इथिक्स (आचार विचार) (टिप्पणी) (Ethics Note I – Part 1)

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प्लेटो, अरस्तु, दंड, बैछमु मिल गीता, गांधी 2दक एआरसी रिपोर्ट (विवरण)

भारतीय सरकारी कार्य संस्कृति की समस्याएंे/विशेषाऐं:-

1. अत्यधिक समस्या के कारण कर्मचारीयों पर किसी (-) तनाव का खतरा ना होना। संविधान का एच-एस11 लोकसेवाओं की विशेष सुरक्षा प्रदान करता हैं, तथा न्यायपालिका में ही आमतौर पर कर्मचारियों का ही पक्ष लिया है। पिछले एक दशम में न्यायपालिका का दृष्टिकोण कुछ बदला है, हालांकि अभी भी सुरक्षा बहुत अधिक है।

2. अच्छे कार्य को विशिष्ट पहचान या प्रंशसा का अभाव (प्रमोशन या वेतन वृद्धि नियमित समय पर ही होती है, उसमें निष्पादन या नैतिक व्यवहार की व्यवस्था नहीं, जो नई व्यवस्था अब लाने की बात की जा रही है, उसमें पदोन्नति के आधार बदले जायेंगे, जो कार्यसंस्कृति को बेहतर बनाने में भूमिका निभा सकते हैं।

3. पांरपरिक सत्तरवादी ढांचा:- नीचे व ऊंचे पदों में अंतराल अधिक होता है।

4. रूढ़िवादी होने के कारण नवाचारों के प्रति असहमति का भाव होता है।

5. प्रेसीडेन्ट (अध्यक्ष) का ज्यादा महत्व, नये समाधान पर कम बल होता है।

6. राजनीतिक हस्तेक्षेप के कारण अनुशासनहीनता की अधिकता। विभिन्न राजनीतिक दलों के समर्थक बंटे हुए है। उनके प्रमोशन या नुियक्तियां इसी आधार पर तय होती है। अत: तटस्थता जैसे मूल्यों का अभाव होता है।

7. एकता की भावना की अनुपस्थिति:- उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत

सामान्य वर्ग ’आरक्षित वर्ण इत्यादि

8. राष्ट्रीय उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्धता का अभाव

1. सबसे पहले स्पष्ट रणनीति तथा ऐसे प्रतिमान बनाये जाने चाहिए, जिन्हें नयी डब्ल्यू. सी. में शामिल करना है।

2. इन प्रतिमानों को लागू रहने की योजना कुछ चरणों में विभाजित की जानी चाहिए।

3. संगठन के सबसे ऊंचे पदों पर आसीन लोग नये प्रतिमानों के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करे, ताकि सभी कर्मचारियों को स्पष्ट हो, कि इस मुद्दे पर संगठन में कोई मत वैविद्यय नहीं है।

4. उच्च पदाधिकारी पहले खुद इन प्रतिमानों का प्रयोग करना शुरू करे व साथ-साथ बाकी कर्मचारियों को प्रोत्साहित करे।

5. संगठन की सारी प्रक्रियाएं (विशेषत: मूल्यांकन की प्रक्रियाएं) नई कार्य सं. के अनुसार व्यवस्थित की जाये। नियम व विनियम भी नये प्रतिमानों के अनुसार बनाये जाये।

6. नये कर्मचारियों का चयन वन अपेक्षाओं अनुसार ही किया जाये, पुराने कर्मचारियों को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाये, संगठन में इतनी सहनशीलता जरूर हो, कि छोटी-मोटी गलतियों को कुछ समय तक माफ किया जाए।

7. जो कर्मचारी जान बूझकर नयी कार्य संस्कृति का विरोध करे, उन्हें चेतावनी दी जाए उनके व्यवहार पर सतत्‌ निगरानी रखी जाये व अगर सुधार की कोई संभावना ना हो, उन्हें कार्य छोड़ने को कहे, नहीं हाे पदावंन्त करे।

एडमिनिस्टिर (दर्शनशास्त्र) फिलोसोपी (दर्शनशास्त्र):-

1. सुशासन उपागम:-1992 में वर्ल्ड बैंक (विश्व अधिकोष) दव्ारा हस्तावित दृष्टिकोण प्रशासकों के नैतिक आचरण को लोक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार मानता है।

2. नव लोक प्रशासन:- यद्यपि इस दृष्टि के केन्द्र में प्रशासनित कार्यकुशलता सबसे ऊपर है, किन्तु वह प्रशासन की ईमानदारी को भी उसका एक महत्वपूर्ण अंश मानता है।

लोकसेवा की अवधारणा

लोकसेवा के दो अर्थ होते है-

(क) पहले अर्थ में इसमें वे सभी सेवाएं शामिल हैं, जो किसी देश की संख्या आधी जनता को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी रखती हैं। पुराने राज्यों में ऐसी सेवाएं काफी कम थीं क्योंकि पुलिस राज्य का मूल कार्य कुछ सेवाओं तक ही सीमित होता है, जैसे पुलिस सेवा, न्यायालयों की सेवा etc.

कल्याणकारी राज्य की स्थापना के बाद लोकसेवाओं का विस्तार बढ़ता गया है। अब इनमें कई अन्य सेवाऐं जैसे जल सेवा, विद्युत, शिक्षा, स्वाथ्य, भोजन, रोजगार, सामाजिक न्याय इत्यादि भी शामिल हैं। किसी राज्य के चरित्र का अनुमान इस आधार पर लगाया जा सकता है, कि

(अ) वह अपने नागरिकों को कितने प्रकार की लोक सेवाएं उपलब्ध करता हैं।

(ब) वह पी.एस. स्वयं ही उपलब्ध कराता है, का निधि योग की भागीदारी के साथ या सिर्फ विधिक्षेत्र के दव्ारा उपलब्ध कराता है।

(स) सेवाऐं निशुल्क उपलब्ध कराता हैं, बाजार कीमत पर या कूछ सब्सिडी देकर।

(ख) पी.एस. का दूसरा अर्थ उन सभी व्यक्तियों का देखा समूह या कार्य से है, जो सरकारी नियमन के तहत कार्य करते हैं। इसके व्यापक अर्थ में सैन्य तथा असैन्य सभी कर्मचारी शामिल हो जाते हैं, किन्तु सीमित अर्थ में सिर्फ वे कर्मचारी जिनके कार्य की प्रकृति नागरिकों को लोकसेवाऐं उपलब्ध कराने से संबंधित हैं।

एक अच्छे लोक सेवक को सिर्फ नौकरी समझ कर काम नहीं करना चाहिए। सेवा शब्द में निहित है, कि उसके भीतर जनता, विशेषत: वंचित वर्गो की सहायता व कल्याण करने की इच्छा होनी चाहिए। इस धारणा के अनुसार लोक सेवा निम्नलिखित आदर्शो पर आधारित होनी चाहिए-

1. अपने कार्य को वोकेशन (पेशा), समस्या, सिर्फ व्यवसाय नहीं। वोकेशन का अर्थ हैं, किसी कार्य व गहरी प्रतिबद्धता के साथ करना।

2. वंचित वर्गो के प्रति परोपकार की भावना का होना।

3. खुद को जनता से ऊचा ना समझना, बल्कि जनता के सेवक के रूप में अपनी परिभाषा करना

(ग) लोकसेवा का एक तीसरा अर्थ भी है, इसके तहत सरकार की कोई भूमिका नहीं है। किसी भी व्यक्ति का आंतरिक प्रेरणा से कुछ ऐसे कार्य करना, जो उसके स्वार्थ पर आधारित ना होकर परोपकार की भावना के लिए किये गये हो, लोकसेवा कहलाते है। जैसे- गरीबों के लिए निशुल्क भोजन की व्यवस्था कराना, किसी सामाजिक कार्य हेतु श्रमदान करना इत्यादि।

इस अवस्था का विशेष महत्व उन देशों में हैं, जहां श्रम की कीमतें काफी ऊँची हैं। ऐसे देशों की सरकारें तथा गैर सरकारी संगठन नागरिकों से निवेदन करते है, कि वे अपना कुछ समय निहस्वार्थ भाव के समाज कल्याण हेतु स्वार्थ होकर करता है। यू.एस.ए. की सरकार ने ऐसी बहुत बड़ी परियोजना चलायी थी। बिल क्लिंटन व चॉर्ज बुश की सरकार ने भी गंभीर प्रयास किये थे। इसके तहत स्वयं सेवकों व विलिटीपर की सूची तैयार की जाती है, व कार्य की उपलब्धता के आधार पर अमेरिका या उसके बाहर भेजा जाता है। खर्च की भूमिका भी इसमें प्रभावी रहती है।

भारत के राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) इसी प्रकार की है। इसके अलावा धार्मिक या लोक आयोजनों में लोगों की ऐसी भागीदारी देखी जा सकती है।