आचार संहिता (Code of Ethics – Part 6)

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लाभ के पद की अवधारणा एवं नैतिक संहिता

भारत के संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (अ) व 191 (1) (अ) में यह निर्धारित किया गया है कि क्रमश: उन संसद और विधानमंडल के सदस्यों को संसद या विधानमंडल का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए अयोग्य कर दिया जाएगा यदि वे सरकार के अधीन ऐसे पद को छोड़कर, जिसको धारण करने वाले का अयोग्य न होता संसद ने विधि दव्ारा घोषित-किया है, कोई लाभ का पद धारण करता है। इसके पीछे मूल विचार पद के कृत्यों और विधायी कृत्यों के बीच हित संघर्ष को दूर करना है। सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने वाले लोगों को संसद या विधानमंडल का सदस्य बनने से विमुक्त करने का सिद्धांत यह है कि ऐसा व्यक्ति उस कार्यपालिका के कृत्यों का प्रयोग स्वतंत्र रूप से न कर सके जिसका वह अंश है। इस सिद्धांत को ब्रिटिश के संवैधानिक इतिहास में हुए विकास में से लिया गया है, जिसके चलते यह स्थापित किया गया कि क्राउन और इसके अधिकारी संसद में अपनी बात नहीं रख सकते। संविधान के निर्माताओं ने कार्यपालिका के प्रभाव और प्रचालन से विधायी पद को पृथक रख कर बिल्कुल उचित ही किया था।

संवैधानिक सिद्धांतों में यह ध्यान रखा गया है कि निर्वाचित सदस्य सरकार के कृत्यों पर निगरानी रख सके। कानून का निर्माण, बजट का अनुमोदन और सभा सरकारी कार्यवाईयों पर निगरानी रखना सदस्यों के कार्य क्षेत्र में ही सरकार की कार्यपालिका शाखा के कानून का कार्यान्वयन करना चाहिए, लोक धन का अनुमोदित उद्देश्यों के लिए सदुपयोग करना चाहिए और विधान के प्रति इसके कृत्यों के लिए उत्तरदायी रहना चाहिए। अत: यदि सदस्य कार्यपालिका के प्रति कृतज्ञ हों तो विधान कभी भी अपनी स्वतंत्रता की कायम नहीं रख सकता और वह मंत्रिपरिषद और अधिकारियों के समूहों पर नियंत्रण खो देता है। इस परिप्रेक्ष्य से, सदस्यों के लिए पद के लाभ पर संवैधानिक रोक लगाना आवश्यक और स्वागत योग्य दोनों ही हैं।

भारत में वैस्टमिराटार मॉडल (आदर्श) को इसलिए स्वीकृति किया, क्योंकि ये उसके साथ मेल खाता है और ऐतिहासिक संबद्धता भी है। इस मॉडल में कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) संसद या या विधानमंडल से ली जाती है। यद्यपि सिद्धांत रूप में विधानमंडल सरकार पर जवाबदेही के लिए नजर रखता है, फिर भी वास्तव में प्राय: यह देखा गया है कि सरकार विधान पर तब तक नियंत्रण रखती है जब तक सदन या विधानमंडल में इसका बहुमत होता है। सत्ता के लिए विधायकों के बहुमत की संतुष्टि के लिए अधिकतर संघर्ष मंत्रिमंडल संरचना के साथ समझौता और संरक्षण की इस आवश्यकता के साथ संबंध होता है। यही कारण है कि मंत्रिपरिषद का आकार पिछले दशकों से भारी भरकम होता आया है। अन्तत: 2003 में संविधान के 91वें संशोधन को अधिनियमित करके निचली सदन में मंत्रिपरिषद के आकार को इसके 15 प्रतिशत तक ही सीमित कर दिया गया है।

नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि

निगमों के अध्यक्ष, विविध मंत्रालयों के संसदीय सचिव के रूप में तथा लाभ के अन्य पद प्राय: विधायकों को पद, प्रतिष्ठा और विशेषाधिकार के लिए अपनी अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए प्राय: घूसखोरों का काम करती है। निसंदेह, यह शक्तियों को अलग करने के सिद्धांत का दुरुप्रयोग हो। परन्तु जब तक यह दुरूप्रयोग लोकतंत्र पर हमारे मॉडल (आदर्श) को एकीकृत रखता है, तब तक लाभ के पद से संबंधित चर्चा को केवल तकनीक और कानूनी मुद्दों तक सीमित रखना बहुत अधिक पर्याप्त होगा।

राजनीतिनिक दृष्टि से कोई भी व्यक्ति तब तक मंत्री नहीं बन सकता, जब तक वह संसद सदस्य विधायक/विधान परिषद का सदस्य न हो। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को, जो संसद सदस्य/ विधायक संविधान परिषद का सदस्य न हो, मंत्री सदस्य होता है तो उसे छ: महीनों के भीतर संसद सदस्य विधायक/विधान परिषद का सदस्य बनना होगा। हमारी व्यवस्था में, इस परिप्रेक्ष्य में कार्यपालिका और विधायिका दोनों में कोई अंतर नहीं होता। परन्तु, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में इस अवस्था में ऐसा नहीं होता, जिससे कुल मिलाकर भ्रष्टाचार और संरक्षण को बढ़ावा मिल सके। कारण है कि एक राजनीतिक संस्कृति को अमन किया गया है, जिसमें सार्वजनिक प्रश्न सामाजिक कल्याण की उन्नति का एक साधन है न कि निजी या पारिवारिक लाभ को है सच है कि हमारे देश में काफी समय से सार्वजनिक पद का प्रयोग अपनी संपत्ति में बढ़ावा करने के लिए किया जाता है इसलिए, कभी भी सार्वजनिक पद बहुत बड़े भ्रष्टाचार के शुरू संरक्षण में वृद्धि करने के साधन बन गए हैं।