महान सुधारक (Great Reformers – Part 23)

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गुरु जम्भेश्वर:-

गुरु जम्मेश्वरजी का जन्म 1451 में राजस्थान के नागौर जिले के पीपासर गाँव में हुआ था। माना जाता है कि वह बचपन से लोगों को अचंभे में डाल देने वाले कार्य कर देते थे संभवतया इसी कारण वे जामूभा (अचम्‌भा जी) कहलाने लगे। जब ये लगभग 16 साल के थे तब इनकी भेंट गुरु गोरखनाथजी से हुई। श्री गुरु जम्मेश्वरजी की शब्दवाणी से पता चलता है कि उन्होंने विवाह नहीं किया था। बाद में गुरु जम्मेश्वरजी समराथल नामक रेतीले टीले पर रहने लगे गए।

समराथल पर रहते हुए इन्होंने 34 साल की आयु में बिश्नोई समाज की स्थापना की। विश्नोई का आशय 29 से है। उन्होंने अपने समुदाय के लिए 29 नियम बनाये, इसलिए इस समुदाय को विश्नोई (विश यानी 20 एवं नाई यानी 9) कहा गया। इन नियमों का पालन करने वाले को विश्नोई कहा गया। इनमें से 8 जैवविधिता, 7 सामाजिक व्यवहार, 10 व्यक्तिगत साफ-सफाई एवं स्वास्थ्य और 4 ईश्वर की पूजा से संबंधित है। इनमें से कुछ नियम इस प्रकार हैं।

1. शील, संतोष रखना

2. सुबह-शाम प्रार्थना करना

3. पानी छान कर पीना और झूठ नहीं बोलना

4. दया-नम्रता रखना

5. निंदा नहीं करना

6. झूठ नहीं बोलना

7. वाद-विवाद से बचना

8. प्राणियों पर दया करना

9. हरे वृक्ष नहीं काटना

10. नीले रंग के वस्त्र नहीं पहनना

11. तंबाकू, भांग आदि का सेवन नहीं करना आदि

गुरु जी ने अकाल पीड़ितों और गरीबों की अन्न-दान से सहायता करके लोगों को मानवता की शिक्षा दी। उन्होंने 120 अनमोल शब्द कहे थे जिनका यह समुदाय पवित्र कार्यो के समय उच्चारण करता है। इन्हें शब्दवाणी भी कहा जाता है।

उनकी समस्त शिक्षाओं का स्रोत यही शब्दवाणी है। इसमें उन्होंने कहा कि ईश्वर एक है, उसका नाम ’हरि’ है। उन्होंने पेड़ों के संरक्षण और मानवेत्तर प्राणियों को बचाने पर बल दिया। वह मानते थे कि प्रकृति के साथ हमें शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के साथ रहना होगा। 1536 में उनका निधन हो गया। उनकी शिक्षाओं का उनके समाज पर गहरा असर है। इसका प्रमाण यह है। कि 1730 में जोधपुर में स्थानीय हरे पेड़ खेजलड़ी को काटने से बचाने के लिए 363 लोगों, जिनमें महिलाएं और बच्चे तक शामिल थे, ने अपने प्राणों की आहूति दे दी। ये पेड़ स्थानीय महाराज के महल को बनवाने के लिए काटे जा रहे थे। विरोध स्वरूप ये लोग पेड़ों से चिपक गये। जब महाराज को यह बात पता चली तो उन्होंने फौरन अपना आदेश वापस ले लिया और इस कुकृत्य के लिए क्षमा मांगी। यह घटना हमें आज के दौर के प्रसिद्ध चिपको आंदोलन की याद दिलाती है।

एकनाथ:-

एकनाथ महाराष्ट्र महाराष्ट्र संतों में ख्याति प्राप्त हैं। महाराष्ट्रीय भक्तों में नामदेव के पश्चात दूसरा नाम एकनाथ का ही आता है। इनका जन्म पैठण में हुआ था। इनका समय 1533 ई. से 1599 ई. के बीच माना जाता है। ये वर्ण से ब्राह्यण जाति के थे। इन्होंने जातिप्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई तथा अनुपम साहस के कारण कष्ट भी सहे। इनकी प्रसिद्धि भागवत पुराण के मराठी कविता में अनुवाद के कारण हुई दार्शनिक दृष्टि से अद्धैतवादी थे।

ऐसी मान्यता है कि एकनाथ अपने माता-पिता को खो चुके थे। इनके दादा ने इनका पालन-पोषण किया था। इनके अंदर भक्ति भाव का उदय बचपन में हो गया था। बहुधा वे बाहर से किसी पत्थर को उठा लाते और देवता कहकर उसके सामने संतों के चरित्र और पुराणों का पाठ करते। बारह वर्ष की उम्र में इन्होंने देवगढ़ के संत जनार्दन से दीक्षा ली और छह वर्ष तक गुरु के पास रहकर अध्ययन करते रहे। फिर तीर्थाटन के लिए निकले।

काशी में रहकर इन्हाेेंने हिन्दी भाषा सीखी। अपनी तीर्थयात्रा से लौटने के पश्चात गुरु की आज्ञा से गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया। नामदेव और तुकाराम की भाँति एकनाथ ने श्री गृहस्थाश्रम को कभी आध्यात्मिक मार्ग को बाधा नहीं समझा। उनमें प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग का अपूर्व समन्वय था। इन्होंने अपने समय में छुआछूत दूर करने का यत्न किया। एकनाथ अपने जीवन का केवल एक ही उद्देश्य मानते थे कि सभी के अंदर सर्व-समन्वय की भावना विकिसत हो। इस प्रकार उन्होंने समाज में से जातिवाद तथा छुआछूत को दूर करने का भरसक प्रयास किया।

एकनाथ उच्चकोटि के कवि भी थे। इन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की है, जिनमें प्रमुख हैं- ’चतु: श्लोकी भागवत, भावार्थ रामायण, रुक्मिणी स्वयंवर, पौराणिक आख्यान, संत चरित्र, आनंद लहरी आदि। एकनाथ ने ’ज्ञानेश्वरी’ की भिन्न-भिन्न प्रतियों के आधार पर इस ग्रंथ का प्रामाणिक रूप भी निर्धारित किया। इन्हाेेंने भागवत पुराण का मराठी भाषा में अनुवाद किया, जिसके कुछ भाग पंढरपुर के मंदिर में संकीर्तन के समय गाये जाते हैं। इन्होंने ’हरिपद’ नामक छब्बीस अभंगों का एक संग्रह भी रचा। ऐसा माना जाता है कि एकनाथ ने गोदावरी के जल में समाधि लेकर अपना जीवनांत किया था।

छत्रपति शाहू जी महाराज:-

महाराष्ट्र के कोल्हापूर के राजा छत्रपति शाहू जी को एक सच्चे प्रजातंत्रवादी और समाज के रूप में माना जाता था। छत्रपति शाहू समाज में महिलाओं के लिए शिक्षा सहित कई प्रगतिशील गतिविधियों के साथ जुड़े थे। वह समाज सुधारक ज्योतिबा फुले के योगदान से काफी प्रभावित थे। उनका जाति और धर्म की परवाह किए बिना दलितों के लिए प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना एक महत्वपूर्ण कदम था। उनका कार्यकाल 1884 से 1922 तक रहा। वे भोंसले वंश के महाराज थे। उनकी जाति मराठा-कुनबी थी। शाहू जी महाराज समाज सुधार के कार्यो के लिए इतिहास में प्रसिद्ध हुए: उनके समय में कौल्हापुर देश का पहला इलाका था, जहाँ अवर्ण जातियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण (50 फीसदी) लागू कोल्हापुर में अब्राहृाणों को पुरोहित बनाने का काम शाहू जी महाराज के समय में हुआ। उनके-कार्यकाल में कोल्हापुर में बालिका विवाह पर पाबंदी लगा दी गयी और विधवा विवाह को मान्यता दी गयी। बाल गंगाधर तिलक इन सामाजिक सुधारों के विरोधी थे।

छत्रपति शाहू ने गरीबों के सामाजिक उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने हमेशा निचली जातियों के विकास और कल्याण पर बल दिया। उन्होंने सभी के लिए शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयास किए। शाहू जी महाराज ने दलित वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की। उन्होंने छात्रावास स्थापित किये और बाहरी छात्रों के लिए शरण प्रदान करने के लिए आदेश दिए। छत्रपति शाहू के शासन के दौरान बाल विवाह को प्रतिबंधित किया गया था। उन्होंने अंतरजातीय विवाह और विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में समर्थन की आवाज उठाई। उसकी गतिविधियों के लिए छत्रपति शाहू समाज को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। वह लंबे समय सत्य शोधक समाज (फुले दव्ारा गठित संस्था) के संरक्षक भी रहे। महान शासक और सामाजिक विचारक छत्रपति शाहू जी महाराज का 6 मई, 1922 को निधन हो गया।