महान सुधारक (Great Reformers – Part 17)

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जूलियों फ्रांसिस रिबैरो:-

भारतीय पुलिस सेवा के तेजतर्रार अधिकारी रहे जूलियों फ्रांसिस रिबैरो या जे.एफ. रिबैरो का जन्म मुंबई में पांँच मई, 1929 को हुआ। वह 1953 में आईपीएस सेवाओं में शामिल हुये। उनकी सूझबूझ और दूरदर्शिता के कारण उन्हें बहुत सराहना मिली। उन्होंने मुंबई पुलिस आयुक्त के पद पर (1982-87), केन्द्रीय रिजर्व (आरक्षित) पुलिस बल के महानिर्देशक और गुजरात के पुलिस महानिर्देशक का पद संभाला। मुंबई पुलिस आयुक्त के पद पर रहने के दौरान उन्होंने मुंबई के संगठित अपराध और हिंसा की नकेल कस दी। दंगो के दौरान उनकी भूमिका को बहुत प्रशंसा मिली।

उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्यकाल पंजाब पुलिस के प्रमुख के पद का रहा। श्री रिबैरो ने यह पद तब संभाला जब यह राज्य आतंकवाद के सबसे भयंकर दौर से गुजर रहा था। उन्हें पंजाब सरकार का सलाहकार और केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय में विशेष सचिव भी बनाया गया। उनकी असाधारण सेवाओं को देखते हुये सरकार ने उन्हें पद्मभूषण सम्मान प्रदान किया। वे रोमानिया में राजदूत भी रहे। उन पर दो बार जानलेवा हमला भी किया जा चुका है। उनकी बनाई नीतियों में सर्वाधिक चर्चित नीति ’बुलेट (गोली) फॉर (के लिये) बुलेट (गोली)’ की रही है। इसी के कारण बाद में एक अन्य आईपीएस अधिकारी के. पी. एस. गिल ने शानदार सफलताएं अर्जित की और पंजाब में दूदांत आतंकवादियों को मार गिराया गया।

वर्तमान में श्री रिबैरो सामाजिक कल्याण कार्य में पूरी क्षमता से जुटे हुये हैं। उनकी लिखी आत्मकथात्मक किताब बुलेट फॉर बुलेट: माई एस ए पुलिस ऑफिसर (अधिकारी) को बहुत चाव से पढ़ा जाता है।

किशन पटनायक:-

किशन पटनायक देश के समाजवादी चिंतको में शिखर पर विद्यमान महान प्रतिभाओं में शामिल हैं। 50 वर्षों से ज्यादा समय तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय श्री पटनायक युवावस्था से ही समाजवादी आंदोलन के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे। वे समाजवादी युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे और केवल 32 मार्च की आयु में 1962 में ओडिशा के संबलपुर में लोकसभा के सदस्य चुने गए। देश में चल रहे समाजवादी आंदोलन से उन्होंने 1969 में दूसरी राह पकड़ी। वह 1972 में लोहिया विचार मंच की स्थापना से जुड़े और बिहार आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई आपातकाल में और उससे पहले 7-8 बार जेल गए। मुख्यधारा की राजनीति के सार्थक विकल्प बनने की तलाश में 1980 में समता संगठन, 1990 में जनआंदोलन समन्वय समिति, 1995 में समाजवादी जन परिषद और 1997 में जनआंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय की स्थापना से जुड़े।

किशन पटनायक मूल रूप से राजनैतिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने देश को अनेक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता दिए। भूमंडलीकरण का आजीवन विरोध करने वाले श्री पटनायक ने भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार किया। उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं था वे जो कहते थे उसको वास्तविक जीवन में उतारने का पूरा प्रयास करते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि सत्ता से अलग रह कर भी राजनीति की जा सकती है। वे राजनीति के लिए दलीय राजनीति को उचित लेकिन अनिवार्य नहीं मानते थे। राजनीति के अलावा वे साहित्य और दर्शन में भी दिलचस्पी रखते थे। साठ के दशक में राममनोहर लोहिया के साथ अंग्रेजी पत्रिका मैनकाइंड के संपादन मंडल में काम किया। इस दौरान प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका कल्पना में राजनीतिक सामाजिक विषयों और साहित्य पर लेखन के साथ-साथ एक लंबी कविता भी प्रकाशित की। उनके लेख मैनकाइंड जन धर्मयुग, रविवार, सेमिनार और अखबारों तथा पत्रिकाओं में छपे। 1977 से मृत्यु पर्यंत तक वे मासिक पत्रिका सामयिक वार्ता के संपादक रहे।

तमाम उम्र वे कट्‌टरता के खिलाफ लड़े। समाजवादी आंदोलन, किसान आंदोलन और छात्र आंदोलन में उन्होंने बढ़ चढ़कर भागीदारी निभाई। वे उड़िया भाषा में भी बेहतर लिखते थे पर आजीवन उन्होंने हिन्दी की वकालत की। 27 मई, 2004 को उनका निधन हो गया। उनकी किताब ’विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ को बहुतर सराहना मिली है।

बी.डी.शर्मा:-

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे श्री ब्रह्यदेव शर्मा का जन्म 19 जून, 1931 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में हुआ लेकिन बाद में उनका परिवार ग्वालियर चला गया। वह 1956 में आईएस के लिए चुने गये। उन्हें मध्य प्रदेश कॉडर मिला। श्री शर्मा 1968 से लेकर 1970 में बस्तर में रहे। इस दौरान उनका ध्यान आदिवासियों की समस्याओं पर गया। वह हाल ही में माओवादियों दव्ारा अपहृत सुकमा के जिलाधिकारी एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई में वार्ताकार बनाये गये और उन्होंने सफलतापूर्वक अपना काम संपन्न किया।

ब्रह्यदेव शर्मा के प्रति आदिवासियों के इस गहरे लगाव का कारण दरअसल बैलाडीला का वो चर्चित कांड है, जिसमें श्री शर्मा ने 1968-69 में 300 से ज्यादा आदिवासी लड़कियों की शादी उन गैर आदिवासियों से करा दी। जो उनके दैहिक शोषण में लिप्त थे। ये वो लोग थे, जो बैलाडीला के लौह अयस्क की खदानों में काम करने आए थे। वह 1973-74 तक केन्द्रीय गृह मंत्रालय में निदेशक बने और फिर संयुक्त सचिव भी बने। लेकिन 1980 में सरकार के साथ बस्तर पाइन प्रोजेक्ट (परियोजना) को लेकर नीतिगत मतभेद उभरने के बाद उन्होंने नौकरशाही से इस्तीफा दे दिया।

जनजातीय मामलों पर भारत सरकार की नीतियां बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। मध्य प्रदेश से इस्तीफे के बाद वे पूर्वोत्तर परिषद के सदस्य बनाए गए। उन्हीं दिनों श्री शर्मा को नॉर्थ (उत्तर) ईस्ट (पूर्व) हिल्स (पहाड़) यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) (नेहू) शिलांग के कुलपति का पद संभालने का निर्देश मिला। उनसे पहले इस पद पर नियुक्त रहे कुलपति की आदिवासियों ने हत्या कर दी थी। ऐसे तनावग्रस्त माहौल में उन्होंने यह पद संभालने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई। वह 1981 से 1986 तक वहां रहे और नेहू को सेंटर (केन्द्र) ऑफ (का) एक्सीलेंस (उत्कृष्टता) बनाने का प्रयास किया। वह 1986 से 1991 तक एससी-एसटी आयुक्त के पद पर कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने वेतन के रूप में केवल एक रूपया लिया। बतौर आयुक्त उन्होंने 28वीं रिपोर्ट (विवरण) राष्ट्रपति को सौंपी। यह रिपोर्ट जनजातीय मामलों पर देश का ऐतिहासिक दस्तावेज माना जाता है। कुछ जानकार तो इस रिपोर्ट को भारत के संविधान के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण दस्तावेज मानते हैं। उस रिपोर्ट के बाद देश में अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग बना। इस प्रकार श्री शर्मा एससी-एसटी विभाग के अंतिम आयुक्त रहे। उन्होंने 1983 में भारतीय जनांदोलन की शुरुआत की और आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर हक की लड़ाई शुरू की। आंदोलन को व्यापक सफलता मिली और सरकार ने ’पेसा’ कानून का निर्माण किया।

गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित श्री शर्मा ने आदिवासियों की समस्याओं पर करीब 100 किताबें लिखी हैं। वे गांव गणराज्य के नाम से पाक्षिक पत्रिका प्रकाशित करते हैं। उनकी दलित, पिछड़े झूठे वायदों का अनटूटा इतिहास, ट्राइयल (परीक्षण) डेवलपमेंट (विकास) आदि किताबों में आदिवासियों की समस्याएँ और भावनाएँ शिद्दत से महसूस की जा सकती हैं।