महान सुधारक (Great Reformers – Part 31)

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जे. कृष्णमूर्ति:-

जे. कृष्णमूर्ति का जन्म तमिलनाडु के एक छोटे-से नगर में निर्धन ब्राह्यण परिवार में 12 मई, 1895 को हुआ था। बचपन से ही इनमें कुछ असाधारणता थी। 1912 में उन्हें शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा गया और 1921 तक वे वहाँ रहे। वे एनी बेसेंट की थियोसाफिकल (अध्यात्मविद्या) सोसाइटी (समाज) से जुड़े रहे और एनी बेसेंट का उन्हें बहुत स्नेह मिला। 1927 में एनी बेसेंट ने उन्हें’ विश्व गुरु’ घोषित किया। किन्तु दो वर्ष बाद ही कृष्णमूर्ति ने थियोसिफिकल विचारधारा से नाता तोड़कर अपने नये दृष्टिकोण का प्रतिपादन आरंभ कर दिया। अब उन्होंने अपने स्वतंत्र विचार देने शुरू कर दिये। कृष्णमूर्ति ने धर्म, अध्यात्म, दर्शन, मनोविज्ञान व शिक्षा को अपनी अंतर्दृष्टि के माध्यम से नये आयाम दिए। जिहू कृष्णमूर्ति की इस नई विचारधारा की ओर समाज का बौद्धिक वर्ग आकृष्ट हुआ और लोग पथ-प्रदर्शन के लिए उनके पास आने लगे थे। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की, जिनमें दक्षिण भारत का ’ऋषिवेली’ विद्यालय उल्लेखीनय है। भारत के इस महान व्यक्तित्व की 91 वर्ष की आयु में 17 फरवरी, 1980 ई. में मृत्यु हो गई।

जे. कृष्णमूर्ति ने सदैव ही इस बात पर बल दिया था कि प्रत्येक मनुष्य को मानसिक क्रांति की आवश्यकता है पर ऐसी क्रांति किन्ही ब्राह्य कारक से संभव नहीं है। व्यक्तित्व के पूर्ण रूपान्तरण से ही विश्व से संघर्ष और पीड़ा को मिटाया जा सकता है। हम अंदर से अतीत का बोझ और भविष्य का भय हटा दें और अपने मस्तिष्क को मुक्त रखें। उन्होंने कहा-याद रखें कि मेरा कोई शिष्य नहीं हैं, क्योंकि गुरु तो सच को दबाते हैं। सच तो स्वयं तुम्हारे भीतर है। सच को ढूँढने के लिए मनुष्य को सभी बंधनों से स्वतंत्र होना आवश्यक है। कृष्णमूर्ति ने दुनिया के अनेक भागों में भ्रमण किया और लोगों को शिक्षा दी और लोगों से शिक्षा ली। उन्होंने पूरा जीवन एक शिक्षक और छात्र की तरह बिताया। मनुष्य के सर्वप्रथम मनुष्य होने से ही मुक्ति की शुरुआत होती है, किन्तु आज का मानव हिन्दू, बौद्ध ईसाई, मुस्लिम, अमेरिकी या अरबी है। उन्होंने कहा था कि संसार विनाश की राह पर आ चुका हैं और इसका हल तथाकथित धार्मिकों और राजनीतिज्ञों के पास नहीं है। वे कहते है कि ”गंगा बस उतनी नहीं है- जो ऊपर-ऊपर हमें नजर आती है। गंगा तो पूरी की पूरी नदी है, शुरू से आखिर तक, जहाँ से उद्गम होता है, उस जगह से वहां तक, जहां यह सागर से मिलती है। हमारे होने से भी कई चीजें शामिल हैं, और हमारी ईजादें सूझें हमारे अंदाजे विश्वास, पूजा-पाठ, मंत्र-ये सब के सब तो सतह पर ही हैं। उनकी हमें जांच-परख करनी होगी, और तब इनसे मुक्त हो जाना होगा- इन सबसे सिर्फ उन एक या दो विचारों एक या दो विधि-विधानों से ही नहीं, जिन्हें हम पसंद नहीं करते।”

कृष्णमूर्ति अनुभव को बहुत महत्व देते थे। वे कहते हैं कि पहली चीज यह है कि हम जो हैं उसे वैसा का वैसा ही पहचाने और प्रत्येक क्षण के अवलोकन में स्वयं को इस प्रकार अनुशासित करें जैसी की अपनी इच्छाओं को खुद ही देखें। जब हम निरंतर जागरूकता का अनुशासन स्थापित कर लेते हैं तो उन सब चीजों को जिनके बारे में सोचते महसूस करते या अमल में लाते हैं उनका निरंतर अवलोकन हमें संपूर्णता की ओर ले जाता है। हम दमन, ऊब और भ्रम से बाहर आकर संपूर्णता की ओर बढ़ते हैं। जीवन का लक्ष्य कुछ ऐसा नहीं जो कि बहुत दूर हो, जो कि दूर नहीं भविष्य में उपलब्ध करना है अपितु पल पल की प्रत्येक क्षण की वास्तविकता हर पल का यथार्थ जानने में है जो अभी अपनी अनन्तता सहित हमारे सामने साक्षात ही है।

कृष्णमूर्ति कहते हैं, ’जब आप खुद को ही नहीं जानते तो प्रेम व संबंध को कैसे जान पाएंगें? ’हम रूढ़ियों के दास हैं। भले ही हम खुद को आधुनिक समझ बैठे, मान लें कि बहुत स्वतंत्र हो गये हैं, परन्तु गहरे में देखें तो हैं हम रूढ़िवादी ही है। इसमें कोई संशय नहीं है क्योंकि छवि-रचना के खेल को आपने स्वीकार किया है और परस्पर संबंधों को इन्हीं के आधार पर स्थापित करते हैं। यह बात उतनी ही पुरातन है जितनी कि ये पहाड़ियां। यह हमारी एक रीति बन गई है। हम इसे अपनाते हैं, इसी में जीते हैं, और इसी से एक-दूसरे को यातनाएं देते हैं तो क्या इस रीति को रोका जा सकता है?

किसी मनुष्य की मौत से अलग, अंतत: किसी पेड़ की मौत बहुत ही खूबसूरत होती है। किसी रेगिस्तान में एक मृत वृक्ष, उसकी धारियों वाली छाल, सूर्य की रोशनी और हवा से चमकी हुई उसकी देह, स्वर्ग की ओर उन्मुख नंगी टहनियां और तने आश्चर्यजनक दृश्य होते हैं। सैकड़ों साल पुराना एक विशाल पेड़ बागड़ बनाने, फर्नीचर या घर बनाने या यूँ ही बगीचे की मिट्‌टी में खाद की तरह इस्तेमाल करने के लिए मिनटों में काट कर गिरा दिया जाता है। सौंन्दर्य का ऐसा साम्राज्य मिनटों में नष्ट हो जाता है। मनुष्य चरागाह, खेती और निवास के लिए बस्तियां बनाने के लिए जंगलों में गहरे से गहरे प्रवेश कर उन्हें नष्ट कर चुका है। जगल और उनमें बसने वाले जीवन ही लुप्त होने लगे हैं। पर्वत श्रृंखलाओं से घिरी घाटियां जो शायद धरती पर सबसे पुरानी रही हों, जिनमें कभी चीते, भालू और हिरन दिखा करते थे अब पूरी तरह खत्म हो चुके हैं, बस आदमी ही बचा है जो हर तरफ दिखाई देता है। धरती की सुन्दरता तेजी से नष्ट और प्रदूषित की जा रही है। कारें और ऊँची बहुमंजिला इमारते ऐसी जगहों पर दिख रही हैं जहां उनकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। जब आप प्रकृति और चहुंँ ओर फैले वृहद आकाश से अपने संबंध खो देते हैं, आप आदमी से भी रिश्ते खत्म कर चुके होते हैं। दुनिया को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है यथार्थवादी और स्पष्ट मार्ग पर चलना। आपके भीतर कुछ भी नहीं होना चाहिए, तब आप एक साफ और सुस्पष्ट आकाश होने के लिए तैयार हों। धरती का हिस्सा नहीं, आप स्वयं आकाश हैं।

जे. कृष्णमूर्ति की शिक्षा जो उनके गहरे ध्यान, सही ज्ञान और श्रेष्ठ व्यवहार की उपज है ने दुनिया के तमाम दार्शनिकों, धार्मिकों और मनोवैज्ञानिकों को प्रभावित किया। उनका कहना था कि आपने जो कुछ भी परंपरा, देश और काल से जाना है उससे मुक्त होकर ही आप सच्चे अर्थों में मानव बन पाएँगे। जीवन का परिवर्तन सिर्फ इसी बोध में निहित है कि आप स्वतंत्र रूप से सोचते हैं कि नहीं और आप अपनी सोच पर ध्यान देते हैं कि नहीं।

जे. कृष्णमूर्ति अपनी वार्ताओं तथा विचार-विमर्शों के माध्यम से अपनी शिक्षा पहुँचाते हैं। उनके लिए प्राथमिक शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। मानव मन में मौलिक परिवर्तन तभी संभव होता है, जब बच्चों की विभिन्न प्रकार की कार्यकुशलता तथा विषयों का प्रशिक्षण देने के साथ-साथ उसे स्वयं अपनी विचारणा तथा क्रियाशीलता के प्रति जागरूक होने की क्षमता भी प्रदान की जाती है। यह जागरूकता बच्चों के अंदर मनुष्य के साथ, प्रकृति के साथ तथा मानव-निर्मित यंत्रों के साथ सही संबंध को परिपक्व करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। जे. कृष्णमूर्ति अपने शैक्षिक विचारों के माध्यम से शिक्षक और शिक्षार्थीं को यह उत्तरादायित्व सौंपते हैं कि वे एक अच्छे समाज का निर्माण करें, जिसमें सभी मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक जी सकें, शांति और सुरक्षा में हिंसा के बिना। क्योंकि आज के विद्यार्थी ही कल के भविष्य हैं।

कृष्णमूर्ति आंतरिक अनुशासन पर बल देते हैं। बाह्य अनुशासन मन को मूर्ख बना देता हैं। यह आप में अनुकूलता और नकल करने की प्रवृत्ति लाता है। परन्तु यदि आप अवलोकन के दव्ारा सुन करके, दूसरी की सुविधाओं का ध्यान करके, विचार के दव्ारा अपने को अनुशासित करते हैं, तो इससे व्यवस्था आती है। जहाँ व्यवस्था होती है, वहां स्वतंत्रता सदैव रहती है। यदि आप ऐसा करने में स्वतंत्र नहीं है तो आप व्यवस्था नहीं कर सकते। व्यवस्था ही अनुशासन है।

जे. कृष्णमूर्ति के मौलिक दर्शन ने पारंपरिक, गैरपरंपरावादी विचारकों, दार्शनिकों, शीर्ष शासन-संस्था प्रमुखों, भौतिक और मनोवैज्ञानियों और सभी धर्म, सत्य और यथार्थपरक जीवन में प्रवृत्त सुधिजनों को आकर्षित किया और उनकी स्पष्ट दृष्टि से सभी आलोकित हुए हैं। उन्होंने भारत, इंग्लैंड और अमरीका में विद्यालय भी स्थापित किये जिनके बारे में उनका दृष्टिबोध था कि शिक्षा में केवल शास्त्रीय बौद्धिक कौशल ही नहीं वरन्‌ मन-मस्तिष्क को समझने पर भी जोर दिया जाना चाहिये। जीवन यापन और तकनीकी कुशलता के अतिरिक्त जीने की कला कुशलता भी सिखाई जानी चाहिए।

उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि मनुष्य की वैयक्तिक और सामाजिक चेतना दो भिन्न चीजें नहीं। ”पिण्ड में ही ब्रह्यांड है।” उन्होंने बताया कि वास्तव में हमारे भीतर ही पूरी मानव जाति पूरा विश्व प्रतिबिम्बत है। उन्होंने प्रकृति और परिवेश से मनृष्य के गहरे रिश्ते और प्रकृृति और परिवेश से अखंडता की बात की। उनकी दृष्टि मानव निर्मित सारे बँटवारों, दीवारों, विश्वासों दृष्टिकोणों से परे जाकर सनातन विचार के तल पर, क्षणमात्र में जीने का बोध देती है। अपने कार्य के बारे में उन्होंने कहा ”यहाँ किसी विश्वास की कोई मांग या अपेक्षा नहीं है, यहाँ अनुयायी नहीं है, पंथ संप्रदाय नहीं, व किसी भी दिशा में उन्मुख करने के लिए किसी तरह का फुसलाना प्रेरित करना नहीं है, और इसलिए हम एक ही तल पर, एक ही आधार पर और एक ही स्तर पर मिल पाते हैं, क्योंकि तभी हम सब एक साथ मिलकर जीवन के अद्भूत घटनाक्रम का अवलोकन कर सके हैं। उनके साहित्य में सार्वजनिक वार्ताएँं, प्रश्नोंत्तर, परिचर्चाएं, साक्षात्कार, परस्पर संवाद, डायरी और उनका खुद का लेखन शामिल है।

जे. कृष्णमूर्ति अपने शैक्षिक विचारों के माध्यम से शिक्षक और शिक्षार्थी को यह उत्तरदायित्व सौंपते हैं कि वे एक अच्छे समाज का निर्माण करें, जिसमें सभी मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक जी सकें, शांति और सुरक्षा में हिंसा के बिना। क्योंकि आज के विद्यार्थी ही कल के भविष्य हैं।