महान सुधारक (Great Reformers – Part 37)

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कंफ्यूशियस:-

चीन के महान दार्शनिक और विचारक कंफ्यूशियस का जन्म 551 ईसा पूर्व चीन के पूर्वी प्रांत शानडोंग (शान वुंग) के क्यूफु में हुआ था। भारत में उस काल में भगवान महावीर और युद्ध के विचारों का जोर था। कंफ्यूशियस एक राजनीतिज्ञ विचारक से ज्यादा एक धार्मिक विचारक भी माना गया है। इस दार्शनिक के नाम से चीन की सरकार एक शांति पुरस्कार भी प्रदान करती है। कंफ्यूशियस के शहर में आज भी उनका स्मारक, मंदिर और भवन समेत कई प्राचीन इमारते हैं। यह चीन की सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे यूनेस्कों ने विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया है।

कंफ्यूशियस ने ऐसे समय जन्म लिया जबकि चीन की शक्ति बिखर गई थी उस समय कमजोर झोऊ राजवंश का आधिपत्य था। उस दौर में कंफ्यूशियस के दार्शनिक विचारों के साथ ही उनके राजनीतिक और नैतिक विचारों ने चीन के लोगों पर अच्छा-खासा प्रभाव डाला। इसी के चलते उन्होंने कुछ वक्त राजनीति में भी गुजारा। दरअसल कंफ्यूशियस एक सुधारक थे। कंफ्यूशियस ने स्व: अनुशासन, बेहतर जीवनचर्या और परिवार में सामंजस्य पर जोर दिया था। उनकी शिक्षाआंे का आज भी चीन के कुछ लोग पालन करते है।

कंफ्यूशियसवाद उन्हीं से जुुड़ी धर्म, दर्शन और सदाचार की विचारधारा है। इसमें भी उनका जोर सदाचरण पर ज्यादा है। उन्होंने सद्व्यवहार, सदाचरण और शिष्टाचार के नियमों पर बहुत बल दिया है। कंफ्यूशियस का प्रयास था कि इससे चीनी समाज में फैली कुरीतियों और बुराइयों को दूर किया जा सकता है।

उन्होंने पिता-पुत्र के मध्य, पति-पत्नी के मध्य, भाइयों के मध्य, शासकों और उनके सलाहकारों के मध्य संबंधों की मीमांसा करके कुछ नियमों का प्रतिपादन किया है। उन्होंने प्रत्येक नागरिक का आह्यन किया कि सही बात को समझना और उसके अनुसार आचरण न करना कायरता है। उन्होंने कहा कि दयालुता का बदला दयालुता और चोट का बदला न्याय से दिया जाना चाहिए। वह पुरानी परंपरा को दोबारा स्थापित करने के इच्छुक थे और जीवन में संयम, निष्ठा आदि पर बल देते थे। उनका मत था कि संसार से पलायन करना मूर्खता है। उनकी शिक्षाएँ धार्मिक गुत्थियों एवं जटिलताओं से परे नैतिकता और सतपुरुष के आचरण की संहिता के रूप में बद्ध है।

हज़रत मुहम्मद साहब:-

इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद साहब थे, उनका जन्म 570 ई. को सउदी अरब के मक्का नामक स्थान में कुरैश कबोले के अब्दुल्ला नामक व्यापारी के घर हुआ था। मान्यता है कि असाधारण प्रतिभाशाली मुहम्मद आजीवन अक्षर-ज्ञान से रहित रहे। सत्य प्रेमी, व्यवहार चतुरता, ईमानदारी आदि अनेक सद्गुणों के कारण उनका बहुत सम्मान होता था। इन्हीं सद्गुणों के कारण उनकी स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ने लगी। जब वह 40 वर्ष के हुए तो उन्हें ईश्वरीय दिव्य संदेश मिलने लगे थे जिसे उन्होंने लोगों को बताना शुरू किया। उनकी बढ़ती लोकप्रियता ने तत्कालीन सत्ताधारियों को नाराज कर दिया।

जब वह 53 साल के थे तो उनकी हत्या का प्रयास किया गया। लेकिन उन्हें इसकी जानकारी पहले मिल गई और वे वहाँ से मदीना नगर को प्रस्थान कर गये। मदीना में वह अधिक दिन तक शांतिपूर्वक विश्राम न कर सके थे कि वहाँ भी उनका विरोधी कुरैश समुदाय उन्हें कष्ट पहुँचाने लगा। अंत में आत्मरक्षा का कोई अन्य उपाय न देख कुरैश और उनकी कुमंत्रणा में पड़े हुए मदीना निवासी यहूदियों के साथ उन्हें युद्ध करने पड़े, जिसकी समाप्ति ’मक्का विजय’ के साथ हुई। उन्होंने अपना शेष जीवन मदीना में ही व्यतीत किया। उनके जीवन में ही सारा अरब एक राष्ट्र और एक धर्म के सूत्र में आबद्ध इस्लाम धर्म में प्रविष्ट हो गया। 632 ई. में मदीना में 63 वर्ष की अवस्था में मुहम्मद अपने महान जीवनोद्देश्य को पूर्ण-कर मृत्यु को प्राप्त हुए।

मुहम्मद साहब पर उतरी आयतों (ईश्वरीय संदेशों) का संकलन ’कुरान’ नामक पुस्तक में किया गया है। ’कुरान’ में तीस खंड है और वह 114 ’सूरतों’ (अध्यायों) में विभक्त है। निवास-क्रम से प्रत्येक सूरत ’मक्की’ या ’मद्री’ नाम से पुकारी जाती है, अर्थात मक्का में उतरी ’सूरते’ ’मक्की’ और मदीना में उतरी ’मद्री कही जाती हैं।

’कुरान’ में एक ईश्वर के विश्वास पर बहुत बल दिया गया है। इसमें एक-दो नहीं, सैकड़ों बार कहा गया है कि वह परमेश्वर एक ही है, इसके सिवा दूसरा कोई पूज्य नहीं। यहाँ ईश्वर को सर्वव्यापक और सर्वज्ञ माना गया है। महात्मा मुहम्मद शांतिप्रिय थे, ईश्वर भक्त थे। उनमें और बहुत से सद्गुण थे। उन्होंने मनुष्य जाति पर बड़ा उपकार किया। उनकी शिक्षाओं ने अगणित लोगों को उचित जीवनमार्ग और शांति प्रदान की। महात्मा मुहम्मद के आचरण को आदर्श मानकर उसे दूसरों के लिए अनुकरणीय कहा गया है।