महान सुधारक (Great Reformers – Part 43)

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जाति व्यवस्था का उन्मूलन:

गांधी जी ने जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए हृदय परिवर्तन पर बल दिया था और अंतर्जातीय भोज तथा अंतर्जातीय विवाहों को इसका साधन बनाया था। डॉ. अम्बेडकर का दावा है कि ये सभी उपाय खोखले हैं क्योंकि जो हिन्दू अपने जीवन की हर घटना वर्ण व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में देखते है, वे इतने छोटे उपायों से इससे मुक्त नहीं हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हृदय परिवर्तन एक बेहद लंबी प्रकिया है और दलित वर्ग, जो अपने शोषण और दमन को समझ चुका है, इतना लंबा इंतजार नहीं कर सकता है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि ”यदि महात्मा गांधी जैसा महान राष्ट्रनायक सवर्ण हिन्दुओं का हृदय परिवर्तन नहीं कर सका तो फिर यह और किसी के लिए कैसे संभव है?”

डॉ. अम्बेडकर के अनुसार जाति व्यवस्था के उन्मूलन का वास्तविक उपाय धर्म के स्तर पर होना चाहिए क्योंकि मूल समस्या धर्म से ही पैदा हुई है। उपनिषदों में अदव्ैतवाद का विचार व्यक्त किया गया है जो बताता है कि आत्मा और ब्रह्य में अभेद है तथा सभी जीव ब्रह्य के प्रतिबिम्ब या विभिन्न रूप हैं। स्पष्ट है कि ऐसा दर्शन वर्ण व्यवस्था या जाति व्यवस्था का समर्थन नहीं कर सकता। किन्तु, ब्राह्यण धर्म के प्रतिनिधियों ने पुरुष सूक्त, मनुस्मृति जैसी रचनाओं में इस विभेद को स्थापित कर दिया। डॉ. अम्बेडकर के अनुसार गीता भी वर्ण विभेद का समर्थन करती है। वे लिखते है-”भगवान कृष्ण ने स्वयं यह उद्घोषित किया कि मैंने स्वयं चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का सृजन किया है और व्यक्तियों की क्षमताओं के अनुसार उन्हें भिन्न-भिन्न व्यवसाय दिया है। अरे अर्जुन, जब कर्तव्यों और व्यवसायों के इस धर्म का पतन होता है तब मैं स्वयं जन्म धारण करता हूँ ताकि इस व्यवस्था के पतन के जिम्मेदार लोगों को दंडित कर सकूँ और व्यवस्था पुन: स्थापित कर सकूँ।”

डॉ. अम्बेडकर का स्पष्ट मत है कि जाति व्यवस्था की मजबूती इतनी अधिक है क्योंकि इसे धर्म दव्ारा वैधता हासिल है। इसलिए, उनके अनुसार, सिर्फ जाति व्यवस्था पर चोट करने से कुछ नहीं होगा। उन मूल आस्थाओं को ही तोड़ना होगा जो इस भेदभाव का वैध बनाती है। वे लिखते है ”वास्तविक समाधान शास्त्रों की पवित्रता में आस्था को नष्ट करना है लोग अपने आचरण को उस समय तक नहीं बदलेंगे जब तक उन शास्त्रों की पवित्रता में विश्वास करना बंद नहीं करेंगे जिन पर उनका आचरण आधारित है।”

डॉ. अम्बेडकर ने इसी विचार के आधार पर हिन्दू धर्म की धार्मिक व्यवस्था को पुन: संगठित करने पर बल दिया। इसका पहला उपाय है कि हिन्दू धर्म का सिर्फ एक प्रामाणिक ग्रंथ होना चाहिए जो आधुनिक मूल्यों से सुसंगम विचारों को लेकर बनाया गया हो। शेष सभी ग्रंथों को कानूनी रूप से निषिद्ध कर दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्हीं का आश्रय लेकर लोग सामाजिक विषमता को सही ठहराते हैं।

दूसरा सुझाव डॉ. अम्बेडकर ने यह दिया कि पुरोहिताई की वंशानुगते व्यवस्था समाप्त होनी चाहिए। उनका तर्क है कि यदि चिकित्सक, अभियंता या वकील बनने के लिए विशेष योग्यताओं का अर्जन करना पड़ता है और परीक्षाओं में सफलता मिलने पर ही इन व्यवसायों में प्रवेश मिलता है तो पुरोहिताई को यूँ ही कैसे छोड़ा जा सकता है? हो सकता है कि पुरोहित मन्द बुद्धि का हो, धार्मिक कथनों को समझ नहीं पाता हो या किसी गंदे रोग से पीड़ित हो तब भी उसे ईश्वर को छुने को अधिकार मिल जाए जबकि शेष वर्णो के योग्य व्यक्ति भी पुरोहित न बन सके-यह अनुचित है।ं पुरोहित को राजकीय सेवक बनाया जाना चाहिए और राज्य दव्ारा चुना जाना चाहिए।

डॉ. अम्बेडकर ने अल्पकालिक समाधान के तौर पर आरक्षण पर भी बल दिया। उनका तर्क है कि निम्न वर्ग के लोगों की कई पीढ़ियों ने अपनी सारी शक्ति मालिकों के लिए श्रम करते हुए गुजारी है, जिसके कारण मालिकों और उनके अपने व्यक्तित्व में बहुत अधिक अंतराल पैदा हो गया है। अब बराबरी करने के लिए जरूरी है कि निम्न वर्गो को कुछ क्षतिपूरक न्याय दिया जाए।

डॉ. अम्बेडकर ने अस्पृश्यता को अपराध सीमित करने की मांग की, जिसे भारतीय संविधान में स्वीकार किया ही गया।

डॉ. अम्बेडकर का अंतिम विचार था कि यदि निम्न वर्ग को किसी भी प्रकार से जातीय नियोग्यताओं से मुक्ति न मिले तो उसे हिन्दू धर्म ही छोड़ देना चाहिए। उन्होंने 1935 ई. में येवला में एक सभा को संबोधित करते हुए घोषणा की कि ”दुर्र्भाग्य से मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ हूँ क्योंकि वह तय करना मेरी शक्ति से बाहर था, पर मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि हिन्दू के रूप में मरूंगा नही”। डॉ. अम्बेडकर ने यहीं किया भी। 1956 ई. में अपनी मृत्यु से कुछ ही महीने पहले उन्होंने नागपुर में अपने हजारों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और यहीं से नव-बौद्ध आंदोलन का सूत्रपात हुआ। उन्होंने बौद्ध धर्म का इसलिए चुना क्योंकि वह न तो ईश्वर और आत्मा जैसी अलौकिक कल्पनाओं में विश्वास करता है और न ही मनुष्यों में भेदभाव को स्वीकार करता है। इसके अतिरिक्त यह भी महत्वपूर्ण है कि महात्मा बुद्ध ने ईसा मसीह, मुहम्मद पैगंबर या कृष्ण की तरह खुद को ईश्वर, ईश्वर का दूत या ईश्वर-पुत्र नहीं बताया। बुद्ध ने वहीं माना जो अनुभव और तर्कबुद्धि से सुसंगत है। उन्होंने बाकी धर्मप्रवर्तकों की तरह स्वयं को ’मोक्षदाता’ नहीं, सिर्फ ’मार्गदाता’ कहा है। ’आत्मदीपों भव’ का सिद्धांत देकर बुद्ध ने प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा में वृद्धि की, जबकि बाकी धर्म मनुष्य की गरिमा का हनन करते हैं।

आलोचनाएँ:

1. डॉ. अम्बेडकर ने वर्ण व्यवस्था की जो ऐतिहासिक व्याख्या प्रस्तुत की है, वह इतिहाकारों को मान्य नहीं है। वे तटस्थ होकर इतिहास की व्याख्या नहीं कर सके हैं, दलित हितों के आधार पर ही इतिहास को देखते हैं।

2. धर्मान्तरण वस्तुत: सही समाधान नहीं है। धर्म दार्शनिक का मत है कि साधारण व्यक्ति यदि धर्म परिवर्तन कर भी लेता है तो उसके वास्तविक जीवन में कोई तात्विक अंतर पैदा नहीं होता।