महान सुधारक (Great Reformers – Part 5)

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राम मनोहर लोहिया:-

राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च, 1910 को अकबरपुर (वर्तमान में अंबेडकर नगर जिला उ. प्र.) में एक अध्यापक व राष्ट्रवादी परिवार में हुआ था। उनके पिताजी गांधी जी के अनुयायी थे। इसके कारण गांधी जी के विराट व्यक्तित्व का उन पर गहरा असर हुआ। लोहिया जी अपने पिताजी के साथ 1918 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार शामिल हुए।

विश्व की रचना और विकास के बारे में उनकी अनोखी व अदव्तीय दृष्टि थी इसलिए उन्होंने सदा ही विश्व नागरिकता का सपना देखा था। वे मानव-मात्र को किसी देश का नहीं बल्कि विश्व का नागरिक मानते थे। उनकी चाह थी कि एक से दूसरे देश में आने जाने के लिए किसी तरह की भी कानूनी रूकावट न हो और संपूर्ण पृथ्वी के किसी भी अंश को अपना मानकार कोई भी कहीं आ जा सकने के लिए पूरी तरह आजाद हो। लोहिया एक नयी सभ्यता और संस्कृति के द्रष्टा और निर्माता थे।

लोहिया ने मार्क्सवाद और गांधीवाद को मूल रूप में समझा और दोनों को अधूरा पाया, क्योंकि उनके अनुसार इतिहास की गति ने दोनों को छोड़ दिया है और दोनों का महत्व युगीन मात्र है। लोहिया की दृष्टि में मार्क्स पश्चिम के तथा गांधी पूर्व के प्रतीक हैं और लोहिया पश्चिम-पूर्व की खाई पाटना चाहते थे। मानवता के दृष्टिकोण से वे पूर्व-पश्चिम, काले-गोरे, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, नरनारी के बीच की दूरी मिटाना चाहते थे।

लोहिया अनेक सिद्धांतों, कार्यक्रमों और क्रांतियों के जनक हैं। वे सभी अन्यायों के विरुद्ध एक साथ जेहाद बोलने के पक्षपाती थे। उन्होंने एक साथ सात क्रांतियों का आहान किया। वे सात क्रांतियां थीं-

1. नर-नारी की समानता के लिए, चमड़ी के रंग पर रखी राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता के खिलाफ।

2. संस्कारगत, जन्मजात जातिप्रथा के खिलाफ और पिछड़ों को विशेष अवसर के लिए, परदेसी-गुलामी के खिलाफ ।

3. और स्वतंत्रता तथा विश्व लोक-राज के लिए, निजी पूँजी की विषमताओं के खिलाफ।

4. और आर्थिक समानता के लिए योजना दव्ारा पैदावार बढ़ाने के लिए, निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप के खिलाफ।

5. और लोकतंत्रीय पद्धति के लिए।

6. अस्त्र-शस्त्र के खिलाफ।

7. और सत्याग्रह के लिए।

इन सात क्रांतियों के संबंध में लोहिया ने कहा कि वे सब क्रांतियां संसार में एक साथ चल रही हैं। अपने देश में भी उनको एक साथ चलाने की कोशिश करना चाहिए। जितने लोगों को भी क्रांति पकड़ में आयी हो उसके पीछे पड़ जाना चाहिए और बढ़ाना चाहिए। बढ़ाते-बढ़ाते शायद ऐसा संयोग हो जाए कि आज का इंसान सब नाइंसाफियों के खिलाफ लड़ता-जुझता ऐसे समाज और ऐसी दुनिया को बना पाये जिसमें आंतरिक शांति और भरा-पूरा समाज हो।

1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में लोहिया अंग्रेजों को चकमा देकर गिरफ्तारी से बच निकले। अपनी समाजवादी मित्र मंडली के साथ वे भूमिगत हो गये। भूमिगत रहते हुए भी उन्होंने बुलेटिनों, पुस्तिकाओं, विविध प्रचार सामग्रियों के माध्यम के अलावा सामन्तर रेडियो ’क्रांग्रेस रेडियो’ का संचालन करते हुए देशवासियों को अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए प्रेरित किया। अगस्त क्रांति के दौरान डॉ. लोहिया के कौशल और साहस से महात्मा गांधी अत्यंत प्रभावित भी कर चुके थे। भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का सूरज डूब रहा था। राष्ट्रीय नेताओं का यह मानना था कि अंग्रेजों के जाते ही पुर्तगाली भी गोवा से स्वयं कूच कर जायेंगे। इसलिए वहां शक्ति झोंकने की जरूरत नहीं। लेकिन डॉ लोहिया ने वहां जाकर आजादी की लड़ाई का बिगुल बजा ही दिया। डॉ. लोहिया का समाजवादी गांधी की विचारधारा के अत्यंत निकट था। आजादी के बाद देश साम्प्रदायिकता के संकट में फंस गया तो शांति और सदभाव कायम करने में डॉ. लोहिया ने गांधी का सहयोग किया। 1956 में डॉ. लोहिया और डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बीच निकटता बढ़ने लगी थी। लेकिल 6 दिसंबर, 1956 को डॉ. अम्बेडकर का निधन होने से उनका राजनीतिक सफर अधूरा रह गया। डॉ. राम मनोहर लोहिया की आगाह करते आ रहे थे कि देश की हालत को सुधारने में कांग्रेस नाकाम रही है।

कांग्रेस शासन नये समाज की रचना में सबसे बड़ा रोड़ा है। उसका सत्ता में बने रहना देश के लिए हितकर नहीं है। इसलिए डॉ. लोहिया ने नारा दिया, कांग्रेस हटाओ देश बचाओ। 1967 के आम चुनाव में एक बड़ा परिवर्तन हुआ। देश के 9 राज्यों पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में गैर-कांग्रेसी सरकारें गठित हो गई। डॉ. लोहिया इस परिवर्तन के प्रणेता और सूत्रधार बने। 12 अक्टूबर, 1967 को 57 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय:-

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर, 1916 को मथुरा में हुआ था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने पिलानी में इंटरमीडिएट (मध्यम) परीक्षा पास की और बी.ए. करने के लिए कानपुर चले गये। वहां पर उन्होंने सनातन धर्म महाविद्यालय में दाखिला लिया। वे सन्‌ 1937 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए। वे एम.ए. करने के लिए आगरा चले गये। सन्‌ 1955 में वे उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांतीय प्रचारक बन गए। उन्होंने लखनऊ में ”राष्ट्र धर्म प्रकाशन” नामक प्रकाशन संस्थान की स्थापना की और अपने विचारो को प्रस्तुत करने के लिए एक मासिक पत्रिका ”राष्ट्र धर्म” शुरू की। बाद में उन्होंने ’पांचजन्य’ (साप्ताहिक) तथा ’स्वदेश’ (दैनिक) की शुरुआत की। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 21 सितंबर, 1951 को उत्तर प्रदेश का एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया और नई पार्टी की राज्य इकाई, भारतीय जनसंघ की नींव डाली। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की संगठनात्मक कुशलता बेजोड़ थी। वे 1968 में जनसंघ पार्टी के अध्यक्ष पद पर बैंठे। दीनदयाल जी इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के पश्चात्‌ जनसंघ का संदेश लेकर दक्षिण भारत गए। 11 जनवरी, 1968 को मुगलसराय में उनकी हत्या कर दी गई।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद का विचार दिया है। इसके अनुसार समाज स्वयंभू है। राज्य एक संस्था के नाते हैं। राज्य के समान और संस्थायें भी समय-समय पर पैदा होती हैं। प्रत्येक व्यक्ति इनमें से प्रत्येक संस्था का अंग रहता है। व्यक्ति एकांगी नहीं बल्कि बहुअंगी है परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अनेक अंगो वाला होकर भी परस्पर सहयोग, समन्वय, एकता और एकात्मकता के साथ चल सकता है। जो व्यक्ति इस गुण का ठीक से उपयोग कर ले वह सुखी व जो गुण का ठीक प्रकार से उपयोग न कर सके वह दुखी रहेगा। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की तत्व दृष्टि थी कि भारतीय संस्कृति समग्रतावादी और सार्वभौमिक भी है। पश्चिमी दुनिया में हजाराेे वाद हैं। पूरा पश्चिमी जगत विक्षिप्त है तथा उसके पास सुस्पष्ट दर्शन का अभाव है। यही अभाव वहां के लोगों को भारत की ओर आकर्षित करता है। अमेरिका का प्रत्येक व्यक्ति आनंद की प्यास में भारत की ओर टकटकी लगाये हुए हैं।

भारत ने संपूर्ण सृष्टि रचना में एकत्व देखा है। भारतीय संस्कृति इसलिए सनातन काल से एकात्मवादी हैं। सृष्टि के एक-एक कण में परंपरावलंबन है। भारत ने इसे ही अर्द्धत कहा है। भारत ने सभ्यता के विकास में परस्पर सरकार को ही मूल तत्व माना है। वस्तुत: एकात्म मानव दर्शन ही है। उन्होंने एकात्म मानव के सर्वांगीण विकास और अभ्युदय के लक्ष्य भी भारतीय दर्शन से ही निरूपति किये।

पंडित जी ने बहुत कुछ लिखा है जिनमें एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ का सिद्धांत और नीति, जीवन का ध्येय, राष्ट्र जीवन की समस्यायें, राष्ट्रीय अनुभूति, कश्मीर, अखंड भारत, भारतीय राष्ट्रधारा का पुन: प्रवाह, भारतीय संविधान, इनकी भी आजादी चाहिए, अमेरिकी समाज/अनाज, भारतीय अर्थनीति, विकास की एक दिशा, बेकारी समस्या और हल टेक्स (कर) था लूट आदि प्रमुख हैं। उनके लेखन का केवल एक ही लक्ष्य था- भारत की विश्व पटल पर लगातार पूर्नप्रतिष्ठा और विश्व विजय उन्होंने बहुत कम समय में ही सम्राट चन्द्रगुप्त जैेस चरित्र पर पुस्तक लिखकर भारतीय इतिहास के एक सांस्कृतिक निष्ठा वाले अन्य का चित्रण किया। पंडित जी ने अपने लेखों व भाषणों में राजनीति में शुचिता पर भी विशेष बल दिया है।