आचार संहिता (Code of Ethics – Part 12)

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विनियामकों के लिए नैतिक संहिता

व्यावसायियों तथा अन्य व्यापारियों के लिए आचार संहिताएं होती हैं। वास्तव में ऐसी संहिताएं अति प्राचीन समय से चलती आ रही हैं। उदाहरण के लिए हम्पुराबी की संहिता में यह निर्धारित है:

§ यदि कोई गृह निर्माता किसी घर को बनाता है और इसका अच्छी तरह से निर्माण करता है तो घर का स्वामी उसे घर के प्रत्येक धरातल के लिए दो शैकल्स (इजराइयल की मुद्रा) देगा।

§ यदि कोई गृह निर्माता किसी के लिए घर बनाता है और उसका अच्छी तरह से निर्माण नहीं करता और उसके दव्ारा निर्मित घर गिर जाता है और घर के स्वामी की मृत्यु हो जाती है तो उस गृह निर्माता को मौत की घाट उतार दिया जाएगा।

समाज के विभिन्न वर्षों के लिए आचार संहिता का निर्धारण और प्रवर्तन सामन्यत: आंतरिक विनियामक व्यवस्थाओं से होता है। गिल्डस ऐसी ही एक व्यवस्था का अति प्राचीन रूप है। यह गिल्ड एक ही प्रकार के व्यापारियों या पेशें के लोगों का संघ होता था जो अपने परस्पर हितों की रक्षा करने और मानदंडो को बनाए रखने के लिए गठित किया जाता था। प्रतिस्पर्द्धा औद्योगिकरण हो जाने के कारण इन गिल्डों का प्रचनल कमोवेश समाप्त हो गया है। फिर भी पिछली शताब्दी में बड़ी संख्या में व्यवसायों का आविर्भाव देखने को मिला है, विशेष रूप से वह जिसे आज सेवा क्षेत्र की संज्ञा दी जाती है। इन व्यावसायियों ने प्रारंभ में विभिन्न प्रकार के संघों में अपने को संगठित किया ताकि सामान्य उद्देश्यों को हासिल किया जा सके और साथ ही उनका प्रवर्तन करने के लिए व्यवहार और व्यवस्थाओं के स्वीकार्य प्रतिमानकों को तैयार किया जा सके।

नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि

कुछ मामलों में ऐसी व्यवस्थाओं के लिए सांविधिक पृष्ठभूमि भी अपनाई गई है। भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) में यह निर्धारित किया गया है कि परिषद् व्यावसायिक आचार और शिष्टाचार के मानकों और आयुर्विज्ञान व्यावसायियों के लिए नैतिक संहिता को विहित करे। आयुर्विज्ञान परिषद् ने तदनुसार व्यावसायिक आचार से संबंधित विनियमों ’पंजीकृत आयुर्विज्ञान व्यावसायियों के लिए शिष्टाचार और नैतिकता’ को बनाया है। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में भारतीय विधि परिषद के कृत्यों को रखा गया है, जिसमें अधिवक्ताओं के लिए व्यावसायिक आचार और शिष्टाचार शामिल है। चार्टर्ड अकाउन्टेंस (अधिकृत लेखापाल) अधिनियम 1949 में भारत में चार्टर्ड लेखा-प्रणाली व्यवसाय के अधिनियमन के लिए इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) ऑफ (का) चार्टर्ड अकाउन्टेंट्‌स (अधिकृत लेखापाल) ऑफ (का) इंडिया (भारत) के गठन के लिए अनुबंध किया गया है। चार्टर्ड अकाउन्टेटस अधिनियम 1949 और इस अधिनियम की अनुसूचियों में व्यवसाय के सदस्यों के व्यवहार के स्वीकार्य प्ररूपों को भी रखा गया है। भारतीय प्रेस परिषद, प्रेस परिषद अधिनियम, 1978 के अंतर्गत काम करती है। यह एक सांविधिक न्यायिक-कल्प निकाय है, जो प्रेस पर निगरानी रखने का काम करती है। यह प्रेस दव्ारा प्रेस के विरूद्ध क्रमश: नैतिकता के हनन और प्रेस की स्वतंत्रता के अतिक्रमण की शिकायतों का न्यायनिर्णय करती है। इस परिषद के उद्देश्य और कृत्यों में समाचार-पत्रों समाचार एजेंसियों (संस्थाओं) और पत्रकारों के लिए आचार संहिता का उच्च व्यावसायिक मानदंडो के अनुसार निर्धारण करना शामिल है। भारतीय प्रेस परिषद ने पत्रकारिता मानदंड संहिता को जारी किया है, जिसका अनुपालन करना मीडिया (संचार माध्यम) से अपेक्षित है। इंस्टीट्‌यूशन (संस्थानों) ऑफ (का) इंजीनियर्स (अभियंता) (रायल चार्टर (राजकीय अध्यादेश), 1935 के अंतर्गत निगमित 1935 ) ने ’निगमित सदस्यों के लिए नैतिक संहिता’ को विहित किया हुआ है।

आंतरिक विनियामको को छोड़ कर, विनियामकों का एक और वर्ग है, जिसे ’बाहरी विनियामक’ कहा जा सकता हे। बाहरी विनियामक का एक उदाहरण अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् है, जो एक सांविधिक निकाय है, जिसे सारे देश में तकनीकी शिक्षा प्रणाली के समूचित आयोजन और समन्वित विकास के लिए गठित किया गया है। सरकार के कृत्यों में प्रतिस्पर्द्धा के आगमन से ’बाहरी विनियंत्रको’ की संख्या अधिक देखने को मिली है। भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण और राज्य विद्युत विनियामक प्राधिकरण इसके कुछ अन्य उदाहरण हैं।

लगभग सभी व्यवसायों के लिए प्रचुर मात्रा में आचार संहिताओं के विद्यमान होने के बावजूद, प्राय: यह ध्यान दिलाया जाता है कि नैतिकता के मानदंडो का अनुपालन सामान्यत: असंतोषजनक रहा है। व्यवसायों में नैतिक मूल्यों की गिरावट ने देश के शासन तंत्र को विपरीत रूप से प्रभावित किया है और सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के बढ़ने का यह एक महत्वपूर्ण कारण है। बाहरी विनियामक की भूमिका भी इससे बढ़ जाएगी जब सरकारी कृत्यों को शुरू कर दिया जाएगा। ऐसे मामलों में विनियामकाेे को स्वयं के लिए और इसके साथ-साथ सेवा प्रदान करने वालों के लिए नैतिकता के मानदंडो को विहित करना आवश्यक हो जाएगा। इससे भी अधिक महत्व की बात उद्देश्यपूर्ण, पारदर्शी और निष्पक्ष निर्णय लेने की प्रक्रियाओं और प्रवर्तन व्यवस्थाओं को तैयार करना है।