महान सुधारक (Great Reformers – Part 22)

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भारत के महान सुधारक

रैदास:-

मध्ययुगीन संतो में रैदास या रविदास का महत्वपूर्ण स्थान है। रैदास के जन्म के संबंध में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं हैं। इनका समय संभवतया 1398 से 1518 ई. के आस-पास का रहा हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि वह कबीर के समकालीन रहे होंगे। संत रविदास काशी के रहने वाले थे। किवंदंती है कि वह रामानन्द के शिष्य थे। परन्तु किसी भी स्रोत से रैदास का रामानन्द का शिष्य होना सिद्ध नहीं होता। इनके अतिरिक्त रैदास की कबीर से भी भेंट की अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं। परन्तु उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। नाभादास कृत ’ भक्तमाल’ में रैदास के स्वभाव और उनकी चारित्रिक उच्चता का प्रतिपादन मिलता है। प्रियादास कृत ’भक्तकाल’ की टीका के अनुसार चितौड़ की ’झालारानी’ उनकी शिष्या थीं, जो महाराणा सांगा की पत्नी थीं। इस दृष्टि से रैदास का समय सन्‌ 1482-1527 ई. होता है। कुछ लोगों का अनुमान कि यह चितौड़ की रानी मीराबाई ही थीं और उन्होंने रैदास का शिष्यत्व ग्रहण किया था। मीरा ने अपने अनेक पदों में रैदास का गुरू रूप में स्मरण किया है। रैदास ने अपने पूर्ववर्ती और समसामयिक भक्तों के संबंध में लिखा है। उनके निर्देश से ज्ञात होता है कि कबीर की मृत्यु उनके सामने ही हो गयी थी। रैदास की अवस्था 120 वर्ष की मानी जाती है।

उनके पिता का नाम ’रग्घु’ और माता का नाम ’घुरविनियां’ बताया जाता है। रैदास ने साधु-संतों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वह अपना काम पूरी लगन तथा तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। उनकी समयानुपालन की प्रवृत्ति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके संपर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे।

प्रारंभ में ही रैदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-संतों की सहायता करने में उनको विशेष सुख का अनुभव होता था। वह उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे प्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया। रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-संतो ंके सत्संग में व्यतीत करते थे। कहते हैं, ये अनपढ़ थे, किन्तु संत-साहित्य के ग्रंथों और गुरु ग्रंथ साहिब में इनके पद पाए जाते हैं।

रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया। वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। उन्होंने वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।

उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सदव्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की ’चींटी’ इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।

संत रैदास ने सत्य को अनुपम और अनिर्वचनीय कहा है। वह सर्वत्र एक रस है। जिस प्रकार जल में तरंगे हैं उसी प्रकार सारा विश्व उसमें लक्षित होता है। वह नित्य, निराकार तथा सबके भीतर विद्यमान है। सत्य का अनुभव करने के लिये साधक को संसार के प्रति अनासक्त होना पड़ेगा। संत रैदास के अनुसार प्रेममूलक भक्ति के लिये अहंकार की निवृत्ति आवश्यक है। भक्ति और अहंकार एक साथ संभव नहीं है। जब तक साधक अपने साध्य के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पण नहीं करता तब तक उसके लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती।

संत रैदास मध्ययुगीन इतिहास के संक्रमण काल में हुए थे। वर्णव्यवस्था की पाशविक मनोवृत्ति से दलित और उपेक्षित पशुभक्त जीवन व्यतीत करने के लिये बाध्य थे। यह अमानवीय व्यवस्था उनकी मानसिकता को उदव्ेलित करती थी। संत रैदास की समन्यवादी चेतना इसी का परिणाम है। उनकी स्वानुभूतिमयी चेतना ने भारतीय समाज में जागृति का संचार किया और उनके मौलिक चिन्तन ने शोषित और उपेक्षित वर्गों में आत्मविश्वास का संचार किया। संत रैदास ने मानवता की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। वर्णाश्रम धर्म को समूल नष्ट करने का संकल्प, कुल और जाति की श्रेष्ठता की मिथ्या सिद्धि संत रैदास दव्ारा अपनाये गये समन्वयवादी मानवधर्म का ही एक अंग है जिसे उन्होंने मानवतावादी समाज के रूप में संकल्पित किया था।

संत रैदास के मन में इस्लाम के लिए भी आस्था का समान भाव था। कबीर की वाणी में जहाँ आक्रोश की अभिव्यक्ति है, वहीं दूसरी ओर संत रैदास की रचनात्मक दृष्टि दोनों धर्मों को समान भाव से मानवता के मंच पर लाती है। संत रैदास वस्तुत: मानव धर्म के संस्थापक थे।

रैदास ने ईश्वर की उपासना के लिए भक्ति का मार्ग चुना और उसके कई प्रकारों में से रागात्मक वृत्ति को ही महत्व दिया है। रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी। इसलिए उनकी शिक्षाओं का श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी, जिससे उनकी शंकाओ का संतोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे। उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये।

रैदास अनपढ़ कहे जाते हैं। हालांकि संत-मत के विभिन्न संग्रहों में उनकी रचनाएँ संकलित मिलती हैं। राजस्थान मे हस्तलिखित ग्रंथों कें रूप में भी उनकी रचनाएँ मिलती हैं। इनके बहुत से पद ’गुरु ग्रंथ साहिब’ में भी संकलित मिलते हैं। यद्यपि दोनों प्रकार के पदों की भाषा में बहुत अंतर है तथापि प्राचीनता के कारण ’गुरु ग्रंथ साहिब’ में संगृहीत पदों की प्रमाणिक मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। रैदास के कुछ पदों पर अरबी और फारसी का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। इसका अधिक संभाव्य कारण उनका लोकप्रचलित होना है।

आज भी संत रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सदव्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। संत रैदास ने समाज के कल्याण के लिए ’बेगमपुरा’ की अवधारणा दी। बेगमपुरा एक ऐसे क्षेत्र की कल्पना है जहाँ कोई गम नहीं यानी बे-गम हैं। इसी से इस क्षेत्र का नाम बेगमपुरा है। इस बेगमपुरा में ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं है। इस बेगमपुरा में सब बराबर हैं। संत कवि रैदास उन महान संतों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनकी रचनाओं की विशेषताएं लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही हैं जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है। मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है। गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी रैदास उच्च-कोटि के विरक्त संत थे। उन्होंने ज्ञान-भक्ति का ऊँचा पद प्राप्त किया था। उन्होंने समता और सदाचार पर बहुत बल दिया। वे खंडन-मंडन में विश्वास नहीं करते थे। सत्य को शुद्ध रूप में प्रस्तुत करना ही उनका ध्येय था। रैदास की विचारधारा और सिद्धांतों को संत-मत की परंपरा के अनुरूप ही पाते हैं। उनका सत्यपूर्ण ज्ञान में विश्वास था। उन्होंने भक्ति के लिए परम वैराग्य अनिवार्य माना है। परम तत्व सत्य हैं, जो अनिर्वचनीय है- ’यह परमतत्व एकरस है तथा जड़ और चेतन में समान रूप से अनुस्यूत है। संत रैदास की साधनापद्धति का क्रमिक विवेचन नहीं मिलता है। जहाँ-तहाँ प्रसंगवश संकेतो के रूप में वह प्राप्त होती है। विवेचकों ने रैदास की साधना में ’अष्टांग’ योग आदि को खोज निकाला है। संत रैदास अपने समय के प्रसिद्ध महात्मा थे। कबीर ने रविदास संत कहकर उनका महत्व स्वीकार किया इसके अतिरिक्त नाभादास, प्रियादास, मीराबाई आदि ने रैदास का सम्मान स्मरण किया है। संत रैदास ने एक पंथ भी चलाया, जो रैदासी पंथ के नाम से प्रसिद्ध है। इस पंथ के अनुयायी पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश आदि में पाये जाते हैं। संत रैदास का प्रभाव आज भी भारत में दूर-दूर तक फैला हुआ है। इस पंथ के अनुयायी रैदासी या रविदासी कहलाते हैं।