इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 16

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थॉमस हाब्स का स्वार्थवाद-

  • मनोवैज्ञानिक स्वार्थवाद का पूरा समर्थन-व्यक्ति का संपूर्ण जीवन उसकी स्वार्थमूलक ईच्छाओं की पूर्ति के प्रयास में गुजरता है वह भौतिक वस्तुओं को ही नही बल्कि स्नेह प्रेम, त्याग जैसे गुणों को भी इसलिए महत्व देता है क्योंकि वे उसकी ईच्छा पूर्ति में सहायक होते हैं

  • स्वार्थी होना बुरा नहीं है यह मनुष्य की प्रवृत्ति है जिस तरह कोई पत्थर आकाश में फुट नहीं सकता वैसे ही कोई मनुष्य परोपकारी नहीं हो सकता है।

    Swarthvad
    manovaigyanik swarthvad, naitik swarthvad or uska mahatva

    स्वार्थवाद (egoism) (अंहभाव) मनुष्य स्वार्थी होता है, और मनुष्य को स्वार्थी होना भी चाहिए

    मनोवैज्ञानिक स्वार्थवाद

    नैतिक स्वार्थवाद

    महत्वपूर्ण

    प्रत्येक मनुष्य स्वार्थी होता है अर्थात वह सिर्फ अपने हित या कल्याण के लिए सभी कार्य करता है

    मनुष्य को स्वार्थी होना चाहिए अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को सिर्फ अपने हित सुख या कल्याण के लिए सभी कर्म करने चाहिए

    आमतौर पर जो व्यक्ति नैतिक स्वार्थवादी होगा वह सुखवादी भी होगा। जैसे- अरिस्टीपस, श्लिम इन दोनों के समर्थक रहे किन्तु यह अनिवार्य नही है कि स्वार्थवादी सुखवादी हो ही, यह बात से तय होगा कि वह अपने स्वार्थ की व्याख्या किस प्रकार करता है। अगर कोई मान ले उसका स्वार्थ सुखों को हासिल करने में नहीं बल्कि ज्ञान व सदगुण अर्जित करने में है और उन्हें पूरा करने की प्रक्रिया में कष्ट उठाने तो वह स्वार्थवादी होकर भी सुखी नहीं होगा।

    नैतिक स्वार्थवाद को सिद्ध करने के लिए इस सिद्धांत का प्रयोग होता है, हॉब्स और श्लिम जैसे विचारकों ने इसी को आधार बनाया है।

    इस सिद्धांत का आशय यह है कि व्यक्ति अनिवार्य तह: स्वार्थी होता है। यह उम्मीद करना कि वह अपने स्वार्थ की बलि चढ़ाकर समाज को फायदा पहुंचाए यह उम्मीद करना व्यर्थ हैं।

    यह भी जरूरी नहीं है कि स्वार्थवादी नैतिक सिद्धांत मानने वाला व्यक्ति आत्म केन्द्रित और समाज से कटा हुआ हो, यह भी इस बात से तय होगा कि वह अपने स्वार्थ की व्याख्या किस प्रकार करें जैसे अगर कोई मान ले कि उसका स्वार्थ अच्छी सामाजिक व्यवस्था बनाने में ही निहित है तो वह स्वार्थवादी हो।

Haical Egoism (अहंभाव)

अधिकांश समर्थक सुखवादी है लेकिन यह जरूरी नहीं असली प्रश्न यह है कि क्या मनोवैज्ञानिक स्वार्थवाद सचमुच नैतिक स्वार्थवाद की स्थापना कर पाता है या नहीं, इसमें 2 समस्यायें है।

  • मनोवैज्ञानिक तथ्य से नैतिक निष्कर्ष निकालना तर्कशास्त्र का उल्लंघन है। ”है” मूलक वाक्य से चाहिये। मूलक निष्कर्ष नहीं निकल सकता, आधार कथन तथा निष्कर्ष कथन में संगति होनी चाहिए।

  • अगर मनोवैज्ञानिक स्वार्थवाद पूर्णत: सत्य है अर्थात यह सत्य है कि कोई भी मनुष्य स्वार्थी होने को बाध्य है तो नैतिक स्वार्थवाद एक आवश्यक सिद्धांत हैं। जैसे हम जानते है कि सांस लेना मनुष्य के लिए अनिवार्य है ऐसे में यह कहना कि मनुष्य का सांस लेना नैतिक है या मनुष्य को सांस लेना चाहिए। एक अनावश्यक कथन है क्योंकि इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है गौरतलब है कि नीतिशास्त्र का संबंध हमारे कर्मो से हो न कि उन कर्मो से जिनके लिये हम बाध्य है।

मनुष्य अपने समाज की रक्षा जीवन का बलिदान कर देते है क्या व्यक्तियों की व्याख्या मनोवैज्ञानिक वाद कर सकता है, जब वे जीवित रहेंगे तब उनके कौन से स्वार्थ होगे।

इस प्रकार के सुख को खारिज करता है बच्चे के लिए किया गया निरपेक्ष रूप में स्वार्थ माना जा सकता हैं।

मूल्यांकन-

  • पूर्णत: व्यक्तिवादी सिद्धांत समाज की अपेक्षा।

  • कई स्थितियों में अनैतिक होने का खतरा, अगर मेरा स्वार्थ इस में है कि मेरे पड़ोसी का घर गिर जाए ताकि मेरे घर में धुप आ सके तो मुझे क्या करना चाहिए।

  • मनुष्य की अनन्त: ईच्छायें है लेकिन 2 सबसे महत्वपूर्ण हैं-

    • अपने जीवन की रक्षा की ईच्छा।

    • अधिकतम सुख प्राप्त करने की ईच्छा।

    • शेष सभी ईच्छायें इन्हीं 2 से आती है।

  • नैतिक स्वार्थवाद का समर्थन-शुभ और अशुभ का संबंध मनुष्य के संबंधों से है जिस वस्तु या कर्म से किसी मनुष्य की ईच्छा पूर्ण होती है वह शुभ है और जिससे ईच्छा शांति में बाधा हो वह अशुभ है।स्पष्ट है कि शुभ और अशुभ वस्तुनिष्ठ और निरपेक्ष सिद्ध नहीं है जो किसी एक व्यक्ति के लिए शुभ है दूसरे के लिए मनुष्य अशुभ हो सकता है। एक ही व्यक्ति अलग-अलग समय में एक वस्तु को शुभ और अशुभ मान सकता है ऐसा कहकर हॉब्स ने व्यक्तियों नीति मीमांसा में आत्मनिष्ठतावाद तथा सापेक्षवाद को स्वीकार कर लिया है।

  • प्रश्न यह है कि अगर प्रत्येक व्यक्ति इतना स्वार्थी है तो वह समाज के नियमों राज्यों के कानूनों को क्यो स्वीकार करता है जबकि उनमें से कई व्यक्ति की ईच्छाओं के विरुद्ध होते है।इसके लिए हॉब्स ने सामाजिक समझौते का सिद्धांत, जिसका कि सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था का निर्माण भी मनुष्य ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए किया है।हॉब्स के अनुसार समाज के विकास से पहले प्राकृतिक स्थिति भी हर व्यक्ति का शत्रु था उस समय आपसी संघर्ष इतना था कि कोई भी व्यक्ति कभी सुरक्षित नहीं, इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए सभी व्यक्तियों ने समझौता किया और अपनी-अपनी शक्तियां राज्य को सोंपा तथा तय किया कि वे आपसी संघर्ष को त्यागकर राज्य के आदेशों को स्वीकार करें।

मूल्यांकन:-

  • सामान्यत: सही सिद्धांत क्योंकि विषय आमतौर स्वार्थी होता ही है।

  • सामाजिक समझौते के सिद्धांत के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं है। कई विचारक मानते है कि समाज और राज्य प्राकृतिक संस्था है।

  • परोपकार और आत्मविश्वास जैसे कर्मो की व्याख्या हॉब्स के स्वार्थवाद से नहीं हो पाती।