महान सुधारक (Great Reformers – Part 10)

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मओ त्से-तुंग:-

म्ओ त्से -तुंग या माओ जेदोंग का जन्म 26 दिसंबर, 1893 को चीन के हूनान प्रांत के शाओशासन कस्बे में एक किसान परिवार में हुआ था। माओ ने महज 13 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ कर खेत पर काम करना शुरू किया। बाद में खेती छोड़कर वे हूनान प्रांत की राजधानी चांगशा में माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने गए। जिन्हाई क्रांति के समय माओ ने हूनान के स्थानीय रेजिमेंट (पलटन) में भर्ती होकर क्रांतिकारियों की तरफ से लड़ाई में भाग लिया। चिंग राजवंश के सत्तच्युत होने पर वे सेना छोड़ कर पुन: विद्यालय गए। माओ ने पीकिंग विश्वविद्यालय में सहायक पुस्तकालयाध्यक्ष पद पर रहकर काम किया और अंशकालिक छात्र के रूप में पंजीकृत होकर कुछ व्याखानों और विदव्ानों के सेमिनारों में भी भाग लेने लगे। उनका झुकाव साम्यवादी सिद्धांतों की तरफ हुआ और वे साम्यवादी दल में शामिल हो गये। उनके नेतृत्व में चीन की क्रांति सफल हुई। उन्होंने जनवादी गणतंत्र चीन की स्थापना (सन्‌ 1949) से मृत्यु पर्यन्त (सन्‌ 1976) तक चीन का नेतृत्व किया। उन्होंने मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा को सैनिक रणनीति में जोड़कर एक विशेष सिद्धांत को जन्म दिया जिसे ’माओवाद’ के नाम से प्रसिद्धी मिली। वर्तमान में कई लोग माओ को एक विवादास्पद व्यक्ति मानते हैं परन्तु चीन में वे राजकीय रूप से महान्‌ क्रांतिकारी, राजनीतिक रणनीतिकार, सैनिक पुरोधा एवं देशरक्षक माने जाते हैं। वे कवि दार्शनिक, दूरदर्शी महान्‌ प्रशासक के रूप में गिने जाते हैं। हालांकि माओ के ’ग्रेट (महान) लीप (छलांग) फॉरवर्ड (आगे)’ और ’सांस्कृतिक क्रांति’ नामक सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यक्रमों के कारण गंभीर अकाल पड़ने और चीनी समाज, अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति को ठेस पहुंचाने की भी बातें की जाती हैं।

लेनिन के बाद वह ऐसे दूसरे क्रांतिकारी हैं, जिन्होंने एक पिछड़े देश (चीन) में सफल क्रांति लाने में सफलता हासिल की। लेनिन की तरह माओ साम्यवाद के केवल सिद्धांतकार ही नहीं थे अपितु उसे व्यावहारिक रूप देने वाले भी थे। मओ ने इस काम में कृषक वर्ग की मदद ली। ऐसा करके मओ ने परंपरागत साम्यवाद को अपने अनुरूप विकसित किया। परंपरागत साम्यवाद में कृषकों की खास भूमिका को स्वीकार नहीं किया जाता था लेकिन माओ ने क्रांति में कृषक वर्ग का सहयोग लेकर साम्यवाद में नया अध्याय जोड़ दिया।

मओ ने अपनी पुस्तक ’एनैलिसिस आफ (का) द (यह) क्लासेस (कक्षाएं) इन (में) द (यह) चाइनिश सोसाइटी’ (समाज) में कृषकों की कई प्रकार की श्रेणियों का वर्णन किया है। वह किसानों को टोटे, सीमांत, मध्यवर्गीय और बड़ी जमीनों के रूप में बाँट कर देखते हैं। उन्होंने इन चारों में से प्रत्येक में संभावित क्रांतिकारिता के तत्वों की पहचान की। उन्होंने कृषकयों और भू-स्वामियों के बीच विरोधाभ्यास को समझा और रेखांकित किया। उसका तर्क था कि चीन की परिस्थितियां भिन्न हैं इसलिए यहां मजदूर के बजाए कृषक क्रांति के लिए अधिक उपयुक्त होंगे। लेकिन माओ ने गैर-कृषक वर्ग को पूरी तरह नकारा नहीं बल्कि क्रांति में उनके सहयोग की संभावनाएं तलाश की। सन्‌ 1928 के बाद हुये कुछ विद्रोहों में माओ को पराजय मिली और उन्हें विवश होकर पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी। यहां से मओ के दल को युद्ध के दांव-पेंच की नई रणनीति ’गुरिल्ला या छापामार’ की नीति को अपनाना पड़ा। यह नीति पर्याप्त सफल रही और चीन के कई क्षेत्रों में मओ के साम्यवादी दल का कब्जा हो गया। उनका यह तरीका साम्यवादियों के अंतरराष्ट्रीय संगठन ’कम्युनिस्ट (साम्यवादी) इंटरनेशनल’ (अंतरराष्ट्रीय) की निर्धारित नीतियों के अनुरूप नहीं था जो शहरी केन्द्रो से संचालन का प्रवक्ता था। मओ ने इसके प्रत्युत्तर में कहा कि शहरी केंद्रित क्रांति चीन में कभी सफल नहीं हो सकती क्योंकि चीन में मजदूर वर्ग बहुत कम संख्या में है।

मओ के विरोधियों की सेना जिसे कोमिनटॉग भी कहा जाता है, उसने इन साम्यवादी क्रांतिकारियों को उत्तर-पश्चिम पहाड़ियों की तरफ धकेलना शुरू कर दिया। फलस्वरूप माओ को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ा और उसने अपने साथियों के साथ दूर-दराज के क्षेत्र की तरफ रुख किया। मओ के इस पलायन को ’लांग मार्च’ की संज्ञा दी गई है। मओे के इस कदम ने उन्हें साम्यवादी दल का निर्विवाद नेता बना दिया। इससे उन्हें अपने दल को मजबूत बनाने में बड़ी मदद मिली। इसी दौरान मओ ने मार्क्सवादी दर्शन का व्यापक अध्ययन किया और दो बहुत गंभीर लेख ’ऑन (पर) प्रैक्टिस’ (अभ्यास) और ’ऑन (पर) कंट्राडिक्शन (अंतर्विरोध)’ लिखे। सन्‌ 1940 के दशक में मओ ने ’न्यू (नया) डेमोक्रेसी (जनतंत्र)’ शीर्षक के अंतर्गत भावी चीन की रूपरेखा खींची। उन्होंने जापान के आक्रमण का सामना करने के लिए चीनी जनता में राष्ट्रवाद की भावना को कूट-कूट कर भर दिया और गुरिल्ला युद्ध को और अधिक परिष्कृत किया। इसी समय राष्ट्र रक्षा के लिए उन्होंने सत्ताधारी कोमिनटॉग से मेल-मिलाप कर लिया। सन्‌ 1949 में दोनों के मध्य सहयोग समाप्त हो गया और मओ चीन राज्य के अध्यक्ष बन गये।

मओ ने चीन के समाज का जो खाका पेश किया वह मार्क्स की रचनाओं में प्रतिपादित रूपरेखा से अलग था और उसे भी अलग था जिसे लेनिन ने सोवियत संघ में बनाने का प्रयास किया था। सन्‌ 1950 के दशक के आरंभ में मओ ने ’लेट ए हंडरेड (सौ) फ्लावर्ज (पुष्प) ब्लूम (कली)’ का आहृान किया जिसके फलस्वरूप चीन में साम्यवादी दल में विभिन्न दृष्टिकोणों को अपनी बात खुल कर कहने की स्वतंत्रता मिली। बाद में उन्होंने कृषि के सामूहिकीकरण का प्रयास किया और उसके साथ ’ग्रेट (महान) लीप (छलांग) फॉरवर्ड (आगे)’ के माध्यम से चीन में साम्यवाद की नींव गहरी करने की कोशिश की। हालांकि मओ को इस काम में पर्याप्त सफलता नहीं मिली। इसका परिणाम यह भी निकला कि उनके खिलाफ असंतोष भी उभरने लगा। मओ ने इस विरोध का वैचारिक आधार पर मुकाबला किया और सन्‌ 1966 में सांस्कृतिक क्रांति का आहृान किया। इसका उद्देश्य साम्यवादी दल के सक्रिय सदस्यों में क्रांतिकारी जोश को तीव्र करना था। उनका यह विचार उनकी मृत्यु यानी 9 सितंबर, 1976 तक बना रहा।

इसमें संदेह नहीं कि मओ के विचारों पर मार्क्स और लेनिन का जबरदस्त प्रभाव था। लेकिन माओ ने उनकी बातों को नए परिप्रेक्ष्य में प्रयुक्त किया। कृषक क्रांतिकारिता की शक्ति पर आश्रित मओ ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद में संशोधन किया। यह ध्यान में रखा जाना चाहिये कि मार्क्स कृषक वर्ग को महत्वपूर्ण नहीं मानते थे। उनका विश्वास था कि कृषक वर्ग रूढ़िवादी होता है और प्रतिक्रियावादी भी। ये वर्ग क्रांति में योगदान नहीं देता। मओ को मौलिक योगदान इस तथ्य में निहत है कि उन्होंने चीन में सफल क्रांति का श्रेय किसानों को दिया। साथ ही, उनके क्रांति के तरीकों को अफ्रीकी एशियाई समाजों ने मिसाल के तौर पर देखा। सांस्कृतिक क्रांति के दौर में मओ ने सोवियत संघ के उत्तर-क्रांतिकाल से शिक्षा लेते हुए इस ओर ध्यान दिलाया था तथा चेतावनी भी दी कि समाजवादी समाज के अंतराल में ऐसे समाज से लाभ लेने के लिए नया पूंजीवादी वर्ग भी खड़ा हो सकता है। माओ ने इस प्रकार सोवियत संघ की विसंगहत को समझ कर साम्यवादी दल में उच्च सोपानकों को एक तरफ रखने के लिए इस प्रकार का तर्क रखा था। मओ निरंतर क्रांति में विश्वास रखता था। इसी विश्वास के कारण उसने सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात किया। मओ और उसके साथियों का मानना था कि उनके बाद रूस की तरह चीन भी पूंजीपतियों से गठबंधन बनाकर उनके महत्व को स्वीकार कर सकता है। ऐसा होने से रोकने के लिए क्रांति आवश्यक है। इसके अलावा ऐसी शक्तियां बार-बार सिर उठाती हैं जो दक्षिणपंथी होती हैं। इसलिए माओ ने कहा है कि सांस्कृतिक क्रांति शाश्वत चेतनता और जागरूकता का प्रतीक है। वह चीनी समाज में उत्पन्न होने वाली पूंजीवादी मनोवृत्ति के दमन का और साम्यवादी क्रांति को विभिन्न मलिनताओं और दोनों से मुक्त रखने वाला उग्र और क्रांतिकारी संघर्ष है। इसी विचार से प्रेरित होकर उसने देश में सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात किया। चीन के प्रधानमंत्री बाऊ एंन लाई ने इसे महान सर्वहारा वर्गीय सांस्कृतिक क्रांति का कहकर पुकारा।

मार्क्स ने अपनी रचनाओं में विरोधाभासों और अंतर्विरोधी को पर्यायवाची माना था। लेनिन ने इन दोनों में भेद करने का प्रयास किया था। मओ ने इस विवाद को और समृद्ध बना दिया। सन्‌ 1937 में अपने सुप्रसिद्ध निबंध ’ऑन (पर) कंट्राडिक्शन (अंतर्विरोध)’ में मओ ने विरोधाभासों को अंतर्विरोधी और गैर-अंर्तविरोधी रूप में देखा। उनके अनुसार अंतर्विरोधी विरोधाभास वह होते हैं जिन्हें शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता है। सन्‌ 1957 में ’ऑन (पर) करेक्ट (सही बात) हैंडलिंग (संचालन) ऑफ (का) कंट्राडिक्शर्स’ (अंतर्विरोध) में माओ ने इस विचार को और विस्तार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि कृषकों तथा मजदूरों के बीच विरोधाभास गैर -विरोधाभास होते है। उन्होंने यह तर्क भी दिया किसी एक समय में एक विरोधाभास मुख्य विरोधाभास हो सकता है, जबकि, दूसरे समय में लघु विरोधाभास भी हो सकता है। एक मुख्य विरोधाभास में एक मौलिक पहलू तथा अन्य छोटे-छोटे पहलू भी हो सकते हैं। जैसे साम्राज्यवाद के युग में साम्रज्यवादी गुट में एक ओर तथा समाजवादी व औपनिवेशक देशों में दूसरी और विरोधाभास मुख्य रूप में हो सकता है। सोवियत संघ तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच विरोधाभास मुख्य विरोधाभास का मुख्य पहलू है। माओ ने आगे यह भी कहा कि कौन सा विरोधाभास गैर अंतर्विरोधात्मक है तथा मुख्य रूप का है या लघुरूप का है, और कौन-सा विरोधाभास गैर अंतर्विरोधात्मक या किस पहलू का मुख्य या लघु कहा जाए ये ऐतिहासिक सामरिक और सापेक्ष परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

माओ ने विरोधाभास के विस्तृत विश्लेषण के आधार पर अपने ज्ञान के सिद्धांत को विकसित किया। उन्होंने अपने निबंध ’ऑन (पर) प्रैक्टिस (अभ्यास)’ में कहा कि वास्तविक संसार का हमारा समस्त ज्ञान हमें ठोस अन्वेषण तथा आनुभाविक विश्लेषण से प्राप्त होता है। उन्होंने केवल किताबों से मिलने वाले ज्ञान तथा सहजबोध सिद्धांतवाद को विरोध किया। उन्होंने कहा कि अगर कोई चीन को समझना चाहता है तो उसे यहां के वर्गीय ढांचे, भू-स्वामित्व के प्रतिरूप और चीन की अर्थव्यवस्था पर साम्राज्यवाद के प्रभाव को समझना होगा। बिना निरंतर आनुपातिक वास्तविकता के सिद्धांत मात्र एक मतांधता बन कर रह जाता है। आनुभाविक वास्तविकता को समझने के लिए माओ ने दो चरणों-चिरस्थाई चरण और प्रत्यात्मक चरण की बात कही। चिरस्थाई चरण पर हमे वास्तविकता का संकेत हमारी इंद्रियों से मिलता है। यह इंद्रिय आधारित ज्ञान प्रत्यात्मक भोगित हो जाता है। जैेसे जब कोई ग्रामीण चीन की आनुभाविक वास्तविकता को देखता है, तो उसका ऐसा ज्ञान चिरस्थाई चरण का ज्ञान है। परन्तु इस प्रकार की वास्तविकता को देखने के बाद हम चीन के समाज व उसके विभिन्न वर्गों जैसे भूमिहीन, सीमांत, छोटे, मध्य और बड़े किसान को समझने का प्रयास करते हैं। यह प्रत्यात्मक चरण कहलाता है।

माओ जानते थे कि चीन में कृषक इतने सशक्त नहीं है। कि वे साम्राज्यवाद तथा सामंतवाद के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष जीत सके। इसलिए उनका मत था कि ऐसी स्थिति में चीनी समाज के अन्य वर्गो की सहायता लेना बहुत आवश्यक है। माओ ने इस बात को ध्यान में रखते हुये संयुक्त मोर्चे की अवधारणा पर बल दिया। यह मोर्चा उन सभी विभिन्न सहयोगियों का मोर्चा समझा जाने लगा जो साम्राज्यवाद के विरुद्ध था। माओ का मानना था कि इस मोर्चे का स्वरूप ऐतिहासिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा और इसका लक्ष्य मौलिक विरोधाभास का समाधान करना होगा।

संयुक्त मोर्चा रणनीति के तहत माओ ने 1940 में चीन के गणराज्य के लिए नवीन प्रकार के लोकतंत्र का आहृान किया और 1945 में उन्होंने ऐसी व्यवस्था का सुझाव दिया जिसे ’नवीन लोकतंत्र’ कहा गया। माओ ने शास्त्रीय मार्क्सवाद की उस अवधारणा जो सर्वहारा के अधिनायकवाद की चर्चा करती थी, से हटकर लोगों के लोकतांत्रिक अधिनायकवाद की बात की थी। वास्तव में माओ ने मार्क्सवाद और राष्ट्रवाद को मिलाने का प्रयास किया था।