आचार संहिता (Code of Ethics – Part 7)

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इस प्रकार के झुकाव और दबाव में, जिसमें सरकार से अपना काम करना पड़े यह आवश्यक हो जाता है कि लाभ के पद की इस परिभाषा की पुन: समीक्षा की जाए। लाभ के पद से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 102 और अनुच्छेद 191 की भावना का वर्षो से अतिक्रमण होता आ रहा है कि जबकि कागजों पर इसका पालन किया जाता है। परिणामस्वरूप, विधि निर्माता अनुच्छेद 102 और अनुच्छेद 191 के अंतर्गत अयोग्यता से छूट की सूची में वृद्धि करते रहे। उदाहरण के लिए, 1959 के अधिनियम 10 में अनुच्छेद 102 के तहत, अयोग्यता से छूट दिए जाने वाले सैंकड़ों नामों का उल्लेख सूची में किया गया है। ऐसी सूची में किसी स्पष्ट युक्तिकरण का उल्लेख शायद समय समय पर कुछ पदधारियों की रक्षा करने के औचित्य के अलावा और कुछ प्रतीत नहीं होता। इसी प्रकार के कानून राज्य विधानमंडलों दव्ारा अनुच्छेद 191 के तहत अधिनिमित किए गए हैं, जिसमें राज्य विधान मंडलों के लिए सैंकड़ों पदों को अयोग्यता से छूट दी गई है। हर बार, कार्यपालिका दव्ारा एक विधायक की किसी पर भी नियुक्ति कर दी जाती है जिसे लाभ के पद पर नियुक्ति कर दिया जाता है जिसे लाभ का पद वर्गीकृत किया जा सकता हो और उस पद को छूट वाली सूची में शामिल करते हुए कानून को अधिनिमित कर दिया जाता है।

प्राय: अशोधित मानदंड अपना लिया जाता है चाहे उस पद के लिए कोई पारिश्रमिक हो या न हो। इस प्रक्रिया में इस बात का बिना वास्तविक अंतर करते हुए कि निर्णय लेने में कार्यपालिका के अधिकार का प्रयोग किया है अथवा सार्वजनिक निधियों के नियोजन में प्रत्यक्ष रूप से संलिप्तता है, इसे प्राय: नजरों से ओझल कर दिया जाता है। नियुक्ति और पद से हटाए जाने के बारे में उच्चतम न्यायालय दव्ारा दिया गया स्पष्टीकरण भी सरकार की कार्यपालिका के हाथों में होता है, अत: वह दोनों जगह काम नहीं आ सकता क्योंकि कई नियुक्तियां सलाहकारी शक्तियों की होती है। विद्यमान प्रतिमानक भी स्थानीय क्षेत्र विकास स्कीमों पर लागू नही होते, जिसके तहत विधायकों को लोक निर्माण कार्यो की मंजूरी देने और संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास स्कीमों (योजना) और विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास स्कीमों के अंतर्गत मंजूर की गई निधियों को व्ययों को अधिकृत करने के लिए सशक्त किया जाता है। अनेक दलों के नेताओं और विधायकों को उनकी मर्जी से विवेकी लोक निधियों की आवश्यकता होती है ताकि वे अपने निर्वाचन स्थलो की आवश्यकतााओं को पूरा करने के लिए सार्वजनिक निर्माण को जल्दी से निष्पादित करवा सकें। तथापि, ऐसी स्कीमों की शक्तियों को पृथक करने वाली धारणा गंभीर रूप से अर्थविहीन हो जाती है, क्योंकि विधायक सीधे-सीधे कार्यपालिका का काम भी करने लग जाते हैं। इससे यह दलील भी दोषपूर्ण सिद्ध हो जाती है कि विधायक इन स्कीमों के अंतर्गत सार्वजनिक निधियों को प्रत्यक्ष रूप से संचालित नहीं करते, क्योंकि ये जिला मजिस्ट्रेट के नियंत्रण में होती हैं। वास्तव में कोई भी मंत्री सार्वजनिक धन का निपटारा नहीं करता। जहां तक कि खजानों और वितरण अधिकारियों के अलावा, कोई कर्मचारी भी व्यक्तिगत रूप से रोकड़ का संचालन नहीं करता। विधानमंडल दव्ारा बजट को अनुमोदित करने के बाद व्ययों पर दिन प्रतिदिन निर्णय लेने का काम एक कार्यपालिका का एक महत्वपूर्ण कृत्य अर्थात एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है।

विविध संवैधानिक विशेषज्ञों और विधि-वेत्ताओं ने उपर्युक्त स्कीमों को अंसवैधानिक करार दिया है। लोक लेखा समिति के भूतपूर्व अध्यक्ष इरा सेजियन दव्ारा लिखित ’संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास स्कीम: संकल्पना, भ्रम और अंतर्विरोध की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस स्कीम (संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास स्कीम) ने संघीय व्यवस्था में संसद सदस्यों की भूमिका को विकृत कर दिया है और उन निधियों को दूसरी ओर मोड़ दिया है जिन्हें वास्तव में, पंचायती राज संस्थानों जैसी एंजेसियों (संस्थाओं) के पास जाना चाहिए था। स्थानीय सरकारों के अधिकारों के हनन के अलावा, इस स्कीम को लागू करने में सबसे बड़ी गंभीर आपत्ति हितों का संघर्ष है जो तब उत्पन्न होता है, जब विधायक कार्यपालिका की भूमिका अदा करने लग जाते हैं। इसी प्रकार के मुद्दे की 1959 में संसद में कांग्रेस पार्टी की एक समिति दव्ारा जांच की गई थी जिसकी अध्यक्षता वी. के कृष्ण मेनन दव्ारा की गई थी, जिसने राज्य के उपक्रमों के लिए संसदीय निगरानी के प्रश्न पर विचार किया। उस समय सार्वजनिक उद्यमों की शासी निकायों पर संसद सदस्य के नामांकन का मामला सामने आया। वी. के कृष्ण मेनन समिति ने निष्कर्ष दिया कि ऐसी नियुक्तियों के विरूद्ध ’प्रतिफलों का अति सबल भार’ होना चाहिए।