महान सुधारक (Great Reformers – Part 29)

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रवीन्द्रनाथ ठाकुर:-

रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई, 1861 को कलकता में देवेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के पुत्र के रूप में एक संपन्न बांग्ला परिवार में हुआ था। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री टैगोर सहज ही कला के कई स्वरूपों की ओर आकृष्ट हुए जैसे-साहित्य, कविता, नृत्य और संगीत। दुनिया के समकालीन सांस्कृतिक रूझान से वे भली-भाँति अवगत थे। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में टैगोर की चित्रकला यात्रा शुरू हुई। यह उनके कवित्व सजगता का विस्तार था। हालांकि उन्हें कला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी फिर भी उन्हाेेने एक सशक्त एवं सहजदृश्य शब्दकोश का विकास कर लिया था। श्री टैगोर की इस उपलब्धि के पीछे आधुनिक पाश्चात्य, पुरातन एवं बाल्य कला जैसे दृश्य कला के विभिन्न स्वरूपों की गहरी समझ थी।

रवीन्द्रनाथ टैगोर की विद्यालय की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर विद्यालय में हुई। टैगोर ने बेरिस्टर (बड़ा वकील) बनने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन पब्लिक (लोग) विद्यालय में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लंदन महाविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना उपाधि हासिल किए ही वापस आ गए। रवीन्द्रनाथ टैगोर को बचपन से ही कविताएँ और कहानियाँ लिखने का शौक था। रवीन्द्रनाथ टैगोर को प्रकृति से बहुत प्यार था। वे गुरुदेव के नाम से लोकप्रिय थे। भारत आकर गुरुदेव ने फिर से लिखने का काम शुरू किया। रवीन्द्रनाथ टैगोर एक बांग्ला कवि, कहानीकर, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार थे। उन्हें अपनी कविता संग्रह गीतांजलि के लिए 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। बाद में गीतांजलि का जर्मन, फ्रेंच, जापानी, रूसी आदि विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ और टैगोर की ख्याति दुनिया के कोने-कोने में फैल गई। टैगोर ने बांग्ला साहित्य में नए गद्य और छंद तथा लोकसभा के उपयोग की शुरुआत की और इस प्रकार शास्त्रीय संस्कृत पर आधारित पारंपरिक प्रारुपों से उसे मुक्ति दिलाई। भारत में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1880 के दशक में कविताओं की अनेक पुस्तकें प्रकाशित की तथा मानसी (1890) की रचना की। यह संग्रह उनकी प्रतिभा की परिपक्वता का परिचायक है। इसमें उनकी कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ शामिल है, जिनमें से कई बांग्ला भाषा में अपरिचित नई पद्य शैलियों में हैं। साथ ही इसमें बंगालियों पर कुछ सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य भी हैं।

वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। राष्ट्रगान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं। वे वैश्विक समानता और एकांतिकता के पक्षधर थे। ब्रह्यसमाजी होने के बावजूद उनका दर्शन एक अकेले व्यक्ति को समर्पित रहा। चाहे उनकी ज्यादातर रचनाएँ बांग्ला में लिखी हुई हो पर वह एक ऐसे लोक कवि थे जिनका केन्द्रीय तत्व अंतिम आदमी की भावनाओं का परिष्कार करना था। वह मनुष्य मात्र के स्पन्दन के कवि थे। टैगोर की कविताओं की पांडुलिपि को सबसे पहले विलियम रोथेनस्टाइन ने पढ़ा था और वे इतने मुग्ध हो गए कि उन्होंने अंग्रेजी कवि यीट्‌स से संपर्क किया और पश्चिमी जगत के लेखको, कवियों, चित्रकारों और चिंतकों से टैगोर का परिचय कराया। बाद में यीट्‌स ने ही अंग्रेजी अनुवाद की भूमिका लिखी। एक ऐसे कलाकार जिनकी रंगों में शांंश्वत प्रेम की गहरी अनुभूति है, एक ऐसा नाटककार जिसके रंगमंच पर सिर्फ दु:खद ही जिंदा नहीं है, अपितु उसमें मनुष्य की गहरी जिजीविधा भी है, एक ऐसा कथाकर जो अपनी आस-पास से परलोक चुनता है। जिसमें वह आदमी के अंतिम गंतव्य की तलाश भी करता है कुछ ऐसी ही छवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की थी।

सिंयालदह और शजादपुर स्थित अपनी खानदानी के प्रबंधन के लिए 1891 में टैगोर 10 वर्ष तक पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में रहे, वहाँ वह अक्सर पद्मा नदी (गंगा नदी) पर एक हाउस वोट (तैरनेवाला घर) में ग्रामीणों के निकट संपर्क में रहते थे और उन ग्रामीणों की निर्धनता व पिछड़ेपन के प्रति टैगोर की संवेदना उनकी बाद की रचनाओं का मूल स्वर बनी। उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियां, जिनमें ’दीन-हीनों’ का जीवन और उनके दुख वर्णित हैं, 1890 के बाद की हैं और उनकी मार्मिकता में हल्की-सी विडंवना की पुट है। उनकी कहानियों में सूर्य, वर्षा, नदियाँ और नदी किनारे के सरकंडे वर्षा ऋतु पर आकाश, छायादार, गाँव, वर्षा से भरे अनाज के प्रसन्न खेत मिलते हैं। उनके साधारण लोग कहानी खत्म होते-होते असाधारण मनुष्यों में बदल जाते हैं।

1901 में टैगोर ने पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र में स्थित शांतिनिकेतन में एक प्रायोगिक विद्यालय की स्थापना की। यहाँ उन्होंने भारत और पश्चिम परंपराओं के सर्वश्रेष्ठ को मिलाने का प्रयास किया। वह विद्यालय में ही स्थायी रूप में रहने लगे और 1921 में यह विश्व भारती विश्वविद्यालय बन गया।

टैगोर ने लंबी अवधि भारत से बाहर बिताई वह यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया के देशों में व्याख्यान देते व काव्य पाठ करते रहे और भारत की स्वतंत्रता के मुखर प्रवक्ता बन गए। हालांकि टैगोर के उपन्यास उनकी कविताओं और कहानियों जैसे असाधारण नहीं है, लेकिन वे भी उल्लेखनीय है। इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं गोरा (1990) और घरे-बाहरे (1916; घर और बाहर)। 1920 के दशक के उत्तरार्द्ध में टैगोर ने चित्रकारी शुरू की और कुछ ऐसे चित्र बनाएं, जिन्होंने उन्हें समकालीन अग्रणी भारतीय कलाकारों में स्थापित कर दिया। वे कवि-दार्शनिक दृष्टि से पूरी तरह मानवतावादी थे। वैश्विक शांति, भाईचारे और आध्यात्मवाद के प्रति लगाव उनके रचनात्मक कार्यों में बखूबी झलकता है। उन्होंने धर्म में संप्रदायवाद का विरोध किया और वे विज्ञान के विध्वंसात्मक प्रयोग से भी काफी आहत थे। उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता से प्रेरित भौतिकवाद का विरोध किया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मृत्यु 7 अगस्त, 1941 को कलकता में हुई।

अय्यनकाली:-

अय्यनकाली का जन्म त्रिवेद्रम के त्रावणकोर में सन्‌ 1863 में हुआ। वह एक नीची जाति समझे जाने वाले पुलय परिवार में पैदा हुए थे। वह अनपढ़ थे। वह जातिवाद के खिलाफ के आंदोलनों के क्षेत्र में अग्रणी थे। अय्यनकाली समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था को मानवता के विरुद्ध अपराध समझते थे। उन्होंने दलितों के खिलाफ हो रहे अन्याय का पुरजोर विरोध किया और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

उनके समय में निचली जाति के लोगों को बैलगाड़ी की सवारी करने को अनुमति नहीं थी। अय्यनकाली के संघर्ष की शुरुआत इस अधिकार को लेकर हुई। वे स्वयं बैलगाड़ी लेकर निकले और अन्य लोगों को प्रेरित किया। उन पर शारीरिक हमले हुये लेकिन वे हमले उनके साहस और विश्वास को नहीं डिगा सके।

अय्यनकाली ने दलित बच्चों के लिए विद्यालय में अध्यापन की मांग की। वे शिक्षा को बहुत महत्व देते थे। वेंगानूर में उच्च जाति के लोगों दव्ारा एक विद्यालय स्थापित किया गया था जिसमें दलित बच्चों के पढ़ने पर उसमें आग लगा दी गई। इसकी प्रतिक्रिया में 1907 में उन्होंने वेंगानूर में एक साल से भी अधिक समय तक चली हड़ताल का नेतृत्व किया। उन्होंने कृषि कामगारों की मांगे उठायीं। उनकी प्रमुख मांगो में -

1. चाय के दुकानों में दलितों को नारियल के गोले में चाय दिए जाने का विरोध।

2. दलित बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार।

3. काम के घंटे के दौरान श्रमिकों के लिए आराम का समय।

4. नकदी भुगतान दव्ारा मजदूरी प्रणाली का प्रतिस्थापन आदि थीं।

अंतत: सत्ता को झुकना पड़ा और निचली जातियों की इन मांगो को स्वीकार कर लिया गया।

अय्यनकाली दव्ारा शुरू किए गये मुक्ति अभियानों की कड़ी में ’कल्लुमाला संघर्ष’ बेहद महत्वपूर्ण है। केरलीय समाज ने जातिपरक पहचान बनाये रखने के लिए हर जाति-समुदाय के लिए खास तरह का पहनावा निश्चित कर रखा था। अछूत स्त्रियांँ और पुरुष कमर से ऊपर घुटने से नीचे का हिस्सा ढक नहीं सकते थे। अय्यनकाली इस बाध्यता को गुलामी का सबूत मानते थे।

पुलय स्त्रियां कमर से ऊपर का हिस्सा ढकने के लिए मनको वाली माला पहना करती थीं। इसे ’कल्लुमाला’ कहा जाता था। स्त्रियों को ढेर सारी मालाएँ लादनी पड़ती थीं तब कहीं जाकर अंग-विशेष ढक पाते थे। इसके अलावा वे चूड़ियां और कानों में लौहे के छल्ले पहलती थीं। कुल्लुमाला संघर्ष 1914 में शुरू हुआ। अय्यनकाली ने अपने समुदाय की स्त्रियों से कहा कि वे गुलामी के प्रतीको उतार फेंके। दक्षिण त्रावणकोर की पुलय स्त्रियों ने ऐसी मालाएं फेंक दीं और उपरिवस्त्र (ब्लाउज) पहनना शुरू कर दिया। उनके प्रयासों के माध्यम से जनता में दलित महिलाओं के लिए उनके तन को ढंकने के लिए अनुमति दी गई। अय्यनकाली के आहृान पर पुलय पुरुषों ने चप्पल पहनना और छाते का इस्तेमाल आरंभ कर दिया। स्वर्ण समझी जाने वाली जातियों के विरोध के बावजूद यह आंदोलन बेहद सफल रहा।

उन दिनों दलितों को अदालत के बरामदे में भी पांव रखने का अधिकार नहीं था। लिहाजा उनकी सुनवाइयां बाहर ही होती थीं। परंपरा यह थी कि अदालत में छुट्‌टी होने के बाद शाम को न्यायाधीश और अन्य कर्मचारी कोर्ट (न्यायालय) के अहाते के पेड़ के नीचे खड़े होते थे और वहीं खड़े-खड़े सुनवाइयां करते तथा निर्णय सुनाते थे। वादी-प्रतिवादी से जज का सीधा संवाद कभी नहीं होता था। अदालत का चपरासी संदेश वाहक का काम करता था। पुलयों को एक निश्चित दूरी बनाकर रखनी पड़ती थी। इस व्यवस्था में अक्सर उनके साथ अन्याय होता था सुनवायी के इस तरीके में अपमान और अवहेलना अपरिहार्य थी। अय्यनकाली को स्वाभाविक रूप से यह व्यवस्था असहनीय लगती थी। उन्होंने इसलिए एक वैकल्पिक न्याय- व्यवस्था शुरू की। साधुजन परिपालन संघम के तत्वाधान में दलितों के लिए ’सोशल (सामाजिक) कोर्ट (न्यायालय) ’ या ’कम्युनिटी (साम्यवादी) कोर्ट (न्यायालय) ’ की स्थापना हुई। संघम्‌ की तमाम शाखओं में कोर्ट की प्रशाखाएं स्थापित की गयी थी। उनके प्रयासों में अपने समकालीन श्री नारयण गुरू और अन्य सामाजिक सुधारकों का समर्थन प्राप्त हुआ। अय्यनकाली के प्रयासों से 1900 में दलितों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने की आजादी दी गई और 1914 में दलित बच्चों के लिए विद्यालय में शामिल होने की अनुमति दी गई।

अय्यनकाली की नेतृत्व क्षमता को देखते हुए तत्कालीन शासकों दव्ारा 1910 में उन्हें त्रावणकोर विधान सभा के लिए नामित किया गया था। अय्यनकाली का निधन 18 जून, 1941 को हुआ।