इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 15

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Sukh Ki Paribhasha
abhavatmak aur bhavatmak

सुख की परिभाषा

अभावात्मक

भावात्मक

ऐपिक्यूटस की परिभाषांं

सिजविक की परिभाषा

शारीरिक पीड़ा और मानसिक कष्ट का अभाव सुख है, सुख का चरम स्तर दुख के पूर्ण विनाश में है।

सुख वह अनुभूति है जिसे विवेकशील प्राणी अनुभव करते है पर वांछनीय समझते है और अन्य अनुभूतिक की तुलना में प्राथमिकता देते है

Sukhvadi Vicharak
indian or western

सुखवादी विचारक

भारत

पश्चिम

चार्वाक, वेदों में भी सुखवाद की झलक, सर्वे भवन्तु सुखित: जैसे श्लोक सुखवाद पर हैं।

अरिस्टीपश, ऐपिक्यूटस, हॉब्स, श्लिम

Sukhvad
meaning of sukhvad

सुखवाद

(ग्रीक शब्द)

सुख और आनंद में कुछ अंतर करते है और कुछ अंतर नहीं करते (मिल) भारत में साध्य को छोड़कर सभी में अंतर मानते हैं

(मनोवैज्ञानिक सुखवाद)

ढवस बसेेंत्रष्कमबपउंसष्झढसपझ सुख का संबंध शरीर - इन्द्री आनंद-बुद्धि, भावना, और मन से

  • सुख-प्राय: क्षणिक, अस्थायी आनंद- अधिक स्थायित्व

  • सुख-अधिक तीव्रता आनंद- प्राय: तीव्रता कम

प्रत्येक व्यक्ति सुख की कामना करता है।

सुख

नैतिक सुखवाद

प्रत्येक व्यक्ति को सुख की कामना करनी चाहिए।

सुख-उदाहरण- स्वादिष्ट भोजन, यौन सुख, उत्तेजक पेयपदार्थ

आनंद - साहित्य, आध्यात्मिक अनुभव।

सुखवाद के प्रकार

Types of Sukhvad
manovaigyanik sukhvad,naitik sukhvad,swarthmulak sukhvad,pararthmulak sukhvad,nikrushth sukhvad,utkrushth sukhvad

मनोवैज्ञानिक सुखवाद

नैतिक सुखवाद

स्वार्थमूलक सुखवाद

परार्थमूलक, सुखवाद

निकृष्ठ सुखवाद

उत्कृष्ठ सुखवाद

हर व्यक्ति का स्वभाव है। वह प्राप्ति का प्रयास करता है।

हर व्यक्ति को नैतिक से अपने सुखों की उपलब्धि का प्रयास करना चाहिए।

व्यक्ति को सिर्फ अपने सुखों की उपलब्धि का प्रयास करना चाहिए। दूसरो के सुखों की चिंता करना उसका कार्य नहीं है।

व्यक्ति को सिर्फ अपने ही नहीं सभी के सुखों पर ध्यान देना चाहिए। सभी के सुखों में उसका अपना सुख स्वाभावत: निहित है।

विभिन्न सुखों को सिर्फ मात्रात्मक भेद होता है गुणात्मक है जैसे चटपटा भोजन करने और दर्शन पाने के सुख में गुणात्मक भेद नहीं है।

सुखों में सिर्फ मात्रात्मक ही नहीं गुणात्मक भेद भी होता है, परोपकार का सुख स्वार्थ में सुख से बेहतर है जैसे- गणित पढ़ने का सुख, चार खाने के सुख से बेहतर होता है।

नैतिक सुखवाद-

  • यह एक मूलक सिद्धांत है-प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य का निर्धारण इस आधार पर करना चाहिए कि कौन सा विकल्प चुनने पर उसे अधिकतम सुख की प्राप्ति होगी, शुभ जैसी अशुभ के निर्धारण का आधार सुख ही है, सुखात्मक विकल्प शुभ है और सुखबाधक विकल्प अशुभ।

  • सुख सर्वोच्च शुभ है अर्थात वह किसी साध्य के लिए साधन न हो अपने आप में ही साध्य है।

सापेक्ष शुभ वे है जो सुख की प्राप्ति में सहायक है, जैसे पारस्परिक स्नेह या साहस जैसे सद्गुण इसलिए शुभ है कि वे अन्तत: सुख की उपलब्धि में सहायक है।

नैतिक सुखवाद की चार शाखायें है (इन पर आगे लिखा है)

मूल्यांकन-

  • आमतौर पर यह सिद्धांत व्यवहारिक जीवन में लागू होता है (विश्व के प्रत्येक धर्म में सर्वे भवन्तु सुखिन, जैसी प्रार्थनाऐं इसलिए है क्योंकि सुख को शुभ माना गया है।

  • समस्या यह है कि इसमें चरित्र ज्ञान और परोपकार जैसे उद्धांत गरीमा से भरे हुए सिर्फ साधन बन जाते है उनका अपना कोई महत्व नहीं रहता।

  • कई सुख ऐसे हैं जो सुख होकर भी वांछनीय नहीं माने जा सकते। जैसे दूसरों को कष्ट में देखकर सुख महसूस करना।

  • यह सिद्धांत इस विचार पर टिका है कि जो कर्म जितना अधिक सुख दे वह उतना ही नैतिक है जबकि सच यह है कि सुख एक आंतरिक वस्तु जिसे ठीक तरह से मापना असंभव है अत: तुलना करना भी संभव नहीं।

मनोवैज्ञानिक सुखवाद-

  • प्रत्येक पास के सभी कर्म सुख प्राप्ति की स्वाभाविक ईर्ष्या में प्रेरित होते हैं।

  • अरिस्टीिपंश, हॉब्स, वेंथम मिल आदि इसी का समर्थन करते हैं।

  • नैतिक सुखवाद इसी पर आधारित है।

मूल्यांकन-

  • सामान्यत: सही है।

  • यह नैतिक सुखवाद का आधार नहीं बन सकता ऐसा 2 कारणों से होता हैं-

  • ’है’ से चाहिए का निष्कर्ष निकालना अनुचित।

  • अगर मनोवैज्ञानिक सुखवाद पूर्णत: सत्य है तो नैतिक सुखवाद का सिद्धांत अनावश्यक और निरर्थक है।

  • इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाता कि कई लोग जानबूझकर दुखात्मक विकल्पों को क्यों चुनते हैं। उदाहरण आत्महत्या की कोशिश आदि।

सुखवाद का विरोधाभास-प्रसिद्ध उपयोगितावादी विचारक सिजविक ने मनोवैज्ञानिक सुखवाद की आलोचना करने के लिए सुखवाद का विरोधाभास दिया है। उसका तर्क है कि अगर कोई व्यक्ति हर क्षण सुख प्राप्ति के बारे में सोचता रहेगा। (जैसा कि मनोवैज्ञानिक सुखवादी कहते हैं) तो वह कभी सुख प्राप्त कर ही नहीं पाएगा, क्योंकि सुखप्राप्ति के लिए जरूरी है कि तर्क करते समय व्यक्ति सुख को भूल जाए उदाहरण- यदि कोई व्यक्ति फुटबाल खेलते समय खेल में ध्यान न दे और खेल से मिलने वाले सुख के बारे में सोचता रहे तो उसे खेल में सुख मिलेगा ही नहीं)

सिजविक का दावा है कि यह विरोधाभास मनोवैज्ञानिक सुखवाद को खारिज कर देता है क्योंकि इससे सिद्ध होता है कि कर्म करते समय सुख हमारा तात्कालिक और प्रत्यक्ष प्रयोजन नहीं हो सकता।

मनोवैज्ञानिक सुखवादियों का दावा है कि सुखवाद के विरोधाभास से उनका सिद्धांत खारिज नहीं होता। इस विरोधाभास से सिर्फ इतना सिद्ध होता है कि सुख के विषय में हर क्षण सोचते रहने से सुख प्राप्त नहीं होता। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि हमारे कर्म अन्तत: सुख के प्रयोजन को लेकर नहीं चलते हैं।

Samanvay Se Bane 4 Sidhhant
nikrushth swarthmulak sukhvad & utkrushth swarthmulka sukhvad, nikrushth pararthmulak sukhvad & utkrushth pararthmulak sukhvad

समन्वय से बने चार सिद्धांत

निकृष्ठ

स्वार्थमूलक

सुखवाद

उत्कृष्ठ स्वार्थमूलक

सुखवाद

निकृष्ठ

परार्थमूलक

सुखवाद

उत्कृष्ठ

परार्थमूलक

सुखवाद

अरिस्टीपस, हॉब्स

सिर्फ अपने सुख पर ध्यान दें किन्तु ध्यान रखो कि सुखों में गुणात्मक भेद होता है सो ऊँचे सुखों पर ध्यान दो नीचे सुखों पर नहीं

सिर्फ अपने सुख पर ध्यान देंना चाहिए। सारे सुख बराबर है उनमें सिर्फ मात्रा भेद है गुण भेद नहीं (अगर समाज के अधिकांश व्यक्तियों को क्रिकेट देखना अच्छा लगता तो वही सुख है। )

सिर्फ अपने नहीं, संपूर्ण समाज के सुखों पर बल दो और यह भी ध्यान रखो कि सुखों में गुणात्मक भेद होता, उच्च कोटी के सुखों को वरीयता दी जानी चाहिए। (क्रिकेट देखने से अच्छा सकुमार गंधर्व को सुनना।

सारे सुख बराबर है सिर्फ अपने सुख पर ध्यान दो।

ऐपिक्यूटस

वैंथम

जे.एस. मिल

निकृष्ठ स्वार्थमूलक सुखवाद-

  • समर्थक-अरिस्टीपश, हौब्स, चार्वाक (धूर्त)

  • विचार- एकमात्र लक्ष्य-अधिकतम व्यक्तिगत सुख-इसी से शुभ अशुभ का निर्धारण होता है।

  • सुखों में सिर्फ मात्राभेद, गुणभेद नहीं जो सुख अधिक तीव्र है या अधिक समय मिलने वाला है वह अधिक शुभ है।

  • आमतौर पर शारीरिक सुख मानसिक सुख से ज्यादा है क्योंकि उसमें तीव्रता ज्यादा होती है, (इसलिए कुछ लोग इस सिद्धांत का इंद्रीय तृप्ती वाद भी कहते हैं)

  • वर्तमान सुख भविष्य के सुख से बेहतर होता है।

  • निश्चित सुख, संभावित सुख से बेहतर (हाथ की चिड़िया, झाड़ी की 2 चिड़िया से बेहतर)

मूल्याकंन:- यह सिद्धांत सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त कर सकता है, सुखों में गुणभेद नहीं मानना, मनुष्य की उच्च मानसिक क्षमताओं का अपमान है।

उत्कृष्ट स्वार्थमूलक सुखवाद-

  • इस सिद्धांत के ज्यादा उदाहरण नहीं मिलते है, आमतौर पर ऐपिक्यूटस अकेला बड़ा विचारक है जो इसके पक्ष में है उसके विचार को ऐपियूरिज्म कहा जाता है।

  • आजकल इंग्लैंड में ऐपियूरिकवाद का लोकप्रिय अर्थ मोज मस्ती से है लेकिन सच यह है कि ऐपिक्यूटस निकृष्ट सुखवाद न होकर उत्कृष्ट सुखवादी था।

  • इस सिद्धांत की अनिवार्य विशेषतायें केवल 2 हैं-

  • स्वार्थ पर बल अर्थात व्यक्ति को सिर्फ अपने हितो के संबंध में सक्रिय होना चाहिए।

  • सुखों में गुणात्मक भेद की स्वीकृति।

  • ऐपिक्यूटस के विचारों के आधार पर इस सिद्धांत के कुछ और लक्षण देखे जा सकते है (ये ऐपिक्यूटसवाद में है)

  • सुख का अर्थ शारीरिक व मानसिक दुखों का अभाव।

  • नैतिक सुख शारीरिक सुख से बेहतर एक तो उनमें स्थायित्व होता है दूसरे के अमिश्रित सुख होते है जबकि शारीरिक सुखों में दुख भी होता है।