महान सुधारक (Great Reformers – Part 36)

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विश्व के महान सुधारक

ईसा मसीह:-

ईसा मसीह को ईश्वर प्रेरित मुक्तिदाता के रूप में पूजनीय माना गया है। ईसा ने अपने कृत्यों, आदर्शों से अपने अनुयायियों को प्रभावित किया। ईसा के अंतिम दो तीन वर्ष समझने के लिए उस समय की राजनीतिक तथा धार्मिक परिस्थिति ध्यान में रखनी चाहिए। समस्त यहूदी जाति रोमन सम्राट तिबेरियस के अधीन थी तथा यहूदिया प्रांत में पिलातस नामक रोमन राज्यपाल शासन करता था। यह राजनीतिक परतंत्रता यहूदियों को बहुत अखरती थीं। वे अपने धर्मग्रंथ में वर्णित मसीह की राह देख रहे थे क्योंकि उन्हें आशा थी कि मसीह उनको गुलामी से मुक्त करेंगें अब ईसा देश का परिभ्रमण करते हुए उपदेश देने लगे। उनके अचानक धर्मापदेशक बनने पर लोगों को आश्चर्य हुआ। सब ने अनुभव किया कि ईसा अत्यंत सरल भाषा तथा प्राय: दैनिक जीवन के दृष्टांतो का सहारा लेकर अधिकारपूर्वक मौलिक धार्मिक शिक्षा दे रहे हैं।

ईसा यहूदियों का धर्म ग्रंथ (ईसाई बाइबिल का पूर्वार्ध) प्रामाणिक तो मानते थे किन्तु यह शास्त्रियों की भाँति उसकी व्याख्या ही नहीं करते थे, प्रत्युत उसके नियमों में परिष्कार करने का भी साहस करते थे। ’पर्वत-प्रवचन’ में उन्होंने कहा -मैं मूसा का नियम तथा नबियों की शिक्षा रद्द करने नहीं, बल्कि पूरी करने आया हूँ। वह यहूदियों के पर्व मनाने के लिए राजधानी जेरूसलम के मंदिर में आया तो करते थे, किन्तु वह यहूदी धर्म को अपूर्ण समझते थे। वह शास्त्रियों दव्ारा प्रतिपादित जटिल कर्मकांड का विरोध करते थे और नैतिकता को ही धर्म का अधार मानकर उसी को अपेक्षाकृत अधिक महत्व देते थे। ईसा के अनुसार धर्म का सार दो बातों में है-

1. मनुष्य का परमात्मा को अपना दयालु पिता समझकर समूचे हृदय से प्यार करना तथा उसी पर भरोसा रखना।

2. अन्य सभी मनुष्यों को भाई-बहन मानकर किसी से भी बैर न रखना, अपने विरुद्ध किए हुए अपराध क्षमा करना तथा सच्चे हृदय से सबका कल्याण चाहना। जो यह भातृ प्रेम निभाने से असमर्थ हो वह ईश्वरभक्त होने का दावा न करे, भगवद्भक्ति की कसौटी भावतृ प्रेम ही है।

जनता इस शिक्षा पर मुग्ध हुई तथा उनके दव्ारा किए गये चमत्कार देखकर जनता ने ईसा को नवी के रूप में स्वीकार किया। ईसा ने धीरे-धीरे यह प्रकट किया कि मैं ही मसीह ईश्वर का पुत्र हूँ, स्वर्ग का राज्य स्थापित करने स्वर्ग से उतरा हूँ। यहूदी अपने को ईश्वर की चुनी हुई प्रजा समझते थे तथा बाइबिल में जो मसीह और स्वर्ग के राज्य की प्रतिज्ञा है, उसका एक भौतिक एवं राष्ट्रीय अर्थ लगाते थे। ईसा ने उन्हें समझाया कि मसीह यहूदी जाति का नेता बनकर उसे रोमनों की गुलामी से मुक्त करने नहीं, प्रत्युत सब मनुष्यों को पाप से मुक्त करने आए हैं। स्वर्ग के राज्य पर यहूदियों का एकाधिकार नहीं है, मानव मात्र इसका सदस्य बन सकता है। वास्तव में स्वर्ग का राज्य ईसा पर विश्वास करने वालों का समुदाय है जो दुनिया के अंत तक उनके संदेश का प्रचार करता रहेगा।

स्वर्ग के राज्य के इस आध्यात्मिक स्वरूप के कारण ईसा के प्रति यहूदी नेताओं में विरोध उत्पन्न हुआ। वे समझने लगे कि ईसा स्वर्ग का जो राज्य स्थापित करना चाहते हैं वह एक नया धर्म है जो जेरूशेलम के मंदिर से कोई संबंध नहीं रख सकता। अंततोगत्वा ईसा को गिरफ्तार कर लिया गया। सन्‌ 29 ई. को प्रभु गधे पर चढ़कर जेरूशेलम पहुँचे। वहीं उनको दंडित करने का षड्‌यंत्र रचा गया। उनके शिष्य जुदास ने उनके साथ विश्वासघात किया। यहूदियों की महासभा ने उनको इसलिए प्राणदंड दिया कि वह मसीह तथा ईश्वर का पुत्र होनेे का दावा करते हैं। रोमन राज्यपाल ने ईसा को क्रूस पर मरने का आदेश दिया। ईसा ने क्रूस पर लटकते समय ईश्वर से प्रार्थना की, ’हे प्रभु, क्रूस पर लटकाने वाले इन लोगों को क्षमा करे। वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।

उनकी मृत्यु के बाद उन्हें क्रूस से उतारकर दफना दिया गया। दफन के तीसरे दिन ईसा की कब्र खाली पाई गई, उसी दिन से, आस्थावानों का विश्वास है, वह पूनर्जीवित होकर अपने शिष्यों को दिखाई देने लगे और उनके साथ वार्तालाप भी करने लगे। उस समय ईसा ने अपने शिष्यों को समस्त जातियों में जाकर अपने संदेश का प्रचार करने का आदेश दिया। पुनरुथान के 40वें दिन ईसाई विश्वास के अनुसार, ईसा का स्वर्गारोहण हुआ।

ईसा की आकृति का कोई भी प्रामाणिक चित्र अथवा वर्णन नहीं मिलता, तथापि बाइबिल में उनका जो थोड़ा बहुत चरित्र चित्रण हुआ है उससे उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली होने के साथ ही अत्यंत आकर्षक सिद्ध हो जाता है। ईसा 30 साल की उम्र तक मजदूर का जीवन बिताने के बाद धर्मोपदेशक बने थे, अत: वह अपने को जनसाधारण के अत्यंत निकट पाते थे। जनता भी उनकी नम्रता और मिलनसारिता से आकर्षित होकर उनको घेरे रहती थी। वह बच्चों को विशेष रूप से प्यार करते थे तथा उनको अपने पास बुलाकर आशीर्वाद दिया करते थे। वह प्रकृति के सौंदर्य पर मुग्ध थे तथा अपने उपदेशों में पुष्पों, पक्षियों आदि का उपमान के रूप में प्राय: उल्लेख करते थे। वह धन-दौलत को साधना में बाधा समझकर धनियों को सावधान किया करते थे तथा दीन दुखियों और रोगियों को स्वास्थ्य-प्रदान कर अपनी अलौकिकशक्ति को व्यक्त करते थे।

वह धार्मिक आडंबरों के निंदक थे। सहृदय और मिलनसार होते हुए भी वह नितांत अनासक्त और निर्लिप्त थे। आत्मसंयमी होते हुए भी उन्होंने कभी शरीर गलाने वाली घोर तपस्या नहीं की। वह पाप से घृणा करते थे, पापियों से नहीं। अपने को ईश्वर का पुत्र तथा संसार का मुक्तिदाता कहते हुए भी वे अहंकारशुन्य और अत्यंत विनम्र थे। मनुष्यों में अपना स्नेह वितरित करते हुए भी वह अपना संपूर्ण प्रेम ईश्वर को निवेदित करते थे। इस प्रकार ईसा में एकांगीपन अथवा उग्रता का सर्वथा अभाव दिखता है, उनका व्यक्तित्व पूर्ण रूप से संतुलित है।