इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 13

Download PDF of This Page (Size: 187K)

वैंथम-

वैंथम ने साधारणतह: हॉब्ज के स्वार्थवाद का समर्थन किया है हॉब्स की तरह उसकी भी राय है मनुष्य मूलत: स्वार्थी है और तब तक कोई कार्य नहीं करना जब तक उसमें उसे कोई लाभ नहीं है।

उसका प्रसिद्ध वाक्य, ”ऐसी कल्पना भी मत करो कोई व्यक्ति अपनी सबसे छोटी अंगुली भी आपके पक्ष में हिलायेगा, जब तक उसे साफ नजर न आ जाए कि इसमें उसका अपना फायदा है,”

किन्तु स्वार्थवाद को महत्व देने के वाद भी वैंथम की गणना उपयोगितावाद (जो कि मूलत: परार्थवादी सिद्धांत है) में इसलिए होती है क्योंकि सुख फलत: में 7वें प्रतिमान में उसमें बहुत से व्यक्तियों के सुख को एक व्यक्ति के सुख की तुलना में शुभ माना है।

वैथम के सिद्धांत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर हर व्यक्ति अपनी मूल प्रवृत्ति में स्वार्थी है तो वह अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख के अनुसार आचरण करेगा ही क्यों? वेंथम ने इसमें उत्तर में 4 नैतिक आदेशों की चर्चा की है उसका दावा है कि व्यक्ति इन चार दबाव के तहत परार्थ की चेतना से कार्य करने को बाध्य होता है।

  • प्राकृतिक दबाव- शारीरिक स्वास्थ्य में लिप्त जन निर्णयों का पालन करना पड़ता है, उदाहरण-कोई भी व्यक्ति पूरे शहर के वाटर (पानी) टैंक (हौज) में जहर नहीं मिलाता क्योंकि यह स्वयं उसके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है

  • सामाजिक दबाव- समाज दव्ारा प्रशंसा का लाभ और निंदा का भय होता हैं।

  • उत्पादकता-अन्य सुखों को उत्पन्न करने वाला सुख-अनौत्पादक सुख।

  • शुद्धता- अमिश्रित सुख- दुखमिश्रित सुख

  • व्यापकता- बहुत से व्यक्तियों का सुख- व्यक्ति का सुख।

वैंथम का उपयोगितावाद

  • वेंथम ने अपने उपयोगितवाद में न्याय के सिद्धांत का भी ध्यान रखा है। उनका प्रसिद्ध कथन है- प्रत्येक व्यक्ति का महत्व केवल व्यक्ति का महत्व है इससे अधिक नहीं। इसका अर्थ है जब हम किसी कार्य की उपयोगिता कम करने के लिए अधिकतम व्यक्तियों से अधिकतम सुखों की गणना करेंगे तो विभिन्न व्यक्तियों की आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों को महत्व नहीं देंगेे। अमीर व्यक्ति का हित उतना ही गिना जाएगा जितना गरीब का, इस सिद्धांत का लाभ यह है कि यह विभिन्न व्यक्तियों में सुख के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करता है।

  • वेंथम मनोवैज्ञानिक सुखवाद तथा नैतिक सुखवाद के समर्थन है और इन्ही के आधार पर अपने उपयोगिता का ढाँचा खड़ा करते है, वे मानते हैं कि कोई नियम अधिकतम व्यक्तियों के लिए अधिकमत उपयोगिता रखता है या नहीं इसका एकमात्र पैमाना सुख है, शेष सभी वांछनीय वस्तुएं सुख के साधन से ही हो सकती है (ज्ञान चरित्र, आदि) उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है-जो कर्म या नियम जितना अधिक सुख उत्पन्न करते हैं उसी अनुपात में वे समाज के लिए उपयोगी या शुभ होते है

  • वेंथम ने सुखों में गुणात्मक अंतर स्वीकार नहीं किया उनका मत है कि विभिन्न सुखों में सिर्फ मात्रात्मक भेद होता है, उनका प्रसिद्ध कथन है ”व्यक्ति (ख्लो एक प्रकार से उतना ही शुभ है जितनी शुभ कविता है।)

  • प्रश्न उठता है यदि सुखों में सिर्फ मात्रात्मक भेद है तो आपसी तुलना के लिए इस मात्रा को मापा कैसे जायेगा? वेंथम से पहले के सुखवादियों ने इस दिशा में विशेष प्रयास नहीं किया था लेकिन वेंथम ने इसके तहत चार प्रतिमानों के आधारों पर सुखों की तुलना की जा सकती है-

  • तीव्रता- अधिक तीव्र सुख-कम तीव्र सुख

  • अवधि- दीर्घकालीक सुख-क्षणिक सुख

  • निश्चिता- निश्चित सुख-अनिश्चित सुख

  • निकटता- तत्काल सुख -भावी सुख

मूल्यांकन-

  • hedonistic (सुखवादी) calculus (गणना) का सिद्धांत अव्यवहारिक है, सुख एक अनुभूति है जिसे सटीक रूप से माना नही जा सकता। वेंथम ने यह नहीं बताया कि यदि hedonistic calculus के विभिन्न प्रतिकारों में अंतर्विरोध हो जाए तो गणना कैसे की जायेगी उदाहरण- अगर मिठाई खाने व उपन्यास पढ़ने के सुख की तुलना करनी हो तो मिठाई के सुख में तीव्रता लेकिन अवधि कम हैं जबकि उपन्यास के सुख में अवधि अधिक है तीव्रता कम है।

  • वेंथम ने जिन 4 नैतिक दबावों की चर्चा की है उनसे प्रतीत होता है कि नैतिकता सिर्फ बाहरी दबावों में टिकी है, जबकि सच यह है कि ऊँचे स्तर की नैतिकता हमेशा आंतरिक प्रेरणा पर आधारित होती है।

  • सुखों में गुणात्मक भेदों को न मानकर वेंथम ने मनुष्य की ऊँची प्रवृत्ति का अपमान किया हैं।

  • अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख का प्रतिमान अल्प संख्यकों के हितों की रक्षा नही कर पाता और बहुसंख्यकों की तानाशाही को प्रस्तावित करना है। (गांधी जी ने इसी आधार पर उपयोगितावाद का विरोध किया)