आचार संहिता (Code of Ethics – Part 11)

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न्यायिक जवाबदेही विधेयक: उपर्युक्त सिफारिशों के आलोक में न्यायिक जवाबदेही विधेयक 2013 दिसंबर 2012 में संसद में पेश किया गया जो कि न्यायाधीश जांच अधिनियम का स्थान लेगा। इस बिल की खासियत यह है कि इसके जरिए न्यायधीशों के खिलाफ जांच को व्यवस्था हो सकेगी। इस बिल के कुछ प्रावधानों को नए विधेयक में भी रखा गया है।

§ न्यायाधीशों को किसी भी संवैधानिक प्राधिकार के खिलाफ अवांछित टिप्पणी करने से बचने के लिए कहा गया है। अगर जज किसी भी संवैधानिक प्राधिकार के खिलाफ मौखिक टिप्पणी करता है तो वह न्यायिक कदाचार का दोषी होगा।

§ न्यायधीशों को अपनी पूरी संपत्ति का खुलासा करना होगा। इसके अलावा इस विधेयक से कुछ न्यायिक मानक भी तय होंगे। न्यायधीशों को स्वयं, अपनी व अपनी पत्नी/पति और संतान की संपत्ति और देनदारी का पूरा खुलासा करना होगा।

§ इस विधेयक से राष्ट्रीय न्यायिक ओवरसाइट (निरीक्षण) कमिटी (समिति) , शिकायत स्क्रूटनी (जांच) पैनल (दल) और एक इंवेस्टिगेशन (जाँच) कमिटी (समिति) की स्थापना होगी। कोई भी व्यक्ति किसी न्यायाधीश के खिलाफ उसके अनुचित व्यवहार के आधार पर ओवसाइट कमिटी को अपनी शिकायत दे सकेगा।

§ अनुचित व्यवहार के आधार पर किसी न्यायधीश के निष्कासन के लिए संसद में प्रस्ताव पेश किया जा सकता है। इस प्रस्ताव की ओवरसाइट कमिटी की तहकीकात व जांच के लिए भेजा जा सकेगा।

§ न्यायधीशों के खिलाफ शिकायत व जांच गोपनीय रहेंगी और निराधार आरोप लगाने वाले शिकायतकर्ताओं के खिलाफ दंड का भी प्रावधान होगा।

अनुच्छेद 124 भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की शक्ति राष्ट्रपति में निहित करता है। इसमें यह अनुबंध किया गया है कि राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय के और अन्य न्यायालयों के उतने ही न्यायाधीशों के साथ परामर्श करने के बाद करेगा, जितने के न्यायाधीश वह आवश्यक समझे। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति भी भारत का राष्ट्रपति करता है। राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ परामर्श करना होगा।

राष्ट्रपति दव्ारा एक संदर्भ उच्चतम न्यायालय को 23 जुलाई 1998 को भेजा गया था, जिसमें उच्चतम न्यायालय को नौ प्रश्नों पर विचार करने को कहा गया था। उच्चतम न्यायालय दव्ारा अधिकथित सिद्धांतों में से एक यह था कि भारत का मुख्य न्यायाधीश चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समूह का गठन करेगा। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति या उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के तबादले के लिए ऐसा करना आवश्यक है और उस समूह का मत नियुक्तियों के मामलों में प्रमुख होगा। इसने यह भी स्पष्ट किया है कि कार्यपालिका के लिए यह विकल्प खुला रहेगा कि वह इस समूह को अपनी आपत्तियों की सूचना दे। तथापि, यदि मुख्य न्यायाधीश और उसके साथी न्यायाधीशों का फिर भी यह मत हो कि उनकी सिफारिशों को वापस लेने का कोई कारण न बनता हो तब एक स्वस्थ परंपरा का पालन करते हुए वह नियुक्ति कर दी जानी चाहिए। तथापि, यदि दो न्यायाधीशों को किसी विशेष नियुक्ति के बारे में गंभीर आपत्ति हो तो नियुक्ति नहीं की जानी चाहिए।

जैसा कि संविधान में अनुबंध किया गया है तथा जैसा कि उच्चतम न्यायालय दव्ारा निर्वाचन किया गया है, उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों की व्यवस्था में न्यायिक स्वतंत्रता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। भारत में, कुछ न्यायाधीशों का समूह ही राष्ट्रपति को पीठ की प्रगति की सिफारिश करता है। और इस प्रयोजन के लिए बाहर से कोई परामर्श नहीं दिया जाता है। न्यायिक घोषणाओं ने सिफारिश को बाध्यकारी बना दिया है। शायद, विश्व के और किसी देश में अपनी ही नियुक्तियों के बारे में न्यायपालिका अंतिम रूप से कुछ नहीं कहती। भारत में, न तो कार्यपालिका और न ही विधायिका उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में किसी नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था सार्वजनिक रूप से छानबीन के लिए खुली हुई नहीं है, अंत जवाबदेही और पारदर्शिता से अभावग्रस्त है। विभिन्न देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था का तुलनात्मक विश्लेषण से पता चलता है कि अमेरिका, ब्रिटेन एवं फ्रांस जैसे देशों में उच्च न्यायपालिका के लिए लोगों की सिफारिश करने के लिए एक समिति बनी हुई है और उस समिति में ऐसे लोगों को भी शामिल किया हुआ है जो अनिवार्यत: न्यायपालिका से ही न हो बल्कि संभवत: प्रतिष्ठावान व्यक्ति भी हो सकते हैं।

भारत में न्यायधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता बरतने हेतु केंद्र सरकार ने 22 अगस्त, 2013 को एक ‘न्यायिक नियुक्ति आयोग’ के गठन का प्रस्ताव किया है। इसके तहत अभी न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली की जगह न्यायिक नियुक्ति आयोग की भूमिका होगी।

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