महान सुधारक (Great Reformers – Part 9)

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लेनिन:- ब्लादिमीर इलीइच लेनिन रूस के एक विद्यालय निरीक्षक पिता की संतान थे। लेनिन का एक अन्य नाम ’उल्यानोव’ भी है। महज 18 वर्ष की आयु में उनके पिता का निधन हो गया। लेनिन के सभी भाई-बहन क्रांतिकारी विचारों के थे। इनके बड़े भाई एलेक्जेंडर को देश के शासक जार की हत्या का षड्‌यंत्र रचने में शरीक होने के आरोप में फांसी दे दी गई थी। सुश्री क्रुप्सकाया से 1893 में सेंट पीटर्सबर्ग में मार्क्सवादियों के समूह में परिचय होने के बाद वह इनकी सहयोगी रहीं और साइबेरिया में निर्वासन के दौरान दोनों ने विवाह कर लिया। इसी निर्वासव के दोरान लिखी तीन पुस्तकों में महत्वपूर्ण है-’रूस में पूंजीवाद का विकास’ जिसमें मार्क्सवादी सिद्धांतों के आधार पर रूस की आर्थिक उन्नति के विश्लेषण का प्रयत्न किया गया है और इसी समय उन्होंने मन में रूस के निर्धन श्रमिकों या सर्वहारा वर्ग का एक दल स्थापित करने की योजना बना ली थी।

लेनिन ने देश से बाहर जाकर ’इस्क्रा’ नामक समाचार पत्र का संपादन आरंभ किया। 1905-07 की प्रथम क्रांति के दौरान लेनिन ने रूस में आकर उसमें भाग लिया और विफलता के बाद वे पुन: बाहर चले गए। अपनी पुस्तक ’साम्राज्यवाद’ (1916) में साम्राज्यवाद का विश्लेषण करते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से बतलाया कि यह पूंजीवाद के विकास की चरम और आखिरी मंजिल है। उन्होंने उन परिस्थितियों पर भी प्रकाश डाला जो साम्राज्यवाद के विनाश को अनिवार्य बना देती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि साम्राज्यवाद के युग में पूंजीवाद के आर्थिक राजनीतिक विकास की गति सब देशों में एक सी नहीं होती। फरवरी-मार्च 1917 में रूस में क्रांति के आरंभ होने पर वे रूस लौट गये। उन्होंने क्रांति की व्यापक तैयारियों का संचालन किया और श्रमिकों तथा सैनिकों की बहुसंख्यक सभाओं में भाषण देकर उनकी राजनीतिक चेतना बढ़ाने और संतुष्ट करने का प्रयत्न किया।

सन्‌ 1917 में उन्होंने ’दि स्टेट एंड रिवोल्यूशन’ (राज्य तथा क्रांति) नामक पुस्तक लिखी और गुप्त रूप से दल के संघटन और क्रांति की तैयारियों के निर्देशन का कार्य जारी रखा। 7 नवंबर, 1917 को लेनिन की अध्यक्षता में सोवियत सरकार की स्थापना की गई। प्रारंभ से ही सोवियत शासन ने शांति स्थापना पर बल देना शुरू किया। जर्मनी के साथ संधि कर ली गई और जमींदारों से भूमि छीनकर सारी भूसंपत्ति पर राष्ट्र का स्वामित्व स्थापित कर दिया गया, व्यवसायों तथा कारखानों पर श्रमिकों का नियंत्रण हो गया और बैंको तथा परिवहन साधनों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। श्रमिकों तथा किसानों को पूंजीपतियों और जमींदारों से छुटकारा मिला और समस्त देश के निवासियों में पूर्ण समता स्थापित कर दी गई। नवस्थापित सोवियत प्रजातंत्र की रक्षा के लिए लाल सेना का निर्माण किया गया। लेनिन ने अब मजदूरों और किसानों के संसार के इस प्रथम राज्य के निर्माण का कार्य अपने हाथ में लिया। उन्होंने ’दि (यह) इमीडिएट (तुरन्त) टास्क्स ऑफ (का) दि (यह) सोवियत गवर्नमेंट’ (सरकारी) तथा दि (यह) प्रोलेटेरियन (सर्वहारा) रिवोल्यूशन (क्रांति) एंड (और) दि (यह) रेनीगेड (मुकर) कौतस्की’ नामक पुस्तके लिखी (1918)।

बाहरी देशों के सैनिक हस्तक्षेपों तथा गृहकलह के वर्षों में लेनिन ने विदेशी आक्रमणकारियों तथा प्रतिक्रांतिकारियों से दृढ़तापूर्वक लोहा लेने के लिए सोवियत जनता का मार्ग दर्शन किया। इस व्यापक अशांति और गृहयुद्ध के समय भी लेनिन ने युद्ध काल से हुई देश की बर्बादी को दूर कर स्थिति सुधारने, विद्युतीकरण का विकास करने, परिवहन के साधनों के विस्तार और छोटी-छोटी जोतों को मिलाकर सहयोग समितियों के आधार पर बड़े फार्म (कृषि) स्थापित करने की योजनाएँ आरंभ कर दी। उन्होंने शासन-तंत्र का आकार घटाने, उसमें सुधार करने तथा खर्च में कमी करने पर बल दिया। उन्होंने शिक्षित और मनीषी वर्ग से किसानों, मजदूरों के साथ सहयोग करते हुए नए समाज के निर्माण कार्य में सक्रिय भाग लेने का आग्रह किया। लेनिन ने बतलाया कि मजदूरों का अधिनायकतंत्र वास्तव में अधिकांश जनता के लिए सच्चा लोकतंत्र है। अपनी महत्वपूर्ण सैद्धांतिक कृति ”साम्राज्यवाद: पूंजीवाद का उच्चतम पड़ाव” में लेनिन ने दिखाया कि पूंजीवाद अपने अंतिम पड़ाव पर अपना सर्वस्व जमाने के लिये पूरी कोशिश करेगा, खूनी विनाशकारी जंग भी छोड़ेंगा, और मानवजाति को एक संकट से दूसरे संकट में धकेलता जायेगा, जब तक कि मजदूर वर्ग इस शोषण की व्यवस्था का तख्तापलट करने और समाजवाद लाने के संघर्ष में शोषित व उत्पीड़ित जनसमुदाय को अगुवाई नहीं देगा।

कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एगेल्स ने मानव समाज के विकास के वैज्ञानिक विश्लेषण के जरिये यह स्थापित किया था कि पूंजीवाद की कब्र खोदना और इंसान के शोषण से मुक्त समाजवाद और साम्यवाद का नया युग लाना मजदूर वर्ग का लक्ष्य है। लेनिन ने अपने समय की हालतों में, जब पूंजीवाद साम्राज्यवाद के पड़ाव पर पहुंच गया था, मार्क्सवाद के सिद्धांत की हिफाजत की, उसे लागू किया और विकसित किया।

लेनिन ने दिखाया कि जब पूंजीवाद साम्राज्यवाद के पड़ाव पर पहुंच जाता है, तो श्रमजीवी क्रांति के लिये सभी हालत परिपक्व हो जाती हैं। उन्होंने असमान आर्थिक और राजनीतिक विकास के नियम का आविष्कार किया और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे। कि अंतर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोधी आदि की वजह से यह मुमकिन हो जाती है कि किसी एक देश में क्रांति शुरू हो सकती है। लेनिन ने यह पूर्वाभास दिया कि क्रांति उस देश में शुरू होगी जहां साम्राज्यवाद की वैश्विक कड़ी सबसे कमजोर है, हालांकि वह देश पूंजीवादी तौर पर सबसे अगुवा न भी हो सकता है। क्योंकि साम्राज्यवाद गुलामी और लूट की वैश्विक व्यवस्था है। लेनिन इस निष्कर्ष पर पुहंचे कि साम्राज्यवाद श्रमजीवी क्रांति की पूर्वसंध्या है।

1917 में रूस में अक्टूबर क्रांति की जीत के साथ दुनिया के इतिहास में एक नया युग शरू हुआ। पहली बार, शोषक वर्ग की राजनीतिक सत्ता को मिटाया गया और उसकी जगह पर मजदूर वर्ग की सत्ता स्थापित हुई। दुनियाभर में कई पीढ़ियों के कम्युनिस्ट (साम्यवादी) और क्रांतिकारी उस समय से शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष में लेनिनवाद के सिद्धांत और अभ्यास से प्रेरित और मार्गदर्शित हुए है।

लेनिन ने मार्क्स की उस अभिधारणा का विस्तार किया श्रमजीवी क्रांति से समाजवाद स्थापित करने के लिए श्रमजीवी अधिनयाकत्व के राज्य की स्थापना करना आवश्यक है, जो कि समाज को समाजवाद और साम्यवाद के रास्ते पर अगुवाई देने के लिए मजदूर वर्ग का मुख्य साधन है। रूस में अक्टूबर 1917 में महान समाजवादी क्रांति की जीत और सोवियत संघ में समाजवाद के निर्माण से यह अभिधारणा सही साबित हुई।

लेनिन ने उन सभी के खिलाफ कठोर विचारधारात्मक संघर्ष किया, जो पार्टी को समान विचार वाले सदस्यों की ढुलमूल संस्था के रूप में बनाना चाहते थे। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूंजीपति वर्ग को हराने के लिए मजदूर वर्ग के अंदर जिस अटूट एकता की जरूरत है, उसे हासिल करने के लिए यह काफी नहीं है कि पार्टी के सदस्य पार्टी के कार्यक्रम से सहमत हो और नियमित तौर पर योगदान दें, पार्टी के सदस्यों को पार्टी के किसी संगठन के अनुशासन तले काम भी करना होगा।

उन्होंने लोकतांत्रिक केन्द्रीयवाद (सामूहिक फैसले लेना और व्यक्तित्व दायित्व निभाना) को कम्युनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी के संगठनात्मक सिद्धांत के रूप में बतौर स्थापित किया, जिसके जरिये अधिक से अधिक व्यक्तिगत पहल उभरकर आती है और साथ ही साथ, पार्टी की एकाश्म एकता हमेशा बनी रहती है तथा मजबूत होती रहती है।

लेनिन ने अपनी कृति ”राज्य और क्रांति” में मार्क्सवाद और एंगेल्स की उस मूल अभिधारणा की हिफाजत की कि श्रमजीवी वर्ग के लिए यह जरूरी है कि पूंजीवादी राज्य तंत्र को चकनाचूर कर दिया जाये और उसकी जगह पर एक बिल्कुल नया राज्यतंत्र स्थापित किया जाये जो मजदूर वर्ग की सेवा में काम करेगा। अपनी कृति ”श्रमजीवी क्रांति और विश्वासघातक काउंत्स्की” में लेनिन ने पूंजीवादी लोकतंत्र के बारे में मजदूर वर्ग आंदोलन में भ्रम फैलाने की कोशिशों का पर्दाफाश किया और श्रमजीवी अधिनायकत्व के तहत श्रमजीवी लोकतंत्र के साथ पूंजीवादी लोकतंत्र की बड़ी तीक्ष्णता से तुलना की।

लेनिन ने बार-बार स्वतंत्रता को मजदूर वर्ग के हितों के साथ जोड़कर देखा और वंचितों के सामाजिक अस्तित्व की रक्षा के संदर्भ में व्याख्यागित करते हुए स्वतंत्रता को भाववाद से मुक्त करते हुए भौतिकवाद से जोड़ा। लेनिन ने लिखा है कि हमें कार्ल मार्क्स की महान शिक्षा को इस प्रसंग में ध्यान में रखना चाहिए। मार्क्स ने लिखा है- ”अगर आपको एक होना ही है तो आंदोलन के व्यावहारिक उद्देश्य को संतुष्ट करने के लिए समझौते कीजिए। लेकिन सिद्धांतों के सवाल पर मोल-तोल मत कीजिए। सैद्धांतिक ’छूट’ या ’रियायतें’ कभी मत दीजिए।”

लेनिन ने एंगेल्स के जरिए त्रिस्तरीय संघर्षों की ओर ध्यान खींचा। एंगेल्स ने 1874 में सामाजिक लोकतंत्रवादी आंदोलन के सिलसिले में कहा कि हमारे बीच अभी दो संघर्ष चल रहे हैं- सामाजिक और आर्थिक। लेकिन एंगेल्स सामाजिक लोकतंत्र के इन दो महान संघर्षों के बजाय तीन संघर्षों को मान्यता देते हैं। यह तीसरा संघर्ष है सैद्धांतिक संघर्ष जो अन्य दो संघर्षो के समकक्ष है, कहीं से भी उनसे कम महत्वपूर्ण नहीं है।” 21 जनवरी 1934 को लेनिन की मृत्यु हो गई।