महान सुधारक (Great Reformers – Part 24)

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राजा राममोहन राय:-

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 को बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गाँव में एक रुढ़िवादी ब्राह्यण परिवार में हुआ। शुरुआती शिक्षा गाँव में पाने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए पटना आ गये, जहाँ वे संस्कृत, अरबी, व फारसी भाषा और अन्य इस्लामी किताबों से वे अवगत हुए। अरबी चिंतन पद्धति और सूफियों के दर्शन ने उन्हें प्रभावित किया। पटना से लौटने के बाद राममोहन ने हिन्दू समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों, मूर्ति पूजा एवं पांखडों पर निबंध लिखने प्रारंभ किये। अब 15 वर्ष की आयु में उन्होंने एक छोटी सी पुस्तिका लिखी थी, जिसमें उन्होंने मूर्तिपूजा का यह कहकर खंडन किया कि ऐसा में नहीं कहा गया है। उनके ऐसे कामों से नाराज उनके कट्‌टरवादी परिवार ने उन्हें घर से निकाल दिया। लेकिन यह स्थिति के लिए बहुत लाभदायक हुई और उन्होंने दूर-दूर तक यात्राएं की एवं ज्ञान और अनुभव संचित किया। राजा राममोहन राय को मूर्तिपूजा परंपराओं के विरोध के कारण अपना घर भी छोड़ना पड़ा था। इसी क्रम में वे तिब्बत पहुँचे और तर्को से वहाँ के पुजारी को उत्तरहीन कर दिया। कुछ साल बाद वे वाराणसी पहुँचे और संस्कृत व हिन्दू दर्शन का गहन अध्ययन किया। सन्‌ 1803 में उनके पिता का देहान्त हो जाने के कुछ समय बाद वे मुर्शिदाबाद चले गये। वहाँ पर उन्होंने ”तुहफात-उल-मुवाहिदील” अर्थात्‌ ’ एकेश्वरवादियों को एक उपहार’ नाम निबंध फारसी में लिखा जिसकी भूमिका अरबी में भी। इस निबंध में राममोहन ने धर्मों पर धार्मिक अनुभव के प्रश्न पर विवेकपूर्ण विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने धर्मों के तुलानात्मक अध्ययन पर बल दिया और एकेश्वरवाद की विशेषताओं की तरफ संसार का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने अलौकिक शक्ति और चमत्कार के सिद्धांतों को नकार दिया।

राममोहन राय ने 1803 में ईस्ट (पूर्व) इंडिया (भारत) कंपनी (संघ) के राजस्व विभाग में नौकरी करनी शुरू की और 1809 में राजस्व अधिकारी ट्रेन (रेल) डिग्बी के सहायक बने। यहां पर उनका संपर्क तांत्रिक विद्या और जैन धर्म से हुआ। अब उन्होंने यूरोप और इंग्लैंड की राजनीतिक घटनाओं में विशेष रूप से रुचि ली। डिग्बी इंग्लैंड से जितने भी अखबार और पत्रिकाएं मंगवाते राम मोहन राय उन्हें चाव से पढ़ते। उन्होंने 22 वर्ष की आयु में अंग्रेजी सीखनी शुरू की थी। इन पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने से उनके अंग्रेजी में अभिवृद्धि हुई वे यूरोपीय राजनीतिक विचारधारा से अवगत हुए।

1815 में उन्होंने आत्मीय सभा की स्थापना की। इसी समय उन्हाेेंने ’वेदांत सूत्र’ का बांग्ला अनुवाद, वेदांत सार का बांग्ला और वेदांत का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उन्होंने कुछ उपनिषदों का बांग्ला अनुवाद किया। वेदांत और उपनिषद के बांग्ला और अंग्रेजी में अनुवाद किये जाने का यह प्रथम अवसर था। 1823 में उन्होंने एक विवरणिका लिखी- ’हिन्दू स्त्रियों का अधिकार’ इसमें उन्होंने मांग रखी की हिन्दू स्त्रियों को उनके पिता और पति की संपत्ति में से हिस्सा मिलना चाहिए। राम मोहन राय ने लैटिन, ग्रीक तथा हिबू भाषाओं का भी अध्ययन किया।

वे एक सर्वव्यापी धर्म के समर्थक थे। संसार के चार धर्मों-हिन्दू, इस्लाम, बौद्ध और ईसाई का तुलनात्मक अध्ययन करके उनके मूल तत्वों में एकता स्थापित करने वाले वे विश्व के प्रथम व्यक्ति थे। उन्होंने 1822 में अद्धैतवादी संस्था के तत्वाधान में एक अंग्रेजी उच्च विद्यालय शुरू किया। जहां अन्य विद्यालयों में विज्ञान की शिक्षा अंग्रेजी में दी जाती थी, लेकिन इसमें विज्ञान बांग्ला भाषा के माध्यम से पढ़ाया जाता था। राम मोहन राय ने बांग्ला में व्याकरण, रेखाचित्र, भूगोल और खगोलशास्त्र जैसी अमूल्य पाठ्‌य पुस्तकें लिखी। इस प्रकार भारतीय शिक्षा में विज्ञान का शुभारंभ राम मोहन राय के कारण ही संभव हुआ। बंकिमचन्द्र चटर्जी और गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं के अंतर्गत बांग्ला भाषा में जो अनुपम साहित्य शैली विकसित की, उसका एक श्रेय राजाराम मोहनराय दव्ारा निर्मित बांग्ला गद्य की रखी बुनियाद को जाता है। बांग्ला में ध्रुपद गीत लिखने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। अपनी ब्रह्य सभा के लिये उन्होंने 32 ध्रुपद गीतों की रचना की।

अप्रैल 1822 ई. में राजा राममोहन राय ने फारसी में एक साप्ताहिक अखबार ’मिरात-उल-अखबार’ नाम से शुरू किया, जो भारत में पहला फारसी अखबार था। साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार को राजा राममोहन राय के धार्मिक विचार और इंग्लैंड की आयरलैंड विरोधी नीति को आलोचना पसंद नही आई। परिणामस्वरूप सरकार ने प्रेस (छपाई का यंत्र) की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के लिए अध्यादेश जारी किया, जिसके विरोध में राजा राममोहन राय ने ’मिरात-उल-अखबार’ का प्रकाशन बंद कर दिया। राजा राममोहन राय ने सामाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए भी कड़ा संघर्ष किया था। उन्होंने स्वयं एक बंगाली पत्रिका ’संवाद-कौमदी’ आरंभ की और उसका संपादन भी किया। यह पत्रिका भारतीयों दव्ारा संपादित सबसे पुरानी पत्रिकाओं में से थी। उन्होंने 1833 ई. के समाचार पत्र संबंधी दमनकारी नियमों के विरुद्ध आंदोलन चलाया। 1828 में उन्होंने ब्रह्य समाज की स्थापना की। राजा राममोहन राय ने भारतीय समाज में प्रचलित बाल विवाह, बहु विवाह जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध आवाज बुलंद की। सती प्रथा के विरूद्ध उन्होंने प्र्रभावी जनमत तैयार कर आंदोलन चलाया। इसके परिणाम स्वरूप लार्ड विलियम बैटिक ने 1829 में इस क्रूर प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर दिया।

सन्‌ 1830 में राजा राममोहन राय ने मुगल बादशाह अकबर दव्तीय के दूत के रूप में इंग्लैंड की यात्रा की। यात्रा की सफलता पर मुगल बादशाह ने उनको राजा की उपाधि से सम्मानित किया। तभी से उनको राजा राममोहन राय से संबोधित किया जाने लगा। इंग्लैंड प्रवास के समय उनकी मुलाकात दार्शनिक जर्मी बेंथम से हुई और बेहद प्रभावित होने पर उन्हें अपना गुरू स्वीकार कर लिया। इंग्लैंड के ब्रिस्टल में 19 सितंबर 1833 को अचनाक वे तेज बुखार से पीड़ित हो गये किन्तु चिकित्सकों के उपचार के बावजूद 27 सितंबर को उनका देहांत हो गया।

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर:-

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर, 1820 को पश्चिमी मेदिनीपुर जिला (पश्चिम बंगाल) में एक निर्धन धार्मिक परिवार में हुआ था। गाँव के विद्यालय से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद छ: वर्ष की आयु में ही ईश्वर चन्द्र पिता के साथ कोलकाता आ गये थे। उत्कृष्ट शैेक्षिक प्रदर्शन के कारण उन्हें विभिन्न संस्थानों दव्ारा कई छात्रवृत्तियां प्रदान की गई थीं। वे उच्चकोटि के विद्धान थे। उनकी विद्धता के कारण ही उन्हें ’विद्यासागर’ की उपाधि दी गई थी। वर्ष 1839 में ईश्वर चन्द्र ने कानून की पढ़ाई संपन्न की। वर्ष 1841 में मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्होंने संस्कृत के शिक्षक के तौर पर ’फोर्ट विलियम महाविद्यालय’ में पढ़ाना शुरू कर दिया। बाद में वह ’संस्कृत महाविद्यालय’ में बतौर सहायक सचिव नियुक्त हुए। पहले ही वर्ष उन्होंने शिक्षा पद्धति को सुधारने के लिए अपनी सिफारिशें प्रशासन को सौंप दीं। 1851 में वह इस महाविद्यालय के प्राधानाचार्य नियुक्त किए गए।

अपने समाज सुधार आंदोलन योगदान के अंतर्गत ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने देशी भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए विद्यालयों की एक श्रृंखला के साथ ही कलकता में ’मेट्रोपॉलिटन महाविद्यालय’ की स्थापना भी की। उन्होंने इन महाविद्यालयों को चलाने में आने वाले खर्च का बीड़ा उठाया। बंगाली में लिखी गई उनकी किताबे हमेशा बच्चों के लिए महत्वपूर्ण रहीं। जब विद्यासागर जी कलकता के संस्कृत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य बनाये गए, तब उन्होंने सभी जाति के छात्रों के लिए महाविद्यालय खोल दिया। ये उनके अनवरत प्रचार का ही नतीजा था कि ’विधवा पुनर्विवाह कानून-1856’ आखिरकार पारित हो सका। उन्होंने इसे अपने जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना था। विद्यासागर जी ने अपने इकलौते पुत्र का विवाह भी एक विधवा से ही किया। उन्होंने ’बाल विवाह’ के खिलाफ भी संघर्ष छेड़ा।