनी समिति करे।

  • संविधान के अनुच्छेद-323 (ख) के अंतर्गत क्षेत्रीय स्तर पर विशेष निर्वाचन न्यायाधिकरण बनाने चाहिए ताकि चुनाव याचिकाओं का छ: माह में निपटारा हो सके।

  • मंत्रियों के लिए वर्तमान आचार संहिता के अतिरिक्त एक नैतिक संहिता होनी चाहिए ताकि संवैधानिक एवं नैतिकता के उच्चतम मानदंडों को बनाए रखा जा सके। यह प्रधानमंत्री का कर्तव्य होगा कि वह इसकी अनुपालना सुनिश्चित कराए।

  • इस संहिताओं की अनुपालना की वार्षिक रिपोर्ट (विवरण) संबंधित विधामंडल में प्रस्तुत की जानी चाहिए।

  • नैतिक संहिता में अन्य बातों के अतिरिक्त मंत्री-लोक सेवक संबंधों के व्यापक सिद्धांतों को सम्मिलित किया जाना चाहिए। यह रिपोर्ट जनता की पहुँच में होनी चाहिए।

  • संसद के प्रत्येक सदन दव्ारा नैतिक आयुक्त पद का गठन किया जाना चाहिए। यह अध्यक्ष या उप सभापति के अंतर्गत कार्य करते हुए नैतिकता पर समिति को कार्य निष्पादन में सहायता करेगा।

  • राज्य विधानमंडलों को भी नैतिक संहिता अपना लेनी चाहिए तथा नैतिक आयुक्त पद गठित करना चाहिए।

  • लाभ के पद की परिभाषा संशोधित की जानी चाहिए। संपूर्ण रूप से परामर्शकारी निकायी में ऐसे सभी पद जहाँ सांसद एवं विधायक का अनुभव दृष्टि एवं विशेषज्ञता सरकारी नीति के लिए इनपुट का कार्य करे, फिर चाहे पद से संबंधित पारिश्रमिक एवं सुविधाएँ ही क्यों न दी गई हों, उसे लाभ का पद नहीं माना जाए। योजना आयोग का इसी तरह की समितियों या प्राधिकरणों के पद जहाँ समन्वय एवं एकीकरण आवश्यक है, उन्हें भी लाभ का पद नहीं माना जाए।

  • सांसद या विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम जैसी योजनाओं को समाप्त कर देना चाहिए।

  • सांसदो एवं विधायकों को आर.टी.आई. के अंतर्गत ’लोक प्राधिकारियों’ के रूप में घोषित किया जाना चाहिए। (विधायी कार्य निष्पादन के अतिरिक्त)।

  • ’लोक सेवा मूल्यों’ जिन्हें सभी लोक सेवक ऊंचा उठाने को परिभाषित करते हुए सरकारी एवं अर्द्धसरकारी सभी संगठनों की सभी श्रेणियों पर लागू किया जाना चाहिए।

  • सेवारत अधिकारियों को लोक उपक्रमों के मंडलों में मनोनीति नहीं किया जाना चाहिए (गैर लाभ के सरकारी संस्थाओं एवं परामर्शकारी निकायों पर लागू हो रही )।

  • सांविधिक पृष्ठभूमि वाले सभी नियंत्रकों के लिए भी व्यापक एवं लागू करने योग्य आचार संहिता होनी चाहिए।

  • संविधान के अनुच्छेद-124 एवं 217 में परिवर्तन करते हुए उप राष्ट्रपति की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय न्यायिक परिषद होनी चाहिए जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश, विधि मंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता तथा राज्यसभा में विपक्ष का नेता सदस्य हों। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं निरीक्षण के मामलों में परिषद में संबंधित राज्य का मुख्यमंत्री तथा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश भी सम्मिलित होगा।

  • राष्ट्रीय न्यायिक परिषद अधीनस्थ न्यायपालिका सहित न्यायधीशों के लिए आचार संहिता निर्मित करेगी तथा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति की निरकुंश, उन पर निरीक्षण, कदाचार मामलों की छानबीन तथा लघु दंड देने का कार्य करेगी। आवश्यक होने पर यह न्यायाधीश को हटाने की अनुशंसा भी कर सकती हैं।

  • उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश को न्यायिक मूल्य आयुक्त पदासीन किया जाना चाहिए। ऐसे ही प्रयास उच्च न्यायालयों में हों। ये आयुक्त आचार संहिता प्रभावी बनाने का कार्य करेंगे।

  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत निम्नांकित को अपराधों के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए।

    • संविधान एवं लोकतांत्रिक संस्थाओं का संपूर्ण दुरुप्रयोग जानबूझकर पद की शपथ का अतिक्रमण करना।

    • किसी व्यक्ति का अनुचित पक्षपात करके या उसे हानि पहुँचाकर अधिकार का दुरुपयोग करना;

    • न्याय में बाधा, तथा

    • सार्वजनिक धन का अपव्यय।

  • उपर्युक्त वर्णित कानून में कपटपूर्ण रिश्वतखोरी भी जोड़ा जाए तथा इसमें वे लेन-देन सम्मिलित हों जिनसे राज्य, जनता या जनहित को हानि पहुँती है। ऐसे में दंड की मात्रा दुगुनी हो जाएगी।

  • रंगे हाथ पकड़े गए या आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति के मामलों में लोक सेवकों के विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति नहीं मांगनी चाहिए। स्वीकृति देने वाले अधिकारियों को बुलाना नहीं चाहिए बल्कि उनके कागजात न्यायालय में पेश होने चाहिए।

  • संसद या विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों को सांसदों एंव विधायकी के क्रम में स्वीकृति दिए जाने हेतु प्राधिकृत किया जाना चाहिए।

  • जहां भारत सरकार लोक सेवकों के विरुद्ध स्वीकृति देने हेतु अधिकृत है, वह कार्य केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त एवं विभागीय सचिव की अधिकार प्राप्त समिति को दे देना चाहिए।

  • कानून में प्रावधान कर भ्रष्ट लोक सेवकों से हर्जाना भी (आपराधिक मामलों में दंड के अतिरिक्त) वसूला जाना चाहिए।

  • भ्रष्टाचार मामलों की सुनवाई में तेजी लाने एवं एक समय सीमा निश्चित करने हेतु कानून में संशोधन किया जाए।

  • भ्रष्टाचार संबंधी मामलों के विशेष न्यायाधीश ऐसे मामलों के निपटारे पर प्राथमिक ध्यान दें। ऐसे अपर्याप्त मुकदमें हो तो ही उन्हें अन्य उत्तरदायित्व सौंपे जाएँ। उच्चतम एवं उच्च न्यायालय भी अवांछित स्थगन एवं विलंब रोकने हेतु दिशा-निर्देश दे सकते हैं।

  • सार्वजनिक उपयोगिता सेवा देने वाले निजी क्षेत्र, सरकारी धन प्राप्त करने वाले गैर सरकारी अभिकरण भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत सम्मिलित किए जाने चाहिएँ।

  • विधि आयोग दव्ारा दिए गए सुझावानुसार भ्रष्ट साधनों दव्ारा गैर कानूनी ढंग से अर्जित संपत्ति को जब्त किया जाना चाहिए।

  • बेनामी लेन-देन निषेध करने हेतु बेनामी लेन-देन (प्रतिषेध) अधिनियम, 1988 का तत्काल क्रियान्वयन के कदम उठाने चाहिए।

  • भ्रष्टाचार या घोटाले की सूचना देने वाले को सभी प्रकार से सुरक्षा एवं संरक्षण मिलना चाहिए।

  • गंभीर आर्थिक अपराध नामक नया कानून लाया जाना चाहिए जिसमें 10 करोड़ रुपयो से अधिक की राशि संलिप्त हो या जिसमें जनता की व्यापक चिंता की संभावना हो या जिसकी जाँच एवं कानूनी कार्यवाही में वित्तीय बाजार की विशिष्ट जानकारी आवश्यक हो या जिसमें महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आवास सम्मिलित हों या जिसकी जाँच में कानूनी, वित्तीय, निवेश इत्यादि कौशल एक साथ आवश्यक हों या जो केन्द्र सरकार, नियंत्रकों, बैंको (अधिकोष) या किसी वित्तीय संस्था को पैचीदा लगे, वे इस श्रेणी के आर्थिक अपराध होंगे।

  • इस नए कानून के दव्ारा गंभीर अपराध कार्यालय गठित किया जाए जो कि मंत्रिमंडल सचिवालय के अधीन होगा एवं ऐसे मामलों की जाँच एवं कानूनी कार्यवाही गंभीर करेगा।

  • ऐसे अपराधों पर अन्वेषणकानूनी कार्यवाही पर निगरानी रखने हेतु मंत्रिमंडल सचिव की अध्यक्षता में एक गंभीर अपराध अनुवीक्षण समिति होनी चाहिए। इसमें मुख्य सतर्कता आयुक्त, गृह सविच, वित्त सचिव, बैंकिग (महाजन) या वित्तीय क्षेत्र सचिव, भारतीय रिजर्व बैंक का एक उप गवर्नर (राज्यपाल), कंपनी (संघ) कार्य विभाग सचिव तथा सेवा का अध्यक्ष सदस्य होंगे।

  • गंभीर अपराध में किसी लोक सेवक के लिप्त होने पर यह कार्यालय राष्ट्रीय लोकायुक्त को रिपोर्ट (विवरण) भेजेगा तथा इसके निर्देशों का पालन करेगा।

  • गंभीर अपराधों के मामलों में न्यायालय अभियुक्त में आपराधिक मन स्थिति को मानकर चलेगा और ऐसा नही होने का प्रमाण देने का दायित्व अभियुक्त का होगा।

  • सी.बी.आई. (दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना) की जाँच शुरू करने के निर्देश देने की शक्तियाँ केन्द्रीिय सतर्कता आयोग को प्रत्योजित की जानी चाहिए।

  • संविधान के अनुच्छेद-310 एवं 311 समाप्त कर देने चाहिए। अनुच्छेद-309 के अंतर्गत नेकनियत से किए गए कार्यो को उपर्युक्त कानून से संरक्षित किया जाए।

  • संविधान में संशोधन करते हुए राष्ट्रीय लोकायुक्त की स्थापना की जाए। इसका कार्यक्षेत्र एवं भूमिका संविधान में वर्णित की जाए जबकि उसका गठन, नियुक्ति की विधि एवं अन्य बातें संसद के एक कानून में दी जानी चाहिए।

  • राष्ट्रीय लोकायुक्त के कार्यक्षेत्र में सभी मंत्रियों (प्रधानमंत्री को छोड़कर) सभी राज्यों के मुख्यमंत्रीयों, वे सभी लोग जो केन्द्रीय मंत्रिपद के समकक्ष सार्वजनिक पद पर आसीन हों एवं सांसदों तक बढ़ा देना चाहिए। यदि ऐसे किसी प्रकरण में लोक सेवक भी सम्मिलित हो तो वह भी इसके दायरे में आएगा।

  • राष्ट्रीष्य लोकायुक्त में अध्यक्ष के रूप में सर्वोच्च न्यायालय का एक सेवारत या अवकाश प्राप्त न्यायाधीश और सदस्य के रूप में एक विशिष्ट विधिक और पदेन सदस्य के रूप में केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त होगा।

  • राष्ट्रीय लोकायुक्त के अध्यक्ष का चयन, भाारत के उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, लोकसभा के अध्यक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक समिति दव्ारा सर्वोच्च न्यायालय के उन आसीन न्यायाधीशों के पैनल में से किया जाएगा, जिनकी तीन वर्ष से अधिक की सेवा हो गई हो। यदि किसी आसीन न्यायाधीश की नियुक्ति करना संभव न हो सके तो समिति सर्वोच्च न्यायालय के किसी अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की नियुक्ति कर सकती है। यही समिति राष्ट्रीय लोकायुक्त के सदस्य (अर्थात किसी विशिष्ट विधिक) का चयन कर सकती है। राष्ट्रीय लोकायुक्त के अध्यक्ष और सदस्य को तीन वर्ष की केवल एक ही अवधि के लिए नियुक्त किया जाना चाहिए और उसके बाद वे सरकार के किसी सार्वजनिक पद पर आसीन न हों। केवल एक ही अपवाद के रूप् में, यदि उनकी सेवाओं की आवश्यकता हो, तो वे भारत के मुख्य न्यायाधीश बनाए जा सकते हैं।

  • राष्ट्रीय लोकायुक्त को सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के मानदंडो में वृद्धि करने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान चलाने के काम को भी सौंपा जाना चाहिए।

  • संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए, जिसमें राज्य सरकारों के लिए लोकायुक्त की स्थापना करना अनिवार्य हो और इसी में इसकी संरचना, अधिकार और कार्यो के बारे में सामान्य सिद्धांतों का वर्णन हो।

  • लोकायुक्त में एक बहुसदस्यीय निकाय होना चाहिए, जिसमें अध्यक्ष पद पर न्यायिक सदस्य, सदस्य के रूप में एक निर्दोष योग्यता वाला एक विशिष्ट विधिवेता या प्रशासक और पदेन सदस्य के रूप में राज्य सतर्कता आयोग का अध्यक्ष सम्मिलित हो। लोकायुक्त के अध्यक्ष का चयन मुख्यमंत्री, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विधान सभा में विपक्ष के नेता की एक समिति दव्ारा सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों अथवा उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीशों के पैनल (अनुसूची) से किया जाना चाहिए। यही समिति, दूसरे सदस्य का चयन विशिष्ट विधिवेता या प्रशासकों में से करेगी। उप लोकायुक्त का चयन करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

  • लोकायुक्त का कार्यक्षेत्र केवल भ्रष्टाचार में संलिप्त मामलों तक ही रहेगा। उन्हें सामान्य लोक शिकायतों की जाँच नहीं करनी चाहिए। लोकायुक्त को मंत्रियों और विधायकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों को निपटाना चाहिए।

  • प्रत्येक राज्य सरकार दव्ारा राज्य सरकार के अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने के लिए एक राज्य सतर्कता आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इस आयोग में तीन सदस्य होने चाहिए और इसके कार्य केन्द्रीय सतर्कता आयोग के समान ही होने चाहिए।

  • भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो (सरकारी विभाग) को राज्य सतर्कता आयोग के नियंत्रण में ले आना चाहिए।

  • लोकायुक्त का अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति कठोरता के साथ केवल एक ही अवधि के लिए होनी चाहिए और उन्हें उसके बाद सरकार के अधीन किसी सार्वजनिक पद को ग्रहण नहीं करना चाहिए।

  • लोकायुक्त के पास जाँच के लिए अपनी ही एक व्यवस्था होनी चाहिए। आरंभ में, ये राज्य सरकार से अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर ले सकते हैं परन्तु पाँच वर्षो की अवधि के बाद इसे अपना एक सवंर्ग भर्ती करने के लिए कदम उठाना चाहिए और उन्हें उचित रूप से प्रशिक्षण देना चाहिए।

  • भ्रष्टाचार के सभी मामले राष्ट्रीय लोकायुक्त या लोकायुक्त को भेजे जाने चाहिए और इन्हें किसी जाँच आयोग को नहीं भेजा जाना चाहिए।

  • स्थानीय निकायों के पदाधिकारियों के विरुद्ध मामलों की जाँच करने के लिए जिलों के समूह के लिए एक स्थानीय निकायों के ओम्बुड्‌समैन का गठन किया जाना चाहिए। इस प्रावधान को शामिल करने के लिए राज्यों के पंचायत राज अधिनियमों और शहरी स्थानीय निकाय के अधिनियम में संशोधन किया जाना चाहिए।

  • स्थानीय निकायों के ओम्बुडसमैन को स्थानीय स्वायत्तशासी सरकारों के पदाधिकारियों दव्ारा भ्रष्टाचार और कुप्रशासन के मामलों की जाँच करने के लिए सशक्त किया जाना चाहिए और रिपोर्टो (विवरण) को सक्षम प्राधिकारियों के पास कार्रवाई के लिए प्रस्तुत किया जाना चाहिए। सक्षम प्राधिकारियों को सामान्यत: वही कार्रवाई करनी चाहिए जिसकी सिफारिश की गई हो। यदि वे सिफारिशों से सहमत नहीं तो उन्हें इनके कारणों को लिखित रूप में बताना चाहिए और इन कारणों को सार्वजनिक कर देना चाहिए।

  • राज्य सतर्कता आयोग या लोकायुक्तों को भ्रष्टाचार संबंधी मामले की कानूनी कार्रवाई पर निगरानी रखने के लिए सशक्त किया जाना चाहिए।

  • विभिन्न प्रकार के मामलों की जाँच करने के लिए जाँच एजेंसियों (शाखा) के लिए एक यथोचित समय सीमा नियत की जानी चाहिए।

  • भ्रष्टाचार के मामलों का अभियोजन यथास्थिति राष्ट्रीय लोकायुक्त या लोकायुक्त के परामर्श से महान्यायवादी अथवा महाधिवक्ता दव्ारा तैयार किए गए अधिवक्ताओं के पैनल दव्ारा किया जाना चाहिए।

  • भ्रष्टाचार निवारण एजेंसियों (शाखा) को बहुत बड़े भ्रष्टाचार में लिप्त होने का विशेष संदर्भ देते हुए विभागों के व्यवस्थित सर्वेक्षण का आयोजन करना चाहिए ताकि आसूचना को एकत्र करके संदेहास्पद छवि वाले अधिकारियों पर नजर रखी जा सके।

  • नागरिक अधिकार पत्रों को प्रभावी रूप दिया जाना चाहिए।

  • स्याुंक्त राज्य अमेरिका की भांति भारत में भी ’झूठा दावा कानून’ बनना चाहिए ताकि सरकार के विरुद्ध झूठे दावे करने वाले व्यक्तियों एवं सगठनों पर रोक लग सके।

  • मीडिया (संचार माध्यम) दव्ारा सभी आरोपों या शिकायतों के लिए आवश्यक संबंधित जोन (क्षेत्र) लागू होना चाहिए। इस प्रणाली को अपनाया जाना आवश्यक है।

  • विकासपरक योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण कराने हेतु दिशा-निर्देश तैयार होने चाहिए।

  • प्रत्येक मंत्रालय एवं विभाग दव्ारा तत्काल ऐसी कार्यवाही करनी चाहिए जिससे कि ’कार्यो की एकाधिकारवादी’ प्रवृत्ति के स्थान पर प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा मिले। केन्द्र सरकार, राज्यों को कुछ योजनाओं में ऐसे प्रयासों पर प्रोत्साहन दे सकती है।

  • प्रशासनिक सुधार के केन्द्रबिन्दु में कार्यप्रणाली को सरल बनाने की आवश्यकता है। विशिष्ट क्षेत्रीय आवश्यकताओं को छोड़कर ऐसे सुधारों के मुख्य सिद्धांत ’एकल खिड़की’ की व्यवस्था को अपनाना, पदसोपानों को कम करना और निपटान के लिए समय सीमा निर्धारित करना इत्यादि होने चाहिए।

  • सभी विभागीय निगम-पुस्तिकाएँ एवं संहिताएं सरल करने हेतु समीक्षा के दायरे में ली जाएं। ऐसे सुधारों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए।

  • ’सकरात्मक चुप्पी’ के सिद्धांत का सामान्यत: प्रयोग किया जाना चाहिए। यद्यपि यह सिद्धांत सभी मामलों में नहीं अपनाया जा सकता है। जहाँ कहीं भी अनुमतियों या लाइसेंसो (अधिकार पत्र) आदि को जारी किया जाना हो, उनकी प्रक्रिया के लिए एक समय सीमा होनी चाहिए जिसके पश्चात्‌ अनुमति को प्रदान किया गया समझा जाना चाहिए, यदि यह पहले से न दी गई हो तथापित नियमों में यह व्यवस्था होनी चाहिए कि ऐसे किसी प्रत्येक मामले में विलंब किए जाने में जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई हो।

  • सरकार के प्रत्येक मंत्रालय या विभाग या संगठन को शासन में सुधार लाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग के लिए एक योजना बनानी चाहिए।

  • सत्यनिष्ठा समझौतों को लागू किया जाना चाहिए। इस हेतु संविदा अधिनियम एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में संशोधन किया जाए।

  • जनता से जुड़े सभी विभाग अपने अधिकारियों की स्वविवेकीय शक्तियों की समीक्षा कर उन्हें कम करें।

  • प्रत्येक स्तर पर ’पर्यवेक्षण’ को सक्रिय एवं प्रभावी बनाया जाए।

  • महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय लेने का किसी व्यक्ति विशेष को सौंपने के बजाय एक समिति को दिया जाना चाहिए तथापि, इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस प्रवृत्ति का प्रयोग तब नहीं किया जाना चाहिए जब तुरन्त ही निर्णय लिए जाने की आवश्यकता हो।

  • प्रत्येक अधिकारी की वार्षिक निष्पादन रिपोर्ट में एक स्तंभ होना चाहिए जहाँ अधिकारी को यह प्रकट करना चाहिए कि उसने अपने कार्यालय और अपने अधीनस्थ लोगों के बीच भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने के लिए क्या-क्या उपाय किए। रिपोर्ट अधिकारी को फिर उस पर अपनी विशेष टिप्पणी देनी चाहिए।

  • उन पर्यवेक्षी अधिकारियों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा जाना चाहिए कि जो अपने अधीनस्थ भ्रष्ट अधिकारियों को उनकी वार्षिक निष्पादन रिपोर्टो में साफ छवि का प्रमाण पत्र दे देतेे है, यदि उस अधिकारी पर, जिसकी रिपोर्ट लिखी जा रही है, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अपरध का आरोप है। इसके अतिरिक्त, उनकी रिपोर्ट में यह तथ्य दर्ज किया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने अधीनस्थ भ्रष्ट अधिकारियों की सत्यनिष्ठा के बारे में कोई विपरीत टिप्पणी नहीं दी हैं।

  • पर्यवेक्षी अधिकारियों से सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके अधीन सभी कार्यालय सूचना अधिकार अधिनियम के अधीन सूचना के लिए स्वप्रेरणा से दे देने की नीति का अनुसरण करते है।

  • एक स्थान पर सेवाएं मिलने या एक खिड़की का प्रावधान बढ़ना चाहिए।

  • ऐसे कार्य जिनमें भ्रष्टाचार की संभावना अधिक है, उन्हें कई गतिविधियों में एवं व्यक्तियों में बाँट देना चाहिए।

  • ऐसे सभी कार्यालयों में, जहाँ बड़ी संख्या में सार्वजनिक संपर्क होता हो, वहाँ ऑनलाइन शिकायत निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए। यदि संभव हो तो शिकायत निगरानी का काम आउटसोर्स (बाहरी स्रोत को ठेके पर देना) भी किया जाना चाहिए।

  • यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि ज्योंही अंकेक्षण दल दव्ारा किसी बड़ी अनियमितता का पता चले या अंदेशा हो तो सरकार दव्ारा तुरन्त ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके लिए एक समुचित व्यवस्था को बनाकर रखा जाना चाहिए। यह कार्यालय प्रमुख का उत्तरदायित्व होगा कि वह किसी ऐसी अनियमितता की जाँच करके कार्रवाई शुरू करे।

  • अंकेक्षण दलों को फोरेन्सिक (अदालती) अंकेक्षण प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

  • एक ऐसे राष्ट्रीय आँकड़ों का गठन किया जाना चाहिए जिसमें सभी स्तरों के सभी भ्रष्टाचार मामलों के ब्योरे शामिल होने चाहिए। ये आँकड़े जनता के अधिकार क्षेत्र में होने चाहिए।

  • ईमानदार लोक सेवकों को संरक्षण मिलना चाहिए