महान सुधारक (Great Reformers – Part 34)

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ओशों रजनीश:-

रजनीश का जन्म 11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्हें बचपमन में ’रजनीश चन्द्र मोहन’ के नाम से जाना जाता था। उन्होंने 1955 में जबलपुर विश्वविद्यालय से एवं सागर विश्वविद्यालय से स्नातकोर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1959 में व्याख्तयाता का पद संभाला। वह इस समय तक धर्म एवं दर्शन शास्त्र के ज्ञाता बन चुके थे। 1908-86 तक के काल में उनकी चतुर्दिक ख्याति फैली। बड़े-बड़े उद्योगपति, विदेशी धनकुबेर, फिल्म अभिनेता इनके शिष्य रहे हैं। रजनीश की कई कृतियाँ चर्चित रहीं हैं, इनमें ’संभागे से समाधि तक’ मृत्यु है दव्ारा अमृत का, संभावनाओं की आहट’ प्रेमदर्शन के नाम प्रमुख हैं। उनकी भोगवादी विचारधारा के अनुयायी सभी देशों में पाये जाते हैं। रजनीश ने पुणे में ’रजनीश केन्द्र’ की स्थापना की। 1981 में उन्होंने अमेरिका के ओरेगान में अपना कम्यून बनाया। रजनीश ने सभी विषयों पर सबसे पृथक और आपत्तिजनक विचार व्यक्त किया हैं। ये उनकी एक अलग छवि बनाते हैं। उन्होंने पुरातनवाद के ऊपर नवीनता तथा क्रांतिकारी विजय पाने का प्रयास किया है। ओशो ने सैकड़ों पुस्तके लिखीं, हजारो प्रचवन दिये। उनके प्रवचन पुस्तकों, आडियो कैसेट तथाा विडियो कैसेट के रूप में उपलब्ध है। अपने क्रांतिकारी विचारों से उन्होंने लाखो अनुयायी और शिष्य बनाये। अत्यधिक कुशल वक्ता होते हुए इनके प्रवचनों की करीब 600 पुस्तकें हैं। ’संभोग से समाधि की ओर ’ इनकी सबसे चर्चित और विवादस्पद पुस्तक है।

रजनीश कहते हैं कि स्त्री को अपनी मुक्ति के लिए अपने व्यक्तित्व को खड़ा करने की दिशा में सोचना चाहिए। उसे पुरुषों के बनाये मार्ग के बजाय खुद के सृजित मार्गों पर जाना चाहिये। जीवन को ज्यादा सुन्दर व सुखद बनाने के लिए उसे इसके लिए प्रयास करना पड़ेगा; तभी स्त्री का मान स्त्री का सम्मान, उसकी प्रतिष्ठा होगी। तब वह पुरुष के समकक्ष आ सकती है। स्त्री को एक और तरह की शिक्षा चाहिए, जो उसे संगीतपूर्ण व्यक्तित्व दे, जो उसे नृत्यपूर्ण व्यक्तित्व दें जो उसे प्रतीक्षा की अनंत क्षमता दें, जो उसे मौन की, चुप होने की, अनाक्रामक होने की, प्रेमी की और करुणा की गहरी शिक्षा दें। यह शिक्षा अनिवार्य रूप से ’ध्यान’ है अगर सारी दुनिया की स्त्रियां एक बार तय कर लें-युद्ध नहीं होगा, दुनिया पर कोई राजनैतिक युद्ध में कभी किसी को नहीं घसीट सकता। सिर्फ स्त्रियां तय कर लें; युद्ध अभी नहीं होगा-तो नहीं हो सकता। क्योंकि कौन जाएगा युद्ध पर? कोई बेटा जाता है, कोई पति जाता है, कोई बाप जाता है। मुश्किल यह है कि स्त्री को कुछ पता नहीं कि क्या हो रहा है। वह पुरुष के पूरे जाल में सिर्फ एक खिलौना बनकर रह जाती है। जो रेखाएँ पुरुषों ने खींची हुई हैं, वे उससे पार जाने की नहीं सोच पाती। सारी दुनिया की महिलाएँ में यह बुनियादी ख्याल जाग जाना चाहिए कि वे एक नई संस्कृति को, एक नए समाज को, एक नई सभ्यता को जन्म दे सकती है। स्त्री सजग हो तो कोई कठिनाई नहीं। एक बड़ी से बड़ी क्रांति दुनिया में स्त्री को लानी है।

रजनीश विभिन्न धर्मो के अनुयाायियों के बीच होने वाले दंगो के बारे में कहते हैं ये हिंसा और इसे जातीय हिंसा कहना गलत हैं। इसके लिए राजनीति जिम्मेदारी है। राजनीति की वजह से ऐसा होता है होना यह चाहिये कि राज्य की नजर में विभिन्न धर्मो के अनुयायियों के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नागरिकों के लिए होना चाहिये। अलग-अलग धर्म के लिए अलग कानून बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। राज्य की नजरों से हिन्दू और मुसलमान का अंतराल खत्म होना चाहिये।

ओशों ने हर एक पाखंड पर चोट की। संन्यास की अवधारणा को उन्होंने भारत की विश्व को अनुपम देन बताते हुए संन्यास के नाम पर भगवा कपड़े पहनने वाले पाख्ांडियों को खूब लताड़ा। उनकी नजर में संन्यासी वह है जो अपने घर-संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए। उनकी दृष्टि में एक संन्यास वह है जो इस देश में हजारों वर्षो से प्रचलित है। वह जीवन से भगोड़ापन है, पलायन है।

रजनीशी कहते हैं कि जीवन में कोई रहस्य है ही नहीं। या यह कहा जा सकता है कि जीवन खुला रहस्य है। सब कुछ उपलब्ध है, कुुछ भी छिपा नहीं है। तुम्हारे पास देखने की आँख भर होनी चाहिए। यह ऐसा है जैसे अंधा आदमी पूछे कि ’मैं प्रकाश के रहस्य जानना चाहता हूँ।’ उसे इतना ही चाहिए कि वह अपनी आँखों का इलाज करवाए ताकि वह प्रकाश देख सके। प्रकाश उपलब्ध है, यह रहस्य नहीं है। जीवन बंद मुट्‌ठी की तरह नहीं है; वह तो खुला हाथ है। लेकिन लोग इस बात का मजा लेते हैं कि जीवन एक रहस्य है-छुपा रहस्य। अपने अंधेपन को छुपाने के लिए उन्होंने यह तरीका निकाला है कि छुपे रहस्य गुह्य रहस्य है जो सभी के लिए उपलब्ध नहीं हैं, या वे ही महान लोग इन्हें जान सकते हैं जो तिब्बत में या हिमालय में रहते हैं, या वे जो अपने शरीर में नहीं है, जो अपने सूक्ष्म शरीर में रहते हैं और अपने चुने हुए लोगों को ही दिखाई देते हैं। इसी तरह की कई नासमझियाँं सदियों से बताई जा रही है। सिर्फ इस कारण से कि तुम इस तथ्य को देखने से बच सको कि तुम अंधें हो। जीवन किसी भी तरह से गुप्त रहस्य नहीं है। जीवन तुम से डरता नहीं है, इसलिए उसे छुपने की जरूरत ही क्या है? सच तो यह है कि तुम छुप रहे हो, लगातार स्वयं को छुपा रहे हो। जीवन के सामने अपने को बंद कर रहे हो क्योंकि तुम जीवन से डरते हो।

रजनीश कहते हैं कि अक्सर जिसको हम बुरा आदमी कहते हैं, उसमें एक जिंदगी होती है, और उसमें उतार-चढ़ाव होते है और अक्सर बुरे आदमी के पास जिंदगी के गहरे अनुभव होते हैं। अगर वह उनका उपयोग कर ले तो संत बन जाए। अच्छा आदमी कभी संत नहीं बन पाता। अच्छा आदमी बस अच्छा आदमी ही रह जाता है- सज्जन यानी मिडियांकर। जिसने कभी बुरे होने की भी हिम्मत नहीं की, वह कभी संत होने की भी सामर्थ्य नहीं जुटा सकता।

वास्तवकि प्रेमी अंत तक प्रेम करते हैं। अंतिम दिन वे इतनी गहराई से प्रेम करते है जितना उन्होने प्रथम दिन किया होता है; उनका प्रेम कोई उतेजना नहीं होता। उतेजना तो वासना होती है। तुम सदैव ज्वरग्रस्त नहीं रह सकते। तुम्हें स्थिर और सामन्य होना होता है। वास्तविक प्रेम किसी बुखार की तरह नहीं होता। यह तो श्वास जैसा है जो निरंतर चलता रहता है। प्रेम ही हो जाओ। अपने को पूरी तरह भूल जाओ कि तुम कह सको कि मै अब नहीं हूँ केवल प्रेम है। तब हृदय नही धड़़कता है, प्रेम ही धड़कता है। तब खुन नहीं दौड़़ता तब प्रेम ही दौड़ता है। तब आँखें नहीं देखती हैं, प्रेम ही देखता है। तब हाथ छूने को नहीं बढ़ते, प्रेम ही छूने को बढ़ता है। प्रेम बन जाओ और शाश्वत जीवन में प्रवेश करो।

रजनीश को उनके यौन-संबंधी विचारों के कारण परंपरागत समाज के कोप का भाजन बनाना पड़ा है। लेकिन इससे रजनीश को कोई फर्क नहीं पड़ा। वे स्पष्ट कहते हैं कि हमने यौन क्रिया को सिवाय गाली के आज तक दूसरा कोई सम्मान नहीं दिया। हम तो बात करने में भयभीत होते है। हमने इसे इस भांति छिपा कर रख लिया है जैसे वह है ही नहीं। लेकिन इसको छिपाया नही दबाया है। दबाने से मनुष्य इससे मुक्त नहीं हो गया बल्कि मनुष्य और बुरी तरह सेक्स (यौन/मैथुन) से ग्रसित हो गया। वास्तव में इसका दमन उल्टे परिणाम लाया हैं।

रजनीश कहते थे कि उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि अपनी विचारधारा में किसी को बदलू। वे कहते है मेरी कोई विचारधारा नहीं है। और दूसरी बात, मेरा विश्वास है कि किसी को बदलने का प्रयास हिंसा है। यह उसके व्यक्तित्व में उसकी विशिष्टता में, उसकी स्वतंत्रता में दखल देना हैं।