महान सुधारक (Great Reformers – Part 40)

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दलाईलामा:-

धर्म के धर्मगुरु को दलाईलामा कहा जाता है। दलाईलामा एक पदवी है जिसका मतलब होता है ज्ञान का महासागर। धर्म के 14वें दलाईलामा तिब्बती धर्मगुरु ग्यात्सो हैं। तेनजिन ग्यात्सो राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरु है। इनका जन्म 6 जुलाई, 1935 को पूर्वात्तर तिब्बत के तत्केसेर क्षेत्र में रहने वाले साधारण किसान परिवार हुआ था। उन्हें मात्र दो साल की उम्र में 13वें दलाई लामा थूबटेन ज्ञायात्सो का अवतार बताया गया। मात्र 15 वर्ष की अल्प आयु में ही उन्हें तिब्बत का राष्ट्रध्यक्ष बना कर अधिकार दे दिये गये थे। चीन के तिब्बत में बढ़ते हस्तक्षेप के कारण दलाईलामा की बहुत छोटी उम्र में ही कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

सन्‌ 1949 में तिब्बत पर चीन के हमले के बाद दलाईलामा से कहा गया कि वह पूर्ण राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले लें बाद में दलाईलामा को पद दे दिया गया। चीन यात्रा पर शांति समझौता व तिब्बत से सैनिकों की वापसी की बात को लेकर 1954 में दाओ जैसे कई चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग भी गए, लेकिन सम्मेलन असफल रहा। आखिकार वर्ष 1959 में चीनी सेनाओं दव्ारा तिब्बती राष्ट्रीय आंदोलन को बेरहमी से कुचले जाने के बाद वह निर्वासन में जाने को मजबूर हो गए। अत: वर्ष 1959 में उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी। वह हिमाचल प्रदेश के शहर धर्मशाला में रह रहे हैं, जो केन्द्रीय तिब्बती का मुख्यालय है।

सन्‌ 1963 में दलाईलामा ने तिब्बत के लिए लोकतांत्रिक संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया। सितंबर, 1987 में दलाईलामा ने खराब होती स्थिति का शांतिपूर्ण हल तलाशने की दिशा में पहला कदम उठाते हुए पांच सूत्री शांति योजना प्रस्तुत की। यह विचार रखा कि तिब्बत को एक ऐसे शांति क्षेत्र में बदला जा सकता है, जहां सभी सचेतन प्राणी शांति से रह सके और पर्यावरण की रक्षा की जाए। 21 सितंबर, 1987 को अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों को संबोधित करते हुए दलाईलामा ने पांच बिन्दुओं वाली निम्न शांति योजना रखी-

1. समूचे तिब्बत को शांति क्षेत्र में परिवर्तित किया जाए।

2. चीन उस जनसंख्या स्थानान्तरण नीति का परित्याग करे जिसके दव्ारा तिब्बती लोगों के अस्त्वि पर खतरा पैदा हो रहा है।

3. तिब्बती लोगों की बुनियादी मानवाधिकार और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए।

4. तिब्बत के प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण व पुनरुदव्ार किया जाय और तिब्बत को नाभिकीय हथियारों के निर्माण व नाभिकीय कचरे के निस्तारण स्थल के रूप में उपयोग करने की चीन की नीति पर रोक लगे।

5. तिब्बत की भविष्य की स्थिति और तिब्बत व चीनी लोगों के संबंधों के बारे में गंभीर बातचीत शुरू की जाए। तिब्बत की मुक्ति के लिए अहिंसक संघर्ष जारी रखने हेतु दलाईलामा की इस कोशिश को सब ने सराहा। चीन और तिब्बत के बीच एक शांतिदूत की भूमिका निभाने के कारण उन्हें 10 दिसंबर 1989 में शांति का नोबल पुरस्कार दिया गया।

1992 में दलाईलामा ने यह घोषणा की कि जब तिब्बत स्वतंत्र हो जाएगा तो उसका सबसे पहला लक्ष्य होगा कि एक अंतरिम सरकार की स्थापना करना, जिसकी पहली प्राथमिकता तिब्बत के लोकतांत्रिक संविधान के प्रारूप तैयार करने और उसके स्वीकार करने के लिए एक संविधान सभा का चुनाव करना होगा। इसके बाद तिब्बती लोग अपनी सरकार का चुनाव करेंगे और दलाईलामा अपनी सभी राजनीतिक शक्तियां नवनिर्वाचित अंतरिम राष्ट्रपति को सौंप देंगे।

उन्होंने लगातार अहिंसा की नीति का समर्थन अत्यधिक दमन की परिस्थिति में जारी रखा है। शांति, अहिंसा और हर सचेतन प्राणी की खुशी के लिए काम करना दलाईलामा के जीवन का बुनियादी सिद्धांत है। वह वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं पर भी चिंता प्रकट करते रहते हैं।

दलाईलामा के शांति संदेश, अहिंसा, अंतर धार्मिक, मेलमिलाप, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व और करूणा के विचारों को मान्यता देने के रूप में 1959 से अब तक 60 मानद डॉक्टरेट (चिकित्सक की उपाधि), पुरस्कार, सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं। उन्होंने 50 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। उनकी आत्मकथा Freedom (आजादी) in (में) Exile (निर्वासन) : The (यह) Autobiography (आत्मकथा) of (का) the (यह) dalai lama है।

दलाईलामा का मानना है कि आज के समय की चुनौती का सामना करने के लिए मनुष्य को सार्वभौमिक उत्तरदायित्व की व्यापक भावना का विकास करना चाहिए। हमें यह सीखने की जरूरत है कि हम न केवल कार्य करें बल्कि पूरे मानवता के लाभ के लिए कार्य करें। मानव अस्तित्व की वास्तविक कुंजी सार्वभौमिक उत्तरदायित्व ही है। यह विश्व शांत, प्राकृतिक संसाधनों के समवितरण और भविष्य की पीढ़ी के हितों के लिए पर्यावरण की उचित देखभाल का सबसे अच्छा आधार है। पर्यावरण के बारे में उनका विचार है कि हमें प्रकृति की रक्षा करनी चाहिये। हम मनुष्य प्रकृति से ही जन्में हैं इसलिए हमारा प्रकृति के खिलाफ जाने का कोई कारण नहीं बनता। दलाई लामा के अनुसार पर्यावरण धर्म, नीतिशास्त्र या नैतिकता का मामला नहीं है। हम विलासिताओं के बिना भी गुजर-बसर कर सकते हैं, लेकिन यदि हम प्रकृति के विरुद्ध जाते हैं तो हम जीवित नहीं रह सकते वह भारत के प्रति भी बहुत कृतज्ञता महसूस करते हैं। वे कहते हैं कि ’एक शरणार्थी के रूप में हम तिब्बती लोग भारत के लोगों के प्रति हमेशा कृतज्ञ हैं, न केवल इसलिए कि भारत ने तिब्बतियों की इस पीढ़ी को सहायता और शरण दिया है, बल्कि इसलिए भी कि कई पीढ़ियों से तिब्बती लोगों ने इस देश से ज्ञान हासिल किया है। इसलिए हम हमेशा भारत के प्रति आभारी रहते है। यदि सांस्कृतिक नजरिए से देखा जाए तो तिब्बत भारतीय संस्कृति का अनुयायी है। चीन के दमनकारी नीतियों के बावजूद उनका मानना है कि तिब्बती समुदाय चीनी लोगों या चीन नेताओं के खिलाफ नहीं है। आखिर वे भी एक मनुष्य के रूप में हमारे भाई बहन हैं। यदि उन्हें खुद निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती तो वे खुद को इस प्रकार की विनाशक गतिविधि में नहीं लगाते या ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे उनकी बदनामी होती हो। मैं उनके लिए करुणा की भावना रखता हूँ।’