(आचार विचार) (टिप्पणी) (Ethics Note I – Part 2)

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शासन एवं ईमानदारी के दार्शनिक आधार

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कन्वेंशनल फिलोसॉपी (पारंपरिक दर्शनशास्त्र) :-

प्लेटो :- ’दार्शनिक राजा’ का सिद्धांत:- राजा ऐसा होना चाहिए, जिसमें विवेक प्रमुख रूप से हो, लालच या भोग नहीं हो। अगर व्यापारी व्यक्ति शासन चलायेंगे, तो लोभ में अंधे होकर राज्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। (राजा लोभ से युक्त हो इसका अर्थ है, कि शासन में ईमादारी होनी चाहिए।)

अरस्तु:- राज्य ही व्यक्ति को व्यक्ति बनाता है, इस कथन का सार ही है, कि राज्य अपनी प्रकृति में नैतिक संस्था है। नैतिक संस्था बेईमानी के आधार पर नहीं चल सकती।

अरस्तु का एक और कथन है- राज्य अस्तित्व में :- आया था, कि मनुष्य का जीवन सुरक्षित रहे, किन्तु यह निरंतर चल पा रहा है, क्योंकि यह मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाता हैं।

हीगल:- राज्य एक नैतिक संस्था है, -परिवार और सिविल समाज से ऊंचे स्तर की नैतिक दशा है। यह सार्वभौमिक परार्थ की भावना पर आधारित हैं, इसमें निहित हैं, कि राजा और उसके कर्मचारी खर्च पर नहीं, बल्कि लोक कल्याण पर ध्यान देंगे।

टी.एच. तीन:- राज्य नैतिक जीवन के रास्ते में आने वाली लाभार्थी की बाधा हैं।

उपयोगतावाद :- मूल आदर्श है, अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख-राज्य प्राकृतिक संस्था नही है, उसे मनुष्यों ने अपने सुखों की वृद्धि हेतु बनाया हैं। अधिकारी तंत्र अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुखों की नीति को लागू करने हेतु जिम्मेदार है-बेईमानी करने का अर्थ है कि जो लाभ समाज को मिलना या, वह किसी कर्मचारी ने अपने पास ही रख लिया। वह राज्य के मूल अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा करता है, क्योंकि राज्य में अस्तित्व से पहलेे भी स्वार्थ का ऐसा ही शासन था।

राजधर्म:-

1. इसका अर्थ है, राज्य को अपने नैतिक कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, कोई भी अन्य लोभ या दबाव इसके मार्ग में बाधक नहीं बनना चाहिए।

2. अस्तेय तथा अपशिष्ट जैसे मूल्य व्यक्ति को बेईमान होने से रोकते है।

3. कोटिल्य ने राज्य के साप्तांग सि. में स्पष्ट कहा है, कि राजा का लोभ व व्यवसन से दूर होना चाहिए। उसका स्पष्ट कथन है, कि राजा का शासन तभी तक सुरक्षित है, जब तक जनता सुख-चैन से है, तथा शासन से नाराज नहीं है। (कुछ का जानना, कि क्रांति तो होनी चाहिए)

4. गीता का बल स्वधर्म पालन पर है। राजा का धर्म बिना स्वार्थ प्रेरणा के ईमानदारी से राजकाज का पालन करना हैं।

पोलेटिकल फिलोशोपी (राजनीतिक दर्शनशास्त्र):-

अदारवाद तथा स्वेच्छाततवाद:-

जॉन लॉक:- राज्य का शासन तभी तक रहेगा, जब तक वह हमारे/जनता के हितों को सुरक्षित करता रहेगा, और जब तक जनता का विश्वास उसके प्रति बना रहेगा।

1. स्वतंत्रवादी विचारक राज्य की व्याख्या कुछ अलग तरीके से करते हैं, उनके अनुसार नागरिक मुश्किल या तारण है, तथा हास्य एक सेवा प्रदाता हैं। लोगों की अधिकारिता ईमानदारी लेने है कि वे उचित सेवाऐं प्राप्त करें, तथा उसके लिए उतनी ही कीमत चुकाये, जितनी न्यायोचित हैं। नागरिक राज्य को कर देते हैं, जो एक तरह से उसकी अधिकारिताओं का हिस्सा हैं। अगर उस राशि का संपूर्ण उपयोग समुचित लोकसेवाओं के लिए होता हैं, तो ठीक है। अगर उसमें से एक भी पैसा कोई कर्मचारी अपने पास रख लेता है, तो यह नागरिकों की अधिकारिताओं को छीनने या चोरी के बराबर हैं।

2. सकरात्मक उदारवाद, समतावाद, लोकतांत्रिक समाजवाद:- इन तीनों विचारधाराओं के अनुसार राज्य केवल पुलिस राज्य नहीं है। जिसका काम सिर्फ कानून व्यवस्था बनाये, रखना होता है। राज्य का प्रमुख कार्य कल्याणकारी कार्य है, जिसमें वितरणमूलक न्याय का सामाजिक न्याय केन्द्रिय पर हैं।

सामाजिक न्याय का अर्थ हैंं, कि राज्य सुविधा संपन्न वर्गो को अधिक करं वसूलेगा तथा उस राशि का उपयोग वंचित वर्गो को इत्यादि देने हेतु करेगा।

उच्च वर्णो की आय की हिनता अपने आप में एक अनैतिक प्रतीत होने वाला कार्य हैं। वह नैतिक सिर्फ इस आधार पर बनता है, कि उससे एक उच्चतर शुभ की प्राप्ति होती है, अर्थात, समाज में संतुलन व समानता का विकास होता है। अगर इस राशि का लाभ, वंचित वर्गो की बजाय अधिकारी खुद तक ही सीमित कर लेंगे, तो कल्याणकारी राज्य का मूल दार्शनिक आधार ही नष्ट हो जाएगा। इसलिए शासन का ईमानदार होना अनिवार्य हैं।