महान सुधारक (Great Reformers – Part 7)

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विश्वनाथ प्रताप सिंह:-

विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म 25 जून, 1931 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले में दहिया राजपरिवार में हुआ था। बाद में स्थानीय रियासत मांडा के नरेश ने उन्हें गोद लिया था और वह मांडा के नरेश भी बने। श्री सिंह को देश का प्रधानमंत्री बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री काल में उनका दस्यू उन्मूलन अभियान काफी चर्चा में रहा।

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इलाहाबाद और पूना विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। वे 1947-1948 में उदय प्रताप कॉलेज (महाविद्यालय), वाराणसी में छात्र संघ के अध्यक्ष रहे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ के उपाध्यक्ष भी रहे। 1957 में उन्होंने भूदान आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और अपनी बहुत-सी जमीने दान में दें दी। विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपने विद्यार्थी जीवन में ही राजनीति से दिलचस्पी हो गई थी। उन्हें युवाकाल की राजनीति में बेहद सफलता प्राप्त हुई। फिर वह कांग्रेस पार्टी से जुड़ गये और 1969 -1971 में वह उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे। उन्होंने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का कार्यभार भी संभाला। उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल 9 जून, 1980 से 28 जून, 1982 तक रहा। इसके पश्चात वह जनवरी, 1983 में केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री बने। विश्वनाथ प्रताप सिंह राज्यसभा के भी सदस्य रहे। भारतीय राजनीतिक के परिदृश्य में विश्वनाथ प्रताप सिंह उस समय वित्तमंत्री थे जब तत्कालीन प्रधानमंत्रीराजीव गांधी के साथ उनका टकराव हुआ। बोफोर्स कांड के उजागर होने के साथ ही उनका कद भारतीय राजनीति में बढ़ने लगा। और उनके कदम प्रधानमंत्री पद की ओर बढ़ गये। वीपी के नाम से मशहूर सिंह ने 1989 के संसदीय चुनाव के बाद भाजपा और वामदलों के सहयोग से केन्द्र सरकार बनाई।

देश के इतिहास में ऐसा दूसरी बार हुआ कि कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। प्रधानमंत्री के रूप में सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का फैसला किया जो भारतीय राजनीति में ’निर्णायक मोड़’ साबित हुआ। इसी दौरान आरक्षण विरोधी अभियान के बारे में उनके रूख के कारण वह समाज के एक वर्ग मे अलोकप्रिय भी हुए। अयोध्या के विवादित ढांचे के मामले पर जब भाजपा ने उनसे समर्थन वापस लिया तो उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। प्रधानमंत्री पद से हटने के कुछ ही समय बाद भले ही उन्होंने अपने खराब स्वास्थ्य के कारण चुनावी राजनीति से संन्यास ले लिया लेकिन जब भी देश में तीसरे विकल्प का कोई प्रयास किया गया, वीपी हमेशा अग्रिम पंक्ति में दिखाई दिए। राजनीति के अलावा वीपी के व्यक्तित्व का रचनात्मक पक्ष उनकी कविताओं और चित्रकला के माध्यम से सामने आता है। अपनी कविताओं में वह एक बौद्धिक लेकिन संवेदनशील रचनाकार के रूप में गहरी छाप छोड़ते हैं। गुर्दे और कैंसर से लंबे समय तक जूझने के बाद वीपी का 27 नवंबर 2008 को निधन हो गया।

विश्वनाथ प्रताप सिंह को देश की राजनीति को एक नया कलेवर देने का श्रेय दिया जाता है। उनके प्रयासों के कारण विभिन्न क्षेत्रों में कई बुनियादी फर्क आए। इससे एक ओर जहां संसद का चेहरा बदल गया वहीं राजनीति आम लोगों की ओर अग्रसर हुई। उस समय तक संसद में उच्च वर्ग के लोगों का वर्चस्व रहता था लेकिन उनके कार्यकाल में भारतीय भाषाओं में बातचीत करने वाले लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। जिन क्षेत्रों में पिछड़े और समाज के अन्य वर्ग का प्रवेश आसान नहीं था, विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रयासों के कारण वहां भी उनकी पहुंच सुगम हो गई। मंडल मुद्दे के कारण पहली बार सामाजिक न्याय बहस का मुद्दा बना और जातिगत विषमता में कमी आई। विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रयासों का असर भारतीय राजनीति में दलित और अत्यंत पिछड़े वर्ग की स्थिति पर स्पष्ट दिखता है। भारत में समतामूलक समाज की बात 1930 से ही की जा रही थी और 1932 में दक्षिण भारत में एक आंदोलन भी चला था। लेकिन सामाजिक स्तर पर आर्थिक या संरचनात्मक सुधार नहीं हो पाया। श्री सिंह ने राजनीति में अभिनव प्रयोग किया। उनके प्रयासों के कारण राजनीति आम लोगों की ओर गई और राजनीतिक चेतना बढ़ी। उसी का नतीजा हैं कि अत्यंत पिछड़े वर्ग ’पावर (शक्तिशाली) ब्लॉक (खंड)’ बन कर उभरे और राजनीति में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी।

कांशी राम:-

कांशी राम का जन्म 15 मार्च, 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले में हुआ था। स्वभाव से सरल और इरादे के पक्के कांशी राम की कर्मयात्रा 60 के दशक से प्रारंभ हुई।

पूर्ण में एक्सप्लोसिव (विस्फोटक) रिसर्च (खोज) एंड (और) डवलपमेंट (विकास) लेबोरेटरी (प्रयोगशाला) के दौरान बिना कारण बताए जब विभाग ने अंबेडकर और युद्ध जयंती की दो छुट्‌िटयों को निरस्त कर दिया तो उन्होंने इसका प्रतिकार करना अपना नैसिर्गिक कर्तव्य समझा। न्यायालय की शरण ली और निरस्त छुट्‌िटयों को बहाल कराया, लेकिन वे इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनका मकसद इस क्षणिक कामयाबी को स्थायी बनाना था। इसके लिए उन्होंने सर्जनात्मक जिद का सहारा लिया। इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जब तक भारतीय समाज में जाति व्यवस्था आर्थिक असमानता और वर्ग विभेद बना रहेगा, तब तक समाज के अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति को न्याय और अधिकार नहीं मिल सकता। तब उन्होंने 70 के दशक के शुरुआती दिनों में पुणे में रक्षा विभाग की नौकरी छोड़ दी। इसके बाद वह महाराष्ट्र में दलितों की राजनीति में दिलचस्पी लेने लगे।

वर्ष 1978 में कांशी राम ने ’बामसेफ’ नामक संगठन बनाया। इसके माध्यम से वे सरकारी नौकरी करने वाले दलित, शोषित समाज के लोगों से एक निश्चित धनराशि लेकर समाज के हितों के लिए संघर्ष करते रहे। वर्ष 1981 में उन्होंने ’दलित शोषित, संघर्ष समाज समिति’ या डीएस-4 की स्थापना की। इस संगठन के बैनर तले उन्होंने कन्याकुमारी से लेकर दिल्ली तक की यात्रा की। सौ दिन की इस यात्रा ने उन्हें वंचितों के करीब ला दिया और शीघ्र ही वे मसीहा बन गए। लोगों के अपार समर्थन से उत्साहित होकर उन्होंने 14 अप्रैल, 1984 की बहुजन समाज पार्टी की नींव डाली। इस राजनीतिक विकल्प ने देश के जमे-जमाए राजनीतिक दलों की चुनौती देना शुरू कर दिया और समाज की खबराहट बढ़ गयी। उनके नेतृत्व में 1984 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी ने 10 लाख से अधिक मत हासिल किये, लेकिन कांशी राम का मकसद केवल सत्ता तक पहुँचना नहीं था, बल्कि उसे माध्यम बनाकर वंचितों को हक दिलाना उनकी प्राथमिकता में शुमार था। उन्होंने बाबा साहब के इस सिद्धांत को माना कि ’सत्ता ही सभी वंचितों की चाबी हैं।

कांशी राम चुनाव लड़ने से कभी पीछे नहीं हटें। उनका मानना था कि चुनाव लड़ने से पार्टी मजबूत होती है, उसकी दशा सुधरती है तथा जनाधार बढ़ता है। कांशी राम किसी आरोप से विचलित नहीं होते थे। अपने संगठन के दव्ारा जो भी धन उनके पास आता था उसमें से उन्होंने कभी भी एक रूपया अपने परिवार वालों को नहीं दिया और न अपने किसी निजी कार्य में खर्च किया। वर्ष 1993 में पहली बार इटावा संसदीय सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे। वर्ष 1993 में उत्तर प्रदेश में उनके समर्थन से सरकार बनी लेकिन 1995 में बसपा ने समर्थन वापस ले लिया। तब बसपा ने अन्य दलों के सहयोग से पहली बार किसी अन्य में सरकार बनाई। यह उनके संगठन के लिए स्वर्णिम अवसर था।

कांशी राम ने पार्टी और दलितों के हित के लिये सभी दलों से मित्रता करके नई राह अपनाई। उन्होंने हमेशा सभी से सहयोग लेने और देने की कोशिश की जिसका उनके दल को बहुत लाभ हुआ। उनका कहना था कि राजनीति में आगे बढ़ने के लिए यह सब जायज है। कांशी राम का राजनीतिक दर्शन था कि अगर सर्वजन की सेवा करनी है तो हर हाल में सत्ता के करीब ही रहना है। सत्ता में होने वाली प्रत्येक उथल-पुथल में भागीदारी बनानी है। बसपा आज भी राजनीतिक दर्शन के साथ है।