महान सुधारक (Great Reformers – Part 42)

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डॉ. अम्बेडकर के जाति संबंधी विचार:-

डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा जाति व्यवस्था के संबंध में आमूल परिवर्तनकारी है। इसका मूल कारण यह माना जाता है कि चूँकि उनका जन्म शूद्र वर्ण में हुआ था और उन्होंने जाति संबंधी नियोग्यताओं तथा अत्याचारों को खुद अनुभव किया था, इसलिए -वे इस व्यवस्था से उत्पन्न समस्याओं को ज्यादा गहराई से महससू कर पाते थे। अम्बेडकर ने स्पष्टत: कहा कि मेरे लिए मेरे व्यक्तिगत उद्देश्य से बड़ा दलितों की मुक्ति का उद्देश्य है। मेरे व्यक्तिगत हित से राष्ट्रीय हित भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं किन्तु यदि कहीं दलितों के हित और राष्ट्रहित को चुनना पड़ता है तो मैं दलितों के हित को प्राथमिकता दूंगा।

डॉ. अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था के संबंध में बहुत सी पुस्तके और लेख लिखे जिनमें से प्रमुख हैं ’the (यह) untouchables (अछूतों)’. ’शूद्र कौन थे’ ’कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के साथ क्या किया है’ तथा ’भारत में जाति का उद्भव और विकास’ आदि। इन पुस्तकों में अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था की उत्पत्ति, उसके नुकसान तथा उन्मूलन के उपायों इत्यादि पक्षों पर विचार किया।

जाति व्यवस्था का उद्भव:

डॉ. अम्बेडकर का दावा है कि मूल रूप से शूद्र सूर्यवंशी क्षत्रिय थे, किन्तु शूद्र राजाओं ने वर्णव्यवस्था के अंतर्गत ब्राह्यणों का वर्चस्व मानने से इंकार कर दिया। इसकी प्रतिक्रिया में ब्राह्याणों ने उनका उपनयन संस्कार करना बंद कर दिया और इसी कारण वे तीनों वर्णों से अलग होकर चौथे वर्ण बन गए। अम्बेडकर ने ऋग्वेद के पुरुष सूक्त को अप्रामाणिक तथा प्रक्षिप्त अंश माना है और तर्क दिया है कि इसमें निहित मान्याताएं वैदिक साहित्य के अन्य कथनों के साथ सुसंगत नहीं हैं। उन्होंने जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के संबंध में रिजले और नेसफील्ड की ’प्रजाति’ तथा ’व्यवसाय’ पर आधारित व्याख्याओं को खारिज किया और दावा किया कि जाति व्यवस्था वर्णव्यवस्था का ही विकृत रूप है जिसे ब्राह्यण वर्ण ने अपनी सुविधा तथा लालच के लिए बनाया है।

गांधी जी ने माना था कि वर्ण व्यवस्था प्राकृतिक नियम की तरह अटल है और वह अपने स्वरूप में ईश्वरीय है। डॉ. अम्बेडकर इस विचार का कठोर खंडन करते हैं और कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था मानवीय व्यवस्था है, वह भी उस समय की जब मानवीय बुद्धि विकास के आदिम स्तर पर थी। उनके अनुसार कुछ ब्राह्यणों ने निहित स्वार्थों के कारण ऋग्वेद में पुरुष सूक्त को प्रक्षेपित कर दिया। इसके बाद से हिन्दुओं को विश्वास हो गया कि वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति ईश्वर ने की है। ईश्वर ने ब्राह्यणों को मुख से, क्षत्रियों को बाहु से, वैश्यों को जाँघ से और शूद्रों को पैर से उत्पन्न किया- इस मिथ्या धारणा ने वर्ण व्यवस्था के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जाति व्यवस्था का विरोध:

गांधी जी ने वर्ण व्यवस्था के कई लाभ बताए थे किन्तु डॉ. अम्बेडकर ने इस व्यवस्था की बहुत सी हानियों को स्पष्ट किया। जाति व्यवस्था के प्रमुख नुकसान इस प्रकार हैं-

1. वर्ण व्यवस्था श्रम का विभाजन नहीं, ’श्रमिको का विभाजन’ है। वे मानते हैं कि किसी भी समाज के विकास के लिए श्रम विभाजन जरूरी होता है। किन्तु, श्रम विभाजन की अच्छी व्यवस्था वह है जिसमें सभी व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार कार्य प्राप्त कर सकें। वर्ण व्यवस्था गतिशीलता को रोकती है। वह रुचि और योग्यता के अनुसार नहीं बल्कि जन्म के अनुसार श्रमिकों का विभाजन करती है।

2. वर्ण व्यवस्था सामाजिक विषमताओं को बढ़ाती है, इसलिए यह आधुनिक व सभ्य समाज के लिए उपयोगी नहीं है। इसमें एक ओर शूद्रो को अमानवीय जीवन जीने के लिए बाध्य किया जाता है, उनकी परछाई को भी अपवित्र माना जाता है तो दूसरी ओर ब्राह्यणों को अधिक से अधिक विशेषाधिकार दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए उसे जन्म के आधार पर ही सभी वर्णो का गुरु होने का अधिकार मिलता है, उस पर कोई कर नहीं लागू होते, वह राजा के अधीन नहीं माना जाता तथा हत्या करने पर भी प्राणदंड का भागी नहीं होता।

3. वर्ण या जाति व्यवस्था बौद्धिक और शारीरिक श्रम में भेद करके आभिजात्यवादी मानसिकता को बढ़ावा देती है। मूल रूप से बौद्धिक और शारीरिक दोनों कार्य समाज के अस्तित्व हेतु अनिवार्य है, अत: उन्हें समान महत्व मिलना चाहिए। वर्ण व्यवस्था ब्राह्यणों को बौद्धिक कार्य देती है और सबसे ऊँचा स्थान देकर इस विचारधारा को स्थापित करती है कि बौद्धिक श्रम शारीरिक श्रम से श्रेष्ठ होता है।

4. वर्ण या जाति व्यवस्था स्वावलंबन को नहीं परवलंबन को बढ़ावा देती है। समाज में श्रम विभाजन तो होना ही चाहिए किन्तु वैसा नहीं जैसा वर्ण व्यवस्था में है। उदाहरण के लिए, ज्ञान की प्राप्ति सभी को करनी चाहिए, अपनी सुरक्षा के लिए साहस और गुणों का विकास सभी में होना चाहिए तथा अपने सामान्य दैनिक कार्य सबका स्वयं ही करने चाहिए। वर्ण व्यवस्था ब्राह्यणों को केवल बौद्धिक कार्य देती है और उनको शरीर से पंगु बना देती है जबकि क्षत्रियों का सिर्फ साहसिक कार्य देकर बाकी योग्यताओं से वंचित कर देती है। यही स्थिति अन्य वर्गों की होती है।

5. वर्ण या जाति व्यवस्था मनुष्य की सृजनात्मक शक्तियों का हृास करती है। हर मनुष्य में कुछ विशिष्ट क्षमताएं होती हैं जिनका सम्यक विकास होने से समाज को अत्यधिक लाभ होता है। वर्ण व्यवस्था व्यक्ति को अपनी सृजनात्मकता दबाने पर मजबूर करती है क्योंकि यदि इसकी क्षमताएँ उसके वर्ण दायित्व के लिए उचित नहीं हैं तो उनका दमन करना ही इसके अनुसार श्रेयस्कर है।

6. वर्ण या जाति व्यवस्था समाज में पृथकता और विघटन जैसे तत्वों को बढ़ावा देती है। यदि लंबे समय तक किसी वर्ग को उसकी बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं से वंचित रखा जाए तो वह खुद को समाज से अलग- अलग महसूस करने लगता है।

स्पष्ट है कि डॉ. अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था को पूरी तरह से नकारा है। वे निष्कर्ष देते हुए कहते हैं कि ”वह दर्शन जो समाज को टुकड़ों में बाँटता है, जो कार्य को रुचि से अलग रखता है, जो बुद्धि को श्रम से पृथक करता है, जो जीवन की मूलभूत रुचियों के अधिकार से आदमी को वंचित करता है, वह सामाजिक उपयोगिता के मानदंड को कैसे संतुष्ट कर सकता है?”