महान सुधारक (Great Reformers – Part 8)

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अन्ना हजारे:-

अन्ना हजारे का जन्म 15 जून, 1937 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भिगर कस्बे में एक गरीब परिवार में हुआ था। बाद में उनका परिवार अपने पैतृक गांव रालेगांव सिद्धि आ गया। बाद में अपनी बुआ के साथ वे मुंबई आ गये। अन्ना हजारे ने मुंबई में सातवीं तक पढ़ाई की और फौज में भर्ती हो गये। फौज में काम करते हुए अन्ना पाकिस्तानी हमलों में बाल-बाल बचे थे। एक बार उन्होंने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन (स्थान) से विवेकानंद की एक पुस्तक ’कॉल (निरीक्षण) टू (तक) द (यह) यूथ (नवयुवक) फॉर (के लिये) नेशन’ (राष्ट्र) खरीदी और उसको पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिदंगी समाज को समर्पित कर दी। उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा और उनके शब्दों को अपने जीवन में डाल लिया। अन्ना हजारे ने इसके बाद आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय किया। 1975 में वे फौज की नौकरी से सेवानिवृत्ति ले कर गांव वापस चले गये।

अन्ना हजारे का मानना है कि देश की असली ताकत गांवों में है और इसलिए उन्होंने गांवों में विकास की लहर लाने के लिए मोर्चा खोल दिया। यहां तक की उन्होंने खुद अपनी पुस्तैनी जमीन बच्चों के हॉस्टल (छात्रावास) के लिए दे दी। अन्ना हजारे ने 1975 से सूखा प्रभावित रालेगांव सिद्धि में काम शुरू किया। वर्षा जल संग्रह, सौर ऊर्जा, बायो गैस और पवन ऊर्जा के उपयोग से गांव को स्वावलंबी और समृद्ध बना दिया गया। यह गाँव विश्व के अन्य समुदायों के लिए आदर्श बन गया है।

1998 में अन्ना हजारे उस समय अत्यधिक चर्चा में आये जब उन्होंने राज्य सरकार के दो नेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार करने के लिए आवाज उठाई। इसी तरह 2005 में अन्ना हजारे ने कांग्रेस सरकार पर उसके चार भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव डाला था। अन्ना की कार्यशैली बिल्कुल गांधी जी की तरह है जो शांत रहकर भी भ्रष्टाचारियों पर जोरदार प्रहार करती है। दिल्ली में 2011 में अन्ना हजारे ने जनलोकपाल विधेयक लाने की मांग को लेकर अभूतपूर्व प्रदर्शन किया।

अन्ना हजारे की समाजसेवा और समाज कल्याण के कार्य को देखते हुए सरकार ने उन्हें 1992 में पद्मश्री से सम्मानित किया था और 1992 में उन्हें पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया जा चुका हैं।

विश्व के महान नेता:-

अंब्राहम लिंकन-

12 फरवरी, 1809 को अमेरिका के केन्टकी प्रांत के एक गाँव के खेत में बनी झोपड़ी में जन्में अंब्राहम लिंकन का व्यक्तित्व अत्यंत अद्भुत और अति प्रेरणादायी है। इनके जीवन की कहानी केवल किसी प्रतिभाशाली एवं महान व्यक्ति की कहानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लगातार प्रयत्न से तैयार हुआ महान व्यक्तित्व है। इन्हें ताकत की जोर-आजमाइश के काल में अपनी सरल, करुणा, दयालुता के साथ दासों को सामान्य जन की गरिमा दिलाने की लड़ाई लड़ने और उसमें विजयी होने तथा अमेरिकी गृहयुद्ध को समाप्त करके शांति लाने का श्रेय प्राप्त है।

अंब्राहम लिंकन के माता-पिता की उनके बाल्यकाल में मृत्यु हो जाने के बाद उनकी बड़ी बहन ने उनकी देखभाल की। उनके पिता एक साधारण किसान थे और बढ़ई का काम जानते थे। लिंकन ने भी बचपन में किसानी और बढ़ई का काम समझा लेकिन पिता का असमय निधन हो जाने के कारण वे इसे पूरा सीख नहीं सके। लिंकन ने अपने सद्गुणों का श्रेय हमेशा अपनी मां को दिया। वे कहते थे आज जो सद्गुण या खूबियाँ उनमें लोग देखते हैं, वे सब उसी की ही देन हैं। मां से मिली शिक्षा के कारण ही उन्होंने स्वयं को महज धनवान बनाने का सपना नहीं देखा। वे कहते थे कि संपत्ति एक ऐसी विलासिता है जिसकी किसी को जरूरत नहीं होनी चाहिए।

लिंकन की विद्यालय की शिक्षा एक साल से कम रही लेकिन अपने श्रमशील जीवन में भी उन्होंने अध्ययन के लिए हमेशा समय निकाला। किशोर वय में बहुत से लोगों की तरह वे भी कविताएँ लिखते थे। अपने काम के संदर्भ में की गई यात्राओं के दौरान उन्होंने नीग्रो लोगों को जंजीरों से बंधा और कोड़ों से पिटते देखा। उन्होंने यह भी देखा कि जबरन गुलाम बना ली गई महिलाओं को बोली लगा कर बेचा जा रहा था। उसने लिंकन पर गहरा प्रभाव डाला और उनके मन में दासप्रथा के खिलाफ गहरी धारणा बन गई।

लिंकन ने आजीविका कमाने के लिए बहुत संघर्ष किया। दुकान में सहायक की नौकरी से लेकर नाव चलाने, लोहे की छड़े काटने और दंगल लड़ने तक के काम को करने में उन्होंने कोई गुरेज (अचरज) नहीं किया। इतने सारे रोजगारों के बाद भी लिंकन ने पढ़ना नहीं छोड़ा। कपड़ों की दुकान में खाली समय में वह गणित के सवाल हल करने लगते। धीरे-धीरे उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की और मौका मिलने पर रोटी के लिए सैनिक टुकड़ों की कप्तानी भी की। धीरे-धीरे लिंकन में अध्ययन की आदत पड़ती गयी लेकिन उनका व्यवसाय कमजोर हो गया। उनकी रुचि मशीनों (यंत्रों) में भी थी और उन्होंने अपनी एक खोज का पेटेंट (आविष्कार) भी करवाया।

25 साल की उम्र में उन्होंने राजनीतिक जीवन आरंभ कर दिया था। संवैधानिक समस्याओं के निपटारे और अन्य नैतिक मसलों में उनकी हमेशा रुचि रहती थी। इस बीच उन्होंने सर्वेक्षण का काम भी सीखा और इस पर किताब भी लिख दी। जब तक उनका वकालत का पेशा नहीं जमा तब तक वे सर्वेक्षण का काम करते रहे। यही नहीं वकालत जमने के पूर्व उन्होंने पोस्टमास्टर (डाकिया) की सरकारी नौकरी की और सेना में भी काम किया। सेना में कप्तानी (संचालन करना) और पोस्टरमास्टरी के बीच एक बार लिंकन ने स्थानीय सभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन वे हार गये। लिंकन के इस पहले चुनाव में दिए गए भाषण को देखना खासा रोचक लगता है वह कहते है- ’मैं विनम्र अब्राहम लिंकन हूं। मेरी राजनीति छोटी सी है, और बुढ़िया के नृत्य की तरह मनोरंजक भी है। यदि चुन लिया गया तो मैं आपका शुक्रगुजार रहूँगा और यदि नहीं चुना गया तो मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं।’ 1834 में लिंकन ने पुन: चुनाव लड़ा। इस बार वे चुनाव जीत गये और आगे लगातार तीसरी बार वे चुने गए। सभा के लिए चुने जाने के आरंभिक दौर में लिंकन ने लोगों को सुनने में समय दिया। बाद में धीरे-धीरे आत्मविश्वास प्राप्त कर उन्होंने भाषण देना शुरू किया। अपने भाषणों में वे साहस के साथ अपनी बाते रखते थे और बुद्धिमानी से नियंत्रित अवसरवाद को जगह देते थे।

सन्‌ 1836 में दास प्रथा की समाप्ति के लिए आंदोलन आरंभ हो गया था। लिंकन भी इसके पक्ष में थे। तमाम प्रबुद्ध लोगों की तरह लिकंन भी चीजों को उसके दव्ंदव्ात्मक स्वरूप और सामयिक संदर्भों में देखने की कोशिश करते थे। दास प्रथा, ईश्वर और शराबियों के बारे में उनका वक्तत्व उधृत करने योग्य है। वे कहते हैं- ’प्रभु ने स्वयं निम्न व पतित व्यक्तियों में भी अपना स्वरूप प्रकट किया है, तो ऐसे व्यक्तियों को निदंनीय मृत्यु होने पर भी उन्हें अंत में मुक्ति प्रदान करने में उसे अस्वीकृति नहीं होगी। मेरी राय में हम लोग जो ऐसे बुरे व्यसनों से बचे हुए हैं, उसका कारण यह है कि हममें इस तरह की भूख नहीं जागी है। इसका अर्थ यह तो नहीं कि जिन लोगों में ये व्यसन है उनसे हम बुद्धि और चरित्र में सर्वोपरि हैं। सचमुच यदि देखा जाए, मसलन शराबी वर्ग को ही लिया जाए तो उनकी बुद्धि और हृदय की विशालता की दूसरे वर्गों से तुलना की जा सकती है।’

1848 से 1854 के बीच लिंकन राजनीति से दूर रहे। इस बीच उन्होंने अपने वकालत के पेशे पर ज्यादा ध्यान दिया। इस दौरान लिंकन का अलग व्यक्तित्व उभरा जिन मुकदमों को उसकी आत्मा स्वीकार नहीं करती थी उन्हें वे नहीं लेते थे या बीच में छोड़ देते थे। लिंकन इस ख्याल को एकदम गलत मानते थे कि कानून के धंधे में थोड़ी-बहुत बेईमानी चलती है। जब लिंकन को दोबारा राजनीति के क्षेत्र में आने का अवसर मिला तो वे ज्यादा प्रबुद्ध और राजनीति के कठोर मैदान में चलने योग्य हो चुके थे। वे फिर इलिनॉयस की सभा का सदस्य चुन लिये गए। 1854 में लिंकन ने रिपब्लिकन (प्रजातंत्र वादी) दल के जन्मदाता के रूप में प्रवेश किया। यह दल दास प्रथा विरोधी था।

अगस्त, 1885 में अपने मित्र जांशुआ स्पीड को लिखे पत्र में लिंकन कहते हैं- ’मैं दास प्रथा पसंद नहीं करता हूँ। मैं उन्हें पकड़े जाते, कोड़ों की मार और असहनीय मजदूरी पर वापस ढकेले जाते देख नफरत से भर उठता हूं। दासता के अंत की कीमत वे गणराज्य के बिखराब के रूप में नहीं चुकाना चाहते थे। इसलिए वे इसके लिए जॉत ब्राउन की तरह क्रांतिकारी तरीके से खुद की फांसी चढ़वा देने के भी पक्षधर नहीं थे। 1858 में जब किसी ने लिंकन से राष्ट्रपति पद के लिए नामजद किए जाने की चर्चा की तो उन्होंने कहा-’मैं अपने -आप कों राष्ट्रपति पद के योग्य नहीं समझता।’ पर राष्ट्रपति के रूप में अपना नाम प्रस्तुत किए जाने पर वे बिना किसी मानसिक कमजोरी के चुनाव जीतने की तैयारी में लग गए। चुनाव में उनके मुकाबले ज्यादा योग्य दो व्यक्ति खड़े थे, लेकिन अपने सरल भाषणों से लोगों की अभिभूत करने वाले लिंकन आखिकर 1860 के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत गए।

31 जनवरी, 1865 को प्रतिनिधि सभा ने सीनेट (प्रबंधकारिणी समिति) दव्ारा पहले ही पास किया हुआ दास-प्रथा रोकने के लिए वैंधानिक संशोधन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 4 मार्च, 1865 को लिंकन ने दूसरी बार संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति का पद ग्रहण किया। इस बार उनके अंगरक्षकों ने नीग्रो सेना की टुकड़ी भी थी। 14 अप्रैल, 1865 को नाटक देखते समय एक रंगकर्मी ने नस्लीय घृणा से वशीभूत होकर लिंकन की गोली मारकर हत्या कर दी।