महान सुधारक (Great Reformers – Part 18)

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ई. श्रीधरन:-

इलतुठूबलपिन श्रीधरन का जन्म 12 जून 1932 को केरल के पलाक्कड़ जिले में हुआ। उन्होंने काकीनाड़ा (आंध्र प्रदेश) के गवर्नमेंट (सरकारी) इंजीनियरिंग (अभियंता) कॉलेज (महाविद्यालय) (जेएनटीयूके) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और कोझीकांड के गवर्नमेंट (सरकारी) पॉलीटेक्निक (नानायंत्र) में अध्यापन का कार्य शुरू किया। बाद में उन्हें इंडियन (भारतीय) रेलवे सर्विसेज (सेवा) में चुना गया। उन्हें पहला काम 1954 में सदर्न रेलवे में बतौर परिवीक्षक सहायक इंजीनियर के पद का सौंपा गया।

श्रीधरन ने अपने करियर (पेशा) में कई शानदार उपलब्धिआं हासिल की हैं। इनमें उनका सबसे प्रशंसनीय कार्य दिल्ली मेट्रो का निर्माण और संचालन शामिल है। इस बेहद जटिल कार्य को उत्तम कार्य संस्कृति के साथ समय से पहले ही पूरा करके उन्होंने एक नया इतिहास ही रच दिया है। इसलिए लोगों ने प्यार से उनका नाम ही ’मेट्रों मैन’ रख दिया है।

केवल मेट्रो ही नहीं, रेलवे की कई परियोजनाओं को उन्होंने अतिप्रशंसनीय ढंग से पूरा किया है। दिसंबर 1964 में तमिलनाडु के पंबन पुल के नष्ट होने जाने पर रेलवे ने इस पुल की मरम्मत के लिए छह महीने का समय तय किया। तब श्रीधरन से बड़े अधिकारी ने यह समय घटा कर तीन महीने कर दिया और श्रीधरन को उसके काम का इंचार्ज बना दिया। श्रीधरन ने अपनी असाधारण योग्यता से इसे महज 46 दिन में पूरा कर दिया। इस उपलब्धि के लिए उन्हें ’रेल मंत्री अवार्ड’ (पुरस्कार) से सम्मानित किया गया।

1970 में बनी देश की पहली मेट्रो-कोलकाता मेट्रो के निर्माण के समय वह डिप्टी चीफ इंजीनियर (मुख्य अभियंता) के पद पर थे। उन्होंने कोचिन शिपयार्ड में भी काम किया और सफलता के झंडे गाड़े। वह 1990 में सेवानिवृत्त हो गये। लेकिन उनकी असाधारण नेतृत्व क्षमता को देखते हुये सरकार ने उन्हें महत्वाकांक्षी परियोजना कोंकण रेलवे का मुख्य महाप्रबंधक नियुक्त किया। यह परियोजना भारतीय रेलवे इतिहास की अनोखी परियोजना रही है। कुल 760 किलोमीटर लंबे और 150 से अधिक पुलों वाली इस परियोजना के बेहद कठिन कार्य को उन्होंने संपन्न करके दिखाया।

1997 में उन्हें दिल्ली मेट्रो का प्रबंध निर्देशक बनाया गया। राजधानी दिल्ली के परिवहन की रीढ़ साबित होने वाली इस परियोजना के सभी लक्ष्य तय समय पर या उससे पहले की निर्धारित बजट में पूरे करके उन्होंने एक विशिष्ट रिकार्ड (प्रमाण) बना डाला। उन्हें कोच्चि मेट्रो रेल प्रोजेक्ट (परियोजना) का मुख्य सलाहकार बनाया गया है। वह राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण के फाउंडेशन (नींव) के सलाहकार बोर्ड (परिषद) में शामिल किये गये हैं। इसमें भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश तक शामिल हैं।

अपनी अमूल्य सेवाओं के लिए श्रीधरन कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किए जा चुके हैं। 2003 में ’टाइम मैगजीन’ (समय पत्रिका) ने उन्हें ’वन (एक) ऑफ (का) एशियाज हीरोज’ के खिताब से नवाजा। फ्रांस सरकार ने उन्हें 2005 में ’नाइट (रात) ऑफ (का) द (यह) लीजन ऑफ (के) ऑनर’ से सम्मानित किया, वहीं भारत सरकार ने उन्हें 2001 में ’पद्मश्री’ तथा 2008 में दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ’पद्मभूषण’ प्रदान किया। श्रीधरन ने सरकार से कई बार सेवानिवृत्त देने के लिए आग्रह किया, लेकिन सरकार उन जैसे ’जीनियस’ (प्रतिभा) की सेवाओं से महरूम नहीं होना चाहती थी, लिहाजा उनकी सेवानिवृत्ति टलती रही। लेकिन उनकी उम्र को देखते हुए सरकार ने उनके सेवानिवृत्त को स्वीकृति दे दी है और वह 31 दिसंबर, 2011 को सेवानिवृत्त हो गये। उन्हें 2013 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार के लिए चुना गया है। पारदर्शिता, कार्यक्षमता, जवाबदेही, समय के पाबंदी, ईमानदारी, पेशेवर योग्यता, स्पष्ट और दृष्टि और सभी घटकों की भागीदारी उनकी सफलताओं के मुख्य सूत्र माने गये हैं।

टी.एन. शेघन:-

टी.एन.शेघन का पूरा नाम ’तिरुनेल्ले नारायण अय्यर शेघन’ है। उनका जन्म 15 मई, 1933 को पालघाट (केरल) के निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। वे भारत के दसवें ’मुख्य चुनाव आयुक्त’ रहे। शेघन ने अपनी गंभीरता, निष्पक्षता और सख्ती से भारत में होने वाले चुनावों को शांतिपूर्वक संपन्न कराने में मुख्य योगदान दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल 12 दिसंबर, 1990 से 11 दिसंबर, 1911 तक रहा। उनके कार्यकाल में स्वच्छ एंव निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए नियमों का कड़ाई से पालन किया गया।

उन्होंने अपनी स्नातक की परीक्षा मद्रास के ’क्रिश्चियन महाविद्यालय’ से उत्तीर्ण की थी। यहीं पर उन्होंने कुछ समय तक एक ’व्याख्यात के रूप में भी कार्य किया। बाद में वे ’भारतीय प्रशासनिक सेवा’ (आई.ए.एस.) के लिए चुने गए और 1955 से इस क्षेत्र में कार्य शुरू किया। प्रारंभ से ही टी.एन. शेघन की छवि एक निर्भीक सख्त तथा ईमानदार प्रशासक की रही। इस कार्यशैली के कारण उन्हें बहुत कठिनाईयों का भी सामना करना पड़ा। लेकिन न तो उन्होंने अपनी राह बदली और न ही निराशा को अपने मन में घर करने दिया। 1990 में टी.एन. शेघन भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त बनाये गए। इस पद पर वे 1996 तक बने रहें। इस दौरान शेघन ने स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव कराने की दिशा में बहुत -से सुधार चुनाव प्रक्रिया में किए। उन्होंने मतदाता सशक्तीकरण चुनाव प्रकिया में सुधार तथा व्यवस्था की धर्मरिपेक्ष छवि, इन दिशाओं में काम शुरू किया। देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक के लिए ’मतदाता पहचान-पत्र’ उन्ही की पहल का नतीजा था, तथा राजनीतिक दलों के खर्च पर अंकुश लगाना आदि उनके महत्वपूर्ण कदम थे, जिन्हें शेघन ने पूरी ईमानदारी से लागू करने की पहल की।

मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से मुक्त होने के बाद टी.एन. शेघन ने ’देशभक्त ट्रस्ट’ (संस्था) भी बनाया। उन्होंने वर्ष 1997 में राष्ट्रपति पदक का चुनाव भी लड़ा, लेकिन इस चुनाव में वे के. आर. नारायणन से पराजित हो गए। इसके दो वर्ष बाद देश की प्रमुख पार्टी में से एक कांग्रेस के टिकट पर उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। टी.एन. शेघन को उनकी दस दायित्वपूर्ण दृढ़ता तथा कर्तव्यनिष्ठा के लिए राजकीय सेवा श्रेणी में 1996 का ’मैग्सेसे पुरस्कार’ प्रदान किया गया।

अनिल बोर्डिया:-

आईएएस अधिकारी और सामाजिक क्षेत्रों में अपने योगदान के लिए जाने गये अनिल बोर्डया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यक्षेत्र शिक्षा का रहा है। उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में आने वाली समस्याओं और उनके समाधान के प्रयासों की गहरी जानकारी थी और इसलिए उन्हें शिक्षा शास्त्री तक कहा गया है। उनका 3 सितंबर, 2012 को 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

5 मई,1934 को इंदौर में जन्में श्री बोर्डिया ने उदयपुर और नई दिल्ली में शिक्षा हासिल की। वह 1957 में भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चुने गये। वह 1986 में बनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सक्रिय रूप से शामिल रहे। उनकी प्रशांसनिक दक्षता और सूझबूझ को देखते हुये सरकार ने उन्हें केन्द्रीय शिक्षा सचिव (1987-1992) का पदभार सौंपा गया। उन्होंने राजस्थान और बिहार में प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया। शिक्षा के क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय काम को देखते हुये सरकार ने उन्हें 2010 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। 1999 में यूनेस्कों ने उन्हें शिक्षा प्रसार में महती योगदान का सम्मान करते हुये स्वर्ण पदक से नवाजा। वह यूनेस्को के एशिया पैसेफिक (शांत) सेंट एजूकेशनल (शैक्षिक भेजा) इनोवेशन (नवाचार) फॉर (के लिये) डेवलपमेंट (विकास), बैंकाक के फैलो भी रहे।

श्री बोर्डिया के नेतृत्व में बनी शिक्षा के अधिकार संबंधी समिति की सबसे बड़ी देन ’सर्व शिक्षा अभियान’ को मजबूत बनाने से संबंधित दृष्टिकोण, रणनीति और मानदंडों को संगत बनाना है। केन्द्रीय शिक्षा सचिव के पद से सेवानिवृत्ति के बाद श्री बोर्डिया ने राजस्थान में किशोरियों-किशोरों की वैकल्पिक शिक्षा के एक सामाजिक कार्यक्रम ’लोक -जुम्बिश’ की शुरूआत की। सन्‌ 2001 में उन्होंने एक नये सामाजिक कार्यक्रम ’दूसरा दशक’ शुरू किया। यह कार्यक्रम युवाओं के विकास और शिक्षा के प्रसार पर केंद्रित था।

जब वे राजस्थान में उद्योग निर्देशक के पद पर थे तो एक हजार गृह उद्योग परियोजना की शुरूआत की गई थी। यह परियोजना शहरी क्षेत्र में रहने वाली गरीब और निम्न मध्यवर्गीय महिलाओं को आर्थिक रूप से सबल बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। श्री बोर्डिया जहांँ-जहाँं नियुक्त रहे उन्होंने प्रौढ़ समितियों की स्थापना की। बीकानेर, जोधपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, जयपुर एवं राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति तथा राज्य संदर्भ केंद्र की स्थापना उन्हीं के मानस की उपज है। शिक्षा में भी उनकी दृष्टि बालिका शिक्षा और औरतो की शिक्षा पर ज्यादातर केंद्रित रही। शिक्षाकर्मी परियोजना में गांव की महिलाओं को शिक्षक के रूप में खड़ा करना अपने आप में चुनौतीपूर्ण काम था। शिक्षा के साथ महिलाओं का सशक्त होना और विकास के बराबर का भागीदारी एवं अत्याचार के विरोध में संगठित होने की जरूरत का विचार 1983-84 में उनके मन में आया और ”महिला विकास कार्यक्रम” के नाम से एक अनूठा कार्यक्रम राजस्थान में शुरू किया। उन्होंने शिक्षकों के कार्य संबंधी विसंगतियों को दूर करने का भी भगीरथ प्रयास किया।

श्री बोर्डिया ने राजस्थान में ही स्वयंसेवी संस्थाओं को बढ़ावा नहीं दिया बल्कि देश के अनेक राज्यों में भी उनका योगदान रहा। उनके इस अनूठे प्रयोग को देश के अन्य राज्यों में महिला समाख्या कार्यक्रम के नाम से शुरू किया गया। वह जहाँं भी रहे शिक्षा से नवाचार, लोक भागीदारी, बालिका शिक्षा, महिला सशक्तिकरण से सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के माध्यम से लगातार करते रहे। शिक्षा में गणवत्ता हो, बालिकाएं और महिलाएं शिक्षा के माध्यम से सशक्त बने यह उनकी ताउम्र कोशिश रही। इसलिए जब 1997 में विशाखा फैसला आया तो ”लोक जुम्बिश परिषद” देश की उन पहली संस्थाओं में शामिल थी जिसने 1998 में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न एवं जेंडर (लिंग) संवदेनशीलता हेतु दिशा निर्देश लिए तैयार किए।