महान सुधारक (Great Reformers – Part 3)

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जयप्रकाश नारायण:- जयप्रकाश का जन्म 11 अक्टूबर, 1902 ई. को सितोबदियारा, बिहार में हुआ था। सन्‌ 1920 में उनका विवाह मृदु स्वभाव की ’प्रभा’ नामक लड़की से हुआ। जयप्रकाश दंपती एक निष्ठावान राष्ट्रवादी थे। मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित जयप्रकाश ने जलियांवाला नरसिंहार के विरोध में ब्रिटिश विद्यालय को छोड़कर बिहार विद्यापीठ से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की। समाजशास्त्र से एम.ए. करने के बाद जयप्रकाश नारायण ने अमेरिकी विश्वविद्यालय में आठ वर्ष अध्ययन किया।

जब कांग्रेस सोशिलस्ट (सामाजिक) पार्टी (दल) बनी तो जयप्रकाश को पार्टी महासचिव बनाया गया। जयप्रकाश ने नई पार्टी का खूब प्रचार प्रसार किया उनकी बातों का भारतीय जनमानस पर अच्छा प्रभाव था। संघर्ष के इसी दौर में उनकी पत्नी भी गिरफ्तार कर ली गई और उन्हें दो वर्ष की सजा हुई। भारत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन चलाने के कारण जेपी को कई बार गिरफ्तार किया गया।

इसी दौरान हजारीबाग जेल में बंद जेपी 9 नवंबर, 1942 ई. को अपने छ: सहयोगियों के साथ जेल परिसर को लांंघ गये। जयप्रकाश नारायण ने आचार्य नरेद्र देव के साथ मिलकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सामाजिक दल) की स्थापना की। 1953 में कृषक मजदूर प्रजा पार्टियों के विलय में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। भारत के स्वतंत्र होने के बाद उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से इस्तीफा दे दिया और चुनावी राजनीति से अलग होकर भूमि सुधार के लिए विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़ गए।

जयप्रकाश जी 1974 में भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक कटु आलोचक के रूप में प्रभावी ढंग से उभरे। 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा होने पर विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। सरकार विरोधी आंदोलन तेज हो गया और बिखरे हुए विपक्षी दल जेपी की छांव में एकता के सूत्र में बंध गये। इस नये समूह ने भारत के 1977 के आम चुनाव में भारी सफलता प्राप्त करके आजादी के बाद की पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनाई। जयप्रकाश ने स्वयं राजनीतिक पद से दूर रहकर मोरारजी देसाई का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सुझाया। इससे उनको त्याग की भावना का पता लगता है। उन्होंने अनेक यूरोपीय यात्राएं करके सर्वोदय के सिद्धांत को संपूर्ण विश्व में प्रसारित किया।

सरकार एंव भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में 5 जून, 1975 को अपने प्रसिद्ध भाषण में जयप्रकाश ने कहा कि ”भ्रष्टाचार मिटाना, बेराजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना आदि ऐसी चीजें है जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीे हो सकती। क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं जब संपूर्ण व्यवस्था बदल दी जाय और संपूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रांति ’संपूर्ण क्रांति’ आवश्यक है।” उनकी इस बात का बिजली और जादू की तरह असर हुआ। देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर संपूर्ण क्रांति का नारा आ गया। हर व्यक्ति तब देश में एक नई प्रभात की प्रतीक्षा करने लगा था। जेपी ने संपूर्ण क्रांति को स्पष्ट करते हुए बताया था कि सामाजिक क्रांति, आर्थिक क्रांति, राजनीतिक क्रांति, सांस्कृतिक क्रांति, वैचारिक अथवा बौद्धिक क्रांति, शैक्षणिक क्रांति और आध्यात्मिक क्रांति जैसी 7 क्रांतियाँ मिलकर संपूर्ण क्रांति होती है। जेपी ने कहा था कि क्रांति शब्द से परिवर्तन और नवनिर्माण दोनों ही अभ्रिपेत है। क्रांति या क्रांतिकारी परिवर्तन-बहुत शीघ्र गति से होता है और यह परिवर्तन बड़ा दूरगामी और मूलगामी होता है। उनका उद्घोष था- ’संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है।’

4 अक्टूबर, 1979 ई. को पटना, बिहार में उनका निधन हो गया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान के लिए 1998 में लोकनायक जय प्रकाश नारायण को मरणोपरान्त भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च सम्मान ’भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

लाल बहादुर शास्त्री:-

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय के रामनगर के संपन्न परिवार में हुआ था। डेढ़ साल की उम्र में इनके पिताजी की मृत्यु हो गई। वे इतने मेधावी थे कि दस साल की उम्र में ही उन्होंने छठी कक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। आगे की पढ़ाई के लिए वह बनारस आ गये। विद्यालय जीवन में ही राष्ट्रभक्त, देशभक्त और शहीदों के बारे में पढ़ते हुए इन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के विषय में विस्तार से जाना। इन्हीं दिनों जलियाँवाला बाग घटना के बाद छात्र आंदोलन ने भी गति पकड़ ली थी और शास्त्री जी इसके एक भाग बन गये। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चला तो ये इस आंदोलन में मुस्तैदी से कूद पड़े और 1921 में उन्हें जेल जाना पड़ा।

1928 में शास्त्री जी इलाहाबाद म्यूनिसपल (सार्वजनिक) बोर्ड (परिषद) के सदस्य चुने गये। उन्होंने आजादी की लड़ाई के दौरान जीवन के कुछ साल जेल में काटे। सन्‌ 1937 में प्रांतीय विधानसभाओं के चुनावों में उन्होनें उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्यता प्राप्त कर ली। 1947 में उन्हें उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में शामिल कर लिया गया। उनके काल में पुलिस का रूप परिवर्तन तथा सड़क यातायात का विकास हुआ। सरकार ने इनके परामर्श पर सड़क यातायात का राष्ट्रीयकरण किया। गांव तक बस सेवा का विस्तार हुआ। सन्‌ 1951 में वह पार्टी-महासचिव बने। वे राज्यसभा के लिए चुने गये और रेल व यातायात के केन्द्रीय मंत्री बने। इसी समय सन्‌ 1955 में दक्षिण भारत के ’अरियाल’ के समीप की रेल दुर्घटना जिसमें 150 लोग हताहत हुए थे, का दायित्व लेकर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। 1957 में वह इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र में चुने गये। उन्हें पुन: यातायात विभाग दिया गया और साथ ही साथ उद्योग और वाणिज्य विभागों का भी मंत्री बना दिया गया। सन्‌ 1961 में उन्हें गृह मंत्री बनाया गया। चीन युद्ध से सकरी से आये नेहरू का साथ देने के लिए शास्त्री जी को बिना विभाग के मंत्री के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया। 27 मई, 1964 को नेहरू जी के देहांत के बाद 9 जून, 1964 को शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

नेहरू का व्यक्तित्व विराट था, उनके निधन से देश में एक मनोवैज्ञानिक शून्यता की स्थिति उत्पन्न हो गई। इससे प्रोत्साहित होकर राष्ट्र विरोधी तत्वों ने सिर उठाना शुरू कर दिया। सन्‌ 1965 में देश के कई भागों में भयानक सूखा भी पड़ा। उस समय अन्न के भंडारण पर ध्यान नहीं देने के कारण यह स्थिति आई। भारत को संकटों में घिरा देख पाकिस्तान ने अचानक गुजरात के कच्छ में आक्रमक शुरू कर दिये। इस पर भारत की जनता इस हमले का मुकाबला करने के लिये तैयारियां करने लगी किन्तु शास्त्री जी के प्रयासो से कुछ दिनों में ही दोनों देशों के बीच समझौता हो गया और समस्याओं के हल के लिये एक सीमा आयोग बनाने का निर्णय किया गया। सितंबर, 1965 में अचनाक पाकिस्तानी फौज ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। पाकिस्तानी सेना भारतीय इलाकों में तेजी से बढ़ती जा रही थी।

इस समय शास्त्री जी ने भारतीय सेना को मुँहतोड़ जवाब देने का आदेश दिया। अब क्या था? भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को रोंदना शुरू कर दिया और 2-3 दिनों में ही हाजी पीर दर्रे पर तिरंगा फहरा कर लाहौर के हवाई अड्‌डे को घेर लिया और दो चकलाला के हवाई अड्‌डे को खत्म कर दिया और पाकिस्तान के 260 पैटन टैंको में से 245 को नष्ट कर दिया। पाकिस्तानी नायक जनरल अब्बूच खान इस पराजय से घबरा गये और समझ गये कि यदि वे युद्ध के मैदान में रूके तो कुछ नहीं बचेगा। तब उन्होंने अमेरिका और सोवियत संघ के माध्यम से शांति की गुहार लगाई। शास्त्री जी ने उस समय ’जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया और एक छोटा सा भाषण दिया-”मेरे सेनाधिकारियों का मनोबल ऊँचा था, मैंने पीठे थपथपाई और कहा, ’बहादुरो! बढ़ते जाओ” संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव पर भारत पाक के मध्य युद्ध विराम हो गया और दोनों सेनाये जहां की तहां रूक गयी।

अब संविधान संघ के प्रधानमंत्री एलेक्सी कांसीजोन ने दोनों को ताशकंद बुलाया। 2 जनवरी, 1966 को शास्त्री जी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ताशकंद गया। 3 से 10 जनवरी तक 8 दिनों की बैठक के बाद दोनों देशों में समझौता हुआ जिसे ’ताशकंद समझौता’ कहते है। इसके अनुसार दोनों देशो के सेनाओं को युद्ध पूर्व स्थान पर लौट जाना था। भारत को उसमें बहुत कुछ खोना पड़ा जो उसने महान आर्थिक व सैनिक क्षति दव्ारा प्राप्त किया था। पहले से ही हृदय रोगी रहे शास्त्री जो वह इस सदमेें को झेल नहीं पाये और उसी रात उन्हें खतरनाक दिल का दौरा पड़ा और 11 जनवरी 1966 को वे दिवंगत हो गये। शास्त्री जी का जीवन सादगी, कर्तव्यपराणयता, देशप्रेम और नैतिकता का महान उदाहरण है।