महान सुधारक (Great Reformers – Part 21)

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कल्पना चावला:-

कल्पना चावला का जन्म 1 जुलाई, 1961 ई. को हरियाणा के करनाल जिले में हुआ था। कल्पना चावला अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय (बाद में उन्हाेेंने अमेरिका की नागरिकता ले ली थी) महिला थी।

प्रफुल्ल स्वभाव तथा बढ़ते अनुभव के साथ कल्पना न तो काम करने में आलसी थी और न असफलता में घबराने वाली थी। धीरे-धीरे निश्चयपूर्वक युवती कल्पना ने स्त्री-पुरुष के भेद-भाव से ऊपर उठ कर काम किया तथा कक्षा में अकेली छात्रा होने पर भी उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी। उन्हें अंतरिक्ष और उड़ान के बारे में पढ़ने में बहुत आनंद आता था। वे अपने पिता के साथ करनाल के फ्लाइंग (उड़ान) क्लब (मंडली) जाती थी और विमानों को उड़ता देख अपने पिता से कई सवाल करती थीं। वहीं से उनमें एरोस्पेस (वायुमंडल) इंजीनियरिंग में रुचि उत्पन्न होने लगी।

इसका प्रमाण यह है कि जब कोई उनसे पूछता था कि बड़े होकर क्या बनोगी तो वे हमेशा यही उत्तर देतीं एरोस्पेस इंजीनियर। उन्हें पंजाब महाविद्यालय में एरोस्पेस (भूमंडल) इंजीनियरिंग (अभियंता) में जगह मिली। उनके जीवन में अध्यापकों और किताबों से प्रेरणा मिली। कल्पना चावला ने 1976 में करनाल के टैगोर विद्यालय से स्नातक, 1982 में चंडीगढ़ से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग तथा 1984 टेक्सास विश्वविद्यालय से ’एरोस्पेस इंजीनियरिंग’ की पढ़ाई की। उन्होंने 1988 में कोलरेडो विश्वविद्यालय से डॉक्टर (चिकित्सक) ऑफ (के) फिलोसोफी (दर्शनशास्त्र) की डिग्री (उपाधि) प्राप्त की। इसी वर्ष कल्पना ने नासा के एम्स रिसर्च (खोज) सेंटर (केन्द्र) में काम करना शुरू किया।

1994 में बतौर अंतरिक्ष यात्री उनका चयन किया गया। कल्पना की पहली अंतरिक्ष उड़ान एस.टी.एस. 87 कोलंबिया स्पेस (अंतरिक्ष) शटल (शटल गाड़ी) से संपन्न हुई तथा इसकी अवधि 19 नवंबर से 5 दिसंबर, 1997 थी। कल्पना की दूसरी और अंतिम उड़ान 16 जनवरी, 2003 को कोलंबिया स्पेस शटल से ही आरंभ हुई। यह 16 दिन का मिशन (लक्ष्य) था। उन्होंने अपने सहयोगियों सहित लगभग 80 परीक्षण और प्रयोग किए। वापसी के समय 1 फरवरी 2003 को शटल दुर्घटना ग्रस्त हो गई तथा कल्पना समेत 6 अंतरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गई। उन्हें मृत्युपरांत कांग्रेशनल अंतरिक्ष पदक के सम्मान, नासा अंतरिक्ष उड़ान पदक, नासा विशिष्ट सेवा पदक और प्रतिरक्षा विशिष्ट सेवा पदक आदि सम्मानों से सम्मानित किया गया।

मंजू राजपाल:-

भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत मंजू राजपाल का जन्म राजस्थान में एक जून 1972 को हुआ। उनकी मातृभाषा सिंधी है। देश के दलित समुदाय से संबंध रखने वाली चुनिंदा महिला आईएस अधिकारियों में शामिल मंजू राजपाल को उनके हौसलों, प्रतिबद्धता और कार्य के प्रति समर्पण के लिए जाना जाता है।

वर्ष 2000 के सिविल (नागरिक) सेवा बैच की महिला वर्ग में टॉपर (सर्वोत्तम) और कुल छठी रैंक (श्रेणी) हासिल करने वाली राजपाल को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (विश्वास) योजना को बहुत उचित ढंग से लागू करने के कार्यों की वजह से सन्‌ 2006 में सर्वश्रेष्ठ जिलाधिकारी का सम्मान प्रदान किया गया। लेकिन उनका शुरूआती जीवन बहुत कठिनाई भरा था। उनके पिता एक साधारण कारोबारी थे। राजपाल का परिवार परंपराओं में विश्वास करने वाला परिवार था। उनकी दो बहने और होने के कारण पढ़ाई पर खर्च बहुत कम हो पाता था लेकिन मंजू के दृढ़ इरादे कुछ और कहानी कहने जा रहे थे। सिविल सेवा में आने पर मंजू राजपाल को प्रशिक्षण समाप्ति के बाद बूंदी जिले की नैनवा तहसील में एसडीएम के पद पर नियुक्ति दी गई। सामान्य तौर पर यह नियम है कि इस पद पर राजस्थान लोकसेवा आयोग से चयनित आरएएस अधिकारी नियुक्त किया जाता है। यहाँ एसडीएम पद पर आने वाली वह पहली आईएएस थीं।

यहां उन्होंने अपना काम इतने अधिक उत्साह से किया कि लोगों को अचंभा होने लगा कि प्रशासन के काम करने की रफ्तार इतनी अधिक भी हो सकती है। यहां तक कि कुछ अधिकारियों को उनकी शैली पसंद नहीं आई और उन्हें चेतावनी तक दे दी। बाद में वरिष्ठ अधिकारियों ने पाया कि मंजू का पक्ष सही था।

डुंगरपुर में जिलाधिकारी के पद पर कार्य करते हुय राजपाल ने मानवता की एक नई मिसाल कायम कर दी। उन्होंने तीन लड़कियों को वैधानिक से गोद ले लिया। इनमें से एक तो उनके गोद लेने से कुछ ही महीने पहले पैदा हुई थी।