महान सुधारक (Great Reformers – Part 6)

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इंदिरा गांधी:-

इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर, 1917 को इलाहाबाद में हुआ था। इनका पूरा नाम ’इंदिरा प्रियदर्शनी गांधी था। इनके पिता जवाहरलाल नेहरू और मां कमला नेहरू थी। उन्होंने शांति निकेतन और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) में पढ़ाई की। 1942 में इनका विवाह बिना किसी आडंबर के अत्यंत सादगी के साथ फिरोज गांधी से हुआ। उनके दो पुत्र हुए-राजीव गांधी और संजय गांधी।

फिरोज -इंदिरा गांधी ने ’बाल सहयोग’ नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से उत्पाद का सहकारिता के आधार पर विक्रय किया जाता था। इंदिरा गांधी ने इंडियन (भारतीय) काउंसिल (परिषद) ऑफ (के) वाइल्ड (जंगली) वेलफेयर (कल्याण)’, इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) काउंसिल (परिषद) ऑफ (के) वाइल्ड वेलफेयर’ तथा ’कमला नेहरू स्मृति अस्पताल’ जैसी संस्थाओं में विभिन्न दायित्व स्वीकार करते हुए परोपकारी कार्यो को अंजाम दिया। वे नेहरू जी के राजनीतिक कार्यो में भी उनकी सहयोगिनी बनी रहीं। 1952 में इंदिरा गांधी को ’मदर्स अवार्ड’ (माता पुरस्कार) से सम्मानित किया गया।

कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी में वह 1955 में शामिल हुई। 1959 में महज 42 साल की इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री ने उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सौंपा। शास्त्री जी की असामायिक मृत्यु के 13 दिन बाद 24 जनवरी, 1966 को इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। उस समय देश में विभिन्न प्रकार की चुनौतियां और संकट थे। पिछले तीन वर्षों में भारत पर दो युद्ध थोपे गए थे। उनके कारण देश की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर थी।

और गिरावट का रूख था। औद्योगिक उत्पादन और खाद्यान्न का संकट सामने था। इंदिरा गांधी ने खाद्यान्न वितरण प्रणाली की कमियां को भी दूर किया जिससे गंभीर संकट का समय टल गया और भूखमरी से होने वाली मौतें कम हो गई। जून, 1966 में इंदिरा गांधी दव्ारा डॉलर (मुद्रा) की तुलना में रूपये का अवमूल्यन कर दिया गया। इंदिरा गांधी ने देश की खाद्यान्न स्थिति को संभालने के लिए शास्त्री जी दव्ारा आंरभ की गई ’हरित क्रांति योजना’ का सहारा लिया।

इंदिरा गांधी ने इस कठिन समय में अमेरिका से मदद मांगी लेकिन उसने भारत से वियतनाम युद्ध में समर्थन की शर्त रख दी। इस कठोर संकट में उन्होंने दिलेरी का परिचय देते हुये शर्त को अस्वीकार कर दिया। इससे अमेरिका भारत से नाराज हो गया लेकिन इंदिरा गांधी ने इसकी कोई परवाह नहीं की और सोवियत संघ से मित्रता बढ़ा दी जिसका आगे चलकर भारत को बहुत लाभ हुआ। यही उस समय की विदेशी नीति और कूटनीति की मांगी थी। समस्त विश्व दो महाशक्तियों को समर्थन में बँटा हुआ था। इंदिरा गांधी ने वक्त की जरूरत को देखते हुए यह समझ लिया कि गुटनिरपेक्ष देशों के संगठन को अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है ताकि किसी भी संकट को आपसी सहयोग और राजनीतिक इच्छा शक्ति से दूर किया जा सके। उन्होंने देश के 14 बैंको (अधिकोष) का राष्ट्रीयकरण कर दिया ताकि वे सरकार की आर्थिक नीति के अनुसार आचरण कर सकें। भूतपूर्व राजा-महाराजाओं को जो बड़ी राशि प्रिवी पर्स के रूप में मिलती आ रही थी, इंदिरा गांधी ने उसकी समाप्ति की घोषणा कर दी। इन दो बड़े कदमों के कारण जनता के मध्य इंदिरा गांधी की एक सुधारवादी प्रधानमंत्री की छवि कायम हुई और उनकी लोकप्रियता बढ़ गई। बैंको के राष्ट्रीयकरण के बाद भारत सरकार की राष्ट्रीय आर्थिक नीति के अंतर्गत सामाजिक सरोकार के कार्य होने लगे। मध्यम वर्ग तथा अल्प मध्यम वर्ग के लोगों को रोजगारत्मक ऋण मिलने का मार्ग साफ हो गया। भूमि हदबंदी योजना को पूरी शक्ति के साथ लागू किया गया। इससे गरीब किसानों को अच्छा लाभ मिला। इस प्रकार इंदिरा गांधी ने लोक कल्याणकारी कार्यों के माध्यम से जनता के मध्य अपनी एक नई पहचान कायम की।

लेकिन उनके विश्वस्त सांसदों की स्थिति पर्याप्त नहीं थी। वह चाहती थीं कि नए विधेयकों के लिए उन्हे दूसरी पार्टियों का मुँह न ताकना पड़े। इस प्रकार चुनाव से पूर्व इंदिरा गांधी ने अपना आभामंडल तैयार किया और 27 दिसंबर, 1970 को लोकसभा भंग करके मध्यावधि चुनाव का मार्ग प्रशस्त कर दिया। एक वर्ष पूर्व लोकसभा भंग करने का उनका निर्णय साहसिक था। इंदिरा गांधी के पक्ष में चुनावी माहौल बनने लगा और इंदिरा गांधी को बहुमत प्राप्त हो गया। उन्हें 518 में से 352 सीटों की प्राप्ति हुई।

1971 के अंत में पूर्वी पाकिस्तान के एक करोड़ शरणार्थी भारत में प्रविष्ट हो चुके थे। इन शरणार्थियों की उदर पूर्ति करना तब भारत के लिए एक समस्या बन गई थी। ऐसी स्थिति में भारत ने पाकिस्तान के बर्बर रूख के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवता के हित में आवाज बुलंद की। इसके जवाब में पाकिस्तान ने 3 दिसंबर, 1971 को भारत के वायु सेना ठिकानों पर हमला करते हुए उसे युद्ध का न्यौता दे दिया। इंदिरा गांधी के महान नेतृत्व में भारत की जवाबी कार्रवाई से पाकिस्तान को केवल पराजय का सामना करना पड़ा बल्कि उसे पूर्वी पाकिस्तान से भी हाथ धोना पड़ा। मजबूरन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्‌टों को भारत से समझौता करने शिमला आना पड़ा।

पाकिस्तान से युद्ध के बाद इंदिरा गांधी ने अपना सारा ध्यान देश के विकास की ओर केंद्रित किया। संसद में उन्हें बहुमत प्राप्त था और निर्णय लेने में स्वतंत्रता थी। उन्होंने ऐसे उद्योगों को रेखांकित किया जिनका कुशल उपयोग नहीं हो रहा था। उनमें से एक बीमा उद्योग और दूसरा कोयला उद्योग था। अगस्त, 1972 में बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इसी प्रकार कोयला उद्योग में भी श्रमिकों का शोषण किया जा रहा था। कोयला एक परंपरागत ऊर्जा का स्रोत था और उसकी बर्बादी की जा रही थी। इंदिरा गांधी ने कोयला उद्योग का जनवरी, 1972 में राष्ट्रीयकरण कर दिया। उनके इन दोनों कार्यो को अपार जनसमर्थन प्राप्त हुआ। हदबंदी कानून को पूरी तरह लागू किया गया। अतिरिक्त भूमि के लघु कृषकों एवं भूमिहीनों के मध्य वितरित किया गया। केंद्र की अनुशंसा पर राज्य सरकारों ने भी विधेयक पारित करके इन कानूनों को राज्य में लागू करने का कार्य किया। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सस्ती दरों पर खाद्यान्न प्रदान करने की योजना का शुभारंभ किया गया। ग्रामीण बैंकों की स्थापना अनिवार्य की गई और उन्हें यह निर्देष दिया गया कि किसानों एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना करने वाले लोगों को सस्ती ब्याज दर पर पूंजी उपलब्ध करवाए। ज्वांइट (संयुक्त) स्टॉक (भंडार) कंपनियों (संघ) दव्ारा जो राजनीतिक चंदा प्रदान किया जाता था, उस पर रोक लगा दी गई ताकि धन का नाजायज उपयोग रोका जा सके।

रणनीतिक मोर्चे पर इंदिरा गांधी की एक अतुलनीय उपलब्धि परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल करने के लिए राजस्थान के पोखरण में परमाणु विस्फोट किया जाना है। उन्होंने सभी प्रकार के अंतरराष्ट्रीय दबावोंे को एक झटके में दरकिनार करते हुए देशहित में यह फैसला किया। उनकी सरकार को हड़ताल के रूप में बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सरकारी कर्मियों के रूप में सबसे बड़ी हड़ताल रेल कर्मचारियों की थी। हड़तालियों से सख्ती से, निपटने के कारण एक वर्ग उनसे नाराज भी हो गया। इस असंतोष की पहल झलक गुजरात में दिखी जहां छात्रों ने हिंसक आंदोलन शुरू कर दिये। इसका विस्तार बिहार में हुआ।

मार्च, 1974 में छात्रों ने बिहार विधानसभा का घेराव किया। छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने लाठी तथा गोली का भी बैझिझक प्रयोग किया। इस आंदोलन में विपक्षी दलों ने छात्रों का साथ देना शुरू किया। ऐसे में हिंसक आंदोलन आंरभ हो गए तथा एक सप्ताह में ही दर्जन से अधिक लोग अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठे। स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन की कमान संभाली। इसी बीच इंदिरा गांधी पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक मुकदमा चल रहा था जो चुनाव में गलत साधन अपनाकर विजय हासिल करने से संबंधित था। 12 जून, 1975 को राजनारायण दव्ारा दायर किए गए मुकदमे के फैसले से न केवल चुनाव रद्द किया गया बल्कि उन्हें छह वर्षो के लिए चुनाव लड़ने से भी प्रतिबंधित कर दिया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने चुनाव में सरकारी मशीनरी (यंत्र) का दुरूपयोग किया था और निर्वाचन आयोग दव्ारा निर्धारित राशि से अधिक राशि का व्यय चुनाव प्रचार में किया था। इंदिरा गांधी ने 25 जून, 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की हस्ताक्षरित स्वीकृति प्राप्त कर ली और 26 जून, 1975 की प्रात: देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। आपातकाल लागू होने के बाद जय प्रकाश नारायण, मोराराजी देसाई और अन्य सैकड़ों छोटे-बड़े नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। ऐसा माना जाता है कि आपातकाल के दौरान एक लाख व्यक्तियों को देश के विभन्न जेलों में बंद किया गया था। इनमें मात्र राजनीतिक व्यक्ति ही नहीं, आपराधिक प्रवृत्ति के लोग भी थे जिन्होंने आंदोलन के समय लूटपाट किया था। साथ ही भ्रष्ट कालाबाजारियों और हिस्ट्रीशीटर अपराधियों को बंद कर दिया गया। आपातकाल से सरकारी मशीनरी कार्यप्रणाली में बहुत सुधार हुआ और भ्रष्टाचार पर लगाम लग गई। लेकिन साथ ही पुलिस ने निरंकुश व्यवहार किया जिससे लोगों में नाराजगी भर गई। दूसरी समस्या सेंसरशिप (नियंत्रण) की थी जिसे कठोरतापूर्वक लागू किया गया। सत्ता में बैठे कुछ लाेागें के अतिउत्साह में कार्य करने जैसे नसबंदी आदि ने भी लोगों को मुश्किलों में इजाफा कर दिया। आपातकाल के बाद हुए चुनावों में उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। नव गठित जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 542 में से 300 सीटें प्राप्त हुई। इंदिरा गांधी की पार्टी मात्र 154 स्थानों पर ही विजय प्राप्त कर सकी। हालांकि दक्षिण भारत में उन्हें पहले की तुलना में 22 सीटें अधिक मिली और आँकड़ा 70 से बढ़कर 92 हो गया।

इंदिरा गांधी पर जनता पार्टी के शासनकाल में अनेक आरोप लगाए गए और कई कमीशन (आयोग) जाँच के लिए नियुक्त किए गए। इनमें ’शाह कमीशन’ सबसे उल्लेखनीय माना जाता है। आपातकाल में तथाकथित आपराधिक कार्यों के लिए उन पर देश की कई अदालतों में मुकदमें कायम किए गए। सरकारी भ्रष्टाचार के आरोप में श्रीमती गांधी कुछ समय तक जेल में रही। सत्तारूढ़ जनता पार्टी में अंतकर्लह के कारण अगस्त, 1979 में सरकार गिर गई। अभी तीन वर्ष भी पूर्ण नहीं हुए थे कि जनता पार्टी में दरार पड़ गई और देश को मध्यावधि चुनाव का भार झेलना पड़ा। चुनाव में इंदिरा कांग्रेस को 592 में से 353 सीटें प्राप्त हुई और स्पष्ट बहुमत के कारण केन्द्र में इनकी सरकार बनी। इंदिरा गांधी पुन: प्रधानमंत्री बन गई। इस प्रकार 34 महीनों के बाद वह सत्ता पर दोबारा काबिज हुई।

23 जून, 1980 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी की वायुयान दुर्घटना में मृत्यु हुई। पंजाब ने भिडंरवाले के नेतृत्व में अलगाववादी ताकते सिर उठाने लगी। एक बार फिर इंदिरा गांधी ने कठोर फैसला लेते हुये स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए सेना की कार्रवाई यानी ऑपरेशन (शल्य क्रिया) ब्लू स्टार (नीला तारा) को मंजूरी दे दी। इसके कुछ महीने बाद अक्टूबर, 1984 को श्रीमती गांधी के आवास पर तैनात उनके अंगरक्षकों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।

भारत के जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, उन सभी की अनेक विशेषताएं हो सकती है, लेकिन इंदिरा गांधी के रूप में जो प्रधानमंत्री भारत भूमि को प्राप्त हुआ, जैसा प्रधानमंत्री अभी तक दूसरा नहीं हुआ है क्योंकि एक प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने विभिन्न चुनौतियों का मुकाबला करने में सफलता प्राप्त की। युद्ध हो, विपक्ष की गलतियों हो, कूटनीति का अंतरराष्ट्रीय मैदान हो अथवा देश की कोई समस्या हो इंदिरा गांधी ने अक्सर स्वयं को सफल साबित किया। इंदिरा गांधी, नेहरू दव्ारा शुरू की गई औद्योगिक विकास की अर्दसमाजवादी नीतियों पर कायम रही। उन्होंने सोवियत संघ के साथ नजदीकी संंबंध कायम किए और पाकिस्तान भारत विचार के दौरान समर्थन के लिए उसी पर आश्रित रहीं। उन्होंने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल को देखा है, वे लोग वह मानते है कि इंदिरा गांधी में अपार साह, निर्णय शक्ति और धैय था।