महान सुधारक (Great Reformers – Part 39)

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रोजा पार्क:-

रोजा पार्क का जन्म 4 फरवरी, 1913 को अमेरिका के अल्यामा शहर में हुआ था। रोजा पार्क 1 दिसंबर, 1955 को अलाबामा के माण्टगोमरी में एक बस में एक गोरे अमरीकी के लिए अपनी सीट से उठने से इंकार कर दिया था। तत्पश्चात उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। रोजा पार्क की गिरफ्तारी ने अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन के लिए एक उत्प्रेरक का काम किया।

इस घटना से पहले अमेरिका के कई राज्यों में बसों में पहली पंक्ति से मध्य पंक्ति तक की सीटें गोरों के लिए आरक्षित हुआ करती थी। इनमें कोई काला व्यक्ति नहीं बैठ सकता था। यह काननू बाध्यकारी था। लेकिन इसी के साथ एक परंपरा यह भी थी कि यदि गोरों की सभी आरक्षित सीटें भर जाती हैं, तो ऐसी दशा में गोरों के लिए काले लोगों को अपनी सीटे खाली पड़ती थी यानी तकनीकी तौर पर देखा जाए तो रोजा पार्क ने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया था। क्योंकि वे गोरों के लिए आरक्षित सीट पर नहीं बैठी थीं। लेकिन जब एक गोरे की सीट (स्थान) देने के लिए ड्राइवर (चालक) ने उनसे सीट छोड़ देने के लिए कहा तो रोजा पार्क ने इनकार कर दिया और उन्हें इस ’अवज्ञा’ के कारण गिरफ्तार कर लिया गया।

रोजा पार्क का यह कदम कोई स्वत: स्फूर्त कदम नहीं था दरअसल रोजा पार्क 1943 से ही कालों के नागरिक अधिकार आंदोलन के साथ जुड़ी हुई थीं और उसके एक संगठन एनएससीपी की सदस्य थीं। रोजा पार्क की गिरफ्तारी नागरिक अधिकार आंदोलन में मील का पत्थर साबित हुई और रोजा पार्क नस्लीय भेदभाव के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गयी।

स्वयं रोजा पार्क ने 1943 से 1955 तक नागरिक अधिकारों के लिए बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ी। डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर (कनिष्ठ) उनके सहयोगी थे। किंग ने 1958 में प्रकाशित अपनी किताब ’स्ट्राइड (छलाँग) टुवड्‌र्स (दो शब्द) फ्रीडम’ (आजादी) में लिखा है कि रोजा पार्क की गिरफ्तारी विरोध प्रदर्शनो का कारण नहीं बल्कि उत्प्रेरक था। रोजा पार्क की गिरफ्तारी के बाद विभिन्न नागरिक अधिकार संगठनों ने बस के बहिष्कार का नारा दिया। यह बहिष्कार ऐतिहासिक रूप से 13 महीने चला। चूँकि बसों में लगभग 75 प्रतिशत संख्या काले लोगों की होती थी इसलिए इस बहिष्कार के कारण लगभग सभी बस कंंपनियां (संघ) आर्थिक रूप से तबाह हो गयीं। बहिष्कार को लागू करने में काले लोगों को भी बहुत कष्ट झेलना पड़ा। बहुतों को अपने काम पर जाने के लिए 30-30 किमी तक पैदल चलना पड़ता था। हालांकि धनी काले लोगों ने अपनी कारें उनकी मदद के लिए दे दीं थी, जिसे वे लोग शेयर (योगदान) टेक्सी (कार) के रूप में इस्तेमाल करते थे। तत्कालीन अमरीकी साम्यवादी दल ने भी इस आंदोलन का सक्रिय समर्थन किया। इस आंदोलन ने कुछ ही महीनों में व्यापक रूप ले लिया। अन्तत: अमरीकी सीनेट (प्रबंधकारिणी समिति) को बाध्य होना पड़ा और गोरे-कालों के अलगाव के इस कानून को रद्द करना पड़ा। अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन की यह बहुत बड़ी जीत थी। अमेरिका का रैडिकल (उग्र) ब्लैक (काला) मूवमेंट (क्षण) भी इसी जमीन पर पैदा हुआ। उनके जन्मदिवस (4 फरवरी) और उनकी बहुचर्चित गिरफ्तारी (1 दिसंबर) को अमेरिका में विशेषकर अफ्रीकन अमरीकियों के बीच ’ रोजा पार्क दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

डॉ. मार्टिन लूथर किंग, जूनियर:-

डॉ. मार्टिन लूथर किंग, जूनियर का जन्म 1929 में अटलांटा, अमेरिका में हुआ था। डॉ. किंग ने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में किसी समुदाय के प्रति होने वाले भेदभाव के विरुद्ध सफल अहिंसात्मक आंदोलन का संचालन किया। 1955 का वर्ष उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था। उनकी अमेरिका के दक्षिणी प्रांत अल्बामा के माण्टगोमरी शहर से डेक्सटर एवेन्यू बॅपटिस्ट चर्च में प्रवचन देने बुलाया गया और इसी वर्ष माण्टगोमरी की सार्वजनिक बसों में काले-गोर के भेद के विरुद्ध एक महिला श्रीमती रोजा पार्क ने गिरफ्तारी दी। इसके बाद ही डॉ. किंग ने प्रसिद्ध बस आंदोलन चलाया।

13 महीने तक चले इस सत्याग्रही आंदोलन के बाद अमेरिकी बसों में काले-गोरे यात्रियों के लिए अलग-अलग सीटें रखने का प्रावधान खत्म कर दिया गया। बाद में उन्होंने धार्मिक नेताओं की मदद से समान नागरिक कानून आंदोलन अमेरिका के उत्तरी भाग में भी फैलाया। उन्हें 1964 में विश्व शांति के लिए सबसे कम उम्र में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। कई अमेरिकी विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद उपाधियां दी। धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं ने उन्हें मेडल (पदक) प्रदान किए। ’टाइम’ पत्रिका ने उन्हें 1963 का ’मैन (पुरुष) ऑफ (का) द (यह) इयर (वर्ष)’ चुना। वे गांधी जी के अहिंसक आंदोलन से बेहद प्रभावित थे। गांधी जी के आदर्शो पर चलकर ही डॉ. किंग ने अमेरिका में इतना सफल आंदोलन चलाया, जिसे अधिकांश गोरो का भी समर्थन मिला।

1959 में उन्होंने भारत की यात्रा की। डॉ. किंग ने अखबारों में कई आलेख लिखे। ’स्ट्राइड टुवर्ड फ्रीडम’ (1958) तथा ’व्हाद वी कैन नॉट वेट’ (1964) उनकी लिखी दो पुस्तकें हैं। 1957 में उन्होंने साउथ (दक्षिण) क्रिश्चियन लीडरशिप (नेतृत्व) कान्फ्रेंस (सम्मेलन) की स्थापना की। डॉ. किंग की प्रिय उक्ति थी-’हम वह नहीं हैं, जो हमें होना चाहिए और हम वह नहीं हैं, जो होने वाले हैं, लेकिन खुदा का शुक्र है कि हम वह भी नहीं हैं, जो हम थे।’ 4 अप्रैल, 1968 को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई।

मिखाइल गोर्बाचोफ:-

मिखाइल सेर्गेयविच गोर्बाचोफ का जन्म 2 मार्च 1931 को दक्षिणी रूस में हुआ। वे पढ़ाई लिखाई में इतने दक्ष थे कि उन्हें मास्को स्टेट (राज्य) विश्वविद्यालय के विधि विभाग में प्रवेश लेने के लिए न तो कोई परीक्षा देनी पड़ी और न ही कोई साक्षात्कार देना पड़ा। मिखाइल गोर्बाचोफ एक किसान परिवार में पैदा होने की वजह से कड़े परिश्रम से कभी पीछे नहीं हटते थे। मार्च 1985 में गोर्बाचोफ सोवियत संघ की कम्युनिस्ट (साम्यवादी) दल के महासचिव के पद पर निर्वाचित हुए। उन्होंने सत्ता संभालते ही देश में लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी जिसको ”पेरेस्त्रोइका” यानी समाज के ”पुनर्गठन” का नाम दिया गया।

इसके अंतर्गत उन्होंने सोवियत समाज को पारदर्शी बनाने और इसमें ”खुलेपन” का वातारण पैदा करने के लिए भरसक प्रयास किए। उसके बाद देश में लोकतंत्रीकरण की ऐसी पवन चली की आम लोग अपने आप को आजाद महसूस करने लगे। 1990 में सोवियत संघ के इतिहास में पहली बार स्वतंत्र संसदीय आयोजन किया गया।

सन्‌ 1990 को मिखाइल गोर्बाचोफ सोवियत संघ से पहले राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हुए। 1985 से 1991 तक उनकी बदौलत इस अवधि में सोवियत संघ और पश्चिमी देशों के बीच संबंधों में मूलभूत परिवर्तन आया। अब एक दुश्मन व साथी की छवि बदल गई। पश्चिम के साथ साझेदारी की इस नीति ने ”शीत युद्ध” और परमाणु हथियारों की दौड़ करने और जर्मनी के एकीकरण में निर्णायक भूमिका निभाई। अपने देश में और पूरे विश्व में सुधार लाने के लिए के लिए मिखाइल गोर्बाचोफ को अक्टूबर 1990 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

दिसंबर, 1991 को मिखाइल गोर्बाचोफ ने राज्य प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन इसके साथ उनके राजनीतिक अंत नहीं हुआ। 1992 में उन्होंने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोधों के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान की स्थापना ”गोर्बाचोफ फाउंडेशन (नींव)” भी कहा जाता है। मिखाइल गोर्बाचोफ रूस के राजनीतिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेते 1996 के चुनाव के दौरान वे रूस के राष्ट्रपति पद के लिए एक उम्मीदवार थे। उन्होंने 2001 में रूस की सामाजिक दल का गठन किया जो सन्‌ 2007 तक देश के राजनीतिक जीवन में सक्रिय रही। मिखाइल गोर्बाचोफ को 300 से स्कारों, उपाधियों, सम्मान और प्रमाण पत्रों से सम्मानित किया गया है। वर्ष 1992 के बाद के समय में उनकी दर्जनों पुस्तकें 10 भाषाओं में प्रकाशित की गई हैं।