(आचार विचार) (टिप्पणी) (Ethics Note I – Part 3)

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सेवा प्रदान करने की गुणवत्ता

1. पहले राज्य पुलिस राज्य होता था, अब कल्याणकारी है, अत: पहले की तुलना में अधिक सेवाएं प्रदान करता हैं।

2. जब तक निधिकरण व उदारीकरण नहीं था, तब तक अधिकांश सेवाओं के मामलें में राज्य एक मात्र सेवा प्रदाता था। इसलिए उपभोक्ताओं का कोई महत्व नहीं था।

3. उदारीकरण के बाद निधि दो में सेवा प्रदान करने के मामले में बेहतर मानक स्थापित किये गये हैं।

4. सूचना के अधिकार तथा पारदर्शिता के अन्य खर्चो से जनता के अधिकार कहे हैं विकसित देशों से संपर्क बढ़ने पर नागरिकों को यह भी समझ में आया, कि उन, देशों में सरकारें सेवा प्रदान करने की प्रक्रिया में कितना जिम्मेदारी भरा रूख अपनाती है।

5. सिविल (नागरिक) सोसायटी (समाज) मूवमेंट (क्षण) सोशल (सामाजिक) मीडिया (संचार माध्यम) के माध्यम से सरकार पर दबाव लोकप्रशासन की नयी अवधारणाऐं तथा स्वेच्छातंत्र विचारक भी राज्य की परिभाषा सेवा प्रदाता के रूप में ही करने लगे है, नागरिक की मांग भी यह है, कि उन्हें उचित सेवाएं प्रभावी तरीके से मिले।

(आजकल यही मुद्दा चुनावों का प्रमुख मृद्दा बन गया हैं)

सरकार अच्छी सेवा प्रदाता कैसे बने-

1. व्यक्तियों को उपभोक्ताओं के रूप में तथा खुद की सेवा प्रदाता के रूप में देखना, ताकि खुद को मालिक व उन्हें प्रजा समझना।

2. अगर सेवा प्रदायन में कमियां हैं, तो लोगों को उसका विरोध करने का पर्याप्त अधिकार दिया जाना चाहिए।

3. सिटिजन (नागरिक) रिपोर्ट (विवरण) कार्ड (पत्रक) की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। इसके अंतर्गत जो नागरिक किसी कार्यालय से सेवा प्रदान करते है, उनके फीडबैक (प्रतिक्रिया) के आधार पर कर्मचारियों का मूल्यांकन होता है, व वेतन वृद्धि जैसे लाभ दिये जाते हैं।

4. जहां तक संभव हो, बहुत सारी सेवाऐं एक ही स्थान पर उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि न्यूनतम समय खर्च करके नागरिक सेवाऐं प्राप्त कर सके।

5. सूचना तकनीक का प्रभावी उपयोग करते हुए बाहर के सभी प्रमुख स्थानों पर कियोस्क लगाए जाये, ताकि बहुत सी सेवाएं हर समय, हर जगह उपलब्ध हो।

6. जनता को प्रेरित रखना चाहिए, कि वह कुछ लोक सेवाओं के मामलें में स्वयं भी जिम्मेदारी स्वीकार करे, इसमें प्रशासन एवं जनता के सहयोग की प्रमुख भूमिका है। जैसी वापसी रखवाली योजना का भागीदारी इत्यादि।

7. सभी विभागों को सिटीजन (नागरिक) चार्टर (घोषणापत्र) की व्यवस्था प्रभावी तरीके से लागू करनी चाहिए।

8. निधियोग की तरह जहां तक संभव हो, नागरिकों को उनके ऊपर ही सेवा प्राप्ति का विकल्प मिलना चाहिए।

9. प्रत्येक सेवा के मामले में प्रतिस्पर्धा की स्थिति हो, जिसमें पूर्ण निधिकरण, सीमित निजीकरण या सरकारी संगठनों के बीच प्रतिस्पर्धा के मॉडल्स (आदर्श) का प्रयोग किया जा सकता है।

10. नागरिकों को अधिकार हो, कि वे जब चाहे सेवा प्रदाताओं को बदल सके।

11. नागरिकों के मूल्यांकन का एक प्रमुख आधार ये हो, कि कितने नागरिकों ने उसकी सेवा को छोड़ा, व कितने नागरिकों ने किसी ओर की सेवा को छोड़कर उसे चुना।

12. सरकार हेतु संभव नहीं है कि सेवा हर व्यक्ति तक पहुंचा सके।

सेवा हर व्यक्ति तक पहुंचा सके, निधिक्षेत्र के साथ साझीदारी करना जरूरी है। जैसे-अगर किसी निजी मोबाइल (गतिशील) सेवा प्रदाता का ट्रांसमीटर (हस्तांतरित करने वाला) का प्रयोग करना तथा अपने का प्रयोग करने की अनुमति उन्हें होना। (हर जगह सरकारी समूह खोलने की बजाय निजी विद्यालयों का मूल्यांकन करके बच्चों को उन्हीं में भेजना व प्रत्येक बच्चे के अनुसार एक निश्चित शुल्क का भुगतान करना।)

13. उपभोक्ता अधिकार से संबंधित कानून, नियमों तथा विनियमों का अधिकतम प्रचार करना। उपभोक्ता अदालतों तक सीधी पहुंच बनाना, जिसमें किसी वकील या मध्यस्थ की आवश्यकता न रहती हो।

14. सुशासन के अन्य आदर्शों का पालन करना:-

नीति संहिता व आचरण संहिता

इन दोनों का संबंध प्रशासन या प्रबंधन में नैतिकता की स्थापना से है, व्यवहारिक तौर पर इन्हें पूरी तरह अलग करना संभव नहीं है, किन्तु सैद्धांतिक तौर पर इनमें अंतर किया जा सकता है-

1. नैतिक संहिता मूल आधार है, जिसमें कुछ नैतिक मूल्यों को शामिल किया जाता है। कोड (संकेतावली) ऑफ (का) कनेक्ट (जुड़िये) नैतिक संहिता पर आधारित एवं दस्तावेज होता है, जो निश्चित कार्यों या आचरणों के बारे में स्पष्ट करता है, कि वे किसी अधिकारी को करने चाहिए या नहीं। दूसरे शब्दों में नैतिक संहिता प्राय: सामान्य व अमूर्त होती है, जबकि आचारण सख्या विशिष्ट व मूर्त है।

2. संभव है, विभिन्न विभागों हेतु नम्बर संख्या एक जैसी हो, जबकि आचारण संहिता अलग हो इसका कारण यह है कि एक ही नैतिक मूल्य अलग-अलग विभागों में विभिन्न रूपों में व्यक्त होता हो। उदाहरण अगर नैतिक मूल्य प्रतिबद्धता है, तो सेवा की आचारण संहिता में जमा खर्च होना कि यह जैसी दशा में अपना जीवन देने को तैयार रहना, भागना नहीं, जबकि किसी सिविल (नागरिक) सेवक की आचरण संहिता में इसका अर्थ होगा- जरूररत पड़ने पर कार्यालय के निश्चित समय के अतिरिक्त उपस्थित होना etc.

3. नैतिक संहितर तुलनात्मक रूप से स्थायी होती है जबकि आचारण संहिता में परिवर्तन समय के बाद होते रहते है। उदाहरण ईमानदारी नैतिक संहितर का एक रहा है, जो लगभग हर समय यथावत रहता है, किन्तु आचरण संहिता में परिर्वतन:- जरूरी होते है, क्योंकि समय के साथ बेईमानी के नए आयाम सामने आ सके हैं। जैसे- डोपिंग (अपमिश्रण) विरोधी नियम, मैच फिक्सिंग (निश्चित करना) विरोधी नियम, स्पॉट फिक्सिंग (स्थान निश्चित करना) ।