महान सुधारक (Great Reformers – Part 16)

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आई.जी. पटेल:-

11 नवंबर, 1924 को जन्मे इंद्रप्रसाद गोर्धनभाई पटेल या आई.जी. पटेल भारतीय रिजर्व (आरक्षित) बैंक (अधिकोष) के 14वें गवर्नर (राज्यपाल) (1977-1982) थे। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री श्री पटेल वित्त मंत्रालय में सचिव पद के अलावा यूएनडीपी में कार्यरत रहे। बेहद ईमानदार श्री पटेल का कार्यकाल एक हजार, पांँच हजार और दस हजार रूपये के नोट का प्रचलन बंद करने के कठोर फैसले के लिए जाना जाता है। रिजर्व बैंक के कार्यकाल की समाप्ति के बाद वह भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएस) अहमदाबाद में निदेशक के पद पर रहे।

उनकी अपूर्व क्षमताओं के कारण ही उन्हें लंदन स्कूल (विद्यालय) ऑफ (का) इकोनामिक्स (अर्थशास्त्र) एंड (और) पॉलिटिकल (राजनीति) साइंस (विज्ञान) में निदेशक का अतिप्रतिष्ठित पद भी सौंपा गया। यह किसी दक्षिण एशियाई व्यक्ति को पहली बार इस पद का कार्यभार सौंपा गया था। बाद में उन्होंने महाराज सयाजीराव सिंधिया विश्वविद्यालय, बड़ौदा में अध्यापन का कार्य भी किया।

उनकी योग्यताओं के कारण 1991 में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने उनसे देश के वित्त मंत्रालय को संभालने का आग्रह किया लेकिन उन्होंने विनम्रतापूर्वक यह आग्रह अस्वीकार कर दिया। अर्थशास्त्र और प्रशासन में उनके योगदान को देखते हुये उन्हें 1991 में पद्म विभूषण दिया गया। 17 जुलाई, 2005 को उनका निधन हो गया।

एम.एस. स्वामीनाथन:-

प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन का जन्म तमिलनाडु के कुंभकोणम में 7 अगस्त, 1925 को हुआ। प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन मूल रूप से वनस्पति आनुवांशिक वैज्ञानिक हैं। उन्होंने वर्ष 1966 में मैक्सिकों के बीजों को पंजाब की घरेलू किस्मों के साथ मिश्रित करके उच्च उत्पादकता वाले गेहूं के संकर बीज विकसित किए। इनको विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भारत सरकार दव्ारा 1972 में पदम भूषण से सम्मानित किया गया।

प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली (1966-72) के निर्देशक और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिर्देशक के अलावा कृषि अनुसंधान एंव शिक्षा विभाग के सचिव (1972-79) रहे।

सामान्यत: भारत के संबंध में यह भावना बनी हुई थी कि कृषि से जुड़े होने के बावजूद भारत के लिए भुखमरी से निजात पाना कठिन है। इसका कारण यही था कि भारत में कृषि के सदियों से चले आ रहे उपकरण और बीजों का प्रयोग होता रहा था। फसलों की उन्नति के लिए बीजों में सुधार की ओर किसी का ध्यान नहीं गया था। प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन को पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सबसे पहले गेहूं की एक ऐसी किस्म को पहचाना और स्वीकार किया कि इस कार्य के दव्ारा भारत को अन्न के मामलें में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। यह मैक्सिकन गेहूंँ की एक किस्म थी जिसे स्वामिनाथन ने भारतीय खाद्यान्न की कमी दूर करने के लिए पहले अपनाने के लिए स्वीकार किया। इसके कारण भारत के गेहूँ उत्पादन में भारी वृद्धि हुई इसलिए स्वामीनाथन को भारत में हरित क्रांति का अगुआ माना जाता है। स्वामीनाथन के प्रयत्नों का परिणाम यह है कि भारत को आबादी में प्रतिवर्ष पूरा एक ऑस्ट्रेलिया समा जाने के बाद भी खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बन चुका है। भारत के खाद्यान्नों का निर्यात भी किया गया है और निरंतर उसके उत्पादन में वृद्धि होती रही है।

लंदन की रॉयल (राजसी) सोसायटी (समाज) सहित विश्व की 14 प्रमुख विज्ञान परिषदों ने प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन को अपना मानद सदस्य चुना है। अनेक विश्वविद्यालयों ने डॉक्टरेट (चिकित्सक की उपाधि) की उपाधियों से उन्हें सम्मानित किया है। 1967 में भारत सरकार ने पद्म श्री और 1972 में पद्मभूषण से सम्मानित करके एक ऐसे व्यक्ति को महत्व दिया है जिसने कभी प्रचार की ओर आकर्षण नहीं दिखाया। 1971 में इन्हें रमन मैग्सेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन का चयन वर्ष 2012 के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार के लिए भी किया गया।

जगमाहेन मल्होत्रा:-

जगमाहेन मल्होत्रा का जन्म पाकिस्तान के हफीजाबाद में 25 सिंतबर 1927 को हुआ। उनके भारतीय प्रशासनिक सेवा के करियर (पेशा) में एक बड़ा मोड़ तब आया जब आपातकाल (1975-1977) के दौरान उन्हें दिल्ली विकास प्राधिकाण (डीडीए) का उपाध्यक्ष बनाया गया। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी के निकट समझा जाता था। श्री जगमोहन ने इस दौरान दिल्ली को झुग्गर मुक्त करने का प्रयास किया और पुनर्वास कॉलोनियों (बस्तियों) का निर्माण करवाया। इस दौरान उनकी कार्यशैली पर सवाल लगे लेकिन दृढ़निश्चय के धनी श्री जगमाहेन मल्होत्रा ने कठोरता का परिचय दिया। उनकी सेवाओं के कारण 1980 में उन्हें दिल्ली का उपराज्यपाल बनाया गया। दिल्ली में आयोजित 1982 के एशियाड खेलों का आयोजन सफल बनाने के लिए उनकी सेवाएं ली गई। उसी समय देश में गुटनिरपेक्ष सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसकी सफलता का श्रेय भी जगमोहन को गया। 1984 से 1989 तक जम्मू कश्मीर के राज्यपाल पद पर बने रहने के दौरान आतंकवाद के दौर में श्री जगमोहन ने काफी कुशलता से प्रशासन का संचालन किया। इस समय उन्होंने हिन्दुओं के पवित्र स्थल वैष्णोदेवी के विकास के लिए बहुत काम किया। उनकी दक्षता को देखते हुये उन्हें एक बार फिर यही पद सौंपा गया। श्री जगमोहन को 1971 में पद्म श्री और 1977 में पद्म भूषण प्रदान किया गया।

ब्र्रजेश मिश्रा:-

भारत के प्रथम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एवं आधुनिक चाणक्य कहे जाने वाले ब्रजेश मिश्रा का जन्म 29 सिंतबर 1928 को हुआ था। कांग्रेस दल से जुड़े पिता दव्ारिका नाथ मिश्र मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। ब्रजेश मिश्रा ने अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेश नीति को लक्ष्योन्मुख दिशा देने में केन्द्रीय भूमिका निभायी। 28 सितंबर, 2012 को 84 साल की उम्र में दुनिया में विदा हुए श्री मिश्रा आकलन कठिन दौर के धुरंधर रणनीतिकार के तौर पर हमेशा होता रहेगा।

ब्रजेश मिश्रा 1951 में भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी बने। उन्होंने इंडोनेशिया में भारत के राजदूत एवं बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के स्थायी प्रतिनिधि होने का गौरव पाया। अफगानिस्तान में सोवियत संघ की दखलंदाजी के मसले पर भारत के रुख को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मतभेद के कारण उन्हें संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेदारी छोड़नी पड़ी।

सेवानिवृत्ति के बाद 1991 में मिश्रा भाजपा में शामिल हो गए और राजग के कार्यकाल (1998-2004) के दौरान उन्होंने भारत की विदेश नीति एवं राष्ट्रीय सुरक्षा को सही दिशा देने में निर्णायक भूमिका अदा की। मार्च 1998 में प्रधानमंत्री वाजयपेयी का प्रधान सचिव बनने के अलावा उन्हें मई 1998 के पोखरण एटमी परीक्षणों के बाद देश का प्रथम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। एक साथ दो शीर्ष जिम्मेदारियों को निभाते हुए मिश्रा वाजपेयी सरकार के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा एंव विदेश नीति दोनों के असली कर्णधार बने।

मिश्रा ने विदेश एवं राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का जो ब्लूप्रिंट (मूल योजना) तैयार किया, उसका असर आज भी सरकारी निर्णयों में महसूस किया जा सकता है। जिस दौर में वह भारतीय विदेश नीति एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के असली नायक थे, उस दौर को तूफानी घटनाक्रम वाले दौर के रूप में याद किया जाता रहेगा। यह दौर पोखरण एटमी परीक्षणों और इनसे पैदा हुई राजनीतिक-राजनयिक सुनामी, अमेरिका से संबंध सुधार, लाहौर समझौता, वाजपेयी की ऐतिहासिक लाहौर बस यात्रा, कारगिल युद्ध, क्लिंटन की बहुचर्चित भारत यात्रा, भारतीय संसद पर आतंकी हमला एवं भारत-पाक तनाव, ऑपरेशन (कार्यवाही) पराक्रम, रूस एवं चीन से रिश्ते में सुधार और कई दूसरी घटनाओं का गवाह रहेगा। इन तमाम मसलों के प्रबंधन में उन्होंने वाजपेयी के लिए चाणक्य की भूमिका निभाई।

मिश्रा ने 1999 में कारगिल लड़ाई के दौरान अहम भूमिका निभाई थी। वर्ष 2004 में राजग सरकार के चले जाने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। उन्होंने अपनी राजनीति प्रतिबद्धताओं की परवाह किये बगैर भारत-अमेरिका परमाणु करार का समर्थन किया। जिस तरह श्री मनमोहन सिंह को देश में आर्थिक उदारीकरण की पटकथा चुनने का श्रेय जाता है, तो मिश्रा को भी भारत सुरक्षा एवं विदेश नीति के उदारीकरण का सूत्रधार कहा जा सकता है। मिश्रा ने निर्णय प्रक्रिया में तेजी, समन्वय एवं जवाबदेही को खास तवज्जों दी। उनके निर्णयों में दृढ़ता एवं स्पष्टता को प्राथमिकता मिली थी। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें बैठक से तब तक किसी का उठना पसंद नहीं था, जब तक संबद्ध बिन्दु पर सहमति न बन जाएं। उनके विरोधी उन्हें जिद्दी समझते थे, वहीं उनके कई निर्णयों को लेकर विवाद भी उठते रहे। उन पर भारत की अमेरिका एवं इजरायल के जरूरत से ज्यादा करीब ले जाने का आरोप लगा। इन तमाम आलोचनाओं को परे रखकर वे राष्ट्रीय हित में व्यवहारिक फैसले लेते रहे। मिश्रा भारत के उन दुर्लभ अनुभवी रणनीतिकारों में हमेशा गिने जाते रहेंगे, जिन्होंने कठिन दौर में देश की नीतियों को सही दिशा दी।